केरेटोकोनस आंखों से संबंधित एक समस्या है। आंखों का सबसे सामने वाला पारदर्शी भाग, जिसे कॉर्निया कहा जाता है, वह पतला हो जाता है और बाहर की तरफ कोन के आकार में उभर जाता है। जिससे आंखों से धुंधला दिखाई देने लगता है। केरेटोकोनस होने पर आंखे रोशनी और चमक के लिए बेहद सेंसटिव हो जाती है। केरेटोकोनस 10 से 25 साल के उम्र के लोगों में पाया जाता है। केरेटोकोनस के शुरुआती स्टेज में आंखों से साफ दिखाई देने के लिए चश्मे या मुलायम लेंस लगाए जाते हैं। बाद में ठीक ने होने पर लेंस को आंखों में फिट कर दिए जाते हैं। अगर स्थिति बहुत ज्यादा खराब हो जाती है तो कॉर्निया ट्रांसप्लांट किया जाता है।

केरेटोकोनस होना बहुत सामान्य है। ज्यादा जानकारी के लिए डॉक्टर से संपर्क करें।
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केरेटोकोनस के लक्षण निम्न प्रकार से हैं :
ऊपर बताए गए लक्षणों के सामने आने पर आपको नेत्र रोग विशेषज्ञ (ophthalmologist) से मिलना चाहिए। जांच में डॉक्टर आपकी आंखों का परिक्षण करने के बाद केरेटोकोनस की पुष्टि करते हैं। इसके बाद जरूरत पड़ने पर लेजर-असिस्टेड इन सीटू केरैटोमाइल्यूसिस (LASIK) सर्जरी की जाती है।
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आंखों में प्रोटीन के छोटे फाइबर्स होते हैं जिसे कोलेजन कहते हैं। ये कोलेजन आंखों के ऊपर के कॉर्निया को पकड़ के रखता है। जब कोलेजन कमजोर पड़ने लगते हैं तो कोलेजन कोन के आकार में विकृत हो कर उभरने लगते हैं। तब जा कर केरेटोकोनस होता है। कॉर्निया में प्रोटेक्टिव एंटीऑक्सीडेंट के घटने के कारण भी केरेटोकोनस होता है। जिसमें कॉर्निया सेल्स डैमेज होने लगती है।
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केरेटोकोनस परिवार में फैलने वाली समस्या है। अगर आपको केरेटोकोनस है तो आप अपने बच्चे का 10 साल की उम्र से ही आंखों का रूटीन चेकअप कराते रहें। जिससे बच्चे पर केरेटोकोनस के असर को कम किया जा सकता है। आंखों की परेशानी टीनएज से शुरू होती है और 30 साल तक की उम्र तक हो सकती है। कुछ मामलों में 40 से ज्यादा उम्र के लोगों को भी केरेटोकोनस हो सकता है। कॉर्निया में होने वाले बदलाव कभी भी बंद हो सकते हैं। वहीं, केरेटोकोनस से पहले एक आंख प्रभावित होती है और फिर दूसरी आंख पर असर पड़ता है।
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केरेटोकोनस में रिस्क फैक्टर निम्न हैं :
यहां प्रदान की गई जानकारी को किसी भी मेडिकल सलाह के रूप ना समझें। अधिक जानकारी के लिए हमेशा अपने डॉक्टर से परामर्श करें।
केरेटोकोनस का पता लगाने के लिए नेत्र रोग विशेषज्ञ पारिवारिक इतिहास के साथ आपका मेडिकल इतिहास भी देखते हैं। साथ ही आपकी आंखों की जांच भी करते हैं। आंखों के लिए निम्न टेस्ट करते हैं :
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केरेटोकोनस का इलाज मरीज के स्थिति पर निर्भर करता है। केरेटोकोनस के शुरुआत में चश्मा या लेंस लगा कर इलाज किया जाता है। लेकिन, जिन लोगों को चश्मा लगाना नहीं पसंद है वे लोग सर्जरी कराते हैं।
लेंस या चश्मा न लगाने की स्थिति में आंखों की सर्जरी की जाती है :
केरेटोकोनस के मरीज के आंखों में अल्ट्रावायलेट ए (UVA) प्रकाश डाला जाता है। जिससे कॉर्निया के टिश्यू मजबूती से पकड़ बना कर रखते हैं। फिलहाल अभी यह ट्रीटमेंट यूनाइटेड स्टेट में टेस्टिंग फेज में है। इसलिए ये ट्रीटमेंट ज्यादा प्रचलित नहीं है।
इस संबंध में आप अपने डॉक्टर से संपर्क करें। क्योंकि आपके स्वास्थ्य की स्थिति देख कर ही डॉक्टर आपको उपचार बता सकते हैं।
हैलो स्वास्थ्य किसी भी तरह की मेडिकल सलाह नहीं दे रहा है। अगर आपको किसी भी तरह की समस्या हो तो आप अपने डॉक्टर से जरूर पूछ लें।