क्या डिलिवरी के बाद मां को अपना प्लासेंटा खाना चाहिए?

चिकित्सक द्वारा समीक्षित | द्वारा

अपडेट डेट जनवरी 14, 2020 . 4 मिनट में पढ़ें
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क्या आपने कभी सुना है कि प्लासेंटा को खाया भी जाता है। जानवर अक्सर बच्चे को जन्म देने के बाद प्लासेंटा को खा जाते हैं। सेलीब्रिटी किम कर्दाशियन ने भी बच्चे को जन्म देने के बाद प्लासेंटा को खाने की बात कबूल की थी। आप ये सब सुनकर सोच में न पड़े क्योंकि ये कोई नई बात नहीं है। सालों पहले से ये प्रक्रिया विभिन्न कल्चर में अपनाई जाती रही है। हो सकता है कि आप इसके बारे में पहली बार सुन रही हो।

प्लासेंटा को सुखाकर इसे गोली के रूप में खाया जा सकता है। प्लासेंटा में प्रोटीन और फैट होता है। बच्चे को जन्म देने के बाद प्लासेंटा खाने की प्रक्रिया को प्लासेंटॉफजी (Placentophagy) कहते हैं। जानवरों के साथ ही ट्राईबल महिलाओं में ये चलन प्रचिलित है। अपने देश में इस चलन के बारे में अब तक जानकारी नहीं मिली है। अगर आप प्लासेंटा के बारे में नहीं जानती हैं, या फिर प्लासेंटा खाने के महत्व की जानकारी चाहती हैं तो ये आर्टिकल पढ़ें।

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आखिर क्या होता है प्लासेंटा?

कंसीव करने के बाद जो अंग सबसे पहले बनता है, उसे प्लासेंटा कहते हैं। इसे गर्भनाल भी कहते हैं। नाल बच्चे को मां से जोड़ने का काम करती है। पूरी प्रेग्नेंसी के दौरान प्लासेंटा बच्चे को ऑक्सिजन, न्यूट्रिएंट्स और जरूरी हाॅर्मोन पहुंचाने का काम करता है। साथ ही ये गंदगी को बाहर करने का भी काम करता है।

वजायनल डिलिवरी  के बाद डॉक्टर नाल को बच्चे से अलग कर देते हैं, वहीं सी-सेक्शन के दौरान भी डॉक्टर प्लासेंटा को काट देते हैं। डिलिवरी के समय प्लासैंटा का वजन एक पाउंड होता है। ये गोल और फ्लैट आकार का होता है।

जो लोग चाइल्ड बर्थ के बाद नाल खाने को सपोर्ट करते हैं, उनका मानना है कि इसे खाने के बाद मां को एनर्जी मिलती है। साथ ही इसे खाने से ब्रेस्ट मिल्क में भी वृद्धि होती है। ये डिप्रेशन को कम करने के साथ ही अनिद्रा को भी दूर करने का काम करता है।

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क्या इस बारे में अध्ययन हुआ है?

बच्चे के जन्म के बाद प्लासेंटा को खाने से महिला को लाभ होता है या नहीं, अभी तक इस बारे में कोई भी प्रमाण नहीं मिले हैं। इस बारे में अभी अध्ययन जारी है। ये बात कितनी सही है या कितनी गलत है, इस बारे में बता पाना संभव नहीं है। चाइल्ड बर्थ के बाद नाल को खाने की बात कई बार सामने आ चुकी है। ये बात भी उतनी ही सच है कि अगर आप नाल को खाते हैं तो हो सकता है कि आपको इंफेक्शन हो जाए। कैप्सूल के रूप में लेने पर भी संक्रमण का खतरा रहता है। अधिक जानकारी के लिए आप डॉक्टर से इस बारे में संपर्क कर सकती हैं।

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क्या आपने देखा है प्लासेंटा?

अगर एक मां से पूछा जाए कि क्या उसने बच्चे के जन्म के समय प्लासेंटा देखा था, तो शायद उसका जवाब ना होगा। बच्चे के जन्म के बाद वजायना से ही प्लासेंटा भी डिलिवर होता है। कई बार जब प्लासेंटा नहीं निकल पाता है तो महिला को अधिक ब्लीडिंग होने लगती है। गर्भनाल काट देने के बाद प्लासेंटा का कोई काम नहीं रहता है। डॉक्टर इसे फेंक देते हैं।

प्रेग्नेंसी में किन कारणों से प्रभावित होती है नाल?

मैटरनल एज – कई बार अधिक उम्र में मां बनने के कारण नाल में बुरा प्रभाव पड़ता है। 40 के बाद मां बनने में समस्या हो सकती है।

प्रीमैच्योर मेंबरेन रप्चर – प्रेग्नेंसी के दौरान बेबी एक तरल पदार्थ से भरी मेंबरेन में घिरा रहता है। इसे एम्निऑटिक सेक कहते हैं। लेबर के पहले ही अगर सेक ब्रेक हो जाती है तो प्लासेंटल प्रॉब्लम के चांस बढ़ जाते हैं।

हाई ब्लड प्रेशरहाई ब्लड प्रेशर भी नाल को प्रभावित करता है।

मल्टिपल प्रेग्नेंसी -मल्टिपल प्रेग्नेंसी के कारण प्लासेंटल प्रॉब्लम का रिस्क बढ़ जाता है।

पहले की समस्या के कारण – अगर आपको प्रेग्नेंसी के पहले से ही प्लासेंटल प्रॉब्लम रह चुकी है तो प्रेग्नेंसी के दौरान इसके बढ़ने की संभावना है।

सर्जरी के कारण – अगर किसी वजह से आपकी प्रेग्नेंसी के पहले सर्जरी हो चुकी है तो नाल समस्या होने की संभावना बढ़ सकती है।

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प्रेग्नेंसी के दौरान नाल का क्या होता है?

  • नाल का विकास सबसे पहले होता है। नाल की सही स्थिति का पता 18वें सप्ताह के दौरान अल्ट्रासाउंड के माध्यम से लगाया जा सकता है।
  • नाल को बच्चे के बर्थ के बाद हटा दिया जाता है। ये काम बच्चे के जन्म के पांच मिनट से लेकर 30 मिनट तक के अंतर में कर दिया जाता है। इसे थर्ड स्टेज ऑफ लेबर कहा जाता है।
  • बच्चे की नॉर्मल डिलिवरी के बाद महिला को हल्का सा संकुचन हो सकता है और उसे पुश करने के लिए कहा जाता है। पुश करने के बाद नाल बाहर आ जाती है। ऐसा न होने पर मेडिसिन का सहारा भी लिया जाता है।
  • सी-सेक्शन होने पर डॉक्टर उसी दौरान नाल निकाल देता है।
  • अगर डिलिवरी के दौरान पूरी नाल नहीं निकलती है तो उसे सर्जिकल तरीके से निकाला जाता है। ऐसा न करने पर ब्लीडिंग और इंफेक्शन की समस्या हो सकती है।

कैसा होता है प्लासेंटा का स्ट्रक्चर?

प्लासेंटा एब्रियॉनिक और मैटरनल टिशू का कंपोजिशन स्ट्रक्टर होता है। ये पेट में पल रहे बच्चे को पोषण देने का काम करता है। प्लासेंटा गर्भाशय की दीवार के साथ जुड़ा हुआ होता है। साथ ही ये फीटस को न्यूट्रिएंट्स देने का काम करता है। साथ ही प्लासेंटा फीटस के वेस्ट प्रोडक्ट को बाहर करने का भी काम करता है। कोरियॉनिक विली फिंगर की तरह संरचना होती है जो कि एब्रियो ट्रोफोब्लास्ट से बनी होती है। प्लासेंटा में इंटरविलस स्पेस भी होता है जो कि कोरियॉनिक विली से घिरा रहता है और साथ ही इसमें मैटरनल ब्लड भी होता है। मैटरनल ब्लड में न्यूट्रिएंट्स और ऑक्सीजन होती है।

प्लासेंटा का प्रेग्नेंसी के दौरान महत्वपूर्ण कार्य होता है। नाल को डिलिवरी के बाद खाना चाहिए या फिर नहीं, इस बारे में अभी तक कोई साक्ष्य नहीं मिले हैं। कई देशों में इसे प्रथा के रूप में भी अपनाया जाता है। भारत देश में इसका चलन है या नहीं, कहना मुश्किल है। क्योंकि इस बारे में किसी तरह की खबरें या जानकारी बाहर नहीं आती है। अगर आपको प्लासेंटा के बारे में जानकारी नहीं है तो डॉक्टर से भी इसके महत्व के बारे में जान सकते हैं। अगर आपको प्लासेंटा खाने संबंधी जानकारी की आवश्यकता हो तो भी बेहतर होगा कि आप एक बार डॉक्टर से बात करें।

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