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ऐसे करें स्ट्रोक के मरीजों की घर पर देखभाल

ऐसे करें स्ट्रोक के मरीजों की घर पर देखभाल

भारत जैसे देश में स्ट्रोक मौत की सबसे बड़ी वजहों में से एक होने के साथ ही विकलांगता के साथ जीने की वजह भी है। 55 वर्ष से ज्यादा उम्र के 10 लोगों में 1-5 महिलाएं और 1-6 पुरूषों को स्ट्रोक का खतरा रहता है। स्ट्रोक रक्त वाहिकाओं में रूकावट की वजह से होता है, जो मस्तिष्क तक रक्त ले जाते हैं। हालांकि स्ट्रोक बुढ़ापे की बीमारी नहीं है इसलिए यह किसी भी उम्र में किसी भी व्यक्ति को हो सकती है। स्ट्रोक से ठीक होने के बाद लोग अपनी जिदंगी को पहले की तरह ही जीना चाहते हैं, लेकिन सच कहें तो ऐसा बहुत मुश्किल होता है। स्ट्रोक के बाद जिंदगी चुनौतीपूर्ण हो जाती है और व्यक्ति को परिवार की मदद से जीना पड़ता है।

स्ट्रोक के मरीज की अस्पताल में रिहैबिलिटेटिव थेरिपी (Rehabilitative Therapy) तब शुरू होती है जब वह पहले से स्थिर हो जाता है। जब मरीज को अस्पताल से डिस्चार्ज किया जाता है तब निरंतर दवाई और देखभाल की जरूरत पड़ती है। इस रिहैबिलिटेटिव थेरिपी से स्ट्रोक के मरीजों को उनकी शारीरिक क्षमता और स्वतंत्रता प्राप्त करने में मदद मिलती है। सही देखभाल और मेडिकेशन से कई स्ट्रोक सर्वाइवल कम समय में पूरी तरह ठीक हो सकते हैं।

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स्ट्रोक के मरीज की घर पर देखभाल कैसे करें?

1.फिजिकल थेरिपी

स्ट्रोक के मरीजों को एक खास तरह की फिजिकल थेरेपी को अपनी दिनचर्या में शामिल करना होता है। इसके लिए फिजिकल थेरेपिस्ट खास तरह की फिजिकल एक्सरसाइज की सलाह देते है जिसमें तंग मांसपेशियों और कठोर जोड़ों की एक्सरसाइज करवाई जाती है। इसके अलावा खड़े होने या चलने के दौरान मिरर का इस्तेमाल किया जाता है ताकि सही बॉडी पोस्चर देखा जा सके, अगर सही बॉडी पोस्चर नही है तो उस पर काम किया जाता है।

2.ऑक्यूपेशनल थेरिपी

इस थेरेपी में स्ट्रोक के मरीज की दैनिक गतिविधियों जैसे भोजन करना, ड्रेसिंग आदि के लिए आवश्यक कौशल विकसित किया जाता है। ताकि स्ट्रोक पेशेंट खुद से इस तरह के काम करने में सक्षम हो सके।

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3.स्पीच या कम्युनिकेशन थेरिपी

इस थेरेपी का इस्तेमाल स्ट्रोक के मरीजों में बोलने की समस्या और निगलने की समस्या से उबरने के लिए किया जाता है।

4.मानसिक और मनोवैज्ञानिक परामर्श

इस परामर्श का बहुत महत्व है इससे स्ट्रोक के मरीजों में भावनात्मक और व्यवहारिक चुनौतियों का सामना करने में मदद मिलती है।

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स्ट्रोक के मरीजों की देखभाल के लिए उचित सलाह

यहां पर स्ट्रोक के मरीजों और उनकी देखभाल करने वाले लोगों के लिए उचित सलाह दी जा रही है ताकि वे आत्मनिर्भर बन सके।

  • स्ट्रोक के मरीजों के लिए स्प्लिंट्स का उपयोग दर्द, हाइपोटेंशन, आदि के प्रबंधन के लिए न्यूरो-रिहैबिलिटेशन के लिए किया जाता है। स्ट्रोक के पैसेंट को कब, कैसे और कितने समय में सप्लिंट का उपयोग करना है ये सीखना जरूरी है।
  • थेरेपेटिक पोजिशनिंग
  • मरीज के लेटने अथवा बैठने के दौरान तकिए की पोजिशन का ध्यान रखना।
  • अव्यवस्था से बचने के लिए कंधे को सावधानी पूर्वक संभालना।
  • घर पर या बाहर जाते समय सभी तरह की सुरक्षा सावधानियों का पालन करें ताकि गिरने से बचा जा सके।
  • मरीजों और देखभाल करने वालों को कमजोर हाथों या पैरों के उपयोग की बजाय मजबूती का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा शारीरिक गतिविधियां की जा सके।
  • दिन में स्ट्रोक वाले हिस्से का अभ्यास या मूवमेंट करें।
  • जब भी व्यक्ति को व्हीलचेयर या बिस्तर से स्थानांतरित करने के लिए सही तकनीक का इस्तेमाल करें ताकि पीठ दर्द से बचा जा सके।
  • स्ट्रोक के मरीजों की देखभाल में हमेशा प्रोत्साहित अथवा मोटिवेट करें ताकि वे जल्दी से आम जिंदगी में वापसी कर सके।
  • स्ट्रोक के मरीजों की देखभाल और सुविधा के लिए अपने घर की सीढ़ियों, हैंडल बार, नॉन स्किड मैट, एलिवेटेड टॉयलेट सीट पर रेलिंग लगाएं ताकि उनको इस्तेमाल करने में सुविधा हो सके।
  • स्ट्रोक के मरीजों की देखभाल के लिए ज्यादा थकान उनकी कार्यक्षमता को प्रभावित करती है इसलिए समय-समय पर उचित आराम भी महत्वपूर्ण है।

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स्ट्रोक के मरीजों के लिए घर पर पुनर्वसन के दौरान हासिल किए जाने वाले लक्ष्य

वैसे तो स्ट्रोक के मरीजों की देखभाल के लिए घर पर पुनर्वसन के अलग-अलग मार्कर हो सकते हैं, लेकिन हम यहां पर कुछ सामान्य मार्कर बताने जा रहे है। हालांकि इन मार्कर को अपनाने से पहले अपने थेरिपिस्ट से उचित सलाह लेना जरूरी है। तो आइए जानते हैं स्ट्रोक के मरीजों की घर पर देखभाल और पुनर्वसन के लिए उचित मार्कर क्या है-

  • घावों पर कम दबाव महसूस करना
  • मूवमेंट के दौरान दिक्कत न होना
  • संतुलन में सुधार और सहायता के बिना आत्म-देखभाल करने की क्षमता जैसे भोजन करना, स्नान, शौचालय की गतिविधियों में सुधार आदि।
  • इनडोर और आउटडोर गतिशीलता में सुधार
  • काम पर लौटना और अपने काम करना

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स्ट्रोक के मरीजों के लिए होम रिहेब क्यों महत्वपूर्ण है?

सामान्यतौर स्ट्रोक के मरीजों की देखभाल के दौरान स्ट्रोक के मरीज की स्थिति में पहले तीन महीनों में ज्यादा सुधार होता है। लेकिन इसके बाद यह सुधार धीमा होने लगता है। स्ट्रोक के बाद शुरूआती समय में किसी फिजियोथेरेपी ओपीडी में रोज-रोज जाना संभव नही है इसलिए होम रिहेब ज्यादा महत्वपूर्ण हाेता है।

स्ट्रोक के मरीजों की देखभाल के लिए होम रिहैबिलिटेशन को उसकी जरूरतों के लिए स्थानांतरण तकनीक सीखने में मदद करता है। होम रिहैबिलिटेशन के अंतर्गत सीमित गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित किया जाता है जैसे ड्रेसिंग अपर बॉडी, लोअर बॉडी, फीडिंग, अलग-अलग उचाईयों पर बैठने की प्रैक्टिस आदि। होम रिहैबिलिटेशन स्ट्रोक के मरीज की देखभाल की निरंतरता संयुक्त गतिशीलता को बनाए रखने और बेहतर बनाने में मदद करती है।

इसलिए शायद ज्यादातर परिवार के सदस्य पुनर्वास कार्यक्रम की शुरूआत में भाग लेने के लिए उत्साहित रहते है। अगर किसी परिवार के सदस्य को स्ट्रोक हुआ है तो पुनर्वास कार्यक्रम में शामिल होना चाहिए ताकि स्ट्रोक के मरीजों को आत्मनिर्भर बनाने में उनकी मदद की जा सके।

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स्ट्रोक के मरीज का ध्यान रखने वाले व्यक्ति के लिए टिप्स

अगर आप स्ट्रोक के मरीजों की देखभाल करने के लिए आपको कई सारी बातों का ध्यान रखना पड़ सकता है। ऊपर दी गई सभी बातों के साथ कुछ अहम नियम बनाएं और उनका पालन करें। क्योंकि किसी मरीज की केयर करना कोई आसान कार्य नहीं होता है।

स्ट्रोक के मरीजों की देखभाल आपके ऊपर एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है जिसका ध्यान आपको पूरी सावधानी से रखना पड़ सकता है। स्ट्रोक मरीज का ध्यान रखने के लिए इन नियमों का पालन करें –

  • खुद से स्ट्रोक के बारे में पढ़ें और डॉक्टर या अन्य एक्सपर्ट से जानकारी इकट्ठा करें कि जिस मरीज का आप ध्यान रख रहे हैं उनके केस में कोई विशेष प्रकार की व्यवस्था की जरूरत तो नहीं है।
  • अगर परिवार का कोई सदस्य स्ट्रोक का शिकार हुआ है तो उसके इंश्योरेंस और फाइनेंस के बारे में जांच-पड़ताल करें और इंश्योरेंस कंपनी से सभी जानकारी और सुविधा प्राप्त करने की कोशिश करें।
  • जल्दी हार न मानें क्योंकि स्ट्रोक से उभरने में व्यक्ति को समय लग सकता है, लेकिन इसके लिए सबसे अधिक आवश्यकता अपनों के साथ और प्रेम की होती है। उनके सभी कार्यों जैसे नलहाना, कपड़े बदलना, मल त्याग और आदि में उनकी मदद करें। इसके लिए परिवार के अन्य सदस्यों की भी मदद लें।
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सूत्र

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डॉ. श्रुति सोनार द्वारा लिखित आखिरी अपडेट 06/05/2021 को