अकूस्टिक ट्रॉमा पहचानने के कुछ तरीके हो सकते हैं, इसमें डॉक्टर आप से सवाल कर सकते हैं कि हाल ही में आप किसी ऊंची आवाज के संपर्क में आए हैं या नहीं। इसके अलावा
ऑडियोमेट्री (Acoustic) के जरिए भी और अकूस्टिक ट्रॉमा (Acoustic Trauma) को पहचाना जा सकता है। इस टेस्ट में आपको साउंड की अलग-अलग तेज आवाज को सुनाया जाता है और उस पर आपका रिस्पांस नोट किया जाता है।
अकूस्टिक ट्रॉमा को अलग-अलग तरह से ट्रीट किया जा सकता है। इसके लिए टेक्नोलॉजिकल हियरिंग असिस्टेंट (Technological Hearing Assistance) जरूरत पड़ सकती है। आपके डॉक्टर आपके लिए
टेक्नोलॉजिकल असिस्टेंट दे सकते हैं, जिसमें हियरिंग एड का इस्तेमाल होता है। इसमें कौक्लियर इम्प्लांट का इस्तेमाल हियरिंग लॉस की स्थिति में अकूस्टिक ट्रॉमा (Acoustic Trauma) में किया जा सकता है।
इसके अलावा ईयर प्रोटेक्शन में डॉक्टर आपको ईयर प्लग्स इस्तेमाल करने की सलाह दे सकते हैं, जिसमें आपके कानों की रक्षा की जा सके। इस तरह के इयर प्लग्स को पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (पीपीई) (Personal Protective Equipment [PPE]) तौर पर जाना जाता है। यह उन लोगों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है, जो लोग तेज आवाज में काम करते हैं।
मेडिकेशन भी अकूस्टिक ट्रॉमा का इलाज हो सकता है। आपके डॉक्टर अकूस्टिक ट्रॉमा (Acoustic Trauma) की स्थिति में
ओरल स्टेरॉयड मेडिकेशन दे सकते हैं। ऐसा कुछ विशेष केसेस में ही किया जा सकता है। यदि आप की सुनने की क्षमता कम हो गई है, तो आपको डॉक्टर नॉइस प्रोटेक्शन की सलाह दे सकते हैं।
अकूस्टिक ट्रॉमा में यदि हियरिंग लॉस (Hearing loss) होता है, तो उसे दोबारा ठीक नहीं किया जा सकता, इसीलिए अपने कानों की पूरी तरह से देखभाल करना और तेज आवाजों से अपने कानों को बचा कर रखना बेहद जरूरी है।