क्या है अन्नप्राशन संस्कार, कब और किस तरीके से करना चाहिए, क्या है इसके नियम

चिकित्सक द्वारा समीक्षित | द्वारा

अपडेट डेट July 19, 2020 . 5 मिनट में पढ़ें
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अन्नाप्राशन संस्कार एक संस्कृत शब्द है। इस शब्द का अर्थ अनाज देना (grain initiation) कहलाता है। शिशु के शुरुआती महीनों में जबतक दांत नहीं निकल आते तबतक उसे मां का दूध ही पीना पड़ता है। लेकिन पांचवें या छठें महीने में शिशु का विकास होता है तो उसे इस प्रथा के बाद अनाज खिलाने की परंपरा शुरू होती है। ताकि उसका सर्वांगीण विकास हो सके। इसमें बच्चों को दही, शहद, चावल, घी आदि खिलाते हैं। जैसे जैसे शरीर का विकास होता है उसी प्रकार शिशु की पाचन शक्ति भी बढ़ती है और उसके लिए उसे पौष्टिक तत्वों की जरूरत पड़ती है। इसलिए इस संस्कार के बाद उसे भोजन दिया जाता है। सामान्य शब्दों में कहे तो हिंदू धर्म में शिशु को पहली बार अनाज खिलाना ही अन्नप्राशन संस्कार कहा जाता है। यह मौका हर हिंदू परिवार के घर में खास होता है, आइए इस आर्टिकल में हम अन्नप्राशन संस्कार के साथ कब और किस तरीके से इसे करना चाहिए, इसके नियम और इससे जुड़ी अन्य जानकारी जानने की कोशिश करते हैं।

अलग अलग प्रांतों में अलग अलग नाम से है प्रचलित

अन्नप्राशन संस्कार को भारत के अलग अलग प्रांतों में अलग अलग नाम से जाना जाता है। कहीं इसे मुंहजुठी के नाम से जानते हैं, तो केरल की तरफ कोरोनू (choroonu) कहा जाता है, वहीं बंगाल में मुखे भात (mukhe bhaat) तो गढ़वाल में भातखुलाई (bhaatkhulai) जैसे नाम से अन्नप्राशन संस्कार को मनाया जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार अन्नप्राशन संस्कार के बाद ही शिशु अनाज व अन्य खाद्य पदार्थ का सेवन कर सकता है। इसलिए इस परंपरा का निर्वहन किया जाता है। इस परंपरा के बाद धीरे- धीरे कर शिशु को अनाज दिया जाने लगता है। देशभर में इस प्रथा को कई तरीकों से सेलिब्रेट किया जाता है।

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आखिर क्यों जरूरी है अन्नप्राशन संस्कार

अन्नप्राशन इसलिए किया जाता है ताकि शिशु तरल खाद्य पदार्थ जैसे गाय व मां के दूध के अलावा अनाज का सेवन कर सके। शिशु के छह महीने के बाद उसके एक साल होने के पहले किसी भी खास मुहूर्त को देख इस परंपरा का निर्वहन किया जाता है। शिशु में यदि लड़का है छह से आठ महीने के अंदर इस संस्कार को किया जाता है। कई मामलों में छठी, आंठवी, दसवें महीने में इस संस्कार को किया जाता है। वहीं नवजात यदि लड़की है तो ऑड नम्बर जैसे पांच से सात महीने में इस परंपरा का निर्वहन किया जाता है। कई मामलों में पांचवें, सातवें, नौंवें और ग्यारहवें महीने में इस संस्कार को किया जाता है।

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इन तिथियों को नहीं किया जाता है यह संस्कार

ब्राह्मण पुरोहित का मानना है कि कुछ विशेष तिथि और दिन में यह संस्कार नहीं किया जाता है, इसलिए अन्नप्राशन का आयोजन करने से पहले उनसे सलाह ले लेना अच्छा होता है।

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अन्नप्राशन संस्कार के दिन इन बातों का रखा जाता है ख्याल

  • घर की अच्छी तरह से सफाई की जाती है
  • घर के द्वार पर आम के पत्तों के द्वारा बंधनवार लगाया जाता है
  • नित्याकर्मावास के बाद शिशु के माता-पिता शाम में भगवान के सामने में ज्योत जला पूजा करते हैं। शिशु के मां-पिता इस दौरान नए कपड़े पहने होते हैं।
  • शादीशुदा महिला घर में पकवान तैयार करती है, जैसे खीर व अन्य खाद्य पदार्थ वहीं बड़ों के लिए समारोह का आयोजन होता है।
  • ब्राह्मण पुरोहित को इस दिन आमंत्रित किया जाता है और वह अन्नप्राशन संस्कार को लेकर वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच पूजा संपन्न कराते हैं।
  • इस पूजन कार्यक्रम में शिशु के साथ मां-पिता व घर के बड़े-बुजुर्ग और रिश्तेदार शामिल होते हैं।
  • पूजा संपन्न होने के बाद बड़ों से लेकर छोटों के क्रम में शिशु को एक एक कर खाद्य सामग्री पहले दादा-दादी, फिर चाचा-चाची, अन्य रिश्तेदार एक एक करके शिशु के मुंह से जुठा कराते हैं।
  • इसके बाद शिशु के मां-पिता ब्राह्मणों के साथ घर के बड़े बुजुर्गों का पांव छूकर आशीर्वाद लेंगे।
  • ब्राह्मणों को दक्षिणा देने के बाद घर आए अतिथियों को प्रसाद देने के बाद उन्हें भोजन कराया जाता है।

कहां किया जा सकता है अन्नप्राशन संस्कार

अन्नप्राशन संस्कार को मंदिरों के साथ घरों में पुरोहितों की देखरेख में किया जाता है। वहीं कुछ अभिभावक इस पल को सेलिब्रेट करने के लिए बेंक्विट हाल तक बुक कराते हैं। केरल की बात करें तो यहां पर कुछ अभिभावक इस प्रथा को प्रसिद्ध मंदिरों में कराते हैं। वहीं मध्य और पूर्वी भारत की बात करें तो वहां के भारतीय लोग इस परंपरा को घरों पर ही कराते हैं। वहीं यह लोग पुरोहितों को घर बुलाकर पारंपरिक रीति रिवाज के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराते हैं।

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कब किया जाता है अन्नप्राशन संस्कार

अन्नप्राशन संस्कार एक खास दिन और समय को होता है, इसका निर्धारण पुरोहित करते हैं। इस दौरान शिशु को नए कपड़े पहनाए जाते हैं। इस दिन भारतीय अपने बच्चों को पारंपरिक परिधान पहनाना पसंद करते हैं, जैसे धोती कुर्ता, लहंगा-चोली। अन्नप्राशन संस्कार की शुरुआत हवन और पूजा के साथ होती है, शिशु के स्वास्थ्य व खुशहाली के लिए उसे अनाज के रूप में उसे प्रसाद खिलाया जाता है। इस दौरान परिवार के सदस्यों के साथ दोस्तों व रिश्तेदारों को बुलाया जाता है।

अन्नप्राशन संस्कार के दौरान खास प्रकार के नियम भी किए जाते हैं। जैसे केले के पत्तों पर चांदी की परात के ऊपर कुछ खास चीजें रखी जाती है, जैसे

  • किताबें, ज्ञान का प्रतीक
  • गहनें, धन का प्रतीक
  • मिट्टी, प्रॉपरटी का प्रतीक
  • खाद्य पदार्थ, भोजन के साथ प्रेम का प्रतीक

यह तमाम चीजें शिशु के आगे रखी जाती है। इनमें से शिशु जिस वस्तु को चुनता है, माना जाता है कि जीवन में वो उसे जरूर हासिल होती है।

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अन्नप्राशन के दौरान शिशु को दिए जाने वाले खाद्य पदार्थ

अन्नप्राशन समारोह के दौरान शिशु को खास प्रकार के खाद्य पदार्थ उसकी प्लेट में परोसे जाते हैं। प्रसाद के तौर पर खीर या पायस दिया जाता है। इसके अलावा शिशु को सादा चावल, घी व दाल को मिलाकर खिलाया जाता है। वहीं अन्य लोगों के लिए व्यंजनों की लंबी लिस्ट होती है, जैसे फ्राइड राइस, पुलाव, सब्जियां, मछली आदि खीर के साथ परोसी जाती हैं।

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सुरक्षित अन्नप्राशन संस्कार के लिए इन बातों पर दें ध्यान

माना जाता है कि इन सुरक्षित उपायों को अपनाकर आप घर पर ही अन्नप्राशन संस्कार की विधि को पूरा कर सकते हैं ताकि शिशु को भी डर न लगें और वो पूरे समारोह रोने की बजाय चीजों को इंज्वाय करे-

  • समारोह से दौरान और समारोह के पहले आप यह सुनिश्चित कर लें कि शिशु भरपूर आराम ले, कुछ अभिभावक चाहते हैं कि शिशु का अन्नप्राशन संस्कार उसके नहाने के बाद किया जाए।
  • ऐसा करने से उस दौरान बेहद कम लोग ही मौजूद रहेंगे, घर के सदस्यों के साथ खास लोग ही जुटेंगे, भीड़ कम होने पर रीति रिवाज आसानी से हो जाएगा।
  • शिशु को पहनाने के लिए वैसे कपड़ों का चयन करें जिसे पहन शिशु आराम महसूस करें, कोशिश यही रहनी चाहिए कि नेचरल फैब्रिक से तैयार किए कपड़ों को ही शिशु को पहनाया जाए। वैसे कपड़े जिसमें मिरर वर्क किया हो, हेवी एम्ब्रायडरी की हो, मेटेलिक थ्रेड हो वैसे कपड़े शिशु को नहीं पहनाना चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि लंबे समय तक उसे पहने रहने के कारण शिशु इरीटेट हो जाता है।
  • बच्चे इस बात पर ध्यान दें कि शिशु को कुछ भी खिलाने के पूर्व अपने हाथों को अच्छी तरह से धो लें।
  • इस बात को लेकर सुनिश्चित कर लें कि जो आपके शिशु के लिए खाना बनाया गया है वो पौष्टिक होने के साथ ताजा ही हो।
  • कोशिश यही रहनी चाहिए कि इस परंपरा के दौरान कहीं आपका शिशु सामान्य से ज्यादा भोजन न कर लें, संभावनाएं रहती है कि ज्यादा भोजन करने से उसका पेट खराब हो सकता है।
  • अन्नप्राशन संस्कार के दौरान आपकी कोशिश यही रहनी चाहिए कि शिशु को हवन के ज्यादा नजदीक न ले जाए, वहीं शिशु के चेहरे को हवन के धुएं से बचाकर रखना चाहिए, वेंटिलेशन के लिए घरों के दरवाजे और खिड़कियों को खुला रखें।
  • सुरक्षित यही रहेगा कि घर आए बच्चों के लिए कुछ खिलौनो का इंतजाम कर दें ताकि वो एक जगह खेलते रहे वहीं बड़ों की देखभाल के लिए किसी को लगाए ताकि वो इरीटेट न हो, उनकी सेवा भी की जाती रहे।
  • आप चाहते हैं कि जाते वक्त अपने अतिथियों को मिठाई या फिर ड्राय फ्रूट्स भेंट करना चाहते हैं तो जरूर करें।
  • इस खास लम्हे को रिकॉर्ड करना न भूलें, वीडियो बनाने के साथ ज्यादा से ज्यादा तस्वीरें लें ताकि यह लम्हा यादगार रहे।

हैलो हेल्थ ग्रुप चिकित्सा सलाह, निदान या उपचार प्रदान नहीं करता है

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