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जानें 50 प्लस के बाद प्रेग्नेंसी प्लानिंग में होने वाले रिस्क और किन बातों का रखें ध्यान

    जानें 50 प्लस के बाद प्रेग्नेंसी प्लानिंग में होने वाले रिस्क और किन बातों का रखें ध्यान

    मेडिकल साइंस (Medical Science) में मां (Mother) बनने की सही उम्र 20 से 30 साल मानी जाती है। इसके अलावा जिनकी शादी देरी से होती है या जिनको अपना करियर बनाना होता है, वो महिलाएं प्रेग्नेंसी (Pregnancy) के बारे में तब तक नहीं सोचती जब तक वे अपने मुकाम तक नहीं पहुंच जाती हैं। कुछ महिलाएं (Women) ऐसी भी हैं, जिनको लाख कोशिशों के बाद भी बेबी कंसीव (Baby Conceive) नहीं होता है। कुछ महिलाएं 40 से 50 की उम्र के बाद भी प्रेग्नेंट (Pregnant) होने की इच्छा रखती हैं।50 के बाद प्रेग्नेंसी प्लानिंग से गुजरना किसी भी महिला के लिए एक बड़ी जंग से कम नहीं है। खैर, जब ठान लिया है तो थोड़ा गौर करें। अगर आप 50 की उम्र के बाद मां (Pregnancy at 50) बनने का सुख लेना चाहती हैं, तो इन बातों पर जरूर ध्यान दीजिएगा। आर्टिकल में हम आपको बताने जा रहे हैं, 50 के बाद प्रेग्नेंसी प्लानिंग के दौरान क्या-क्या प्रॉब्लम आती है। जानें यहां-

    प्रेग्नेंट (Pregnant) न होने पाने के कारण

    मेडिकल साइंस पहले ही कह चुका है, किसी भी महिला के लिए 20 से 30 साल की उम्र में मां बनना सबसे आसान होता है। अब हैरानी की बात यह है कि कुछ महिलाए 50 साल की उम्र के बाद यानि मॉनोपॉज शुरू होने की उम्र में मां बनने का सपना रखती है। यही सोचकर मेडिकल साइंस ने भी इस पर पहले ही तैयारी कर ली थी। यही कारण है कि मेडिकल साइंस की तरक्की की वजह से अधेड़ उम्र की महिला भी औलाद का सुख पा रही हैं। बता दें कि 30 साल की उम्र के बाद फर्टिलिटी कम होती चली जाती है। वहीं, 40 के बाद तो महिला की प्रजनन क्षमता खत्म होने के कगार पर होती है। इस उम्र में महिला के लिए मां बनना महज एक सपना था, लेकिन नई मेडिकल टेक्नोलॉजी ने इस संभंव कर दिया है।

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    क्या कहता है मेडिकल साइंस (Medical Care During Pregnancy)

    मेडिकल साइंस के मुताबिक, जब एक लड़की का जन्म होता है तो उनके अंडाशयों में 10 से 20 लाख अंडें मौजूद होते हैं। पीरियड्स शुरू होने की कंडिशन में हर ऑव्युलेशन साइकल में अंडा रीलिज होता है। गौर करने वाली बात यह है कि साल दर साल अंडाशय में मौजूद इन अंडों की संख्या कम होती जाती है। वहीं, मॉनोपॉज की अवस्था में इन अंडों का बनना पूरी तरह बंद और कम हो जाता है। ऐसे में बिना अंडे के मां बनना संभंव नहीं है, जिन महिलाओं के लिए अंडाशय में थोड़े-बहुत अंड़े बचे होते हैं, उनके लिए मां बनना मुसीबत बन जाता है। अंडों की क्वालिटी कम होने पर क्रोमोसोमल एब्नार्मेलिटीज (Chromosomal Abnormalities )होने का खतरा पैदा हो जाता है। अगर आप 50 के उम्र के बाद मां बनने की सोच रही हैं तो डॉक्टर से सलाह जरूर लें।

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    50 के बाद प्रेग्नेंसी प्लानिंग: इन 3 तरीकों से बन सकती हैं मां

    प्राकृतिक रूप (Natural Way): 50 के बाद प्राकृतिक रूप से गर्भधारण कर मां बना जा सकता है, लेकिन इसकी संभावना न के बराबर है। साथ ही इसके लिए महिला का शारीरिक तौर पर फिट होना बहुत जरुरी है।

    • आईवीएफ (IVF) तकनीक: इसमें खुद के एग्स का इस्तेमाल करके, महिला मां बनने का सुख ले सकती हैं।
    • आईवीएफ (IVF) तकनीक में डोनर एग्स (Donor Eggs) के जरिए भी मां बना जा सकता है।
    • बता दें कि आईवीएफ तकनीक में महिला के अंडों और पार्टनर के वीर्य (Sperm) से लैब में भ्रूण तैयार किया जाता है। इसके बाद उसे महिला के गर्भाशय में डालने का काम किया जाता है। लेकिन, इसके लिए डॉक्टर पहले महिला का शारीरिक चेकअप करेगा और साथ ही देखेगा कि महिला इस जिम्मेदारी के लिए तैयार है या नहीं।

    50 के बाद प्रेग्नेंसी प्लानिंग में इन बातों का ख्याल रखें

    50 के बाद प्रेग्नेंसी प्लानिंग में किसी भी महिला के लिए मां बनना आसान नहीं है। क्योंकि, इस उम्र में सबसे बड़ी दिक्कत बेबी कंसीव न होने की है। हालांकि, इस उम्र पर बच्चे को जन्म देना सहूलियतभरा हो सकता है, लेकिन इसके पीछे कितना रिस्क छिपा है यह भी जान लें

    50 के बाद प्रेग्नेंसी प्लानिंग: मिसकैरिज (miss carriage): यह समस्या गर्भधारण करने वाली किसी भी उम्र की महिला को हो सकती है, लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि 50 के बाद इसकी संभावना अधिक होती है।

    50 के बाद प्रेग्नेंसी प्लानिंग: इक्टोपिक प्रेग्नेंसी (Ectopic Pregnancy): इस उम्र में मां बनने वाली महिलाएं यह जान लें इसमें बेबी बच्चेदानी में न ठहरकर फैलोपियन ट्यूब या अंडेदानी में भी फंस जाता है।

    50 के बाद प्रेग्नेंसी प्लानिंग: प्रीक्लेम्पसिया (Preeclampsia): इस उम्र में भारत में 8 से 10 फीसदी प्रेग्नेंट महिलाएं प्रीक्लेम्पसिया जूझ रही हैं। गर्भधारण के दौरान यह समस्या उनके जान के लिए एक जंजाल है। प्रीक्लेम्पसिया का मुख्य लक्षण हाई ब्लड प्रेशर जो इस दौरान महिला के जान का खतरा पैदा करता है।

    50 के बाद प्रेग्नेंसी प्लानिंग: सिजेरियन डिलिवरी (Caesarean Section): 50 के बाद गर्भ धारण करने वाली महिलाओं के लिए यह रिस्क भी होता है कि इसमें सिजेरियन सेक्शन के ज्यादा चांसेस होते हैं।

    50 के बाद प्रेग्नेंसी प्लानिंग: जेस्टेशनल डायबिटीज (Gestational diabetes): 50 साल के बाद महिलाओं में जेस्टेशनल डायबिटीज एक आम समस्या है, खासकर गर्भवती महिलाओं के लिए। अब दिक्कत यह है कि इसमें शिशु को जेनेटिक बीमारियां होने का बड़ा रिस्क होता है।

    हायपरटेंशन (Hypertension): हाईपरटेंशन को हाई ब्लड प्रेशर की समस्या भी कहते हैं, एक पुरानी मेडिकल टर्म है जिसमें धमनियों में खून का दबाव बढ़ जाता है। इस उम्र में मां बनने के लिए इस समस्या से जूझना पड़ सकता है।

    स्टिल बर्थ (stillbirth): एक तो 50 के बाद गर्भवती होना फिर पता चलना कि बच्चा तो पेट में दम तोड़ चुका है, यह डर और दुख भी महिलाओं को सताता है। दरअसल, गर्भावस्‍था के 20वें हफ्ते के बाद लेकिन डिलीवरी से पहले कोख में ही शिशु की मौत होना स्टिलबर्थ (Still Birth) कहलाता है। इसलिए ध्यान रहे कि अगर आप इस उम्र में मां बनना चाहती हैं तो पहले इन चीजों के तैयार हो जाएं और डॉक्टर से सलाह लेना बिल्कुल न भूले

    प्री-मैच्योर डिलिवरी (Premature Delivery): इस उम्र पर गर्भधारण करने वाली महिलाओं को ‘प्री-मैच्योर डिलिवरी’ का बड़ा खतरा होता है।

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    50 के बाद प्रेग्नेंसी प्लानिंग में रिस्क (Pregnancy Risk after age 50)

    सुख पाना और 50 के बाद मां बनना में बहुत अंतर है। पहली कंडीशन में सब एक नेचुरल प्रोसेज है और महिला का शरीर इस अवस्था के लिए शत-प्रतिशत फिट होता है। वहीं, दूसरी कंडीशन में यह मां बनना किसी मेजर ऑपेशन से कम नहीं है। इसलिए 50 के बाद मां बनने महिलाओं के बच्चे में कई तरह की बीमारियां और विकार देखे जा सकते हैं। साथ ही महिला पर भी इसका बुरा असर दिखाई दे सकता है।

    50 के बाद प्रेग्नेंसी प्लानिंग: बच्चों में हो सकती है लर्निंग डिसएबिलिटीज (Learning Disabilities)

    • डिलीवरी के बाद महिला के शरीर के किसी भी अंग को बड़ा जोखिम उठाना पड़ सकता है, जिसे बर्थ डिफेक्ट्स (Birth Defects) कहते हैं।
    • डाउन सिंड्रोम (Down Syndrome) में आमतौर पर बच्चे के शारीरिक विकास में देरी, चेहरे में विषमता और हल्की बौद्धिक विकलांगता की समस्या हो सकती है।
    • लो बर्थ वेट (Low Birth Rate): दरअसल, जन्म के समय 2.5 किलो से कम वजन के शिशुओं को कम वजन वाले यानी लो बर्थ वेट बेबी कहते है।
    • ऑटिज्म और ब्रेस्ट कैंसर (Autism and Breast Cancer): 50 के बाद जन्म देने वाली महिलाओं की बच्चियों (Girls) में ऑटिज्म और ब्रेस्ट कैंसर की संभावना होती है। साथ ही इन बच्चियों का कद भी सामान्य लड़कियों से छोटा होता है।

    जेनेटिक डिसऑर्डर (Genetic Disorder): इस उम्र में जन्म देने वाले बच्चों में विसंगतियां होने का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। आंकड़ों के मुताबिक, 20 की उम्र के दौर में जेनेटिक डिसऑर्डर के साथ पैदा होने वाले बच्चों की संभावना 2,500 में एक है, जबकि 40 की उम्र में यह संभावना 350 में एक हो जाती है। वहीं, 50 के बाद ऐसे विसंगति वाल बच्चों की संख्या और बढ़ जाती है।

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    क्या है प्रेग्नेंसी की सही उम्र

    वैसे तो 20 से 30 के बीच मां बनना बेहद आसान और सहूलियतभरा होता है। लेकिन, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, 20 साल की उम्र से पहले मां बनने वाली महिलाओं के बच्चे में जन्म के दौरान मौत का खतरा सबसे अधिक होता है। वहीं, 15 से 19 साल की लड़कियों की मौत प्रेग्नेंसी के दौरान होने वाली परेशानी के कारण हो जाती है।

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    Niharika Jaiswal द्वारा लिखित आखिरी अपडेट 23/12/2021 को
    डॉ. प्रणाली पाटील के द्वारा मेडिकली रिव्यूड
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