Rare congenital Heart defects: जानिए रेयर कंजेनाइटल हार्ट डिजीज से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी यहां!
हार्ट टू हार्ट ग्लोबल केयर (Heart to Heart Global Cardiac Care) द्वारा पब्लिश्ड रिपोर्ट के अनुसार पूरे विश्व में 1.3 मिलियन रेयर कंजेनाइटल हार्ट डिजीज (Rare congenital heart defects) की समस्या से पीड़ित बच्चों का जन्म होता है। रेयर कंजेनाइटल हार्ट डिजीज को अगर सामान्य शब्दों में समझें तो इसका अर्थ है दुर्लभ जन्मजात हृदय दोष। आज इस आर्टिकल में जानेंगे रेयर कंजेनाइटल हार्ट डिजीज (Rare congenital heart defects) की लिस्ट में काईन-कौन सी दिल की बीमारी (Heart Disease) शामिल है।
रेयर कंजेनाइटल हार्ट डिजीज क्या है?
रेयर कंजेनाइटल हार्ट डिजीज में कौन-कौन सी दिल की बीमारी शामिल है?
रेयर कंजेनाइटल हार्ट डिजीज के कारण क्या हैं?
चलिए रेयर कंजेनाइटल हार्ट डिजीज (Rare congenital heart defects) से जुड़े इन सवालों का जवाब जानते हैं।
सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (Centers for Disease Control and Prevention) में पब्लिश्ड रिपोर्ट के अनुसार रेयर कंजेनाइटल हार्ट डिजीज (Rare congenital heart defects) जन्म के साथ ही बच्चों में होने वाली दिल से जुड़ी बीमारी है। जन्म से निम्नलिखित हार्ट डिजीज बच्चों में देखी जा सकती है, लेकिन इसके पीछे कुछ कारण भी होते हैं। रेयर कंजेनाइटल हार्ट डिजीज के कारण को समझेंगे, लेकिन सबसे पहले रेयर कंजेनाइटल हार्ट डिजीज (Rare congenital heart defects) की लिस्ट में शामिल बीमारियों के बारे में संह लेते हैं। इनमें शामिल है-
रेयर कंजेनाइटल हार्ट डिजीज (Rare congenital heart defects) में कौन-कौन सी दिल की बीमारी शामिल है?
एट्रियल सेप्टल डिफेक्ट (Atrial Septal Defect)- एट्रियल सेप्टल डिफेक्ट को सामान्य भाषा में दिल में छेद के नाम से जाना जाता है।ह्यूमन हार्ट में चार चेंबर होते हैं। ASD एक ऐसी स्थिति होती है, जहां दो ऊपरी कक्षों के बीच में छेद होता है। एट्रियल सेप्टल डिफेक्ट (ASD) को रेयर कंजेनाइटल हार्ट डिजीज की लिस्ट में शामिल किया गया है।
एट्रियो वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट (Atrioventricular Septal Defect)- हार्ट के लेफ्ट, राइट चेंबर में छेद होने की समस्या को एट्रियो वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट (AVSD) कहते हैं। एट्रियो वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट की समस्या की वजह से ब्लड फ्लो से जुड़ी समस्या होती है।
कोआरकेशन ऑफ दि एओर्टा (Coarctation of the Aorta)-एओर्टा बॉडी का सबसे बड़ा आर्टरी माना जाता है। यह पूरे शरीर में ऑक्सिजन रिच ब्लड सप्लाई का काम करता है, लेकिन जन्म से ही नैरो होने की वजह से कोआरकेशन ऑफ दि एओर्टा (Coarctation of the Aorta) को रेयर कंजेनाइटल हार्ट डिजीज की श्रेणी में रखा जाता है।
डबल आउटलेट राइट वेंट्रिकल (Double-outlet Right Ventricle)-जन्म से ही डबल आउटलेट राइट वेंट्रिकल की समस्या देखी जाती है। इसलिए इसे रेयर कंजेनाइटल हार्ट डिजीज की लिस्ट में शामिल किया गया है। एओर्टा राइट वेंट्रिकल और राइट वेंट्रिकल से ही लंग्स तक ऑक्सिजन सप्लाई में इसकी खास भूमिका होती है।
डी-ट्रांस्पोजिशन ऑफ दि ग्रेट आर्टरी (d-Transposition of the Great Arteries)- डेक्स्ट्रो ट्रांस्पोजिशन ऑफ दि ग्रेट आर्टरी एक रेयर कंजेनाइटल हार्ट डिजीज है। इस कंजेनाइटल हार्ट डिजीज के दौरान एओर्टा राइट या लेफ्ट डेक्सट्रो कनेक्ट होती है। इसे क्रिटिकल कंजेनाइटल हार्ट डिफेक्ट (Critical congenital heart defect) भी कहा जाता है।
एब्सटिन अनोमली (Ebstein Anomaly)- रेयर कंजेनाइटल हार्ट डिजीज एब्सटिन अनोमली के दौरान वॉल्व का पोजीशन ठीक नहीं होता है। ऐसी स्थिति में वॉल्व valve ठीक तरह से अपना काम नहीं कर पाता है। यही नहीं एब्सटिन अनोमली होने की स्थिति में ब्लड वॉल्व से लीक भी हो सकता है, जिससे हार्ट को अपना काम करने में दिक्कत आ सकती है।
हाइपोप्लास्टिक लेफ्ट हार्ट सिंड्रोम (Hypoplastic Left Heart Syndrome)- हाइपोप्लास्टिक लेफ्ट हार्ट सिंड्रोम (HLHS) की स्थिति तब बनती है जब दिल बाईं ओर से ठीक तरह से डेवलप नहीं हो पाता है। ऐसी स्थिति में ऑक्सिजन और ब्लड दोनों की कमी हो सकती है।
इन्टरप्टिड एओर्टिक आर्च (Interrupted Aortic Arch)-एओर्टा ठीक तरह से डेवलप नहीं होने की स्थिति को इन्टरप्टिड एओर्टिक आर्च (Interrupted Aortic Arch) कहते हैं। अगर इन्टरप्टिड एओर्टिक आर्च की समस्या नजर आती है, तो ऐसी स्थिति में शिशु के जन्म के कुछ ही दिनों बाद सर्जरी की जा सकती है।
पल्मोनरी एट्रेसिया (Pulmonary Atresia)-जब हार्ट में मौजूद वॉल्व ठीक तरह से डेवलप नहीं हो पाते हैं तो ऐसी स्थिति रेयर कंजेनाइटल हार्ट डिजीज पल्मोनरी एट्रेसिया कहलाती है। हार्ट से लंग्स तक ब्लड फ्लो कंट्रोल करना इसी वॉल्व का काम होता है।
सिंगल वेंट्रिकल (Single Ventricle)-सिंगल वेंट्रिकल डिफेक्ट्स (Single Ventricle Defects) की समस्या होने पर एक वेंट्रिकल छोटा या ठीक तरह से विकसित नहीं होता है। ऐसे में ब्लड को पंप करने के लिए उनका एक वेंट्रिकल ही अच्छे से काम करता है। यह एक जन्मजात हृदय दोष है, जो आमतौर पर बहुत कम बच्चों में देखने को मिलती है। ऐसा माना जाता है कि एक लाख में से पांच बच्चों को यह समस्या होती है। सिंगल वेंट्रिकल डिफेक्ट्स (Single Ventricle Defects) कई प्रकार के हो सकते हैं।
टेट्रालजी ऑफ फलोट (Tetralogy of Fallot)-रेयर कंजेनाइटल हार्ट डिजीज (Rare congenital heart defects) की लिस्ट में शामिल टेट्रालजी ऑफ फलोट के दौरान हृदय से पूरे शरीर में पुअर ब्लड ऑक्सिजन सप्लाई होता है। ऐसे लोगों में त्वचा का रंग हल्का ब्लू कलर का हो सकता है।
टोटल अनोमलस पल्मोनरी वीनस रिटर्न (Total Anomalous Pulmonary Venous Return)-पल्मोनरी वेन्स में मौजूद चार ब्लड वेसेल्स जब लेफ्ट एट्रियम से वापस हार्ट में पहुंच जाती है, तो ऐसी स्थिति रेयर कंजेनाइटल हार्ट डिजीज की पैदा करती है और इसे मेडिकल टर्म में टोटल अनोमलोउस पल्मोनरी वीनस रिटर्न (Total Anomalous Pulmonary Venous Return) कहा जाता है।
ट्रायकप्सिड अट्रेसिया (Tricuspid Atresia)-जब दो हार्ट चेंबर्स के वॉल्व में डिफेक्ट हो, तो ऐसी स्थिति ट्रायकप्सिड अट्रेसिया (Tricuspid Atresia) कहलाती है। इसे रेयर कंजेनाइटल हार्ट डिजीज माना जाता है।
ट्रंकस आर्टेरीओसस (Truncus Arteriosus)- जब हार्ट से सिर्फ एक वेसल्स बहार निकली हो तो ऐसी स्थिति ट्रंकस आर्टेरीओसस (Truncus Arteriosus) कहलाती है। वहीं इस हेल्थ कंडिशन के दौरान दिल के दो चेंबर के बीच छेद भी रहता है, जिसे वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट (Ventricular Septal Defect) कहते हैं।
ये सभी रेयर कंजेनाइटल हार्ट डिजीज है, जो शिशु में जन्म से ही देखी जा सकती है।
फेमली हिस्ट्री में जेनेटिकल (Family history and genetics) समस्या होना।
इन ऊपर बताये कारणों की वजह से रेयर कंजेनाइटल हार्ट डिजीज (Rare congenital heart defects) की समस्या हो सकती है।
रेयर कंजेनाइटल हार्ट डिजीज की समस्या होने पर इसका इलाज भी किया जा सकता है। कुछ केसेस में प्रेग्नेंसी (Pregnancy) के दौरान अल्ट्रासाउंड (Ultrasound) के दौरान ही शिशु में होने वाली परेशानियों की जानकारी मिल सकती है और फिर इलाज किया जाता है।
रेयर कंजेनाइटल हार्ट डिजीज (Rare congenital heart defects) या दिल की बीमारी से जुड़े किसी सवालों का जवाब जानना चाहते हैं, तो हमें कमेंट कर पूछ सकते हैं। हैलो स्वास्थ्य के हेल्थ एक्सपर्ट आपके सवालों का जवाब जल्द से जल्द देने की कोशिश करेंगे।
शिशु के जन्म के बाद पेरेंट्स की रिस्पॉन्सिब्लिटी बढ़ जाती है। जन्म के बाद शिशु को अलग-अलग टीके लगाए जाते हैं, जिसके लिए अलग-अलग समय निर्धारित की गई है। हेल्थ एक्पर्ट एवं रिसर्च के अनुसार कुछ वैक्सीन बच्चे को लगवाना अवश्य होता है। इसलिए नीचे दिए इस वीडियो लिंक पर क्लिक कर जानिए शिशु के लिए जरूरी वैक्सिनेशन के बारे में।
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