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रेस्पायरेटरी इन्फेक्शन से हो सकता है जान का खतरा, ऐसे करें बचाव

रेस्पायरेटरी इन्फेक्शन से हो सकता है जान का खतरा, ऐसे करें बचाव

सांस से संबंधित संक्रमण या रेस्पायरेटरी इन्फेक्शन वायरस या बैक्टीरिया से फैलने वाला इन्फेक्शन है। संक्रमण के कारण सांस लेने में समस्या होती है। रेस्पायरेटरी इन्फेक्शन अपर रेस्पिरेटरी सिस्टम और लोअर रेस्पिरेटरी सिस्टम को प्रभावित करता है। अपर रेस्पायरेटरी सिस्टम में इन्फेक्शन साइनस से शुरू होकर वोकल कॉर्ड तक पहुंचता है। वहीं लोअर रेस्पिरेटरी सिस्टम का इन्फेक्शन वोकल कॉर्ड से शुरू होकर फेफड़ों तक पहुंचता है। लोअर रेस्पिरेटरी सिस्टम का इन्फेक्शन बच्चों और ओल्डर एडल्ट्स के लिए बहुत खतरनाक होता है। जिन लोगों की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, उन्हें संक्रमण का अधिक खतरा रहता है। जानिए कैसे रेस्पायरेटरी इन्फेक्शन फैलता है और इसके क्या लक्षण होते हैं।

रेस्पायरेटरी इन्फेक्शन (Respiratory Infections) कैसे फैलता है?

रेस्पायरेटरी ट्रेक्ट इन्फेक्शनके कारण साइनस, गला, एयरवेज या फेफड़ों पर बुरा प्रभाल पड़ता है। इंफेक्शन खांसी या छींक के माध्यम से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में आसानी से फैल सकता है। रेस्पिरेटरी ट्रेक्ट इंफेक्शन कई प्रकार के होते हैं। जानिए अपर रेस्पायरेटरी इन्फेक्शन (Upper Respiratory Infections) में कौन-सी बीमारियां आती हैं?

और पढ़ें: कफ के प्रकार: खांसने की आवाज से जानें कैसी है आपकी खांसी?

कॉमन कोल्ड (Common cold)

कॉमन कोल्ड को आम इंफेक्शन माना जाता है। ये समस्या किसी भी उम्र में हो सकती है। जुकाम एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में आसानी से फैलता है। कॉमन कोल्ड वायरस मुंह, आंख, नाक के माध्यम से आसानी से शरीर में प्रवेश कर जाता है और विभिन्न प्रकार के लक्षण पैदा करता है। लोगों को मौसम बदलने पर जुकाम की अधिक समस्या होती है। साल में एक से दो बार जुकाम होना सामान्य माना जाता है। ज्यादातर लोगों में बिना इलाज के ही जुकाम अपने आप ठीक हो जाता है। कॉमन कोल्ड के लक्षण निम्नलिखित हैं

वैसे तो कॉमन कोल्ड अपने आप ठीक हो जाता है लेकिन समस्या बढ़ने पर कफ सिरप, नोजल स्प्रे, बॉडी पेन किलर या फीवर कम करने के लिए डॉक्टर दवा दे सकते हैं। बच्चों को बिना डॉक्टर की सलाह के दवा नहीं दी जानी चाहिए।

साइनोसाइटिस (Sinusitis)

साइनोसाइटिस बैक्टीरिया का संक्रमण है, जो साइनस ब्लॉकेज की समस्या का कारण बनता है। इस कारण से साइन में सूजन की समस्या हो जाती है। साइन में सूजन आम समस्या मानी जाती है, जो कुछ समय बाद ठीक हो जाती है। 7 से 21 दिनों तक बीमारी के लक्षण दिखते हैं और फिर ये ठीक हो जाती है। जानिए साइनोसाइटिस के लक्षणों के बारे में

  • नाक बहना
  • गले में खराश
  • ​सिर दर्द
  • बुखार
  • सांस लेने में समस्या
  • माथे पर सूजन

एलर्जी या पर्यावरण प्रदूषण के कारण भी ये बीमारी जन्म ले सकती है। फंगल साइनसिसिस इन्फेक्शन फंगस के कारण हो सकता है। डॉक्टर बीमारी के लक्षणों को दूर करने के लिए पेनकिलर जैसे कि पेरासिटामोल दे सकते हैं। साथ ही सूजन की समस्या को समस्या को कम करने के लिए एंटीहिस्टामाइन युक्त नाक का स्प्रे इस्तेमाल किया जाता है। जिन लोगों को क्रॉनिक साइनसिसिस संक्रमण हो जाता है, उन्हें सर्जरी की जरूरत भी पड़ सकती है।

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फैरिन्जाइटिस ( Pharyngitis)

कॉमन कोल्ड या फ्लू फैरिन्जाइटिस का कारण बन सकता है। ये बीमारी बच्चों और किशोरों में आमतौर पर देखने को मिलती है। फैरिन्जाइटिस की समस्या के कारण गले में खराश, थकावट, मसल्स पेन, खाने में परेशानी, लिफ्ड नोड में सूजन, जोड़ों में दर्द, कफ की समस्या आदि लक्षण दिखाई पड़ते हैं। बीमारी के लक्षण कुछ समय बाद अपने आप ही ठीक हो जाते हैं। डॉक्टर एंटी-इंफ्लेमेटरी मेडिसिंस की हेल्प से लिम्फ नोड की सूजन को कम करते हैं। इस बीमारी से बचने के लिए हाइजीन की जरूरत होती है। अगर बच्चे को बीमारी है, तो उसके खिलौने के साथ ही आसपास की सभी वस्तुओं को साफ रखें। अगर समस्या अधिक है, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें।

एपिग्लोटाइटिस (Epiglottitis)

एपिग्लोटाइटिस के कारण एपिग्लॉटिस में सूजन की समस्या हो जाती है। एपिग्लॉटिस टंग यानी जीभ के नीचे के हिस्से को कहते हैं। इस कारण से ब्रीथिंग प्रॉब्लम शुरू हो जाती है। ऐसा एपिग्लॉटिस संक्रमण के कारण होता है। पेशेंट को इस बीमारी के कारण खाना खाने में समस्या होती है और साथ ही वो बोलने में असमर्थ होता है। ये बीमारी वातावरण में फैले बैक्टीरिया, फंगस या वायरस के कारण होती है, जो सांस लेने के दौरान शरीर में फैलते हैं। डॉक्टर एंटीबायोटिक दवाओं के माध्यम से संक्रमण को कम करते है। बीमारी अधिक गंभीर होने पर डॉक्टर को ब्रीथिंग के लिए सांस की नली लगाने की जरूरत पड़ती है।

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लेरिंजोट्रेकाइटस (laryngotracheitis)

लेरिंजोट्राईटिस वायरल रेस्पायरेटरी इन्फेक्शन है, जिसके कारण गैलिस हर्पीसवायरस 1 (GaHV-1) के कारण होता है। लेरिंजोट्राईटिस के कारण साइनोसाइटिस, कफ के साथ खून आना, सांस लेने में समस्या, एग प्रोडक्शन में कमी आदि समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इस संक्रमण के कारण सिरदर्द की समस्या, फीवर, एब्डॉमिनल पेन आदि की समस्या हो सकती है। बीमारी चिकन के कारण फैलती है। बीमारी से संक्रमित व्यक्ति को हॉस्पिटलाइजेशन की जरूरत पड़ती है। आपको बीमारी के लक्षण दिखने पर तुरंत इलाज कराना चाहिए।

लोअर रेस्पायरेटरी ट्रेक्ट इन्फेक्शन होने पर निम्नलिखित बीमारियां हो सकती हैं।

ब्रोंकाइटिस (Bronchitis)

ब्रोंकियल ट्यूब में सूजन की समस्या के कारण ब्रोंकाइटिस की समस्या हो जाती है। ब्रोंकाइटिस की समस्या फ्लू या संक्रमण के कारण होती है। इस कारण से अधिक मात्रा में बलगम बनने लगता है। साथ ही सांस लेने में समस्या, सांस फूलना, बलगम में खून का आना, थकान का एहसास, खांसी और चेस्ट पेन की समस्या भी होती है। बीमारी के लक्षण दो से तीन सप्ताह तक रहते हैं। वायरल इंफेक्शन फ्लू के कारण पैदा होता है और फेफड़ों की समस्या पैदा कर सकता है। डॉक्टर आपको बीमारी के लक्षणों को कम करने के लिए दवा देंगे। समय पर दवा का सेवन करने से बीमारी से छुटकारा मिल सकता है।

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निमोनिया (Pneumonia)

निमोनिया फेफड़ों से संबंधित संक्रमण है। ये या तो एक फेफड़े या फिर पूरे फेफड़ों को प्रभावित करता है। जब फेफड़े संक्रमित होते हैं, जो ठीक तरह से काम नहीं कर पाते हैं और शरीर को ब्लड से ऑक्सीजन मिलने में भी कठिनाई होती है। निमोनिया की समस्या बैक्टीरियल निमोनिया (Bacterial Pneumonia), वायरल निमोनिया (Viral Pneumonia), फंगल निमोनिया (Fungal Pneumonia), माइकोप्लाज्मा निमोनिया (Mycoplasma Pneumonia) से हो सकती है। निमोनिया की समस्या किसी को भी हो सकती है।निमोनिया के कारण बुखार आना, सांस लेने में तकलीफ, भूख न लगना, थकान महूसस होना, म्यूकस के साथ खांसी आना आदि लक्षण दिख सकते हैं।बैक्टीरियल निमोनिया का ट्रीटमेंट एंटीबायोटिक्स की हेल्प से किया जाता है। वहीं एंटीवायरल दवाएं वायरल निमोनिया के ट्रीटमेंट के लिए इस्तेमाल की जाती हैं। इस बीमारी से बचने के लिए डॉक्टर की सलाह के अनुसार फ्लू शॉट लेना चाहिए।

ब्रोंकियोलाइटिस (Bronchiolitis)

ब्रोंकियोलाइटिस रेस्पायरेटरी कंडीशन है, जो फेफड़ों के छोटे पैसेज में सूजन का कारण बनती है। ये ब्रांकिओल्स (bronchioles) में सूजन पैदा करती है।ब्रांकिओल्स फेफड़ों में एरयफ्लो को कंट्रोल करने का काम करते हैं। वायरल संक्रमण के कारण सांस लेने में समस्या, थकान, तेज सांस लेना, खांसी आदि समस्याएं हो सकती हैं। ब्रोंकियोलाइटिस की समस्या किसी भी उम्र में हो सकती है। वायरल ब्रोंकियोलाइटिस को दूर करने के लिए डॉक्टर हॉस्पिटल में पेशेंट को ऑक्सीजन, नेबुलाइजर और इंट्रावेनस फ्लूड ट्रीटमेंट दे सकते हैं। कुछ एंटीबायोटिक दवाएं बेबी के एयरवेज को ओपन करने में मदद करती हैं।

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रेस्पायरेटरी इन्फेक्शन का डायग्नोसिस कैसे किया जाता है?

रेस्पायरेटरी इन्फेक्शन डायग्नोज करने के लिए डॉक्टर सबसे पहले शारीरिक परिक्षण करते हैं और ब्रीथिंग में फोकस करते हैं। साथ हीं फोफड़ों में सूजन की जांच की जाती है। डॉक्टर गले की जांच भी करते हैं। एक्स-रे और सीटी स्कैन की सहायता से लंग कंडीशन के बारे में जानकारी मिलती है। लंग फंक्शन टेस्ट के लिए डॉक्टर टूल्स का इस्तेमाल करते हैं। नोज स्वैब की हेल्प से भी इन्फेक्शन के बारे में जानकारी मिलती है। डॉक्टर बलगम की जांच भी कर सकते हैं।

रेस्पायरेटरी इन्फेक्शन ट्रीटमेंट कैसे किया जाता है?

रेस्पायरेटरी इन्फेक्शन के ट्रीटमेंट के लिए डॉक्टर पहले इस बात की जांच करते हैं कि संक्रमण का कारण बैक्टीरिया है या फिर वायरस। इसके बाद डॉक्टर बैक्टीरियल संक्रमण को दूर करने के लिए एंटीबायोटिक और वायरल संक्रमण को दूर करने के लिए एंटीवायरल मेडिसिंस देते हैं। अगर संक्रमण का इलाज सही समय पर न कराया जाए, तो व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है। रेस्पायरेटरी अरेस्ट के कारण लंग काम करना बंद कर देता है। वहीं रेस्पायरेटरी फेलियर के कारण शरीर में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा बढ़ने लगती है। बीमारी के लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से सलाह करें।

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रेस्पायरेटरी इन्फेक्शन से बचने के लिए इन बातों का रखें ध्यान

सांस संबंधी संक्रमण से बचने के लिए अपने हाथ बार-बार धोएं। छींक आने पर हमेशा हाथों को मुंह में लगाएं। आप रूमाल का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। अगर आपको संक्रमण हो गया है, तो घर में अपने को बाकी लोगों से दूर रखें। बाहर से आने के बाद हाथों को अच्छी तरह से धोएं और फिर अपने मुंह को धुलें।किसी भी सामान को शेयर न करें। बीमारी के हल्के लक्षणों को इग्नोर किए बिना इलाज कराएं। अगर आप रेस्पायरेटरी इन्फेक्शन के साधारण लक्षणों पर ध्यान नहीं देते हैं, तो सांस लेने में बहुत तकलीफ हो सकती है।

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Bhawana Awasthi द्वारा लिखित आखिरी अपडेट 12/03/2021 को
डॉ. प्रणाली पाटील के द्वारा मेडिकली रिव्यूड
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