डायबिटीज के मरीज में हो सकते हैं भावनात्मक बदलाव, जानें कैसे बचें

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Update Date नवम्बर 15, 2019
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आज के समय में अधिकतर लोग डायबिटीज की समस्या से परेशान हैं और ऐसे मरीजों में तनाव के साथ भवनात्मक समस्याएं ज्यादा देखने को मिलती हैं। कई शोधों में यह पाया गया है कि स्वस्थ लोगों के मुकाबले में डायबिटीज के मरीजों में डिप्रेशन और भावनात्मक समस्याएं ज्यादा हो सकती हैं। आमतौर पर, डायबिटीज के मरीज के लिए डॉक्टर्स दवाईयों और एक्सरसाइज पर ज्यादा जोर देते हैं, जबकि मनोवैज्ञानिक पहलुओं को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

डायबिटीज मरीजों में भावनात्मक बदलाव

कई अध्ययन में पाया गया कि डायबिटीज के मरीज किसी नकारात्मक अनुभव के प्रति कुछ ज्यादा ही संवेदनशील होते हैं। एक रिसर्च में ये भी पाया गया कि डायबिटीज की शुरुआत और टाइप-2 डायबिटीज के ग्रस्त लोगों के दिमाग का दाहिना हिस्सा ज्यादा एक्टिव रहता है जोकि डिप्रेशन (अवसाद) और नकारात्मक विचारों की ओर इशारा करता है।

इसके अलावा डायबिटीज के मरीज में कॉर्टिसॉल की मात्रा कम पाई जाती है, जिसका मतलब है कम तनाव सह पाना। वहीं इसके रोगियों में चिंता का स्तर 40 प्रतिशत अधिक होता है। इस बीमारी की चपेट में आने के बाद मरीज कई तरह की भावनात्मक उथल-पुथल से गुजरता है। जैसे – हैरान-परेशान रहना, डर और चिंता, गुस्सा, अवसाद, कुंठा आदि।

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डायबिटीज के मरीजों के लिए मनोवैज्ञानिक सहयोग

डायबिटीज पेशेंट अगर नकारात्मक विचारों से भरे रहते हैं, तो फिर उन्हें अपनी स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से निपटने और वजन कम करने में समस्या आती है। नकारात्मक विचारों की वजहों से लोग संतुलित आहार नहीं ले पाते और ना ही एक्सरसाइज पर ध्यान देते हैं। इसकी वजह से उन्हें ठीक होने में और ज्यादा समय लगता है। इसी वजह से अगर डॉक्टर्स डायबिटीज मरीजों को मनोवैज्ञानिक मदद दें तो उन्हें जल्दी ठीक होने में मदद मिलती है। एक ताजा शोध में पाया गया किया जब रोगियों को डायबिटीज के ट्रीटमेंट के साथ अलग से मनोवैज्ञानिक सपोर्ट दिया गया तो वो तेजी से ठीक होने लगे और उनमें कम भावनात्मक समस्याएं नजर आईं।

डायबिटीज के दौरान भावनात्मक संतुलन कैसे बनाएं?

डेबोराह रोजमैन की एक जानीमानी कहावत है, ”अगर आप अपनी भावनाओं को काबु नहीं करेंगे, तो आपकी भावनाएं आपको काबु करेंगी”। इसलिए डायबिटिक पेशेंट को अपनी भावनाओं पर काबु रखना आना भी बेहद जरूरी है। इसके लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं-

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स्वीकार्यता:

 अगर आप अपनी बीमारी को जितनी जल्दी स्वीकार कर लेंगे उतना आपके लिए फायदेमंद होगा। आपको बीमारी के हर पहलु को समझकर उन्हें स्वीकार करना होगा, जिससे आप नकारात्मक विचारों से बच जाएंगे। हमेशा सकारात्मक विचार बनाएं रखें और आप देखेंगे कि आप जल्दी ठीक होने लगे हैं।

खुद को माफ करें :

बीमारी होने के बाद अपनी लाइफ स्टाइल को कोसने और अपराधबोध महसूस करने का कोई फायदा नहीं। खुद को माफ करें और स्वस्थ भविष्य के बारे में सोचें।

एक्शन प्लान बनाएं :

बीमारी को स्वीकारने और खुद को माफ करने के बाद तय करें कि आप कितनी जल्दी स्वस्थ होना चाहते हैं। इसके लिए खानपान और व्यायाम का एक्शन प्लान बनाएं

लोगों से जुड़े रहें :

अकेलापन हर बीमारी की जड़ है। अगर आप डायबिटीज का शिकार है तो अकेले रहने से बचें और लोगों से घुलें मिलें। इससे आप चिंता से दूर रहेंगे। समय-सयम पर अपने दोस्त, परिवार या प्रेमी की मदद लें और हमेशा बातचीत करते रहें। ये डिप्रेशन से बचने का सबसे कारगर उपाय है।

अगर आपको अपनी समस्या को लेकर कोई सवाल है, तो कृपया अपने डॉक्टर से परामर्श लेना ना भूलें।

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