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जानें प्रीमैच्याेर शिशु के आंख और नाक की देखभाल कैसे करें, साथ में किन बातों का रखें ध्यान

जानें प्रीमैच्याेर शिशु के आंख और नाक की देखभाल कैसे करें, साथ में किन बातों का रखें ध्यान

नवजात शिशु (Infant) की देखभाल बहुत ही सावधानी से करने की सलाह दी जाती है। उनके कमरे से लेकर कपड़ों तक का पूरा ख्याल रख जाता है, ताकि वे संक्रमण (Infection) से बच सकें। क्योंकि नवजात को संक्रमण होने का खतरा सबसे अधिक होता है। लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी है एक प्रीमैच्याेर बेबी (Premature Baby) की देखभाल। प्रीमैच्याेर बेबी की केयर (Premature Baby’s Care) सामान्य बच्चों से ज्यादा करने की सलाह दी जाती है। इसके कई कारण हैं, जैसे उन्हें सांस लेने समेत संक्रमण का बड़ा खतरा अधिक होता है। आर्टिकल में बात करेंगे प्रीमैच्योर बेबी में आंख और नाक की समस्या के बारे में।

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प्रीमैच्याेर बच्चों में आंख की समस्या

आंखों का इंफेक्शन ( Eye Infection)

प्रीमैच्याेर शिशु में होने वाले आंखों के इंफेक्शन को अनदेखा नहीं करना चाहिए। ऐसे बच्चों को जन्म के एक से दो सप्ताह के अंदर आंखों के इंफेक्शन का बड़ा खतरा होता है। इसे हम ‘ऑफ्थैलिमिया न्यूनाटोरम’ (Ophthalmia Neonatorum) कहते हैं। आंखों में सूजन, आंख में पानी आना, आंखों का चिपकना और आंखों का हद से ज्यादा लाल होना इसके बड़े लक्षण हैं।

प्रीमैच्याेर बेबी में इस तरह की समस्या दिखने पर तुरंत डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर है। ब्रॉड स्पेक्ट्रम एंटी-बायॉटिक आई ड्रॉप डालने और आंख की सफाई करने से यह संक्रमण ठीक हो जाता है। दो से तीन दिन में ठीक न होने पर आंखों के डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।

आंख की पुतली में इन्फेक्शन

आंख के बीच में गोलाकार काले रंग का दिखने वाला भाग को कॉर्निया कहा जाता है। यह एक तरह से पारदर्शी होता है, लेकिन इसमें संक्रमण होने पर इसकी पारदर्शिता कम होने लगती है और इसके पीछे मौजूद आइरिस दिखना बंद हो जाती है। आंख की पुतली पर किसी भी तरह का संक्रमण आंख के लिए किसी बड़े खतरे से कम नहीं है। क्योंकि इस स्थिति में शिशु की आंख में दर्द, आंख का चिपकना और लाल होने जैसी शिकायतें आने लगती हैं। बता दें कि कार्निया की पार्दर्शिता खत्म होने पर आंख की रोशनी भी जा सकती है।

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आंसू की नली का ब्लॉक होना

आंख में एक आसूं की नली होती है जो नाक के नीचे के हिस्से में जाकर खुलती है। इस नली को ‘नेजोलेक्राइमल डक्ट’ (Nsolacrimal Duct) कहते हैं। इस नली की वजह से ही आंख में लगातार आने वाले आंसू नाक के रास्ते गले में जाते हैं, लेकिन जब यह नली ब्लॉक हो जाती है, तो यह पानी गले में उतरने के बजाय बच्चे का आंख से बहने लगते हैं, जिससे आंख में इन्फेक्शन हो जाता है और फिर बच्चे की आंख चिपकने लगती है। यह कंजंक्टिवाइटिस (Conjunctivitis) बीमारी का एक कारण बनती है।

यह कंजंक्टिवाइटिस (Conjunctivitis) बीमारी शिशुओं में आमतौर पर जन्म के एक हफ्ते बाद देखने को मिलती है। इसमें बच्चे की नाक के दोनों तरफ दिन में तीन से चार बार आंसू की नली के ऊपरी हिस्से पर मालिश करने और ब्रॉड स्पेक्ट्रम एंटी-बायॉटिक आई ड्रॉप का इस्तेमाल करने से इस समस्या से राहत मिलती है। वहीं, तीन-चार महीने में जिन बच्चों में यह समस्या ठीक नहीं होती है तो उनके लिए एक छोटा-सा ऑपरेशन ही इस समस्या से निजात दिलाता है, जिससे यह नली खुल जाती है। जानकर हैरानी होगी कि जन्म के समय तकरीबन 20 प्रतिशत बच्चों में यह समस्या पाई जाती है।

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मोतियाबिंद (cataracts) की समस्या

प्रीमैच्याेर ही नहीं बल्कि सामान्य शिशुओं में भी मोतियाबिंद की समस्या देखी जाती है, जो आगे चलकर उन्हें परेशान करती हैं। इसका सबसे बड़ा कारण गर्भावस्था के दौरान मां के खान-पान में बड़ी कमी, रूबेला नामक वायरस का इंफेक्शन, गर्भावस्था में मां का कुछ दवाओं का सेवन करना और रेडिएशन (गर्भावस्था के दौरान एक्स-रे आदि करवाना) आदि हैं।

इसका इलाज यह है कि मां अगर गर्भावस्था के दौरान अच्छा खान-पान कर तो और इन चीजों से दूर रहे तो शिशु को ‘जन्मजात मोतियाबिंद’ से बचाया जा सकता है। ‘जन्मजात मोतियाबिंद’ में आंख की पुतली के बीच में सफेद रिफ्लेक्स दिखाई देता है। जन्मजात मोतियाबिंद होने पर डॉक्टर बच्चे की आंख की रोशनी की भी जांच करते हैं। अगर मोतियाबिंद आंख के पूरे लेंस में है, तो जल्द-से-जल्द मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराना जरूरी होता है। ऐसा ना करने पर आंख में एम्बलायोपिया (Amblyopia) होने की संभावना बढ़ जाता है, जिसमें आंख के पर्दे पर पाया जाने वाला मेक्यूला डल हो जाता है और आंखें सुस्त पड़ने लग जाती है।

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प्रीमैच्योर में भैंगापन होना ( Squint In Eyes)

भैंगेपन की समस्या सामान्य और प्रीमैच्याेर दोनों ही नवजात में होना आम बात है। बता दें कि भैंगेपन में बच्चे की आंख अंदर या बाहर की तरफ होने लगती है। कई बार एक आंख में और कई बार दोनों आंखों में भैंगेपन की समस्या हो जाती है। इसमें एक या दोनों आंखों के तिरछा होने से आंखें सुस्त होने लगती है, जिससे आंख की रोशनी कम होने लगती है। अगर शुरुआत में इस पर ध्यान दिया जाए तो इससे निपटा जा सकता है।

जन्मजात काला मोतिया (Glaucoma)

आंखों में काला मोतिया की समस्या जन्मजात भी हो सकती है। इसे इन्फेंटाइल ग्लूकॉमा (Infantile Glaucoma) भी कहते हैं। इसमें आंख का ड्रेनेज सिस्टम आसामन्य होता है। इसकी वजह से आंख की रोशनी को पहुंचने वाले नुकसान की भरपाई करना मुश्किल होता है, लेकिन इसके प्रभाव को बढ़ने से रोका जा सकता है। बता दें कि इसमें आंख से लगातार पानी आने लगता है। रोशनी में आंख को चौंध लगती और खुलने में मुश्किल होती है। इसमें बच्चे की आंख का साइज भी बढ़ने लगता है। वैसे, आमतौर पर आंख का साइज 11 मिमी होता है लेकिन, इस समस्या में आंख का साइज 11 से बढ़कर 15 मिमी तक होने लगता है।

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रेटिनोपैथी (Retinopathy) ऑफ प्रीमैच्योरिटी

यह समस्या उन बच्चों में अधिक पाई जाती है जो समय से पहले जन्म लेते हैं और जिन बच्चों का वजन सामान्य बच्चों की तुलना में कम होता है। बता दें कि गर्भावस्था में बच्चे की आंख का विकास तीसरे महीने में होने लगता है और आंख के पर्दे में नई खून की नालियां बनने लगती हैं, जिससे कई बार आंख के पर्दे पर खून आने और पर्दे के खिसकने की संभावना बनी रहती है। यह बीमारी आंख की रोशनी के लिए खतरनाक होती है। इसलिए लेजर द्वारा इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है।

आंख में फुंसी होना

आंख की पलकों पर पाए जाने वाले जिईज ग्लैंड्स (Zeis Glands) में संक्रमण के कारण हुई सूजन को आंख की फुंसी कह जाता है। यह समस्या दोनों तरह के शिशुओं में पाई जाती है। यह बच्चों के बड़े होने पर भी हो सकती है। जिन बच्चों में दृष्टि दोष होता है, जो बच्चे अधिकतर आंख रगड़ते रहते हैं, जिन बच्चों की आंख की पलकों पर रूसी जमा होती रहती है और जिन लोगों को डायबीटीज हो, उनमें यह समस्या सबसे अधिक देखी जाती है।

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आंखों की जांच ( Eye Checkup) जरूरी

आंख के विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चे को जन्म देने के बाद और अस्पताल से डिस्चार्ज होने से पहले ही एक बार शिशुओं की आंखों को किसी आई सर्जन से चेक करा लेना बेहतर होता है। इससे शिशु की आंख में जो भी परेशानी होगी वो सामने आ जाएगी। अगर ऐसा नहीं करवा पाए हैं तो बच्चे को स्कूल में बैठाने से पहले यानी तीन साढ़े तीन साल की उम्र में आंखों की पूरी जांच करवाएं।

सही नंबर का चश्मा लगवाएं

अगर बच्चे की नजर कमजोर है तो चश्मा बनवाएं और उसे पहनने के लिए कहें। कई बार पेरेंट्स बच्चों को इसलिए चश्मा नहीं पहनने देते क्योंकि, उन्हें लगता है कि इससे बच्चे की आंखें कहीं और ज्यादा कमजोर न हो जाएं, लेकिन, ऐसा सोचना गलत है। इसलिए जरूरी है कि साल में एक बार बच्चें का आई टेस्ट जरूर करवाएं।नवजात बच्चों को विटामिन-ए की कमी न होने दें क्योंकि, इसकी कमी से बच्चों में रतौंधी की समस्या हो सकती है।

आंख में बिना समस्य के कोई भी आई ड्रॉप न डालें। अगर आंख में किसी भी तरह की समस्या दिखती है, तो पहले डॉक्टर की सलाह लें। आई ड्रॉप के खुलने के बाद उसे एक महीने के अंदर ही इस्तेमाल कर लें।

शिशुओं की आंखों में काजल आदि वगरैह लगाने से बचना चाहिए। क्योंकि इनमें मौजूद कार्बन के कण कार्निया और कंजंक्टाइवा को नुकसान पहुंचा सकते हैं। वहीं, शिशुओं की आंखों में शहद डालने से वह आंसुओं के साथ मिलकर बैक्टीरिया, वायरस और फंगस बढ़ाने का काम करता है, जिससे आंख में संक्रमण फैल सकता है।

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प्रीमैच्याेर बच्चों में नाक की समस्या

मां-बाप बच्चे की चेहरे की सही बनावट का बहुत ख्याल रखते हैं। इसलिए वे शिशु के बचपन से ही उसकी नाक को उठाने की कोशिश करते हैं ताकि वह नुकीली और उठी हुई बन सके। लेकिन, इस बात के बहुत कम प्रमाण है कि ऐसा करने से बच्चों की नाक में सुधार होता है। जबकि, मेडिकल साइंस के मुताबिक, ऐसा करने से बच्चों को नाक संबंधी कई परेशानियां हो सकती हैं।

सांस लेने में मुश्किल

शिशुओं को सांस लेने में तकलीफ होती है। नाक बंद होने पर उन्हें मुंह से सांस लेना पड़ जाता है, जिसे ब्रीथ डिहाइड्रेशन (Breath Dehydration) भी कहा जाता है। इसलिए जरूरी है कि ऐसे शिशुओं को संक्रमण से बचाकर रखा जाए। बच्चा सही समय पर सांस ले रहा है या नहीं, इसके लिए समय-समय पर मेडिकल चेकअप कराएं।
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सर्दी-जुकाम (Cold & cough)की गिरफ्त में आना

प्रीमैच्याेर बच्चे सर्दी-जुकाम की जकड़ में आसानी से आ जाते हैं। इन्हें सांस लेने में दिक्कते होती है। साथ ही बंद नाक की वजह उन्हें सोने और दूध पीने में भी मुश्किल होती है। नाक बहना और साफ श्लेम आना, जो कि गाढ़ा होकर पीले, सफेद या हरें रंग का हो सकता है। शिशुओं को जुकाम होने का बड़ा कारण उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली का विकसित न होना होता है।

बिना सलाह न दें बच्चों को दवाई

अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्‍स का कहना है कि चार साल से कम उम्र के बच्चों को डॉक्टर की सलाह के बिना देने वाली जुकाम और खांसी की दवाई हानिकारक साबित हो सकती है। पेरेंट्स को बिना डॉक्टर के सलाह के कोई दवाई बच्चों को नहीं देनी चाहिए। इससे बच्चों को साइड इफेक्ट्स हो सकता है। इसलिए बच्चों की बहती नाक के लिए घरेलू उपाय ही बेहतर हैं।

नाक की शेप सही न होना

प्रीमैच्याेर बेबी में कुछ न कुछ शारीरिक कमी जरूर पाई जाती है। इसमें उनकी आंख, कान या फिर नाक से संबंधित परेशानी हो सकती है। क्योंकि, प्रीमैच्याेर बेबी पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाता है तो इसलिए हो सकता है उसकी नाक का शेप ठीक न हो, या पूरी तरह से नाक विकसित न हुई है। ऐसे में इन बच्चों को सांस लेने में सबसे ज्यादा तकलीफ होती है। यही कारण है कि वह मुंह से सांस शुरू कर देते हैं।

नाक से न करें ज्यादा छेड़छाड़

विशेषज्ञों का मानना है कि प्रीमैच्याेर शिशुओं में शारीरिक अंगों का असामान्य होना आम बात है, जो समय-समय पर अच्छे से केयर करने पर ही ठीक होती है। जनन मार्ग से बाहर आने के दौरान भी शिशुओं की नाक पिचक जाती है और चपटी भी हो जाती है। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि शिशुओं में नाक का आकर अस्थाई होता है जो, समय के साथ अपना आकार बदलने लगती है। इसमें नेजल ब्रिज यानी नाक की हड्डी को विकसित होने में कुछ हफ्तों या महीने का समय लगता है। कई मामलों में इस तरह की समस्या सर्जरी से ठीक करवाई जाती है।

 

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Niharika Jaiswal द्वारा लिखित आखिरी अपडेट 27/05/2021 को
डॉ. प्रणाली पाटील के द्वारा मेडिकली रिव्यूड
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