कैंसर से दो साल तक लड़ने के बाद ऋषि कपूर ने दुनिया को कहा, अलविदा

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अपडेट डेट जून 1, 2020 . 4 मिनट में पढ़ें
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Rishi Kapoor Died- बॉलीवुड के लोकप्रिय और दिग्गज अभिनेता ऋषि कपूर ने 67 वर्ष की उम्र में 30 अप्रैल को दुनिया को अलिवदा कह दिया है। ऋषि कपूर की मृत्यु की खबर की पुष्टि उनके भाई रणधीर कपूर ने की। आपको बता दें कि, ऋषि कपूर का निधन ल्यूकेमिया कैंसर (Leukemia Cancer) की बीमारी की वजह से हुआ है, जिसके बारे में उन्हें दो साल पहले 2018 में पता लगा था। 29 अप्रैल की देर रात ऋषि कपूर को मुंबई के सर एचएन रिलायंस फाउंडेशन हॉस्पिटल में भर्ती करवाया गया था और 30 अप्रैल की सुबह उनकी मृत्यु की खबर दी गई। आखिरी समय उनके साथ उनकी पत्नी नीतू कपूर थीं।

ऋषि कपूर का निधन – अमिताभ बच्चन ने कहा- मैं टूट गया हूं

एक दिन पहले यानी 29 अप्रैल को ही बॉलीवुड के मशहूर एक्टर इरफान खान की भी कोलन इंफेक्शन की वजह से मृत्यु हो गई थी, जिसके बाद ऋषि कपूर ने आखिरी सांस ली। एक के बाद एक बुरी खबर की वजह से पूरे बॉलीवुड जगत में शोक की लहर है। अमिताभ बच्चन ने ट्वीट कर लिखा कि, ‘वो चले गए, ऋषि कपूर चले गए, मैं बुरी तरह टूट गया हूं।’ इसके बाद सभी बॉलीवुड स्टार्स द्वारा इस बुरी खबर पर शोक व्यक्त किया गया। गौरतलब है कि, पिछले गुरुवार को भी ऋषि कपूर को अस्पताल में भर्ती करवाया गया था, लेकिन कुछ ही घंटे बाद डिसचार्ज कर दिया गया था।

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ऋषि कपूर का निधन – ल्यूकेमिया के थे शिकार (Rishi Kapoor Death)

ऋषि कपूर की फैमिली की तरफ से जारी बयान के मुताबिक, ऋषि कपूर ल्यूकेमिया की बीमारी से ग्रसित थे, जो कि एक प्रकार का कैंसर होता है। बयान में कहा गया कि, ‘दो साल तक ल्यूकेमिया से लड़ने के बाद आज सुबह 8.45 बजे अस्पताल में हमारे प्रिय ऋषि कपूर का निधन हो गया है। दो साल तक दो महाद्वीपों में ट्रीटमेंट के दौरान वह जिंदगी को पूरी तरह से जीने के प्रति दृढ़ थे। उनका पूरा ध्यान फैमिली, फ्रेंड्स, फूड और फिल्म के लिए था और इस समय के दौरान जो भी व्यक्ति उनसे मिला, वह यह देखकर अचंभित था कि कैसे उन्होंने बीमारी को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। वह हमेशा अपने फैन्स और दुनिया द्वारा दिए गए प्यार के प्रति शुक्रगुजार हैं। इस व्यक्तिगत नुकसान के दौरान दुनिया काफी बुरे और कठिन समय से गुजर रही है। इसलिए हम सभी से अपील करते हैं कि लागू नियमों को सख्ती से पालन करें। वह भी यह चाहते हैं।’

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ल्यूकेमिया क्या होता है?

ल्यूकेमिया एक प्रकार का कैंसर होता है, जो कि शरीर के खून और बोन मैरो को प्रभावित करता है। अधिकतर मामलों में यह व्हाइट ब्लड सेल्स का कैंसर होता है, लेकिन यह दूसरी प्रकार की ब्लड सेल्स में भी शुरू हो सकता है। यह एक्यूट मतलब तेजी से विकसित होने वाला और क्रोनिक मतलब धीरे-धीरे विकसित होने वाला हो सकता है। व्हाइट ब्लड सेल्स के ल्यूकेमिया में बोन मैरो शरीर में व्हाइट ब्लड सेल्स का उत्पादन असामान्य रूप से करने लगता है। जिससे हेल्दी ब्लड सेल्स (रेड ब्लड सेल्स और प्लेटलेट्स) को पर्याप्त जगह नहीं मिल पाती और वह सही से कार्य नहीं कर पाती।

वैसे तो व्हाइट ब्लड सेल्स संक्रमण से लड़ने, रेड ब्लड सेल्स शरीर में ऑक्सीजन प्रवाहित करने और प्लेटलेट्स ब्लड क्लॉट ने बनने में मदद करती है। लेकिन, ल्यूकेमिया की वजह से असामान्य रूप से उत्पादित हो रही व्हाइट ब्लड सेल्स संक्रमण से लड़ने में सक्षम नहीं होती हैं और वह दूसरे अंगों को प्रभावित करने लगती हैं। इसके साथ ही उसके अधिक उत्पादन होने की वजह से रेड ब्लड सेल्स और प्लेटलेट्स की मात्रा घटती रहती है, जिससे भी शरीर पर बुरा असर पड़ता है।

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ल्यूकेमिया के प्रकार

ल्यूकेमिया कई प्रकार का हो सकता है। लेकिन निम्नलिखित प्रकार के मामले सबसे ज्यादा देखे जाते हैं। जैसे-

  • एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया
  • क्रोनिक लिम्फोसाईटिक ल्यूकेमिया
  • एक्यूट मायलोइड ल्यूकेमिया
  • क्रोनिक मायलोइड ल्यूकेमिया

इस प्रकार के कैंसर के लक्षण क्या होते हैं?

ल्यूकेमिया कैंसर के लक्षण इसके प्रकार और बीमारी की गंभीरता यानी स्टेज के मुताबिक होते हैं। जैसे-

  • बुखार
  • संक्रमण होना
  • खून निकलना
  • हड्डियों या जोड़ों में दर्द
  • सिरदर्द
  • थकान
  • उल्टी
  • वजन घटना
  • रात को पसीना आना
  • सांस लेने में तकलीफ
  • स्प्लीन या लिंफ नोड्स में सूजन

ऐसा जरूरी नहीं कि ल्यूकेमिया के हर मरीज में यह सभी लक्षण दिखाई दें। इन लक्षणों में से सिर्फ कुछ लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं।

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ल्यूकेमिया के कारण क्या होते हैं?

विशेषज्ञों की ल्यूकेमिया के कारणों पर बिल्कुल पक्का आश्वासन तो नहीं है, लेकिन माना जाता है कि जिन लोगों को यह बीमारी होती है, उनके शरीर में कुछ असामान्य क्रॉमोसोम होते हैं। लेकिन क्रॉमोसोम की वजह से यह बीमारी नहीं होती। इसकी बजाय निम्नलिखित कारण इस बीमारी के विकास में भूमिका निभा सकते हैं। जैसे-

  • स्मोकिंग
  • परिवार में किसी को ल्यूकेमिया होना
  • डाउन सिंड्रोम की तरह जेनेटिक डिसऑर्डर होना
  • कैंसर ट्रीटमेंट में रेडिएशन थेरिपी व कीमोथेरिपी का उपयोग
  • किसी कैमिकल या रेडिएशन के अत्यधिक संपर्क में आना

कैसे होती है इस बीमारी की जांच?

सबसे पहले कोई भी डॉक्टर आपके शरीर में दिख रहे लक्षणों की पहचान करके ल्यूकेमिया की जांच करवाता है। जिसमें निम्नलिखित टेस्ट करवाए जा सकते हैं।

  • बोन मैरो टेस्ट में इससे सैंपल लिए जाते हैं और आपका डॉक्टर उसके आधार पर ल्यूकेमिया के प्रकार और गंभीरता के बारे में बताता है।
  • ब्लड टेस्ट की मदद से खून में मौजूद विभिन्न प्रकार की सेल्स की गणना देखी जाती है।
  • इमेजिंग टेस्ट के दौरान सीटी, एमआरआई और पीईटी स्कैन की मदद से ल्यूकेमिया के स्पॉट साइन देखे जाते हैं।
  • स्पाइनल टैप की मदद से स्पाइनल कॉर्ड से फ्लूड लेकर शरीर में इसके प्रसार को जांचा जाता है।

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ल्यूकेमिया का ट्रीटमेंट

ल्यूकेमिया का ट्रीटमेंट इसके प्रकार और स्टेज पर निर्भर करता है। जिसके बाद डॉक्टर निम्नलिखित ट्रीटमेंट का चुनाव कर सकता है। जैसे-

  1. कीमोथेरिपी में ड्रग्स की मदद से खून और बोनमैरो में कैंसरीकृत सेल्स को नष्ट किया जाता है
  2. रेडिएशन थेरिपी में हाई एनर्जी एक्स रे की मदद से ल्यूकेमिया सेल्स को बढ़ने से रोका जाता है या नष्ट किया जाता है।
  3. इम्यूनोथेरिपी की मदद से इम्यून सिस्टम कैंसरीकृत सेल्स को पहचानकर उनपर हमला करता है।
  4. टारगेटेड थेरिपी की मदद से शरीर में कैंसरीकृत सेल्स के विकास के लिए जरूरी प्रोटीन और जीन्स को ब्लॉक किया जाता है।
  5. स्टेम सेल्स की मदद से बोन मैरो में मौजूद ल्यूकेमिया सेल्स की जगह नई स्वस्थ सेल्स दी जाती है।
  6. सर्जरी में डॉक्टर स्प्लीन को हटा सकता है, क्योंकि उसमें कैंसरीकृत सेल्स की मात्रा ज्यादा हो जाती है और वह दूसरे अंगों को प्रभावित करने लगती है।

हैलो स्वास्थ्य किसी भी तरह की मेडिकल सलाह नहीं दे रहा है। अगर आपको किसी भी तरह की समस्या हो तो आप अपने डॉक्टर से जरूर पूछ लें।

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