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स्पाइनल कॉर्ड इंजरी को न करें अनदेखा, जानें क्यों जरूरी है इसका सही समय पर इलाज

स्पाइनल कॉर्ड इंजरी को न करें अनदेखा, जानें क्यों जरूरी है इसका सही समय पर इलाज

स्पाइनल कॉर्ड हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है और अगर ये सही न हो तो दिमाग के काम करने से लेकर चलने -फिरने तक में मुश्किल आ जाती है। इसलिए शरीर के सभी अंगों के साथ इसकी खास देखभाल भी जरूरी है। लेकिन कई बार लोग स्पाइनल में लगी चोट को इतना सिरियस नहीं लेते हैं। जो भविष्य में जाकर एक बड़ी समस्या बन जाती है। शायद ऐसी समस्या भी जो आपको अपंग बना सकती है। स्पाइनल कॉर्ड इंजरी से जुड़ी समस्या पर हुआ ये अध्ययन उन मरीजों के इलाज के बेहतर परिणामों को जानने के लिए किया गया है जो स्पाइनल कॉर्ड इंजरी से जूझ रहे होते हैं। उनका इलाज पुनर्वास के जरिए किया जा रहा होता है। ये अध्ययन सिर्फ विकसित देशों में रहने वाले मरीजों पर किया गया है। विकासशील देशों में इसका परिणाम अलग हो सकता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि यहां उपचार की सुविधा होने की वजह से मरीज को समय पर इलाज नहीं मिलता है। किए गए पिछले अध्ययनों में स्पाइनल कॉर्ड इंजरी वाले व्यक्तियों में 8.1 फीसदी लोगों को 24 घंटे के अंदर इलाज मिल गया था। वहीं 15.1 फीसदी लोगों को चोट लगने के 3 महीने बाद इलाज मिल पाया था। कभीकभी मरीजों को इलाज के लिए लंबे समय तक हॉस्पिटल में रखा जाता है। वहीं ज्यादातर मरीजों को शुरुआती इलाज के बाद जल्दी घर भेज दिया जाता है। इसके अलावा अस्पताल में सुविधा ना होने पर कभीकभी मरीजों को बिना इलाज के ही वापस लौटना पड़ता है।

विकाशसील देशों में अस्पतालों में सुविधा होने की वजह से इलाज नहीं मिल पाता है। इसी वजह से यहां मुश्किल से ही कोई अध्ययन किया गया है। सेनगुप्ता और राजशेकरन ने फ्रैक्चर होने पर शुरुआती इलाज न मिलने के कुछ कारणों का ही वर्णन किया है। इसी वजह से हमने स्पाइनल कॉर्ड की दर्दनाक इंजरी के इलाज में देरी होने के कारणों और प्रभाव के विस्तारपूर्वक अध्ययन किया है।

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जानें क्या कहता है अध्ययन

इंस्टीट्यूशनल एथिक्स कमिटी द्वारा परमिशन लेने के बाद, मई 2009 और अगस्त 2011 के बीच 61 स्पाइनल कॉर्ड इंजरी के रोगियों को भर्ती किया गया। 4 हफ्तों बाद भी उनका इलाज शुरू नहीं हुआ। ठीक उसी समय स्पाइनल कॉर्ड इंजरी से ग्रसित दूसरे ग्रूप के 62 लोगों का इलाज 2 दिन में ही शुरू कर दिया गया।

सामने आए परिणाम

उम्र, लिंग, आर्थिक स्थिति, गांव और शहर के आधार पर स्पाइनल कॉर्ड इंजुरी वाले मरीजों पर ये अध्ययन किया गया था। इस अध्ययन के अनुसार, 52.5% लोगों का इलाज पूरा होने से पहले ही उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया था। साथ ही उन्हें पुनर्वास की सुविधा भी नहीं दी गई थी वहीं 42.6% लोग अस्पताल देरी से पहुंचे थे जिस वजह से उनका इलाज देरी से शुरू किया गया था। इसमें से 4.9% लोगों का परीक्षण ही नहीं हो पाया। इस अध्ययन में ये आंकड़े भी निकलकर आए कि कितने हफ्तों तक मरीजों की स्पाइनल कॉर्ड इंजुरी को नजरअंदाज किया गया यानी उन्हें इलाज ही नहीं मिला। ये आंकड़े इस तरह हैं। 29.5% लोगों को 4 से 8 हफ्तों तक इलाज नहीं मिला। 49.2% लोगों को 8 से 24 हफ्ते तक और 49.2% लोगों का 24 हफ्तों तक इलाज नहीं किया गया। कुल मिलाकर 18% लोगों का इलाज रूढ़िवादिता की वजह से नहीं हो पाया। वहीं 9.8% लोगों की कोई सर्जरी या इलाज नहीं हुआ क्योंकि वो भारतीय स्पाइनल कॉर्ड इंजरी सेंटर्स तक पहुंच ही नहीं पाए।
93.4% व्यक्तियों को शुरू में पुनर्वास नहीं दिया गया जबकि ये प्रक्रिया जरूरी होती है। 91.8% और 96.8% लोगों ब्लेडर और आंतों को ठीक रखने को लेकर पूरी जानकारी नहीं दी गई थी। जिन लोगों को दी भी गई उन्होंने इसका पालन नहीं किया था। ऐसे 4.9% मरीज सामने आए हैं।

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आखिर मरीज क्यों करते हैं देरी

निगेटिवटीएससीआई पर स्पाइनल कॉर्ड इंजरी से जुड़े लिटरेचर की भारी कमी है। इसको लेकर निगेटिवटीएससीआई में किसी समिति का गठन भी नहीं किया गया है। हसन के अनुसार, किसी सर्वाइकल स्पाइनल चोट के मरीजों को तब नजरअंदाज माना जाता है जब चोट का इलाज 3 हफ्ते से ज्यादा समय तक नहीं किया जाता। वहीं सेन गुप्ता ने भी रीढ़ की चोटों को नजरअंदाज करने को परिभाषित किया है। उनका मानना है कि जब मरीज के पास सुविधा नहीं होती है तभी उसका इलाज संभव नहीं हो पता है। राजशेखरन के अनुसार, पश्चिमी देशों में रीढ़ की हड्डी की चोट उस समय नजरअंदाज हो जाती है जब परीक्षण के दौरान डॉक्टर को नजर नहीं आती है। वहीं विकासशील देशों में मरीज को चोट होने के बावजूद परीक्षण नहीं किया जाता। ये चोट धीरेधीरे गहरी होती जाती हैं। उपचार ना मिलने के कारण बीमारी गंभीर हो जाती है।

कुछ अध्ययन इस बारे में भी हुए हैं कि चोट का परीक्षण होने में देरी क्यों होती है। विकसित देशों में देरी से परीक्षण होना एक असामान्य कारण है। कई बार अस्पताल में सुविधा ना होने की वजह से मरीज को डिस्चार्ज कर दिया जाता है जिससे वो स्पाइनल कॉर्ड इंजरी सेंटर्स में जाकर अपना इलाज करवा सकें लेकिन मरीज सेंटर जाने में देरी करते हैं। वहीं मरीज को अस्पताल से डिस्चार्ज करने के बाद सेंटर्स में रेफर नहीं किया जाता है। उन्हें सिर्फ व्यायाम करने की सलाह दी जाती है। पुनर्वास की सुविधा होने के बावजूद उन्हें वहां नहीं भेजा जाता। मरीज और उनके परिवार को ये जानकारी भी नहीं होती है कि अस्पताल के बाद उन्हें पुनर्वास के लिए जरूर जाना चाहिए। 41 फीसदी लोगों को पुनर्वास ना मिलने के कारण चोट पूरी तरह से ठीक नहीं होती है।

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विकासशीन देशों में रीढ़ की हड्डी की चोटों को नजरअंदाज करने का मुख्य कारण आर्थिक समस्या, इलाज से पहले डिस्चार्ज, पुनर्वास के लिए भेजना और सेंटर्स के लिए रेफर ना करना सामने आया है। इन देशों में ऐसे अस्पतालों की कमी भी देखी गई है, जहां रीढ़ की हड्डी की चोट का इलाज हो सके। वहीं गांवों में ज्यादातर मरीज अस्पताल तक पहुंच ही नहीं पाते हैं। विकसित देशों में किए गए अध्ययन में काफी अंतर पाया गया। इसके अनुसार, 95.1% लोगों की घर पर अच्छे से देखभाल नहीं की गई। वहीं 83.1% मरीजों को बिना परीक्षण किए ही घर भेज दिया गया।

मरीज की चोट जब गंभीर हो जाती है तो उन्हें काउंसलिंग की जरूरत होती है। कई मरीज ऐसे भी देखे गए जिन्हें समझाया गया, लेकिन उन्होंने अपना ख्याल रखने में लापरवाही की। नेगटीएससीआई वाले करीब 6 मामले ऐसे देखे गए जिनकी रीढ़ की हड्डी की चोट की सर्जरी हुई, साथ ही उन्हें ये भी कहा गया कि अगर समस्या बढ़ी तो फिर से सर्जरी हो सकती है। लेकिन मरीजों ने इस पर ध्यान नहीं दिया और स्पाइनल कॉर्ड इंजरी की गंभीरता को नजरअंदाज कर दिया।

ऐसी चोटों का सही समय पर इलाज होने पर इलाज का तरीका भी बदल जाता है। अब ये चोट ठीक होने में ज्यादा समय लेंगी। हर किसी को पता है कि इलाज मिलने पर परेशानी बढ़ जाएगी। इसमें पीठ में हमेशा दर्द बना रहेगा। इसके अलावा कुछ निम्न परेशानियां भी शरीर को घेर सकती हैं, जैसे

इस अध्ययन से साफ है कि रीढ़ की हड्डी की चोट का सही समय पर इलाज ना होने पर समस्या बढ़ जाती है। इससे घाव गहरे होते जाते है। इसका विशिष्ट कारण पेशेवरों, रोगियों और प्रबंधकों के बीच जागरूकता की कमी है। इस अध्ययन से यह परिणाम सामने आता है कि अस्पतालों में रहने का और इलाज का खर्च ज्यादा होता है। इस वजह से ऐसी गंभीर चोटें नजरअंदाज हो जाती हैं। इस मामले में एक समाधान निकालने की जरूरत है।

निष्कर्ष

स्पाइनल कॉर्ड इंजरी ऐसी चोट है जिसके बारे में डॉक्टर और मरीज पर्याप्त रूप से जागरूक नहीं हैं। विकासशील देशों में ऐसी चोटों के नजरअंदाज होने का दूसरा बड़ा कारण आर्थिक समस्या है। इसके अलावा मरीजों को पुनर्वास की सुविधा ना मिलना भी इन चोटों को गंभीर बना देता है। स्पाइनल कॉर्ड इंजरी की समस्या गंभीर हो जाती है तो मरीजों को ज्यादा समय तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ता है। मरीज में मानसिक परेशानी भी बढ़ जाती है। वहीं विकसित देशों में समय से पहले मरीजों को घर भेज देना सबसे बड़ा कारण उभरकर आया है। ऐसे में डॉक्टरों को जागरूकता कार्यक्रम द्वारा जागरूक करना बेहद जरूरी है। वहीं अस्पतालों में सुविधा बढ़ाने की भी जरूरत है।

हैलो हेल्थ ग्रुप हेल्थ सलाह, निदान और इलाज इत्यादि सेवाएं नहीं देता।

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डॉ. एच एस छाबड़ा द्वारा लिखित आखिरी अपडेट 01/09/2020 को
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