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जन्मजात होती है कॉन्जेनिटल हार्ट डिजीज, इन बातों का रखें ध्यान

जन्मजात होती है कॉन्जेनिटल हार्ट डिजीज, इन बातों का रखें ध्यान

कॉन्जेनिटल हार्ट डिजीज की समस्या बच्चे में जन्म के समय ही मौजूद रहती है। जन्म लेने के दौरान अगर बच्चे का हार्ट एब्नॉर्मल है, तो इसे कॉन्जेनिटल हार्ट डिजीज कहा जाएगा। इस समस्या के कारण हार्ट वॉल, हार्ट वॉल्व और ब्लड वैसल्स प्रभावित होते हैं। कई प्रकार के जन्मजात हृदय दोष होते हैं, जो दिल पर बुरा असर डालते हैं। कॉन्जेनिटल हार्ट डिजीज के कारण कॉम्प्लेक्स प्रॉब्लम्स हो सकती हैं और ये मौत का कारण भी बन सकता है। डिजीज के कारण ब्लड फ्लो ठीक तरह से नहीं हो पाता है या फिर ब्लड फ्लो गलत डायरेक्शन में जाता है। कई बार ब्लॉकेज की सिचुएशन भी उत्पन्न हो जाती है। जिन बच्चों को ये समस्या होती है, उन्हें अपनी जीवनकाल में अधिक देखभाल की जरूरत होती है। वहीं कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं, जो जन्म लेने के कुछ समय बाद मर जाते हैं। आज इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको कॉन्जेनिटल हार्ट डिजीज के संबंध में जानकारी देंगे और साथ ही बताएंगे कि ऐसी स्थिति में किस तरह की सावधानियां रखनी चाहिए। जानिए क्यों होती है कॉन्जेनिटल हार्ट डिजीज।

और पढ़ें: पुरुष हार्ट हेल्थ को लेकर अक्सर करते हैं ये गलतियां

कॉन्जेनिटल हार्ट डिजीज (Congenital Heart Disease ) क्यों होती है?

कॉन्जेनिटल हार्ट डिजीज होने के कई कारण हो सकते हैं। जब हार्ट स्ट्रक्चर में किसी तरह की समस्या आ जाती है, तो वो कॉन्जेनिटल हार्ट डिजीज का कारण बनती है। अभी तक रिसर्चर्स इस बात का पता नहीं लगा पाए कि आखिर क्यों दिल का विकास पूरी तरह से नहीं हो पाता है? कुछ कारण हैं, जो कॉन्जेनिटल हार्ट डिजीज या कॉन्जेनिटल हृदय रोग का कारण बन सकते हैं।

  • फैमिली में किसी को जन्मजात हृदय रोग होने के कारण।
  • प्रेग्नेंसी के दौरान कुछ दवाओं का सेवन जन्मजात हृदय रोग का कारण बन सकता है।
  • जिन महिलाओं को प्रेग्नेंसी के पहले ट्राईमेस्ट में वायरल इंफेक्शन की समस्या होती है, उनके होने वाले बच्चों में हार्ट डिफेक्ट की अधिक संभावना रहती है।

हार्ट से संबंधित बीमारियों को जानने के लिए देखें बायो डिजिटल वीडियो –

कॉन्जेनिटल हार्ट डिजीज के लिए कौन कौन से टेस्ट्स उपलब्ध हैं?

कॉन्जेनिटल हार्ट डिजीज को डायग्नोज करने के लिए डॉक्टर फिजिकल एक्जामिनेशन करते हैं। डॉक्टर प्रेग्नेंसी के दौरान भी बच्चे की हार्ट की जांच फीटल इकोकार्डियोग्राम (fetal echocardiogram) से करते हैं। जन्म के तुरंत बाद बच्चे में हार्ट डिजीज है या फिर नहीं, इस बात की जानकारी मिल जाती है। बच्चे में जन्मजात हार्ट डिजीज होने पर निम्नलिखित लक्षण नजर आ सकते हैं।

  • तेजी से सांस लेना
  • सायनोसिस (Cyanosis) या त्वचा, होंठ और नाखूनों का रंग नीला होना
  • थकान
  • पूअर ब्लड सर्कुलेशन

कुछ बच्चों में हार्ट डिजीज के लक्षण नजर नहीं आते हैं और वयस्क होने तक उनका निदान नहीं हो पाता है। जानिए डॉक्टर हार्ट डिजीज की जांच कैसे करते हैं।

  • इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (electrocardiogram)
  • चेस्ट एक्स-रे (chest X-ray)
  • ब्लड टेस्ट (Blood tests)
  • एमआरआई और सीटी स्कैनिंग (magnetic resonance imaging)

कुछ बच्चों को जन्म के बाद सांस लेने में दिक्कत होती है या फिर फीडिंग करने में भी दिक्कत हो सकती है। साथ ही वजन भी कम हो सकता है। रूटीन मेडिकल चेकअप के दौरान इन समस्याओं का पता चल जाता है। बच्चों के कार्डियोलॉजिस्ट (Pediatric cardiologists) हार्ट संबंधित समस्याओं की जांच करते हैं और ट्रीटमेंट भी करते हैं। साथ ही फ्यूचर में ली जाने वाली सावधानियों के बारे में भी जानकारी देते हैं।

और पढ़ें :हार्ट अटैक और कार्डिएक अरेस्ट में क्या अंतर है?

इस हार्ट की तकलीफ के साथ बच्चे को कौन-कौन सी हेल्थ प्रॉब्लम हो सकती है?

बच्चों को निम्नलिखित हार्ट संबंधित समस्याओं का सामान करना पड़ सकता है।

  • एट्रियल सेप्टल डिफेक्ट (Atrial Septal Defect)
  • ट्रिओवेंटिकुलर सेप्टल डिफेक्ट ( Atrioventricular Septal Defect)
  • कॉर्टेशन ऑफ द ओर्टा ( Coarctation of the Aorta)
  • डबल आउटलेट राइट वेंट्रिकल (Double-outlet Right Ventricle)
  • डी- ट्रांसपुजिशन ऑफ द ग्रेट ऑर्रीज (d-Transposition of the Great Arteries)
  • एबस्टीन एनोमली (Ebstein Anomaly)
  • हाइपोप्लास्टिक लेफ्ट हार्ट सिंड्रोम (Hypoplastic Left Heart Syndrome)
  • इंटरप्टेड ऑर्टिक आर्च (Interrupted Aortic Arch)
  • पल्मोनरी एट्रिसिया (Pulmonary Atresia)
  • सिंगल वेट्रिकल (Single Ventricle)
  • टेट्रालॉजी ऑफ फलोट (Tetralogy of Fallot)
  • टोटल एनोमलस पल्मोनरी वीनस रिटर्न (Total Anomalous Pulmonary Venous Return)
  • ट्राइकसपिड अट्रेसिया (Tricuspid Atresia)
  • ट्रंकस आर्टेरियोसस (Truncus Arteriosus)
  • वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट (Ventricular Septal Defect)

और पढ़ें: लड़का या लड़की : क्या हार्टबीट से बच्चे के सेक्स का पता लगाया जा सकता है?

इस तकलीफ से निपटने के लिए कौन कौन से उपाय अपनाए जा सकते हैं?

कॉन्जेनिटल हार्ट डिजीज से बचने के लिए प्रेग्नेंसी के दौरान अधिक सावधानी की आवश्यकता होती है। जो महिलाएं प्रेग्नेंसी के दौरान बिना सलाह के ड्रग्स का सेवन करती हैं या फिर वायरल इंफेक्शन होने पर ठीक से इलाज नहीं करा पाती है, उनके बच्चों को कॉन्जेनिटल हार्ट डिजीज या जन्मजात दिल की बीमारी का अधिक खतरा रहता है। बेहतर होगा कि प्रेग्नेंसी के दौरान किसी भी प्रकार की समस्या होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें और बीमारी का इलाज कराएं। कॉन्जेनिटल हार्ट डिजीज के ट्रीटमेंट के लिए डॉक्टर सर्जरी की हेल्प ले सकते हैं। सर्जरी की हेल्प से हार्ट या ब्लड वैसल्स को रिपेयर किया जा सकता है। कुछ बच्चों को सर्जरी की जरूत नहीं होती है और उन्हें कार्डियक कैथेटेराइजेशन (cardiac catheterization) के माध्यम से ठीक करने की कोशिश की जाती है। कैथेटर एक लंबी ट्यूब होती है, जिसे रक्त वाहिकाओं के माध्यम से हार्ट में डाला जाता है। इसके माध्यम से डॉक्टर मेजरमेंट के साथ ही पिक्चर भी ले सकते हैं। इस दौरान रिपेयर का काम भी किया जाता है। ऐसा करने से बिना सर्जरी के ब्ल फ्लो को ठीक किया जा सकता है और दिल भी ठीक तरह से काम करना शुरू कर देता है। कॉन्जेनिटल हार्ट डिजीज के साथ जीना चुनौतीपूर्ण होता है। बच्चे को बड़े होने तक बहुत सी सावधानियां रखनी पड़ती है। डॉक्टर इस संबंध में सभी जानकारी उपलब्ध कराते हैं।

इस तकलीफ में बच्चे की हेल्थ का ख्याल कैसे रखा जा सकता है?

जिन बच्चों को कॉन्जेनिटल हार्ट डिजीज होती है, वो लंबे समय तक जी सकते हैं। यानी ऐसा जरूरी नहीं है कि जिन बच्चों को कॉन्जेनिटल हार्ट डिजीज की समस्या है, उनकी मौत हो जाएगी। कुछ लोगों में समय के साथ विकलांगता हो सकती है। जेनेटिक प्रॉब्लम के कारण विकलांगता उत्पन्न हो सकती है, जो कि जोखिम को बढ़ाने का काम करती है। अगर जन्म से ही बच्चे का ट्रीटमेंट कराया जाए हार्ट डिफेक्ट के लक्षणों को कम करने में मदद मिलती है। ऐसे बच्चों में समय के साथ हार्ट की अन्य समस्याएं जैसे कि अनियमित हार्ट बीट, हार्ट मसल्स में इंफेक्शन की समस्या (increased risk of infection in the heart muscle ), कार्डियोमायोपैथी की समस्या आदि का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में बच्चों को रूटीन चेकअप की जरूरत पड़ती है। चाइल्डहुड सर्जरी के साथ ही भविष्य में भी सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है। अगर कॉन्जेनिटल हार्ट डिजीज के साथ लंबे समय तक जीना है, तो रूटीन चेकअप के साथ ही लाइफस्टाइल में सुधार भी बहुत जरूरी हो जाता है। “इस बारे में लखनऊ कि क्लीनिकल आयुर्वेदिक डॉक्टर प्रियतमा चतुर्वेदी का कहना है कि आज के समय बच्चों में इस तरह की हार्ट डिजीज देखना एक बड़ा चिंता का विषय है। इसकी सबसे बड़ी वजह है प्रेग्नेंसी के दौरान खराब लाइफस्टाइल और खानपान की। जिसका प्रभाव सीधे पेट में पल रहे बच्चे के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। इस वजह से भी बच्चा जन्म के साथ ही दिल की बीमारी के साथ पैदा होता है। इस बीमारी को कॉन्जेनिटल हार्ट डिजीज (Congenital Heart Disease) यानी दिल की जन्मजात बीमारी कहते हैं। लेकिन इन सबके अलावा दिल से जुड़ी कुछ ऐसी भी बीमारियां हैं जो किसी को भी जन्म के बाद भी हो सकती हैं। किसी भी व्यक्ति को जन्मजात दिल की बीमारी होने का मतलब यह है कि उसके हृदय में जन्म से ही कई दिक्कतें मौजूद हैं। बच्चें में होने वाली हार्ट डिजीज का समय रहते इलाज बहुत जरूरी है। “

कॉन्जेनिटल हार्ट डिजीज है, तो इन बातों का रखें ध्यान

अगर बच्चे को कॉन्जेनिटल हार्ट डिजीज (Congenital Heart Disease) है, तो उसे जीवनभर कई सावधानियों को अपनाने की जरूरत पड़ती है। जानिए क्या सावधानियां अपनाई जा सकती हैं।

  • खाने में फ्रूट्स और वेजीटेबल्स को शामिल करें और जूस का अधिक मात्रा में सेवन न करें।
  • बटर या एनिमल फैट्स के बजाय लो सैचुरेटेड फैट ही लें।
  • खाने में या फिर पेय पदार्थों में शुगर का कम सेवन करें।
  • खाने में व्होल ग्रेन लें। प्रोसेस्ड फूड को इग्नोर करें।
  • खाने में कम मात्रा में नमक लें और साथ ही फैट मीट प्रोडक्ट को इग्नोर करें।
  • बैलेंस मील को अपनाएं।
  • बाहर खाने के बजाय घर में ही खाएं।
  • छोटे बच्चे को स्पेशल डायट सजेस्ट की जा सकती है, उसे फॉलो करें।
  • वयस्क होने पर एल्कोहॉल का सेवन या स्मोकिंग न करें।
  • अपनी दिनचर्या में वॉकिंग के साथ ही एक्सरसाइज को भी शामिल करें।
  • वजन को नियंत्रित रखें। वजन बढ़ने से हार्ट से संबंधित समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।
  • स्ट्रेस न लें। अगर कोई समस्या हो, तो अपनों से शेयर करें। कई बार स्ट्रेस और डिप्रेशन के कारण भी हार्ट डिजीज का खतरा बढ़ जाता है।

आप हार्ट से संबंधित किसी भी बीमारी की जानकारी के लिए डॉक्टर से जरूर सलाह लें। अगर आपको बच्चे में किसी भी तरह के लक्षण नजर आएं, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। समय पर कराया गया ट्रीटमेंट बच्चे भविष्य में होने वाली कई समस्याओं से बचाने का काम कर सकता है। आप स्वास्थ्य संबंधी अधिक जानकारी के लिए हैलो स्वास्थ्य की वेबसाइट विजिट कर सकते हैं। अगर आपके मन में कोई प्रश्न है, तो हैलो स्वास्थ्य के फेसबुक पेज में आप कमेंट बॉक्स में प्रश्न पूछ सकते हैं और अन्य लोगों के साथ साझा कर सकते हैं।

हार्ट डिजीज की अधिक जानकारी के लिए देखें वीडियो –

हैलो हेल्थ ग्रुप हेल्थ सलाह, निदान और इलाज इत्यादि सेवाएं नहीं देता।

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Bhawana Awasthi द्वारा लिखित आखिरी अपडेट कुछ दिन पहले को
डॉ. प्रणाली पाटील के द्वारा मेडिकली रिव्यूड
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