हिंदी दिवस : क्या आपको भी हिंदी में ‘भड़ास’ निकालने से ही सुकून मिलता है?

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‘अबे चल, तेरी हिम्मत कैसे हुई ये सब बोलने की’, ‘एक कंटाप देंगे ना..सारी हेकड़ी निकल जाएगी’, ‘दिमाग मत खा’ इन वाक्यों से मन की जो भड़ास निकलती है न, वो अंग्रेजी में ‘हाऊ डेर यू टू से लाइक दिस’, ‘आई विल स्लैप यू’ आदि जैसे सेंटेंस में निकलनी थोड़ी ही नहीं, काफी मुश्किल है। इसमें कोई दो राय नहीं कि हिंदी भाषा एक ऐसी भाषा है (हिंदी भाषियों के लिए), जिसमें बात करने के बाद ही मानसिक सुकून मिलता है, दिल को चैन मिलता है और यूं कहें कि मन की पूरी ‘भड़ास’ निकल जाती है।

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अगर किसी से अपने जज्बात व्यक्त करने हों, तो इस बारे में सबसे पहले हमारे दिमाग में हिंदी में ही चिंतन होगा। अगर किसी को गरियाना हो, तो हिंदी में गरियाने का जो मजा है, वो किसी और भाषा में नहीं है। वहीं, अगर मानसिक स्वास्थ्य की बात करें, तो हिंदी में बोलने के बाद दिमाग को सुकून मिलता है, वो अन्य भाषा में मिलना थोड़ा मुश्किल हो जाता है।

‘‘तुमसे मिलकर बहुत अच्छा लगा’’! इस एक वाक्य में अपनापन, रिश्तों की नजदीकियों का अहसास हो रहा है। लेकिन, वहीं अगर हम अंग्रेजी में कहेंगे ‘नाइस टू मीट यू’…तो शायद ये वाक्य आपको उन सभी लोगों के मुंह से सुना हुआ वाक्य लगे, जो ज्यादा लंबे समय तक आपके दिल को न छुए।

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आखिर क्यों मिलता है हिंदी में सुकून?

भले ही हम बाहर लोगों के साथ अंग्रेजी में गिटिर पिटिर कर लें, लेकिन, हमें जो बात करनी है, उसके बारे में हम पहले हिंदी में ही सोचते हैं, हिंदी में ही कल्पना करते हैं। किसी को प्यार से बुलाना हो, तो हिंदी में बुलाने में अलग की मजा आता है।

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निकिता भल्ला एक एमएनसी की एडिटर इन चीफ हैं। हैलो स्वास्थ्य ने हिंदी भाषा को लेकर उनकी राय जाननी चाही। निकिता कहती हैं कि यूं तो प्रोफेशनल लाइफ में वो अंग्रेजी भाषा बोलना पसंद करती हैं लेकिन, जब बात आए पर्सनल लेवल की, तो उन्हें अपनी ही भाषा बोलना पसंद है।

बातचीत आसान लगती है

सुनीति एक हिंदी राइटर है और उनकी अंग्रेजी भी काफी अच्छी है। सुनीति ने भी यही कहा कि अगर उन्हें अपनी भावनाएं व्यक्त करने को कहा जाए और अपने पूरे दिल से बोलने के लिए कहा जाए, तो वो भी हिंदी में बोलना और व्यक्त करना चाहेंगी। सुनीति का कहना है कि वो जितना भी अंग्रेजी गाने सुन लें, जब तक वो हिंदी गाने न सुनें, दिल को सुकून नहीं मिलता। सुनीति कहती हैं हिंदी में बातचीत करना उन्हें ज्यादा आसान लगता है।

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ज्यादा सोचना नहीं पड़ता

वहीं, मोना भी एक कंटेट राइटर हैं। उनका कहना है कि वो भले ही अंग्रेजी में एक घंटे का लैक्चर दे दें लेकिन, हिंदी में 10 मिनट बोलना भी उनके दिल को सुकून देता है। इससे उनकी भड़ास निकलती है। मोना कहती हैं कि हर भावनाओं को व्यक्त करने के लिए वो सबसे ज्यादा कंफर्टेबल हिंदी में ही होती हैं। मोना कहती हैं कि हिंदी बोलने से पहले ज्यादा सोचना नहीं पड़ता, जो कहना होता है, कह दिया जाता है।

भले ही अब हिंदी में आधुनिकीकरण हो गया है और अब हिंदी ने भी खुद में कई भाषाओं को समावेष कर लिया है। इसलिए, हिंदी अब यूथ की भाषा बन गई है, जिसे बोलने में, कुछ व्यक्त करने में, लोग काफी एक्सपेरिमेंट भी कर रहे हैं और इसका काफी मजा भी ले पा रहे हैं।

हालांकि, ये बात सिर्फ हिंदी पर ही लागू नहीं है कि इसमें हम अपनी भावनाएं ज्यादा अच्छी तरह व्यक्त कर पाते हैं। ये बात मातृभाषा पर लागू होती है। जिसकी जो भी मातृभाषा है, वो अपने कंफर्ट के हिसाब से इसमें सब कुछ व्यक्त करना बेहतर समझता है।

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रिव्यू की तारीख सितम्बर 13, 2019 | आखिरी बार संशोधित किया गया सितम्बर 13, 2019

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