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खून के विकार साबित हो सकते हैं जानलेवा, इग्नोर करने की न करें भूल

खून के विकार साबित हो सकते हैं जानलेवा, इग्नोर करने की न करें भूल

ब्लड लीविंग टिशू होते हैं, जो लिक्विड और सॉलिड से बने होते हैं। ब्लड का लिक्विड पार्ट प्लाज्मा (plasma) कहलाता है। प्लाज्मा वॉटर, सॉल्ट, प्रोटीन से मिलकर बना होता है। ब्लड का आधा भाग प्लाज्मा ही होता है। ब्लड के सॉलिड पार्ट में रेड ब्लड सेल्स (red blood cells), वाइट ब्लड सेल्स (white blood cells) और प्लेटलेट्स (platelets) होते हैं। ब्लड डिसऑर्डर एक्यूट या क्रॉनिक हो सकता है। ज्यादातर ब्लड डिसऑर्डर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाते है। शरीर में रेड ब्लड सेल्स ऑक्सीजन को एक स्थान से दूसरे स्थान में लेकर जाती हैं, वहीं वाइट ब्लड सेल्स इन्फेक्शन से लड़ने का काम करती है। प्लेटलेट्स खून जमाने में मदद करती हैं। जब इन सेल्स के कार्य में किसी प्रकार की कमी आ जाती है, तो ब्लड डिजीज हो जाती है। ब्लड डिजीज की कंडीशन के अनुसार ही ट्रीटमेंट किया जाता है। ब्लड डिसऑर्डर के कई प्रकार होते हैं। ब्लड के बिना शरीर का जीवित रह पाना मुश्किल है। अगर ब्लड संबंधित बीमारी के बारे में आपको जानकारी नहीं है, तो ये आर्टिकल आपके लिए उपयोगी साबित हो सकता है। हम आपको इस आर्टिकल के माध्यम से ब्लड डिसऑर्डर के अंतर्गत आने वाली तकलीफों, उनसे छुटकारा पाने के उपाय, जरूरी टेस्ट्स और ट्रीटमेंट के बारे में जानकारी देंगे। जानिए कैसे होती है ब्लड डिसऑर्डर की शुरूआत।

और पढ़ें : ब्लड शुगर कैसे डायबिटीज को प्रभावित करती है? जानिए क्या हैं इसे संतुलित रखने के तरीके

कैसे होती है ब्लड डिसऑर्डर(Blood disorders) की शुरुआत?

जब खून में खराबी होती है, तो पूरे शरीर के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। कॉमन ब्लड डिसऑर्डर के कारण एनीमिया ( anemia), ब्लीडिंग डिसऑर्डर (bleeding disorders) जैसे कि हीमोफीलिया, ब्लड क्लॉट्स और ब्लड कैंसर जैसे कि ल्यूकेमिया(leukemia), लिम्फोमा (lymphoma)और मायलोमा (myeloma) आदि हो सकते हैं। ज्यादातर ब्लड डिसऑर्डर अनुवांशिक होते हैं। कुछ ब्लड डिसऑर्डर मेडिसिन्स के कारण या फिर डायट में पोषण की कमी के कारण हो सकते हैं। जब डायट से पर्याप्त मात्रा में आयरन नहीं मिल पाता है, तो एनीमिया की बीमारी हो जाती है। इस कारण से सांस लेने में दिक्कत और थकान का एहसास हो सकता है। ब्लड डिसऑर्डर जेनेटिक म्यूटेशन (genetic mutations) के कारण भी हो सकता है। यानी ब्लड डिसऑर्डर को कई फैक्टर्स प्रभावित करते हैं। अगर लक्षण दिखते ही बीमारी का इलाज कराया जाए, तो बड़ी समस्याओं से बचा जा सकता है।

ब्लड डिसऑर्डर (Blood disorders) के कारण हो सकती हैं ये तकलीफें

ब्लड डिसऑर्डर के कारण कई तकलीफों का सामना करना पड़ सकता है। ब्लड डिसऑर्डर के कारण एनीमिया (Anemia), थैलिसीमिया (Thalassemia), हीमोफीलिया (Hemophilia), प्लेटलेट्स डिसऑर्डर (Platelet Disorder), वाइट ब्लड सेल्स डिसऑर्डर (White Blood Cell disorder) और अन्य डिसऑर्डर (Other Blood Disorders) की समस्या हो सकती है। जानिए ब्लड डिसऑर्डर के कारण क्या लक्षण दिखाई पड़ते हैं।

आयरन की कमी के कारण होती है एनीमिया (Anemia) की समस्या

एनीमिया ब्लड डिसऑर्डर का एक प्रकार है। जब खून में आयरन की कमी हो जाती है, तो एनीमिया की बीमारी हो जाती है। प्रोटीन हीमोग्लोबिन को प्रोड्यूस करने के लिए शरीर में आयरन की जरूरत होती है, जो रेड ब्लड सेल्स की सहायता से लंग्स से पूरे शरीर में ऑक्सीजन को ले जाने में मदद करता है। एनीमिया के निम्न प्रकार होते हैं।

  • पर्निसियस एनीमिया (Pernicious anemia)
  • आयरन डेफिशिएंसी एनीमिया (Iron deficiency anemia)
  • अप्लास्टिक एनीमिया (Aplastic anemia)
  • सिकल सेल एनीमिया (Sickle cell anemia)
  • थैलेसीमिया (Thalassemia)
  • ऑटोइम्यून हीमोलिटिक एनीमिया (Autoimmune hemolytic anemia)

शरीर में खून की कमी होने पर कमजोरी के साथ ही अन्य लक्षण भी दिख सकते हैं। एनीमिया होने पर शरीर में निम्नलिखित लक्षण नजर आ सकते हैं।

  • कमजोरी का एहसास
  • चक्कर आना
  • सिरदर्द होना
  • थकान
  • हार्ट बीट बढ़ जाना
  • ज्वाइंट्स पेन
  • यलोइश स्किन कलर

एनीमिया की बीमारी जेनेटिक भी हो सकती है। पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में एनीमिया की बीमारी अधिक होती है। इसका कारण पीरियड्स के साथ ही डिलिवरी के दौरान होने वाला ब्लड लॉस भी है। एनीमिया की बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है। अगर आपको कमजोरी का एहसास हो रहा हो या फिर अक्सर थकान रहती हो, तो डॉक्टर से जरूर संपर्क करें। एनीमिया की बीमारी जेनेटिक भी हो सकती है। पर्याप्त रेड ब्लड सेल्स का निर्माण न हो पाने के कारण एनीमिया की बीमारी हो जाती है। हैवी ब्लीडिंग भी एनीमिया का कारण बन सकती है। वहीं कुछ बीमारियां जैसे कि एचआईवी, कैंसर, क्रोहन रोग आदि के कारण रेड ब्लड सेल्स का प्रोडक्शन पूरी तरह से नहीं हो पाता है।

और पढ़ें : बच्चों में खून की कमी कैसे दूर करें?

हीमोग्लोबिन की असामान्यता के कारण होता है थैलेसीमिया (Thalassemia)

थैलेसीमिया

जेनिटक म्यूटेशन के कारण थैलेसीमिया (Thalassemia) की बीमारी होती है। थैलेसीमिया एक इनहेरिटेड ब्लडडिसऑर्डर है। इस कारण हीमोग्लोबिन का प्रोडक्शन ठीक तरह से नहीं हो पाता है। जब रेड ब्लड सेल्स में पर्याप्त मात्रा में हीमोग्लोबिन नहीं होता है, तो शरीर के सभी भागों तक ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती है। इस कारण से शरीर के पार्ट ठीक तरह से काम नहीं कर पाते हैं। थैलेसीमिया के कारण हार्ट प्रॉब्लम (heart problems), बच्चों की ग्रोथ में कमी, इंलार्ज्ड स्प्लीन (enlarged spleen), बोंस डिफॉर्मिटीज (bone deformities) आदि समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इस बीमारी के कारण निम्नलिखत लक्षण नजर आ सकते हैं।

  • बच्चों की ग्रोथ कम होना
  • थकान का एहसास
  • फेस बोंस में प्रॉब्लम्स
  • कमजोरी का एहसास
  • त्वचा का रंग पीला पड़ना

थैलेसीमिया (Thalassemia) के लक्षण बच्चों में आसानी से दिखाई पड़ सकते हैं। थैलेसीमिया की बीमारी से बचने के लिए समय पर लक्षणों की जांच और इलाज बहुत जरूरी है। अगर बीमारी का सही समय पर इलाज नहीं कराया जाता है, तो बीमारी जानलेवा भी साबित हो सकती है।

ब्लड क्लॉटिंग डिसऑर्डर है हीमोफीलिया (Hemophilia)

हीमोफीलिया

हीमोफीलिया (Hemophilia) ब्लड क्लॉटिंग डिसऑर्डर है। हीमोफीलिया की बीमारी के कारण खून जमने या ब्लड क्लॉटिंग में दिक्कत होती है। हीमोफीलिया की बीमारी महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में अधिक पाई जाती है। ब्लीडिंग की समस्या शरीर के अंदर या फिर बाहर हो सकती है। ब्लीडिंग बिना किसी कारण के शुरू हो सकती है। ये बीमारी अनुवांशिक या जेनेटिक हो सकती है। माता-पिता से ये बीमारी बच्चे को हो सकती है। नेशनल हीमोफीलिया फाउंडेशन की मानें, तो करीब एक तिहाई हीमोफीलिया के केस अचानक से डेवलप होते हैं। हीमोफीलिया ब्लड कंडीशन है, जो कि रेयर है। करीब 5000 बच्चों में एक बच्चे को ये बीमारी हो सकती है। जानिए हीमोफीलिया के लक्षण के बारे में।

  • इंटरनल या एक्सटर्नल ब्लीडिंग होना
  • जॉइंट्स में दर्द
  • बिना कारण नाक से ब्लीडिंग
  • यूरिन या स्टूल से ब्लड आना
  • वैक्सिनेशन के बाद ब्लीडिंग
  • सिरदर्द
  • डबल विजन
  • वॉमिटिंग
  • अचानक से कमजोरी

हीमोफीलिया की बीमारी में ब्रेन ब्लीडिंग रेयर होती है। ऐसा कुछ केसेज में हो सकता है। बीमारी के लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। कुछ ब्लड पार्टिकल क्लॉटिंग की प्रोसेस में भाग लेते हैं। जब क्लॉटिंग फैक्टर कम हो जाता है, तो हीमोफीलिया की समस्या हो जाती है। हीमोफीलिया कई प्रकार के होते हैं लेकिन ज्यादातर अनुवांशिक होते हैं। करीब 30 प्रतिशत लोगों में हीमोफीलिया की कोई भी फैमिली हिस्ट्री नहीं होती है। एक्वायर्ड हीमोफीलिया (Acquired hemophilia ) रेयर होता है। इस बीमारी में इम्यून सिस्टम क्लॉटिंग फैक्टर्स में अटैक करने लगता है।

और पढ़ें : इन 15 लक्षणों से जानें क्या आपको आयरन की कमी है?

कम या ज्यादा प्लेटलेट्स बनती हैं प्लेटलेट डिसऑर्डर (Platelet Disorder) का कारण

कट या अन्य इंजुरी होने पर सबसे पहले प्लेटलेट्स ही रिस्पॉन्स करती हैं। इंजुरी के स्थान पर प्लेटलेट्स इकट्ठा हो जाती हैं और टेम्परेरी प्लग बनाती है, ताकि खून रुक जाए। प्लेटलेट्स डिसऑर्डर के कारण खून में तीन प्रकार की असामान्यताएं पाई जा सकती हैं।

  • थ्रोम्बोसाइटोपेनिया (Thrombocytopenia) :पर्याप्त मात्रा में प्लेटलेट्स का न होना
  • थ्रोम्बोसाइटेमिया (Thrombocythemia) : अधिक प्लेटलेट्स का होना
  • प्लेटलेट्स का सही से क्लॉट न होना

पर्याप्त मात्रा में प्लेटलेट्स न बनने के कारण छोटी चोट के दौरान भी अधिक ब्लड लॉस हो सकता है। वहीं अधिक प्लेटलेट्स होने के कारण मेजर आर्टरी ब्लॉक हो सकता है। इस कारण से स्ट्रोक या हार्ट अटैक भी हो सकता है। सही तरीके से थक्का न बना पाने वाली प्लेटलेट्स ब्लड वैसल्स की दीवारों से चिपक नहीं पाती हैं और ब्लड लॉस का कारण बनती हैं। प्लेटलेट्स डिसऑर्डर जेनेटिक होता है। प्लेटलेट्स डिसऑर्डर के निम्न कारण हो सकते हैं।

  • ऑटोसोमल रिसेसिव इनहेरिटेंस (Autosomal recessive inheritance)
  • ऑटोसोमल डॉमिनेंट इनहेरिटेंस (Autosomal dominant inheritance)
  • एक्स-लिंक्ड इनहेरिटेंस (X-linked inheritance)

और पढ़ें : एनीमिया और महिलाओं के बीच क्या संबंध है?

वाइट ब्लड सेल डिसऑर्डर (White Blood Cell disorder)

वाइट ब्लड सेल डिसऑर्डर

वाइट ब्लड सेल्स (White blood cells) को ल्यूकोसाइट्स (leukocytes) भी कहते हैं। ल्यूकोसाइट्स इम्यून सिस्टम सेल्स हैं, जो इन्फेक्शन के खिलाफ, एलर्जी के खिलाफ लड़ने का काम करती हैं। स्वस्थ्य व्यक्ति में वाइट ब्लड सेल्स की संख्या 4,000–11,000 सेल्स पर माइक्रोलीटर ब्लड होती हैं। अगर ब्लड में अधिक मात्रा में वाइट ब्लड सेल्स मौजूद हो, तो उस कंडीशन को ल्यूकोसाइटोसिस (leukocytosis) कहते हैं। कम मात्रा में वाइट ब्लड सेल्स की उपस्थिति ल्यूकोपेनिया (leukopenia) कहलाती है। बैक्टीरियल या वायरल संक्रमण, कुछ दवाओं के कारण, एलर्जी, स्मोकिंग, इंफ्लामेट्री डिजीज, ऑटोइम्यून डिसऑर्डर, जेनेटिक कंडीशन, रेडिएशन, कैमिकल एक्पोजर, जेनेटिक म्यूटेशन और कैंसर के कारण वाइट ब्लड सेल्स डिसऑर्डर हो सकता है।

वाइट ब्लड सेल्स डिसऑर्डर मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं। प्रोलिफेरेटिव डिसऑर्डर (proliferative disorders)और ल्यूकोपिनिआस (leukopenias) दो मुख्य डिसऑर्डर हैं। प्रोलिफेरेटिव डिसऑर्डर में वाइट ब्लड सेल्स अधिक मात्रा में बनती हैं। वहीं ल्यूकोपिनिआस में ब्लड सेल्स कम मात्रा में बनती हैं। दोनों ही डिसऑर्डर के कारण इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाती है। इस कारण से इन्फेक्शन की संभावना बढ़ जाती है। सेल्स काउंट को मेंटेन कर बीमारी की इलाज किया जा सकता है। वाइट ब्लड सेल्स डिसऑर्डर होने पर निम्नलिखित लक्षण दिखाई पड़ सकते हैं।

  • बुखार
  • मुंह के छालें
  • त्वचा में फोड़े-फुंसी
  • निमोनिया
  • थकान
  • वजन घटना
  • इन्फेक्शन होना

उपरोक्त लक्षण नजर आने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। अगर आप सही समय पर बीमारी की जांच कराते हैं, तो बीमारी से निजात पाने में मदद मिल सकती है। वाइट ब्लड सेल्स में गड़बड़ी के कारण इन्फेक्शन की समस्या आसानी से हो सकती है, जो आपको अधिक बीमार कर सकती है। इस बारे में अधिक जानकारी के लिए डॉक्टर से संपर्क करें।

जानिए अन्य ब्लड डिसऑर्डर (Other Blood Disorders) के बारे में

प्लाज्मा सेल डिसऑर्डर (Plasma cell disorders) के कारण प्लाज्मा सेल्स प्रभावित होती हैं। वाइट ब्लड सेल्स शरीर में एंटीबॉडीज बनाने का काम करती हैं। ये सेल्स इन्फेक्शन से लड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इस कारण से शरीर में संक्रमण की संभावना बढ़ जाती है।

प्लाज्मा सेल मायलोमा (Plasma cell myeloma) रेयर ब्लड कैंसर है, जो बोन मैरो की प्लाज्मा सेल्स में होता है। घातक प्लाज्मा कोशिकाएं बोन मैरो में जमा हो जाती हैं और स्पाइन, हिप्स और रिब्स में ट्यूमर बनाती हैं। प्लाज्मा सेल मायलोमा किस कारण से होता है, इस बारे में अभी जानकारी उपलब्ध नहीं है।

वॉन विलेब्रांड डिजीज ( Von Willebrand disease) इनहेरिटेड ब्लीडिंग डिसऑर्डर है। जब ब्लड क्लॉटिंग के लिए जिम्मेदार प्रोटीन की कमी हो जाती है, तो वॉन विलेब्रांड डिजीज हो जाती है।

ब्लड कैंसर ब्लड डिजीज के अंतर्गत आता है। ब्लड कैंसर के अंतर्गत ल्यूकेमिया के कारण वाइट ब्लड सेल्स कैंसर हो जाता है। इस कारण से पेशेंट की इन्फेक्शन से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है। इस कारण से रेड ब्लड सेल्स और प्लेटलेट्स का प्रोडक्शन भी कम हो जाता है। अगर ल्यूकेमिया का सही समय पर इलाज कराया जाए, तो बीमारी को लक्षणों को कम करने में मदद मिलती है। क्रोनिक ल्यूकेमिया का ट्रीटमेंट मुश्किल हो जाता है। ल्यूकेमिया को सामान्य ब्लड कैंसर माना जाता है। अक्यूट ल्यूकेमिया और क्रॉनिक ल्यूकेमिया के बारे में अधिक जानकारी के लिए डॉक्टर से जानकारी जरूर लें। वहीं मायलोमा प्लाज्मा सेल्स कैंसर को कहते हैं। प्लाज्मा सेल्स कैंसर के कारण पेशेंट की प्रतिरोधक क्षमता कम होने लगती है। लिम्फोमा कैंसर के कारण लिम्फेटिक सिस्टम में सेल्स ग्रोथ तेज हो जाती हैं।

और पढ़ें: क्या आप एनीमिया के प्रकार के बारे में जानते हैं?

ब्लड डिसऑर्डर ( Blood Disorders) से ऐसे पाया जा सकता है निजात

ब्लड डिसऑर्डर या ब्लड डिजीज से बचने के लिए डॉक्टर रोगी की जांच करते हैं। लक्षणों के आधार पर जांच की जाती है और फिर बीमारी का इलाज किया जाता है। ट्रीटमेंट के साथ ही लाइफस्टाइल में बदलाव भी बहुत जरूर होती है। अगर डायट में बदलाव किया जाए, तो प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के साथ ही शरीर में आयरन की कमी को भी दूर किया जा सकता है। जानिए ब्लड डिसऑर्डर या ब्लड डिजीज से निजात पाने के लिए कौन से उपाय किए जाते हैं।

एनीमिया (Anemia) से बचाव के लिए डायट में करें सुधार

एनीमिया से बचाव के लिए डॉक्टर आपसे बीमारी के लक्षणों के बारे में पूछेंगे। डॉक्टर ब्लड सेल्स की जांच के लिए सीबीसी ब्लड टेस्ट कर सकते हैं। साथ ही खून में रेड ब्लड सेल्स के साइज और शेप को भी चेक किया जाएगा। डॉक्टर आपको डायट में चेंज की सलाह दे सकते हैं। एनीमिया से बचने के लिए खानपान में सुधार बहुत जरूरी है। खाने में आयरन युक्त भोजन को शामिल करें। विटामिन्स और मिनिरल युक्त फूड्स आयरन की कमी से बचाएंगे। फोलेट युक्त आहार का भी सेवन करें। डॉक्टर आयरन सप्लीमेंट्स, फोलेट और विटामिन सी सप्लीमेंट्स, विटामिन बी-12 के इंजेक्शन दे सकते हैं। अगर आपको एनीमिया है, तो बेहतर होगा कि आप इस बारे में डॉक्टर से जानकारी जरूर प्राप्त करें।

थैलेसीमिया (Thalassemia) से बचाव

थैलेसीमिया

थैलेसीमिया की बीमारी के लक्षण दिखने पर आपको डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। लैब में ब्लड का सैम्पल लेने के बाद जांच की जाती है और देखा जाता है कि रेड ब्लड सेल्स का शेप ठीक है या फिर नहीं। आपको बताते चले कि थैलेसीमिया की बीमारी होने पर रेड ब्लड सेल्स का शेप बिगड़ जाता है। फिर हीमोग्लोबिन इलेक्ट्रोफोरेसिस (Hemoglobin electrophoresis) की हेल्प से रेड ब्लड सेल्स की असामान्यता को पहचाना जाता है। डॉक्टर थैलेसीमिया का इलाज करने के लिए बोन मैरो ट्रांसप्लांट (Bone marrow transplant), ब्लड ट्रांसफ्यूजन (blood transfusion), स्प्लीन रिमूव के साथ ही मेडिसिन और सप्लिमेंट लेने की सलाह दे सकते हैं। डॉक्टर आपको फोलेट और आयरन से भरपूर फूड्स खाने की सलाह देंगे। थैलेसीमिया के लक्षणों के दिखने पर अगर जांच और इलाज सही समय पर करा लिया जाए, तो इस बीमारी के प्रभाव को कम किया जा सकता है।

हीमोफीलिया (Hemophilia) से बचाव के लिए लें आयरन रिच डायट

हीमोफीलिया से बचाव के लिए डॉक्टर ब्लड सैंपल की सहायता से रक्त की जांच करते हैं। डॉक्टर ब्लड क्लॉटिंग फैक्टर को दवा की सहायता से बढ़ाने की कोशिश करते हैं। साथ ही हीमोफीलिया के लक्षणों को कम करने की कोशिश भी करते हैं। पेशेंट को खून की कमी भी हो सकती है, ऐसे में ब्लड चढ़ाना भी जरूरी होता है। डॉक्टर आपको इंजुरी से बचने की सलाह देंगे। आपको प्लेटलेट काउंट बढ़ाने वाली डायट लेनी चाहिए। खाने में विटामिन सी और आयरन से भरपूर डायट लें।

प्लेटलेट डिसऑर्डर (Platelet Disorder) से बचने के लिए प्लेटलेट्स ट्रांसफ्यूजन

डॉक्टर प्लेटलेट्स डिसऑर्डर को चेक करने के लिए फिजिकल एक्जामिनेशन कर सकते हैं। ब्लड सैंपल की हेल्प से खून में प्लेटलेट्स की जांच की जाती है। साथ ही क्लॉटिंग टेस्ट भी किया जाता है। डॉक्टर जीन म्यूटेशन की जांच भी कर सकते हैं। प्लेटलेट्स डिसऑर्डर रेयर होता है। प्लेटलेट्स डिसऑर्डर का कॉमन ट्रीटमेंट डेस्मोप्रेसिन (desmopressin) है। ये ट्रीटमेंट बॉडी में प्लेटलेट्स लेवल को बढ़ाने का काम करता है। इसे इंजेक्शन के रूप में स्किन या वेंस में दिया जाता है। अल्टरनेटिव के रूप में डॉक्टर ट्रानेक्सामिक एसिड (tranexamic acid) मेडिसिन भी दे सकते हैं। डॉक्टर प्लेटलेट्स ट्रांसफ्यूजन भी कर सकते हैं। इस बारे में अधिक जानकारी के लिए आप डॉक्टर से परामर्श कर सकते हैं। आप डॉक्टर से स्पेशल डायट के बारे में भी जानकारी ले सकते हैं।

वाइट ब्लड सेल डिसऑर्डर (White Blood Cell disorder) से बचाव के लिए स्टेम सेल्स ट्रांसप्लांटेशन

डॉक्टर कम्प्लीट ब्लड काउंट टेस्ट की सहायता से वाइट ब्लड सेल्स डिसऑर्डर की जांच करते हैं। डॉक्टर ब्लड स्मीयर टेस्ट की सहायता से ब्लड डिसऑर्डर की जांच कर सकते हैं। इन्फेक्शन होने पर डॉक्टर एंटीबायोटिक्स दे सकते हैं। वहीं मेडिकेशन की हेल्प से बोन मैरो में वाइट ब्लड सेल्स प्रोडक्शन को बढ़ाया जाता है। कुछ केसेज में स्टेम सेल्स ट्रांसप्लांटेशन की हेल्प भी ली जा सकती है। वाइट ब्लड सेल ट्रांसफ्यूजन रेयर केस में ही किया जाता है। आप इस बारे में अधिक जानकारी के लिए डॉक्टर से परामर्श करें।

अन्य ब्लड डिसऑर्डर (Other Blood Disorders) से ऐसे पा सकते हैं निजात

प्लाज्मा सेल डिसऑर्डर (Plasma cell disorders), प्लाज्मा सेल मायलोमा (Plasma cell myeloma),वॉन विलेब्रांड डिजीज ( Von Willebrand disease) या ब्लड कैंसर होने पर आपको कुछ लक्षण नजर आ सकते हैं। अगर बीमारी के लक्षणों को पहचान कर डॉक्टर से ट्रीटमेंट कराया जाए, तो बीमारियों के साइडइफेक्ट को काफी हद तक कम किया जा सकता है। ब्लड कैंसर के लिए डॉक्टर कुछ टेस्ट कराने की सलाह दे सकते हैं। कुछ टेस्ट जैसे कि ट्यूमर मार्कर टेस्ट, ब्लड प्रोटीन टेस्ट, कम्प्लीट ब्लड काउंट आदि कैंसर की पहचान के लिए किए जाते हैं। ब्लड कैंसर ब्लड सेल्स की अनियमित ग्रोथ के कारण होता है। डॉक्टर ट्रीटमेंट के दौरान कीमोथेरेपी की सहायता से कैंसर सेल्स के डेवलपमेंट को रोकने का काम करते हैं। रेडिएशन थेरिपी की सहायता से भी ब्लड कैंसर के खतरे को कम किया जाता है।

और पढ़ें: Blood Type Diet: ब्लड टाइप डायट क्या है?

ब्लड डिसऑर्डर या डिजीज की जांच के लिए किए जाते हैं ये टेस्ट्स (Tests for Blood Disorders)

Tests for Blood Disorders

ब्लड डिसऑर्डर को डायग्नोज करने के लिए फिजिकल एक्जामिनेशन करते हैं। कभी-कभी ब्लड डिसऑर्डर के कारण कोई भी लक्षण नजर नहीं आते हैं। लेकिन लेबोरेट्री टेस्ट के बाद बीमारी का कारण पता चल जाता है। रेग्युलर चेकअप के लिए कम्प्लीट ब्लड काउंट किया जाता है। जब किसी अन्य ब्लड डिऑर्डर का आभास होता है, तो डॉक्टर कम्प्लीट ब्लड काउंट के साथ ही अन्य टेस्ट की भी सलाह देते हैं।

कम्प्लीट ब्लड काउंट (Complete blood count)

सेल्युलर कम्पोनेंट की जांच के लिए कम्प्लीट ब्लड काउंट की हेल्प ली जाती है। इस टेस्ट की हेल्प से रेड ब्लड सेल्स, वाइट ब्लड सेल्स और प्लेटलेट्स के बारे में जानकारी मिलती है। थोड़े से ब्लड में ये टेस्ट एक मिनट में किया जा सकता है।

ब्लड स्मीयर (Blood smear)

ब्लड स्मीयर टेस्ट की हेल्प से ब्लड सेल्स के शेप और साइज के बारे में जानकारी मिलती है। माइक्रोस्कोप की हेल्प से ब्लड स्मीयर टेस्ट किया जाता है। माइक्रोस्कोप से जांच के दौरान एडिशनल जानकारी भी मिल जाती है। एक ग्लास स्लाइड में ब्लड की लेयर बनाई जाती है और प्रत्येक ब्लड सेल्स के बारे में जानकारी हासिल की जाती है। सेल्स काउंट, साइज और स्पेसिफिक करेक्टर के बारे में इस टेस्ट से जानकारी मिलती है।

क्लॉटिंग टेस्ट (Clotting tests)

प्लेटलेट्स फंक्शन की जांच के लिए क्लॉटिंग टेस्ट किया जाता है। प्रोटीन की जांच के लिए प्रोथाम्बिन टाइम और पार्शियल थ्रोम्बोप्लास्टिन टाइम टेस्ट किया जाता है। टेस्ट के माध्यम से क्लॉटिंग फैक्टर के बारे में जानकारी मिलती है।

रेटिकुलोसाइट काउंट (Reticulocyte count)

रेटिकुलोसाइट काउंट टेस्ट की हेल्प से नई रेड ब्लड सेल्स की वॉल्यूम के बारे में जानकारी मिलती है। जब ब्लड लॉस हो जाता है, तो बोन मैरो में ब्लड सेल्स का फॉर्मेशन होता है। इस टेस्ट की हेल्प से बोन मैरो की ब्लड सेल्स प्रोडक्शन की क्षमता के बारे में जानकारी मिलती है।

ब्लड टाइपिंग (Blood typing)

ब्लड टाइपिंग की हेल्प से रेड ब्लड सेल्स में प्रोटीन की उपस्थिती की जानकारी मिलती है। प्लाज्मा और रेड ब्लड सेल्स के लिए ब्लड टाइपिंग की जरूरत होती है। ब्लड ट्रांसफ्यूजन से पहले ब्लड टाइपिंग जरूरी होती है।

प्रोटीन के लिए टेस्ट (Measures of proteins)

ब्लड प्लाज्मा में बहुत-सी प्रोटीन होती है। मल्टीपल मायलोमा में प्लाज्म सेल्स कैंसरस हो जाती हैं और अनयूजुअल प्रोटीन का प्रोडक्शन शुरू हो जाता है। इन्हें ब्लड और यूरिन टेस्ट की हेल्प से पहचाना जा सकता है। एरिथ्रोप्रोटीन बनने से किडनी बोन मैरो को रेड ब्लड सेल्स प्रोडक्शन के लिए स्टिमुलेट करती है। टेस्ट के माध्यम से इस प्रोटीन की जांच की जा सकती है।

और पढ़ें: Hematuria: (हेमाट्यूरिया) पेशाब में खून आना क्या है? जानें इसके कारण, लक्षण और उपाय

ब्लड डिसऑर्डर या ब्लड डिजीज के लिए ट्रीटमेंट्स

ब्लड डिसऑर्डर या ब्लड डिजीज का ट्रीटमेंट बीमारी के प्रकार पर निर्भर करता है। सिंपल ऑब्जर्वेशन के बाद डॉक्टर स्टेरॉयड और अन्य इम्यून मॉडुलेटिंग थेरिपी की सलाह दी जा सकती है। एनीमिया से पीड़ित व्यक्ति के ट्रीटमेंट के लिए रेड ब्लड सेल ट्रांसफ्यूजन (red blood cell transfusions) जरूरी होता है। एरिथ्रोपोइटिंस ( erythropoietins)ट्रीटमेंट की जरूरत एनीमिया के अन्य प्रकार में पड़ सकती है, जब बोन मैरो में रेड ब्लड सेल्स का अंडरप्रोडक्शन शुरू हो जाता है।

पॉलीसिथीमिया वेरा ( Polycythemia vera) का ट्रीटमेंट फ्लबोटोमी ( phlebotomy) की हेल्प से किया जाता है। ये एक सिंपल टेक्नीक है जिसमे उचित अंतराल में ब्लड यूनिट को हटाया जाता है। ये प्रोसेस रेड ब्लड सेल्स काउंट को नॉर्मल रेंज में बनाए रखता है, जिससे स्ट्रोक या दिल के दौरे का खतरा कम होता है। ब्लड डिसऑर्ड के लिए निम्न ट्रीटमेंट भी इस्तेमाल किए जाते हैं।

  • स्टेरॉयड का उपयोग (use of steroids)
  • इम्यून मॉडुलेटिंग थेरिपी ( immune-modulating therapies)
  • ट्रांसफ्यूजन (transfusions)
  • बोन मैरो ट्रांसप्लांटेशन (bone marrow transplantation)
  • कॉम्प्लेक्स कीमोथेरिपी (complex chemotherapy)
  • स्प्लेनेक्टोमी ( Splenectomy)

ब्लड डिसऑर्डर में ये डायट आपको पहुंचाएगी फायदा

ब्लड फूड

ब्लड डिसऑर्डर या डिजीज की समस्या से जूझ रहे लोगों को अपनी डायट में हेल्दी फूड शामिल करने चाहिए। ऐसी डायट को चूज करें, जो विभिन्न प्रकार की न्यूट्रीशनल वैल्यू शामिल हो। खाने में व्होल ग्रेंस (whole grains),फल, वेजीटेबल्स और लो सॉलिड फूड, एडड शुगर और सॉल्ट शामिल करना चाहिए। फिजिकल एक्टिविटी के साथ ही डायट में बैंलेसिंग बॉडी को हेल्दी बनाए रखने में हेल्प करती है। बच्चों को खाने में कैल्शियम रिच फूड्स जैसे कि फैट फ्री मिल्क, लो फैट चीज, सीरियल्स, आलमंड्स आदि जरूर दें। खून की कमी या हीमोफीलिया की बीमारी में कैल्शियम रिच फूड्स और आयरन रिच फूड्स जरूर शामिल करें। आप खाने में निम्नलिखित फूड शामिल कर सकते हैं।

  • रेड मीट
  • ऑर्गन मीट (किडनी, लिवर)
  • डार्क, लीफी, ग्रीन वेजीटेबल्स
  • ड्राई फूट्स
  • बींस
  • फलियां
  • एग योक

आप ब्लड डिसऑर्डर या ब्लड डिजीज की समस्या होने पर किसी भी तरह की डायट लेने से पहले डॉक्टर से परामर्श जरूर करें। डॉक्टर आपको कुछ फूड को अवॉयड करने की सलाह भी दे सकते हैं।

इन चीजों से बनाएं दूरी

शरीर में खून की कमी होने पर पौष्टिक आहार के साथ ही आयरन युक्त फूड खाने की सलाह दी जाती है। लेकिन ब्लड डिसऑर्डर होने पर कुछ फूड्स को अवॉयड करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो सकता है। अगर आपको हीमोफीलिया के साथ ही अन्य ब्लड डिसऑर्डर है, तो आपको दिए गए फूड अवॉयड करने चाहिए।

  • बिना परामर्श के फूड सप्लिमेंट्स
  • जूस का अधिक सेवन
  • सॉफ्ट ड्रिंक और एनर्जी ड्रिंक
  • हैवी ग्रेवी और सॉस
  • बटर
  • फुल फैट डेयरी प्रोडक्ट
  • कैंडी
  • ट्रांस फैट युक्त फूड

उपरोक्त जानकारी चिकित्सा सलाह का विकल्प नहीं है। अगर आपको ब्लड डिसऑर्डर है, तो डॉक्टर से उन फूड्स के बारे में जरूर पूछें जो आपको नुकसान पहुंचा सकते हैं। आप खाने में एंटीऑक्सीडेंट और फाइबर युक्त फूड्स को शामिल कर सकते हैं।

इन एक्सरसाइज को दिनचर्या में करें शामिल

हीमोफीलिया की बीमारी होने पर मसल्स को स्ट्रांग और फ्लेस्बिल रखना बहुत जरूरी हो जाता है। अगर शरीर में खून की कमी है, तो भी आपको पौष्टिक आहार के साथ ही शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने वाली एक्सरसाइज करनी चाहिए।ब्लड डिजीज में एक्ससाइज निम्न तरीके से फायदा पहुंचाती है।

  • मसल्स स्ट्रांग और फ्लेक्सिबल बनती है, जिनसे ज्वाइंट्स डैमेज और ब्लीडिंग को रोकने में मदद मिलती है।
  • एक्सरसाइज करने से थकान मिटती है।
  • एक्सरसाइज से वेट कम होता है और ज्वाइंट्स स्ट्रेस से राहत मिलती है।
  • चोट लगने का खतरा कम होता है और ब्लीडिंग की समस्या भी कम होती है।

आपको निम्नलिखित एक्सरसाइज और एक्टिविटी को रोजाना अपनी दिनचर्या में शामिल करना चाहिए।

  • स्वीमिंग
  • टेबल टेनिस
  • वॉकिंग
  • फिशिंग
  • डांस
  • बैडमिंटन
  • गोल्फ
  • बॉलिंग
  • सायकलिंग

ब्लड डिसऑर्डर से छुटकारे के लिए अल्टेरनेटिव ट्रीटमेंट

ब्लड डिसऑर्डर या ब्लड डिजीज से छुटकारा पाने के लिए ट्रीटमेंट के साथ ही अल्टरनेटिव ट्रीटमेंट भी अपनाए जा सकते हैं। ब्लड डिसऑर्डर जैसे कि एनीमिया की बीमारी से बचाव के लिए अल्टरनेटिव ट्रीटमेंट के तौर पर हर्ब का इस्तेमाल किया जा सकता है। खाने में आयरन रिच फूड के साथ ही हर्ब का इस्तेमाल एक्टपर्ट की सलाह पर किया जा सकता है। स्पिरुलिना (Spirulina) ब्लू-ग्रीन एल्गी है, जो कुछ प्रकार के एनीमिया से राहत दिलाने में मदद करती है। अल्फाल्फा ( Alfalfa) हर्ब का इस्तेमाल खून को साफ करने के लिए किया जाता है। जेंशियन हर्ब का यूज आयरन और खाने के अवशोषण को बढ़ाने के लिए किया जाता है। एनीमिया के होम्योपैथी ट्रीटमेंट के लिए होम्योपैथी थेरिपी, प्रोफेशनल होम्योपैथी काम आती है। खून की कमी के लिए फेरम फास्फोरिकम (Ferrum phosphoricum), बच्चों में एनर्जी की कमी को दूर करने के लिए कैल्केरिया फॉस्फोरिका (Calcarea phosphorica) आदि होम्योपैथी दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है।

एक्यूट लिफ्फोब्लाटिक ल्यूकेमिआ (acute lymphoblastic leukemia) के लिए टी सेल थेरिपी की हेल्प से पेशेंट की टी सेल्स को कलेक्ट किया जाता है और फिर कैंसर सेल्स को टार्गेट किया जाता है। जीन थेरिपी की हेल्प से न्यू जींस को कैंसरस सेल्स में इंट्रोड्यूज किया जाता है। ऐसा करने से सेल्स की ग्रोथ धीमी हो जाती है। ये टेक्नीक बहुत फ्लेक्सिबल होती है।

थैलेसीमिया की बीमारी में जीने थेरिपी का यूज अल्टनेटिव ट्रीटमेंट के तौर पर किया जाता है। नॉर्मल बीटा-ग्लोबिन जीन को बोन मैरो में इंसर्ट किया जाता है। कुछ ड्रग्स का फीटल हीमोग्लोबिन प्रोड्यूस करने वाले जीन को रिएक्टिवेट करने के लिए किया जा सकता है। वहीं कुछ हर्ब भी थैलेसीमिया के लक्षणों को कम करने में मदद करती है।

अब तो आपको पता ही चल गया होगा कि हमारे शरीर के लिए खून कितना महत्वपूर्ण होता है। अगर आपको खून संबंधी विकार या किसी भी तरह की परेशानी का एहसास हो रहा है, तो तुरंत डॉक्टर से जांच कराएं। बीमारी का समय पर इलाज आपको बीमारी की गंभीरता से बचा सकता है। आप इस संबंध में अधिक जानकारी के लिए डॉक्टर से संपर्क करें। आप स्वास्थ्य संबंधी अधिक जानकारी के लिए हैलो स्वास्थ्य की वेबसाइट विजिट कर सकते हैं। अगर आपके मन में कोई प्रश्न है, तो हैलो स्वास्थ्य के फेसबुक पेज में आप कमेंट बॉक्स में प्रश्न पूछ सकते हैं।

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सूत्र
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Bhawana Awasthi द्वारा लिखित आखिरी अपडेट 3 weeks ago को
डॉ. प्रणाली पाटील के द्वारा मेडिकली रिव्यूड
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