दीपिका पादुकोण ने कैसे पाया डिप्रेशन पर काबू?

By Medically reviewed by Dr. Hemakshi J

बॉलीवुड ऐक्ट्रेस और जवा दिलों की धड़कन दीपिका पादुकोण को देश में कौन नहीं जानता। उन्होंने अपने फिल्मी करियर में काफी नाम कमाया है। लेकिन, यहां हम बात दीपिका के फिल्मी करियर की नहीं, उनकी निजी जीवन के कर रहे हैं। डिप्रेशन से दीपिका कैसे बाहर आई इस सवाल के जवाब को उन्हीं के शब्दों में समझने की कोशिश करते हैं। उन्होंने कई बार इंटरव्यू में अपने डिप्रेशन से जुड़ी बातें मीडिया के साथ शेयर की हैं और इससे पीड़ित व्यक्तियों को हिम्मत भी बंधाई है।

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तब हुआ डिप्रेशन का अहसास

बहुत-से इंटरव्यू में मीडिया से बातचीत करते हुए दीपिका पादुकोण ने बताया कि करीब तीन साल पहले मेरी फैमिली मुझसे मिलने मुंबई आई हुई थी। जब वो लोग वापसी के लिए निकलने वाले थे, तो मुझे बेहद अजीब लग रहा था। वो जाने के लिए तैयार थे और मैं बेडरूम में सिमटी हुई बैठी थी। मुझे परेशान देखकर मां ने मुझसे पूछा कि सब ठीक तो है न? मैंने ‘हां’ में सिर हिला दिया। मां ने दो से तीन बार पूछा और मैं हर बार टालती रही। लेकिन, आखिर में मेरा गला भर आया और मैं फूट-फूटकर रो पड़ी। मेरी ऐसी हालत देखकर घरवालों ने टिकट कैंसल करवा दिया।

मैं अपनी मां से कहना चाहती हूं कि अगर वह न होतीं, तो आज मैं यहां न होती। हर पल मेरा साथ देने के लिए शुक्रिया मां। मां हमेशा मेरे साथ रहीं। मुझे कुछ भी पता नहीं लग पा रहा था कि मेरे साथ क्या हो रहा था।

मैंने एक अजीब-सा अकेलापन महसूस किया था। इस घटना के बाद पहली बार लगा कि मुझे किसी काउंसलर को दिखाना चाहिए। तब पहली बार मैंने ऐना चैंडी को दिखाया था। हालांकि, इसके बावजूद मैं दवाइयां नहीं खाना चाहती थीं। दरअसल, हमें ऐसा लगता ही नहीं कि हमें कोई मानसिक दिक्कत भी हो सकती है लेकिन, यह कड़वा सच है। सच्चाई यह है कि हमारे लिए मानसिक स्वास्थ्य को समझना बेहद जरूरी है।

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क्यों बताया लोगों को?

दीपिका पादुकोण ने काफी समय तक इस बारे में लोगों को  मैं चाहती थी कि भारत में इसके प्रति लोगों का नजरिया बदले। मैं उस स्टेज पर पहुंच चुकी थी, जहां मैंने महसूस किया कि क्यों मैं लोगों को यह नहीं बता सकती कि मैं क्या महसूस करती हूं। लेकिन जब मैंने मदद लेने का फैसला लिया तब मैं अपने इलाज के बारे में लोगों से शेयर करने में पीछे नहीं हटी।

मेरा मानना है कि डिप्रेशन को लेकर हमें बचपन से ही सीरियस होना चाहिए। मेंटल हेल्थ भी स्कूल के पाठ्यक्रम का हिस्सा होना चाहिए। इससे बच्चों को इससे जुड़े मिथक का भी पता चलेगा। फिजिकल एज्युकेशन मेरे स्कूल के पाठ्यक्रम का हिस्सा था, इसलिए मैं उसके बारे में टीचर और पैरंट्स या किसी से भी बात कर सकती थी। लेकिन, मेंटल हेल्थ कोर्स में न होने के कारण, इस पर बात करने के लिए कोई नहीं था। मैंने महसूस किया है कि शहरों में तो फिर भी इस बारे में लोग बात कर लेते हैं लेकिन, गांवों में तो लोग इससे अनजान ही हैं। वहां खासतौर पर मानसिक स्वास्थ्य के बारे में काम करने की जरूरत है। लोगों को इस बारे में शिक्षित करना जरूरी है।

तो ये रही कहानी दीपिका पादुकोण के डिप्रेशन पर काबू पाने की। यदि आप डिप्रेशन से पीड़ित हैं, तो दीपिका की ये कहानी आपको इससे निकलने में प्रेरणा दे सकती है।

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रिव्यू की तारीख सितम्बर 10, 2019 | आखिरी बार संशोधित किया गया सितम्बर 10, 2019