ई-सिगरेट पीने से अमेरिका में सैकड़ों लोग बीमार, हुई 5 लोगों की मौत

By Medically reviewed by Mayank Khandelwal

अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (एएमए) ने अमेरिकी लोगों से ई-सिगरेट ना पीने की सलाह दी है। हाल ही में अमेरिका में ई-सिगरेट पीने से 450 लोगों को फेफड़ों से जुड़ी बीमारी हुई है और इससे संबंधित बीमारी से पांच लोगों की जान जा चुकी है। एमए अमेरिका के दिग्गज डॉक्टरों का एक समूह है। एमए ने डॉक्टरों से अपील की है कि वो मरीजों को ई-सिगरेट के नुकसान के बारे में जागरूक करें। एमए के मुताबिक, ई-सिगरेट में टॉक्सिन्स और केरसिनोजेन्स होते हैं। इसके बाद अमेरिकी स्टेट्स सेंटर्स फोर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन ने शुक्रवार को लोगों से ई-सिगरेट ना पीने को लेकर एडवाइज जारी की। वैज्ञानिक फिलहाल ई-सिगरेट से होने वाली फेफड़ों की बीमारी के संबंध की जांच कर रहे हैं।

वहीं, पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स को अभी तक संक्रमित बीमारी का कोई सुराग नहीं मिला है। उनका मानना है कि लोगों के केमिकल के संपर्क में आने से उन्हें फेफड़ों की बीमारी हुई है। हालांकि, जांचकर्ताओं को अभी तक इसका सटीक कारण नहीं मिला है लेकिन, वेपिंग डिवाइसेज के अंदर जरूर इससे संबंधित कुछ मिला है।

ये भी पढ़ें

यह 5 स्टेप्स अपनाकर पाएं स्मोकिंग की लत से छुटकारा

ई-सिगरेट के प्रमुख पदार्थ

ई-सिगरेट में तीन प्रकार के पदार्थ होते हैं। पहला फ्लेवर, मीठापन और सॉल्वेंट। सॉल्वेंट वह पदार्थ है, जिसका इस्तेमाल टीएचसी या सीबीडी सहित निकोटिन या फिर मारिजोना से पैदा होने वाले कपाउंड को डिजॉल्व करने के लिए किया जाता है।

सॉल्वेंट का सबसे ज्यादातर इस्तेमाल वेप्स सब्जियों ग्लिसरीन और प्रोपेयलेन ग्लायसोल (propylene glycol) में किया जाता है। मारीजॉना में टीएचसी नामक पदार्थ होता है, जिससे नशा होता है।

सीबीडी, या केनाबिडॉयल भी मारीजोना में पाया जाता है लेकिन, इसका साइकोएक्टिव प्रभाव नहीं पड़ता है। वेजीटेबल ग्लिसरीन से विजिबल एरोसोल (aerosol) या क्लाउड पैदा होता है, जो वेपिंग में देखा जा सकता है। इसे सब्जियों के तेल से बनाते हैं। प्रोपायलेन ग्लायसोल एक स्पष्ट द्रव्य पदार्थ होता है। यह रंगहीन होने के साथ इसमें स्मैल नहीं आती है। मीठे में सुक्रोलोज और एथायल मालटोल मिला होता है।

ये भी पढ़ें

पुरुषों की स्मोकिंग की वजह से शिशु में होने वाली परेशानियां

यूएसएफडीए की राय

ई-लिक्विड फ्लेवर्स की एक बड़ी रेंज होती है। इसे वाइन के स्वाद की तरह ही फील किया जा सकता है। यह ‘नोट्स ऑफ वनीला’ या ‘बैरीज एंड हर्बल नोट्स’ की तरह होती है। यह सभी इनग्रीडिएंट एक सॉल्वेंट होते हैं। वहीं, मीठेपन और फ्लेवर को अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (USFDA) द्वारा सुरक्षित माना जाता है।

लेकिन, इनका डाइजेशन तभी होता है जब इन्हें फूड के रूप में खाया जाए। इन इनग्रीडिएंट्स को जब एरोसोल पर गर्म किया जाता है तो इनमें अलग-अलग तरह के पदार्थ निकलते हैं। इन पदार्थों को सूंघने पर मनुष्य की बॉडी में इसका क्या प्रभाव पड़ता है इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है।

अध्ययनों में क्या सामने आया?

अध्ययनों में इस बात का पता चला है कि एरोसोलाइज्ड प्रोपायलेन ग्लायसोल को सूंघने पर दमे की बीमारी होती है। 2012 में एक मामले में यह सामने आया था कि छह महीने तक एक महिला ने वेपिंग की, जिसके बाद उसे एक्सोजेनियस लिपॉयड (exogenous lipoid) निमोनिया हो गया था। डॉक्टरों का कहना था कि ई-सिगरेट में ऑयल्स के सॉल्वेंट्स होते हैं, संभावित रूप से महिला को इनसे यह परेशानी हुई। डॉक्टर ने कहा कि वेपिंग छोड़ने पर उसकी स्थिति में सुधार आया।

जर्नल केमिकल रिसर्च इन टॉक्सीलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन में कुछ अहम तथ्य सामने आए। अध्ययन के मुताबिक, ई-सिगरेट में सुक्रालोज पदार्थ पाया जाता है। इसे गर्म करने पर यह ब्रेक डाउन होता है, जो कैंसर का कारण बनता है। वहीं, टोबेको कंट्रोल में प्रकाशित एक शोध में पाया गया कि दालचीनी जैसे फ्लैवर पदार्थ को गर्म करने पर यह जहरीला बन जाता है।

हाल ही में येल विश्वविद्यालय में एक शोध प्रकाशित हुआ। शोध के मुताबिक, वनिला बीन के रस को एरोसोलाइज्ड करने पर यह एसेटल्स नामक पदार्थ में तब्दील हो जाता है। शोधकर्ताओं ने कहा कि यह पदार्थ फेफड़ों में इरिटेशन पैदा कर सकते हैं। इन्हें सूंघने पर फेफड़े खराब भी हो सकते हैं।

निकोटिन, टीएचसी और सीबीडी

सामान्य सिगरेट में निकोटिन सबसे ज्यादा लत लगाने वाला पदार्थ होता है। यह युवाओं के दिमाग पर असर डाल सकता है, जिनका दिमाग विकासित हो रहा होता है। कुछ प्रयोगशालाओं में पता चला कि निकोटिन से ट्यूमर पैदा हो सकता है। अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन का कहना है कि निकोटिन ब्लड प्रेशर को बढ़ा सकता है। यह हार्ट रेट को भी बढ़ा सकता है। इसके साथ ही यह आर्ट्रीज को सिकोड़कर हार्ट अटैक के खतरे को बढ़ा सकता है।

सीबीडी से कई प्रकार की स्वास्थ्य संबंधित समस्याएं जैसे अनिद्रा, एंजाइटी और क्रोनिक पेन का इलाज किया जाता है। हालांकि, इनमें से ज्यादातर दावों की पुष्टि नहीं हुई है। सीबीडी पर कुछ चुनिंदा शोध हुए हैं लेकिन, यह उतने बड़े नहीं हैं।

इस पर व्यापक स्तर पर क्लीनिकल ट्रायल्स की जरूरत है, जिससे यह पता चल सके कि यह पदार्थ सुरक्षित है या नहीं। वेपिंग में टीएचसी के सूंघने के प्रभाव के बारे में भी कम जानकारी उपलब्ध है। हाल ही में देशभर में रेस्पिरेटरी से जुड़ी समस्याओं में टीएचसी का संबंध सामने आया है। हेल्थ ऑफिसर्स का कहना है कि लोगों को इसका सेवन करने से बचना चाहिए।

मेटल

ई-सिगरेट पर ई-लिक्विड को मेटल कॉयल्स के साथ गर्म करने पर इसमें एक एरोसोल निकलता है। इन मेटल कॉयल्स से विभिन्न प्रकार के पदार्थ बनाए जा सकते हैं। इससे एलॉय आयरन, क्रोमियम और एल्युमीनियम कंथाल बनाया जा सकता है। इससे नेकल और क्रोमियम का कॉम्बिनेशन भी बनाया जा सकता है।

2018 में जॉन्सन होपकिन्स स्टडी को रिलीज किया गया। इस शोध में पाया गया कि इन मेटल्स लीच का वेपिंग एरोसोल (aerosol) में खतरनाक स्तर है। शोध के मुताबिक, ‘ई-सिगरेट संभावित रूप से जहरीले मेटल्स (क्रोमियम, नेकल और लेड) के एक्सपोजर का सोर्स है और यह मेटल्स (मैग्नीज और जिंक) सूंघने पर जहरीले होते हैं।’

यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि जहरीले कैमिकल्स या पेस्टिसाइड्स ई-लिक्विड्स की सप्लाई में पाए गए हैं। यह भी स्पष्ट नहीं है कि ई-लिक्विड्स को गर्म करने पर यह दूसरे अन्य पदार्थों में बदलते हैं। सड़कों पर मिलने वाले वेप्स में दूषित पदार्थ की मिलावट या स्ट्रीट वेप्स इन बीमारियों का कारण हो सकते हैं। ई-सिगरेट पीने के बाद जिन लोगों को रेस्पिरेटरी की दिक्कत हुई है उन लोगों में से 80 सैंपल्स की जांच एफडीए कर रहा है। इस जांच के नतीजे अभी तक नहीं आए हैं।

ये भी पढ़ें

प्रेग्नेंसी के दौरान स्मोकिंग करने से बच्चा हो सकता है बहरा

अभी शेयर करें

रिव्यू की तारीख सितम्बर 10, 2019 | आखिरी बार संशोधित किया गया सितम्बर 11, 2019

सूत्र
सर्वश्रेष्ठ जीवन जीना चाहते हैं?
स्वास्थ्य सुझाव, सेहत से जुड़ी नई जानकारी के लिए हैलो स्वास्थ्य न्यूज लेटर प्राप्त करें