ब्रिटल डायबिटीज (Brittle Diabetes) क्या होता है, जानिए क्या रखनी चाहिए सावधानी ?

चिकित्सक द्वारा समीक्षित | द्वारा

अपडेट डेट जुलाई 14, 2020 . 4 मिनट में पढ़ें
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डायबिटीज की बीमारी का नाम सुनते ही मन में ख्याल आने लगता है कि जिस भी व्यक्ति को ये बीमारी हुई है, वो शुगर अधिक खाता होगा, लेकिन ये सिर्फ मिथ है। डायबिटीज कई प्रकार की होती है। आपने टाइप 1 डायबिटीज, टाइप 2 डायबिटीज के बारे में जरूर सुना होगा। ब्रिटल डायबिटीज, मधुमेह का गंभीर रूप है। इसे हार्ड टू कंट्रोल डायबिटीज या लबाइल डायबिटीज ( labile diabetes) के नाम से भी जाना जाता है।

डायबिटीज की इस कंडिशन में ब्लड शुगर यानी ग्लूकोज के लेवल में स्विंग यानी बदलाव आता है। ग्लूकोज यानी ब्लड शुगर में लगातार परिवर्तन आपके शरीर में बहुत से बदलाव ला सकता है। वैसे इस कंडीशन को अनकॉमन माना जाता है। डायबिटीज की समस्या से परेशान लोगों में भी ये कंडीशन पाई जा सकती है। ब्रिटल डायबिटीज को गंभीर हाइपरग्लाइसीमिया (hyperglycemia) या कीटोएसिडोसिस  (ketoacidosis) के जोखिम के रूप में देखा जा सकता है। कीटोएसिडोसिस सीरीयस कॉम्प्लीकेशन होता है जिसमे बॉडी में हाई लेवल में ब्लड एसिड प्रोड्यूस होता है, इसे कीटोन कहते हैं। इस कंडीशन से बचने के लिए बेहतर रहेगा कि डायबिटीज केयर प्लान को फॉलो किया जाए और डॉक्टर से सलाह ली जाए।

और पढ़ें :डबल डायबिटीज की समस्या के बारे में जानकारी होना है जरूरी, जानिए क्या रखनी चाहिए सावधानी

ब्रिटल डायबिटीज का रिस्क फैक्टर जानिए (Risk factors of brittle diabetes)

ब्रिटल डायबिटीज उन लोगों में होने की संभावना अधिक होती है, जिन्हें टाइप 1 डायबिटीज की समस्या हो। टाइप 2 डायबिटीज की समस्या वाले लोगों में ब्रिटल डायबिटीज होने की संभावना कम ही रहती है। कुछ डॉक्टर्स का मानना है कि ये डायबिटीज का कॉम्प्लीकेशन है। टाइप 1 डायबिटीज में इंसुलिन बनना बंद हो जाता है। जिसके कारण ब्लड में शुगर लेवल कम या ज्यादा होता रहता है। जब ब्लड में शुगर का लेवल कम या फिर ज्यादा होता है तो शरीर में कई तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं। इस कारण से शरीर में कुछ लक्षण भी दिखाई देते हैं। जिन लोगों को टाइप 1 डायबिटीज है, उन्हें ब्रिटल डायबिटीज का खतरा रहता है। जानिए क्या हैं इसके रिस्क फैक्टर।

  • अगर पेशेंट महिला है तो रिस्क फैक्टर बढ़ जाता है।
  • हार्मोनल गड़बड़ी
  • वजन अधिक हो जाना
  • हाइपोथायरायडिज्म यानी थायरॉयड हार्मोन कम बनना
  • अगर उम्र 20 से 30 साल के बीच है।
  • अगर डिप्रेशन की समस्या है।
  • सीलिएक रोग होने की स्थिति में
  • इंसुलिन एब्जॉर्शन प्रॉब्लम (Insulin absorption problems)

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और पढ़ें :एलएडीए डायबिटीज क्या है, टाइप-1 और टाइप-2 से कैसे है अलग

ब्रिटल डायबिटीज के लक्षण क्या हैं ? (Signs of brittle diabetes)

ब्रिटल डायबिटीज की समस्या होने पर ब्लड में शुगर का लेवल कम या फिर ज्यादा हो सकता है। जिन लोगों को टाइप 1 और टाइप 2 डायबिटीज होता है, उन्हें ब्रिटल डायबिटीज के लक्षण दिख सकते हैं। कुछ लोगों में लक्षण में बदलाव भी महसूस किया जा सकता है। जब ब्लड में शुगर लेवल अचानक से कम (Hypoglycemia)  हो जाता है तो निम्नलिखित लक्षण दिख सकते हैं।

  • चक्कर आने की समस्या
  • वीकनेस फील होना
  • अचानक से ज्यादा भूख लगना
  • चिड़चिड़ापन होना
  • डबल विजन की समस्या
  • नींद न आने की समस्या

जब ब्लड में शुगर का लेवल ज्यादा (Hyperglycemia) हो जाए तो निम्नलिखित लक्षण दिख सकते हैं।

और पढ़ें :एमओडीवाई डायबिटीज क्या है और इसका इलाज कैसे होता है

ब्रिटल डायबिटीज की समस्या का ट्रीटमेंट क्या है ? (treatment of brittle diabetes)

ब्लड में शुगर लेवल को बैलेंस करना ही इस समस्या का समाधान है। इसके लिए टूल की हेल्प भी ली जा सकती है। ब्रिटल डायबिटीज की समस्या से जूझ रहे लोगों में इंसुलिन को लेने की निश्चित मात्रा (शरीर को जितना इंसुलिन चाहिए) का ज्ञान होना जरूरी है। इंसुलिन पंप की सहायता से ऐसा किया जा सकता है। ब्रिटल डायबिटीज को कंट्रोल करने के लिए इसे इफेक्टिव टूल माना जाता है। इस टूल को जेब में आसानी से रखा जा सकता है। इस टूल में एक सुई होती है जो स्किन में लगाई जाती है। 24 घंटे में ये टूल शरीर में लगातार इंसुलिन को पंप करने का काम करता है। जब शरीर में इंसुलिन का स्तर सही रहता है तो ब्लड में शुगर यानी ग्लूकोज के लेवल को भी कंट्रोल रखा जा सकता है।

ग्लूकोज की मॉनिटरिंग है जरूरी (Monitoring of blood glucose)

टिपिकल डायबिटीज मैनेजमेंट में ब्लड का लगातार टेस्ट जरूरी होता है ताकि ग्लूकोज के लेवल को चेक किया जा सके। ब्रिटल डायबिटीज की समस्या जिन लोगों को होती है, उनके ब्लड में शुगर का लेवल कंट्रोल में नहीं रहता है। इसलिए दिन में कई बार ग्लूकोज मॉनिटरिंग की जरूरत पड़ सकती है। कॉन्टीन्यूयस ग्लूकोज मॉनिटरिंग (CGM) की हेल्प से ऐसा संभव है। CGM में सेंसर लगा होता है। सेंसर की हेल्प से ब्लड में ग्लूकोज के लेवल का पता लगाया जा सकता है। जैसे ही ब्लड में शुगर का लेवल अचानक से कम हो जाता है या फिर बढ़ जाता है तो सेंसर इस बारे में एलर्ट कर देता है।इस सेंसर की मदद से एलर्ट मिलने पर तुरंत ट्रीटमेंट लिया जा सकता है। लेकिन इस बारे में अधिक जानकारी के लिए आपको एक बार डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। जिन लोगों को ट्रीटमेंट के बाद भी कोई खास फर्क नहीं पड़ता है, उन्हें पैंक्रियाज ट्रांसप्लांट करवाना पड़ सकता है।

और पढ़ें :प्री डायबिटीज से बचाव के लिए यह है गोल्डन पीरियड

सावधानी ही है डायबिटीज की समस्या का इलाज (Precautions of diabetes)

ब्रिटल डायबिटीज की समस्या रेयर होती है यानी लोगों में इस समस्या के पाए जाने की संभावना कम ही होती है। लेकिन ये बहुत जरूरी है कि इस बीमारी से बचने के लिए सावधानी रखी जाए। अगर आपको डायबिटीज का जोखिम है तो आपको अपने खानपान से लेकर लाइफस्टाइल में सुधार की जरूरत है ताकि आगे चलकर परिस्थितियां गंभीर न बन जाए। डॉक्टर आपको इस समस्या से बचने के लिए निम्न सलाह भी दे सकता है, जैसे कि

  • अपने वजन को बढ़ने न दें। हेल्दी वेट बहुत जरूरी है।
  • अगर आपको स्ट्रेस रहता है तो इसे कम करने के लिए थेरेपिस्ट की सहायता लें।
  • डायबिटीज के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी प्राप्त करें ताकि आपको किसी प्रकार की दुविधा न रहे।
  • अगर आपको डायबिटीज संबंधि कोई भी समस्या हो तो एंडोक्रिनोलॉजिस्ट को दिखाएं।

ब्रिटल डायबिटीज की समस्या उन लोगों में होने के चांसेज ज्यादा होते हैं, जिन्हें टाइप 1 डायबिटीज हो। ऐसी डायबिटीज से बचने के लिए बेहतर रहेगा कि आप ब्लड शुगर की मॉनिटरिंग समय-समय पर करते रहे। ऐसा करने से डायबिटीज कॉम्प्लीकेशन से बचा जा सकता है। अगर आपको डायबिटीज की समस्या है तो बेहतर होगा कि डॉक्टर से इस बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त करें। क्योंकि, यह भविष्य में जाकर कई गंभीर परिणामों का कारण बन सकती है, लेकिन इसे समय रहते जीवनशैली में बदलाव, स्वस्थ आहार और एक्सरसाइज की मदद से नियंत्रित किया जा सकता है।

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