टॉयलेट से ही होती है स्वच्छता की शुरुआत, जानें एक्सपर्ट की नजर में स्वच्छता कैसे स्वतंत्रता से भी ज्यादा जरूरी?

टॉयलेट जाना हम लोगों के लिए सांस लेने जितना ही जरूरी है। हालांकि, कईयों के लिए यह बुरे सपने से कम नहीं है। हाल ही में 110 मिलियन शौचालयों का निर्माण करके भारत को ‘खुले में शौच’ मुक्त घोषित किया गया। इसके बावजूद, अपर्याप्त सैनिटेशन देश में चिंता का एक बड़ा कारण है। महात्मा गांधी कहते थे कि स्वच्छता स्वतंत्रता से भी ज्यादा जरूरी है। इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्वच्छता कितनी जरूरी है। मानव अपशिष्ट को सही तरीके से संसाधित करने के लिए जल निकासी और सीवेज सिस्टम पर्याप्त तरीके से सक्षम नहीं हैं। नतीजतन सही अपशिष्ट ट्रीटमेंट विकल्प न मिलने के कारण इन्हें नदियों में प्रवाहित कर दिया जाता है। इस दूषित पानी का इस्तेमाल लोग दैनिक कार्यों जैसे खाना बनाने और साफ-सफाई में करते हैं। लोगों को पता नहीं होता है कि इस पानी के अंदर कई कीटाणु और रोग पैदा करने वाले सूक्ष्मजीव होते हैं, जो दस्त, हैजा जैसी बीमारियों का कारण बन सकते हैं। इस रिस्क के अलावा गंदे और अनहाइजीनिक टॉयलेट्स महिलाओं में कई संक्रमण पैदा कर सकते हैं।

खुले में शौच के बजाय चुने शौचालय

विश्व बैंक के अनुमानों से संकेत मिलता है कि अपर्याप्त स्वच्छता के कारण भारत को $ 53.8 बिलियन का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है जो कि देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 6.4% है। इन नुकसानों को स्वास्थ्य प्रभावों, बीमारियों के इलाज की लागत और बीमारियों के कारण प्रोडक्टिव समय न मिलने के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। इसका प्रभाव महिलाओं और बच्चों पर भी पड़ता है जो कि इस कारण काम या स्कूल में पढ़ने नहीं जा पाते हैं। कई घरों में निर्मित शौचालय, गड्ढे, कन्टेनमेंट चैम्बर्स या सेप्टिक टैंक हैं, जिन्हें बनाने में पानी के स्त्रोतों से अनुशंसित दूरी का पालन नहीं किया जाता है। इन शौचालयों से अपशिष्ट निकालने के लिए अधिक पानी की खपत होती है, जो आगे चलकर लोगों के स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डाल सकता है। इसके अलावा एक और चुनौती लोगों को जुटाने और उन्हें यह समझाने में है कि उन्हें खुले में शौच करने के बजाय शौचालय का उपयोग क्यों करना चाहिए। इस कमी को तभी दूर किया जा सकता है जब व्यवहार परिवर्तन करने के लिए कुछ अन्य मूल्यों, मानदंडों और मान्यताओं पर काम किया जाए। इसका मूल उद्देश्य सैनिटेशन यानी कि स्वच्छता और सभी मायनों में उससे मिलने वाले हेल्थ बेनेफिट्स होने चाहिए।

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दूसरों से सबक लेना

यह उस समय की बात है जब ली क्वान यू सिंगापुर के पहले प्रधानमंत्री बने थे और देश का पूरी तरह से कायाकल्प करना चाहते थे। वह यह भलीभांति समझ चुके थे कि सैनिटेशन कितना जरूरी है। हालांकि, उस समय सिंगापुर में इसके लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं थे। अपनी प्रिवेंटिव हेल्थ और सेनिटेशन पॉलिसी के अंतर्गत उन्होंने हाइजीन और सैनिटेशन में निवेश किया। 10 वर्षों के भीतर ही उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि सिंगापुर नदी पूरी तरह से साफ और सभी प्रकार की गंदगी से मुक्त हो। उनका फोकस था कि यह नदी साफ पानी का स्रोत बने वह भी पूरे सेनिटेशन के साथ। भारत को भी ऐसा ही कुछ करना चाहिए।

सिर्फ टॉयलेट्स बनाना ही काफी नहीं, लोगों में जागरूकता है जरूरी

यूनिसेफ के अनुसार, सैनिटेशन एक व्यापक शब्द है जिसका मतलब हुआ, “एक ऐसा वातावरण तैयार करना जिसमें मनुष्य बीमारियों और उसके जोखिम के प्रति कम से कम एक्स्पोज हो”। वहीं हाइजीन का अर्थ हुआ, “व्यवहारों की एक ऐसी श्रंखला जो हेल्थ को बनाए रखने के साथ ही बीमारियों को फैलने से भी रोक सके। इसके अंतर्गत, हैंडवॉश करना, मेंस्ट्रुअल हाइजीन मैनेजमेंट और फूड हाइजीन भी शामिल हैं। वक्त की जरूरत सिर्फ यह नहीं है कि अधिक टॉयलेट्स बनाए जाएं बल्कि लोगों को भी जागरूक करना है, ताकि लोग इन्हें अशुद्ध न समझें। टॉयलेट और सैनिटेशन को विकास और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है- यह एक ऐसा ट्रेंड है जिसे लोग फॉलो करते हैं न कि उन्हें इसे जबरदस्ती इसे अडॉप्ट करवाना पड़ता है। यह बेहद आवश्यक है कि लोगों को व्यक्तिगत स्तर पर बेसिक हाइजीन बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। खासतौर पर उन्हें यह बताया जाए कि टॉयलेट्स कैसे साफ रखें और अच्छी क्वालिटी के टॉयलेट सीट सैनिटाइजर स्प्रे का प्रयोग जरूर करें। ऐसा करने से इंफेक्शन एक से दूसरे व्यक्ति तक नहीं फैलेगा।

वहीं, सरकार और अन्य संगठनों को बच्चों के बीच जाकर कम उम्र से ही सैनिटेशन और हाइजीन का कांसेप्ट उनके दिमाग में डालना शुरू करना चाहिए। यह सिर्फ एक डिपार्टमेंट का काम न होकर पूरे देश की व्यवस्था का हिस्सा बने ताकि एक ओवरऑल चेंज सुनिश्चित किया जा सके।

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रिव्यू की तारीख नवम्बर 19, 2019 | आखिरी बार संशोधित किया गया नवम्बर 19, 2019

विकास बगारिया फाउंडर पीसेफ
विकास बगारिया एक जानेमाने एन्टेर्प्रेनुएर हैं जिनको 20 से भी अधिक वर्षों का अनुभव है। 
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