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प्रेग्नेंसी के दौरान समस्याएं है तो नजरअंदाज ना करें, जान लें इनके बारे में

प्रेग्नेंसी के दौरान समस्याएं है तो नजरअंदाज ना करें, जान लें इनके बारे में

प्रेग्नेंसी के दौरान खानपान सही से न लेने के कारण महिलाओं को एनीमिया, यूरिन संबंधी इंफेक्शन, ब्लीडिंग की समस्या आदि का सामना करना पड़ सकता है। प्रेग्नेंसी के दौरान समस्याएं होना बहुत सामान्य है क्योंकि आपका शरीर बदल रहा होता है। बहुत से सारे शारीरिक बदलाव के साथ महिलाओं में हार्मोन इंबैलेंस भी होता है।

प्रेग्नेंसी के दौरान समस्याएं होने के कुछ लक्षण आम होते हैं जिनके बारे में आपको डॉक्टर सूचित कर देते हैं लेकिन कुछ ऐसे लक्षण होते हैं जिन्हें इग्नोर करना आपको परेशानी में डाल सकता है। जब हैलो स्वास्थय ने कंसल्टेंट गायनोकोलॉजिस्‍ट डॉ. अर्चना सिन्हा से बात की तो उन्होंने कहा कि, ”महिलाओं को गर्भावस्था में विभिन्न प्रकार की समस्याएं हो सकती हैं। ज्यादातर लोगों को पेट में दर्द या ब्लीडिंग की समस्या होती है। कई बार सही डायट न लेने की वजह से भी आयरन या कैल्शियन की कमी हो जाती है। गर्भावस्था के दौरान प्रीमैच्योर लेबर भी बड़ी समस्या है। सही समय पर डॉक्टरी सलाह और इलाज जरूर लें।प्रेग्नेंसी के दौरान समस्याएं होने पर उसे इग्नोर नहीं करना चाहिए वरना परेशानी बढ़ सकती है।”

और पढ़ें : गर्भावस्था में पेरेंटल बॉन्डिंग कैसे बनाएं?

प्रेग्नेंसी के दौरान समस्याएं जिसमें यूरिन इंफेक्शन है कॉमन

प्रेग्नेंसी के दौरान समस्याएं होने पर महिलाओं को यबटीआई की परेशानी होती है। यूटीआई के दौरान पेट के निचले हिस्से में दर्द, जलन और होती है। साथ ही मतली, पीठ दर्द या बुखार के लक्षण भी दिख सकते हैं। महिलाओं को इस दौरान थकान भी महसूस हो सकती है। अगर आपको ऐसी समस्या है तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। डॉक्टर चेक करने के बाद आपको एंटीबाॅयोटिक देगा। कुछ दिनों बाद ये समस्या खत्म हो जाएगी। प्रेग्नेंसी के दौरान समस्याएं होने पर इसे नजरअंदाज ना करें क्योंकि आपकी समस्या पेट में पल रहे भ्रूण से जुड़ी हुई हैं।

प्रेग्नेंसी के दौरान समस्याएं कहीं एनीमिया तो नहीं

एनीमिया की समस्या आयरन की कमी के कारण होती है। जब शरीर में आयरन कम हो जाता है तो शरीर पीला दिखने लगता है। एनीमिया की समस्या को दूर करने के लिए खानपान पर ध्यान देना जरूरी है। खाने में आयरन वाले फूड्स को शामिल करें, साथ ही प्रेग्नेंसी के दौरान आयरन की जांच करा लें। प्रेग्नेंसी के दौरान समस्याएं होने पर आप खुद उसका इलाज ना करके अपने डॉक्टर से बात करें।

और पढ़ें : प्रेग्नेंसी की पहली तिमाही में अपनाएं ये डायट प्लान

प्रेग्नेंसी के दौरान समस्याएं की वजह हाई ब्लडप्रेशर तो नहीं

प्रेग्नेंसी के दौरान समस्याएं होती रहती है लेकिन हाआ ब्लडप्रेशर उस दौरान बहुत सामान्य है। हाई ब्लड प्रेशर की समस्या दूसरे तिमाही के दौरान बढ़ जाती है। अगर ये कुछ समय में ठीक हो जाता है तो घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन ये कम नहीं होता है तो डॉक्टर आपको मेडिसिन लेने की सलाह दे सकते हैं। अगर आपको प्रेग्नेंसी के पहले बीपी की समस्या रही है तो गर्भावस्था के दौरान डॉक्टर आपके बीपी को नियंत्रित करने की कोशिश करेंगे। प्रेग्नेंसी के दौरान समस्याएं होने पर अपने डॉक्टर से ना छिपाएं।

और पढ़ें : गर्भावस्था में लिनिया नाइग्रा: क्या ये प्रेग्नेंसी में त्वचा संबधी बीमारी है?

जेस्टेशनल डायबिटीज की समस्या

प्रेग्नेंसी के दौरान समस्याएं बहुत सी होती है लेकिन एक बहुत आम परेशानी आती है जेस्टेशनल डायबिटीज की। जेस्टेशनल डायबिटीज ऐसी समस्या है जो ब्लड में शुगर की मात्रा को बढ़ा सकती है। प्रसव के बाद स्थिति ठीक हो जाती है, लेकिन कुछ महिलाएं व्यायाम के माध्यम से शर्करा के स्तर को बैलेंस कर लेती हैं। डॉक्टर 24 से 28वें सप्ताह में बीच आपके ग्लूकोज की जांच करते हैं। डिलिवरी के बाद समस्या समाप्त हो सकती है। कई बार प्रेग्नेंसी के दौरान समस्याएं होती है लेकिन वो बाद में खुद ही ठीक हो जाती है।

प्रसव से पहले संकुचन की स्थिति

इस दौरान आपको 37वें सप्ताह में संकुचन का आभास हो सकता है। समय से पहले प्रसव आपके बच्चे के लिए हानिकारक साबित हो सकता है। प्रीटर्म लेबर को दवाओं के माध्यम से भी ठीक किया जा सकता है। अध्ययन के दौरान पता चला है कि इसे प्रोजेस्ट्रॉन की सहायता से ठीक किया जा सकता है। प्रेग्नेंसी के दौरान समस्याएं मां के साथ बच्चे को भी परेशान करती है।

डिलिवरी के समय स्टिलबर्थ

डिलिवरी के समय स्टिलबर्थ से मतलब बच्चे की मौत से है। प्रेग्नेंसी के दौरान समस्याएं होने पर समय से डॉक्टर को दिखाएं। कभी-कभार प्रेग्नेंसी के दौरान मां को बच्चे के मूवमेंट का पता नहीं चलता ऐसे में स्टिलबर्थ का खतरा बढ़ जाता है। जब डिलिवरी के पहले या फिर डिलिवरी के बाद बच्चे की किसी कारणवश मौत हो जाती है तो उसे स्टिलबर्थ कहते हैं। ये प्रेग्नेंसी लॉस को इंडिकेट करता है। अर्ली स्टिलबर्थ 20 से 27 हफ्तों के दौरान होता है जबकि लेट स्टिलबर्थ 2

8 से 36 सप्ताह में होता है। टर्म स्टिलबर्थ 37 हफ्तों या फिर उसके बाद होता है।

और पढ़ें : प्रेग्नेंसी के दौरान कितना होना चाहिए नॉर्मल ब्लड शुगर लेवल?

प्रेग्नेंसी के दौरान मिसकैरिज

प्रेग्नेंसी के दौरान समस्याएं कई बार मिसकैरिज तक हो सकती है। प्रेग्नेंसी के 20 वें सप्ताह में जब फीटस या एम्ब्रियो की मौत हो जाती है तो उसे मिसकैरिज कहते हैं। मिसकैरिज ज्यादातर प्रेग्नेंसी के शुरुआत में होता है। दस में आठ मिसकैरिज प्रेग्नेंसी की शुरुआती तीन महीनों में होते हैं। लगभग 10 से 20 % प्रग्नेंसी मिसकैरिज की वजह से खत्म हो जाती हैं।

प्रग्नेंसी में ब्लीडिंग की समस्या

करीब 20 % महिलाएं प्रेग्नेंसी के समय ब्लीडिंग की समस्या से जूझती हैं। ये पहले 12 सप्ताह के दौरान देखने को मिलता है। पहली तिमाही के दौरान या कंसीव करने के 12 दिनों के बाद इंप्लांटेशन ब्लीडिंग हो सकती है। अगर ब्लीडिंग ज्यादा हो रही है तो ये खतरे का संकेत भी हो सकता है। प्रेग्नेंसी के दौरान समस्याएं छोटी हो या बड़ी एक बार डॉक्टर से सालह जरूर लें।

प्रेग्नेंसी के दौरान प्लेसेंटा प्रीविया

जब प्लेसेंटा गर्भाशय के मुंह में आ जाता है तो समस्या उत्पन्न हो जाती है। इसके कारण ब्लीडिंग होती है। प्लेसेंटा गर्भाशय ग्रीवा के पास आ जाता है। लेबर के समय प्लेसेंटा गर्भाशय की दीवार से अलग हो जाता है, जिसके कारण ब्लीडिंग होती है। ऐसी स्थिति में होने वाले बच्चे को भी खतरा बढ़ जाता है।

समय से पहले वाटर ब्रेक होना

प्रेग्नेंसी की तीसरी तिमाही के दौरान हो सकता है कि अचानक से वाटर ब्रेक हो जाए। समय से पहले वाटर ब्रेक होना समस्या खड़ी कर सकता है। इस दौरान यूट्रस में दवाब पड़ने से कई बार यूरिन भी पास हो जाती है। कई महिलाएं इसे लेकर परेशान हो सकती हैं। अगर समय से पहले वाटर ब्रेक हुआ है तो आपको बिना इंतजार किए तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए। गर्भावस्था में आने वाली समस्याएं कई बार बड़ी परेशानी भी खड़ी कर सकती हैं।

और पढ़ें : क्या प्रेग्नेंसी में प्रॉन्स खाना सुरक्षित है?

प्री मैच्योर बेबी का होना

बच्चा मां के पेट में नौ माह रहता है और ग्रोथ करता है। प्रेग्नेंसी के सभी महीने बहुत अहम होते हैं। अगर बच्चा किसी कारणवश समय से पहले पैदा हो जाता है तो बच्चे का वजन कम हो सकता है। प्री मैच्योर डिलिवरी होने पर बच्चे की जान को भी खतरा हो सकता है। अगर बच्चा आठ माह में पैदा होता है तो बच्चे के वजन कम होने की संभावना रहती है। जो महिलाएं ज्यादा उम्र में मां बनती हैं, उन महिलाओं के प्री मैच्योर डिलिवरी की अधिक संभावना होती है। आप इस बारे में अधिक जानकारी के लिए डॉक्टर से संपर्क कर सकती हैं।

गर्भावस्था में समस्या किसी को भी हो सकती है। सभी महिलाओं का शरीर प्रेंग्नेंसी के दौरान अलग लक्षण दिखा सकता है। अगर आपको प्रेग्नेंसी के दौरान कोई समस्या हो तो एक बार अपने डॉक्टर से संपर्क जरूर करें। इस दौरान किसी भी सलाह को बिना डॉक्टर से पूछें न अपनाएं। आप स्वास्थ्य संबंधि अधिक जानकारी के लिए हैलो स्वास्थ्य की वेबसाइट विजिट कर सकते हैं। अगर आपके मन में कोई प्रश्न है तो हैलो स्वास्थ्य के फेसबुक पेज में आप कमेंट बॉक्स में प्रश्न पूछ सकते हैं।

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ड्यू डेट कैलक्युलेटर

अपनी नियत तारीख का पता लगाने के लिए इस कैलक्युलेटर का उपयोग करें। यह सिर्फ एक अनुमान है - इसकी गैरेंटी नहीं है! अधिकांश महिलाएं, लेकिन सभी नहीं, इस तिथि सीमा से पहले या बाद में एक सप्ताह के भीतर अपने शिशुओं को डिलीवर करेंगी।

सायकल लेंथ

28 दिन

हैलो हेल्थ ग्रुप हेल्थ सलाह, निदान और इलाज इत्यादि सेवाएं नहीं देता।

सूत्र

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लेखक की तस्वीर
Bhawana Awasthi द्वारा लिखित आखिरी अपडेट 27/10/2020 को
Dr. Shruthi Shridhar के द्वारा एक्स्पर्टली रिव्यूड
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