बर्सा एक छोटी, जेली जैसे थैली होती है। ये थैली कंधे, कोहनी, कूल्हे, घुटने और एड़ी में स्थित होती हैं। इन थैलियों में तरल पदार्थ भरा होता है जो हड्डियों और नरम ऊतकों के बीच में होता है। यह जोड़ों वाली जगह पर घर्षण को कम करने में कुशन की तरह काम करते हैं। प्रीपेटेलर बर्साइटिस एक प्रकार की बर्सा की सूजन है, जो घुटनों या जोड़ों में होती है। यह तब होता है जब बर्सा पूरी तरह से घिस जाता है। इससे बहुत अधिक तरल पदार्थ निकलता है। जिसके कारण सूजन हो जाती है। यह सूजन घुटने के आस-पास के हिस्सों पर दबाव डालती है।

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इस बीमारी का इलाज संभव है। इलाज के बाद मरीज को अपने घुटनों पर ज्यादा दबाव नहीं डालना चाहिए। जो लोग स्पोर्ट्स में एक्टिव रहते हैं उन्हें नीपैड का इस्तेमला करना चाहिए। इससे वे बर्साइटिस से बच सकते हैं। जो लोग घुटने के बल चलने की कोशिश करते हैं उन्हें ये समस्या ज्यादा होती है। प्रीपेटेलर बर्साइटिस तब भी हो जाता है जब इम्यून सिस्टम पर दबाव पड़ता है। इससे बर्सा बैक्टीरिया से संक्रमित हो जाते हैं, इसे सेप्टिक बर्साइटिस कहते हैं। प्रीपेटेलर बर्साइटिस घुटनों में होते हैं।
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प्रीपेटेलर बर्साइटिस होने के कई कारण हो सकते हैं। यह अक्सर घुटने में लगातार दबाव पड़ने के कारण होता है। प्लंबर, छत बनाने वाले, कालीन बनाने वाले, कोयला खनिज में काम करने वाले और बगीचों में काम करने वाले लोगों में प्रीपेटेलेर की समस्या ज्यादा देखी जाती है। क्योंकि इन लोगों के काम में घुटने पर ज्यादा दबाव पड़ता है। इसके अलावा स्पोर्ट्स पर्सन और एथलीट्स को भी इन समस्याओं से गुजरना पड़ता है। क्योंकि खेल खेलते समय वे कई बार गिर जाते हैं या उनके घुटनों पर चोट लग जाती है। ऐसे में प्रीपेटेलर बर्साइटिस की समस्या पैदा होती है। इन खेलों में फुटबॉल, कुश्ती या बास्केटबॉल शामिल हैं।
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कोई पुरानी चोट- घुटने पर चोट लगने से बर्सा को नुकसान पहुंचता है। जिससे बर्सा रक्त से भर जाएगा और फिर घुटनों में सूजन होना शुरू हो जाती है। हालांकि शरीर रक्त को फिर से अवशोषित कर लेता है लेकिन बर्सा में सूजन बनी रह सकती है। इससे घुटने में बर्साइटिस के लक्षण दिखने लगते हैं।
लंबे समय तक घुटने टेकना- बर्साइटिस अक्सर “मिनी-ट्रॉमा’ के कारण होता है। जो गंभीर समस्याओं का कारण बन सकता है। अगर आप कालीन पर भी बार-बार घुटने टेकते हैं तो भी आपमें प्रीपेटेलर बर्साइटिस के लक्षण दिखाई दे सकते हैं।
अन्य समस्याएं-ऑस्टियोअर्थराइटिस, रयूमेटाइड गठिया, गाउट या स्यूडो गाउट जैसी बीमारी झेल रहे लोगों में भी बर्साइटिस की समस्या हो सकती है। इन बीमारियों का उपचार होने के बाद बर्साइटिस की समस्या भी ठीक हो सकती है।
प्रीपेटेलर बर्साइटिस जीवाणु संक्रमण के कारण भी हो सकता है। अगर घुटने में चोट हो, किसी कीड़े ने काटा हो या गिरने से खरोंच आई हो तो बैक्टीरिया बर्सा थैली के अंदर पहुंच सकते हैं और संक्रमण का कारण बन सकते हैं। इसे संक्रामक यानी सेप्टिक बर्साइटिस कहा जाता है। संक्रामक बर्साइटिस आम समस्या नहीं है, लेकिन गंभीर है। ऐसे में मरीज को तुरंत इलाज की जरूरत होती है।
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। बेहतर जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श करें।
डिस्क्लेमर
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Current Version
28/05/2020
Bhawana Sharma द्वारा लिखित
के द्वारा मेडिकली रिव्यूड डॉ. प्रणाली पाटील
Updated by: shalu