जेस्टेशनल ट्रोफोब्लास्टिक डिजीज (GTD) क्या है और जानें इसका इलाज

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Published on अप्रैल 16, 2020 . 4 मिनट में पढ़ें
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आजकल दुनिया में इतने प्रकार की बीमारियां बढ़ गई है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। अलग-अलग नाम और लक्षणों के साथ होने वाले इन बीमारियों में से कुछ के बारे में लोगों को पता भी नहीं चल पाता है कि, आखिर उन्हें हुआ क्या है। ऐसी ही एक बीमारी का नाम है जेस्टेशनल ट्रोफोब्लास्टिक डिजीज (GTD), ये महिलाओं में होने वाली एक दुर्लभ किस्म की बीमारी है। इस बीमारी में अक्सर महिलाओं को प्रेग्नेंट होने का भ्रम हो जाता है। जरा सोचिये जिस चीज को आप प्रेग्नेंसी का लक्षण समझते हों वो अगर एक किस्म की बीमारी निकले तो, एक क्षण में आपकी दुनिया बदल नहीं जाएगी। बहुत से लोगों को इस बीमारी के बारे में मालूम भी नहीं होगा। इस आर्टिकल के जरिए हम आपको जेस्टेशनल ट्रोफोब्लास्टिक डिजीज से जुड़ी हर आवश्यक तथ्य के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं।

जेस्टेशनल ट्रोफोब्लास्टिक डिजीज क्या है ?

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि, जेस्टेशनल ट्रोफोब्लास्टिक डिजीज महिलाओं में होने वाली एक असामान्य बीमारी है। ये गर्भधारण के महिलाओं की ओवरी में ट्रोफोबैस्ट कोशिकाएं बढ़ने लगती है, जिसे GTD कहते हैं। अगर किसी महिला को ये बीमारी होती है तो, शुरूआती दिनों में वो इसे प्रेग्नेंसी का लक्षण मान सकती हैं। ज्यादातर लोग इस बीमारी में कंफ्यूज हो जाते हैं कि, आखिर वो प्रेग्नेंट हैं या नहीं। इस बीमारी में और भी कई प्रकार के रिस्क महिला को हो सकते हैं। जैसे कि, चोरिकार्सिनोमा ये एक प्रकार का कैंसर है जो इस अवस्था में महिला के शरीर में पनप सकता है। इसके अलावा एपिथेलियोइड ट्रोफोब्लास्टिक और प्लेसेंटल साइट ट्रोफोब्लास्टिक ट्यूमर जैसी समस्या भी हो सकती है। इस बीमारी में हाइपरथायरॉइड होने का खतरा भी बढ़ सकता है।

जेस्टेशनल ट्रोफोब्लास्टिक डिजीज के कारण

सबसे पहले बात करें जेस्टेशनल ट्रोफोबॉलास्टिक डिजीज के कारण कि, तो इसका मुख्य कारण महिलाओं में मोलर प्रेग्नेंसी हो सकता है। इस प्रेग्नेंसी में गर्भाशय में अंडा उत्पन्न तो होता है लेकिन, पोषक तत्वों की कमी और अन्य कारणों से उसका विकास नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में वो ओवरी में ही एक ट्यूमर का रूप ले लेता है, यही ट्यूमर बढ़कर जेस्टेशनल ट्रोफोबॉलास्टिक डिजीज का कारण बन सकता है। ये स्थिति तब उत्पन्न होती है जब महिला के गर्भाशय में स्पर्म का निषेचन ठीक तरह से नहीं हो पाता है। हालांकि ये स्थिति काफी असामान्य होती है लेकिन इस बीमारी में महिलाओं को एक साथ बहुत-सी स्वास्थ्य समस्याओं से गुजरना पड़ सकता है।

जेस्टेशनल ट्रोफोब्लास्टिक डिजीज के लक्षण

जेस्टेशनल ट्रोफोब्लास्टिक डिजीज का निदान

शारीरिक जांच और मेडिकल हिस्ट्री

इस बीमारी के बारे में मुख्य रूप से डॉक्टर शारीरिक जांच के द्वारा मरीज में जेस्टेशनल ट्रोफोब्लास्टिक डिजीज का पता लगाते हैं। इस दौरान महिला के शरीर में इस बीमारी के संकेतों की जांच के साथ ही, शरीर में किसी प्रकार की गांठ या असामान्य स्थिति के बारे में जानकारी ली जाती है। इसके अलावा यदि मरीज की कोई मेडिकल हिस्ट्री रही है तो उसकी जांच भी इस प्रोसेस में की जाती है।

प्लेविक की जांच

इस जांच में मुख्यरूप से डॉक्टर महिला की योनि, गर्भाशय ग्रीवा (Cervix ), गर्भाशय, फैलोपियन ट्यूब, अंडाशय और मलाशय की जांच करते हैं। इस बीमारी के लक्षण नजर आने पर डॉक्टर, योनि में एक स्पेकुलम डालकर योनि और गर्भाशय ग्रीवा का परिक्षण करते हैं। डॉक्टर योनि में लुब्रिकेटेड उंगलियां डालकर गर्भाशय और अंडाशय के आकार और उसकी स्थिति का परिक्षण करते हैं। गर्भाशय में किसी प्रकार की गांठ का परीक्षण करने के लिए डॉक्टर मलाशय में भी लुब्रिकेशन प्रोसेस के जरिए इसका परिक्षण करते हैं।

पेल्विस का अल्ट्रासाउंड

जेस्टेशनल ट्रोफोबॉलास्टिक डिजीज के बारे में पता लगाने के लिए डॉक्टर पेल्विस की अल्ट्रासाउंड का भी सहारा लेते हैं। इस प्रक्रिया में मुख्य रूप से अल्ट्रासाउंड और सोनोग्राम के दोनों का सहारा लिया जाता है। अल्ट्रासाउंड पेल्विस में कोशिकाओं को उभारने का काम करता है और सोनोग्राम द्वारा उन कोशिकाओं की तस्वीर ली जाती है। इस प्रोसेस में कभी कभी एक अल्ट्रासाउंड ट्रान्सडूसर को सोनोग्राम के लिए योनि में इंसर्ट किया जाता है।

जेस्टेशनल ट्रोफोबॉलास्टिक डिजीज का इलाज इन बातों पर निर्भर करता है

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि, जेस्टेशनल ट्रोफोबॉलास्टिक डिजीज का इलाज संभव है, हालांकि इस बीमारी का उपचार विशेष रूप से निम्नलिखित तथ्यों पर निर्भर करता है।

  • जेस्टेशनल ट्रोफोबॉलास्टिक डिजीज का इलाज मुख्य रूप से इस बात पर भी निर्भर करता है कि, आखिर ये बीमारी किस प्रकार की है।
  • ट्यूमर गर्भाशय, लिम्प नोड्स और शरीर के दूसरे हिस्से में कितना फैला है, इस बात पर भी बीमारी का इलाज निर्भर करता है।
  • जेस्टेशनल ट्रोफोबॉलास्टिक डिजीज का इलाज इस बात पर भी निर्भर करता है कि, ट्यूमर किस हिस्से में है और उसकी संख्या कितनी है।
  • गर्भाधान के कितने समय बाद ट्यूमर का पता चला इस बात पर भी इलाज निर्भर करता है।
  • जेस्टेशनल ट्रोफोबॉलास्टिक डिजीज (GTD) का इलाज इस बात पर भी मुख्य रूप से निर्भर करता है कि, ये समस्या मोलर प्रेग्नेंसी, मिसकैरिज या फिर नॉर्मल प्रेग्नेंसी में किसके द्वारा हुई है।
  • ट्यूमर का साइज कितना बड़ा है, ये बात भी एक सफल इलाज के लिए काफी मायने रखती है।

इस बीमारी का उपचार इन सभी बातों पर तो निर्भर करता ही इसके साथ ही महिला शारीरिक रूप से कितनी सबल है इस चीज पर भी डिपेंड करता है।

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