प्रीमैच्योर शिशु के लिए आवश्यक न्यूट्रिशन से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी
साल 2018 में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन द्वारा पब्लिश्ड रिपोर्ट के अनुसार पूरे विश्व में तकरीबन 15 मिलियन प्रीमैच्योर बच्चों का जन्म होता है। प्रीमैच्योर शिशु के जन्म के पीछे कई कारण हो सकते हैं, लेकिन प्रीमैच्योर शिशु के लिए आवश्यक न्यूट्रिशन (Nutritional requirements of premature baby) की पूर्ति से बच्चे को हेल्दी बनाने में मदद मिल सकती है। इसलिए आज इस आर्टिकल में प्रीमैच्योर शिशु के लिए आवश्यक न्यूट्रिशन (Nutritional requirements of premature baby) के साथ-साथ कई अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां आपके साथ शेयर करेंगे।
किन शिशुओं को प्रीमैच्योर बेबी कहते हैं?
प्रीमैच्योर शिशु के लिए आवश्यक न्यूट्रिशन की पूर्ति कैसे करें?
किस कारण से शिशु का जन्म समय से पहले हो सकता है?
चलिए अब प्रीमैच्योर शिशु और प्रीमैच्योर शिशु के लिए आवश्यक न्यूट्रिशन (Nutritional requirements of premature baby) से जुड़े इन सवालों का जवाब जानते हैं।
किन शिशुओं को प्रीमैच्योर बेबी (Premature baby) कहते हैं?
नैशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन (National Library of Medicine) में पब्लिश्ड रिपोर्ट के अनुसार जब किसी शिशु का जन्म 40 हफ्ते, 37वें हफ्ते या उससे भी पहले जन्म लेने वाली बच्चों को प्रीमैच्योर बेबी कहते हैं। प्रीमैच्योर बेबी शारीरिक रूप से कमजोर हो सकते हैं और उनका वजन भी सामान्य से कम हो सकता है। हालांकि प्रीमैच्योर शिशु के लिए आवश्यक न्यूट्रिशन के बारे में समझकर और उसे ठीक तरह से फॉलो कर प्रीमैच्योर बच्चों को हेल्दी बनाया जा सकता है।
प्रीमैच्योर शिशु के लिए आवश्यक न्यूट्रिशन (Nutritional requirements of premature baby) की पूर्ति कैसे करें?
नवजात शिशुओं के लिए ब्रेस्ट मिल्क या फॉर्मूला मिल्क ही आवश्यक न्यूट्रिशन की पूर्ति में सहायत है। अगर किसी भी कारण से शिशु का जन्म समय से पहले यानी प्रीमैच्योर शिशु के लिए आवश्यक न्यूट्रिशन (Nutritional requirements of premature baby) की पूर्ति के लिए भी दूध का सेवन करवाया जाता है। प्रीमैच्योर बच्चों को फीडिंग के लिए तीन अलग-अलग विकल्प अपनाये जाते हैं। जैसे:
इंट्रावेनसली (Intravenously)
फीडिंग ट्यूब (Feeding tube)
शिशु के मुंह से (Directly by mouth)
इन इन अलग-अलग तरहों से प्रीमैच्योर शिशु को दूध का सेवन करवाया जा सकता है। प्रीमैच्योर बच्चों के लिए आवश्यक न्यूट्रिशन (Nutritional requirements of premature baby) में तीन अलग-अलग तरह के पोषण को शामिल किया जाता है। जैसे:
टोटल पेरेंटल न्यूट्रिशन (TPN)
ब्रेस्ट मिल्क (Breast milk)
इन्फेंट फॉर्मूला मिल्क (Infant formula milk)
नोट: प्रीमैच्योर शिशु के लिए आवश्यक न्यूट्रिशन की पूर्ति के लिए इन्फेंट फॉर्मूला मिल्क में न्यूट्रिशन का विशेष ध्यान रखा जाता है।
प्रीमैच्योर बच्चों के फीडिंग से पहले स्वास्थ्य विशेषज्ञ शिशु के जेस्टेशनल एज (Gestational age) और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट (Gastrointestinal tract) से जुड़ी कॉम्प्लिकेशन को भी समझने की कोशिश करते हैं, जिससे समय से पहले जन्म लिए शिशु को संपूर्ण
प्रीमैच्योर शिशु के लिए आवश्यक न्यूट्रिशन (Nutritional requirements of premature baby)
प्रीमैच्योर शिशु के लिए आवश्यक न्यूट्रिशन: इंट्रावेनस फीडिंग और पेरेंटल न्यूट्रिशन (Intravenous feeding and parenteral nutrition)
प्रीमैच्योर शिशु के लिए आवश्यक न्यूट्रिशन की पूर्ति के लिए इंट्रावेनस फीडिंग मेथड को अपनाया जा सकता है। दरअसल अगर प्रीमैच्योर बेबी को डायजेशन से जुड़ी कोई समस्या है, तो ऐसी स्थिति में इंट्रावेनस फीडिंग मेथड की सहायता से शिशु को फीडिंग करवाई जाती है। इस दौरान इंट्रावेनस इंजेक्शन का पहला प्रकार यानी आईवी लाइंस की सहायता से कुछ समय के लिए शिशु को दूध पिलाया जाता है। आईवी लाइंस में एक बारीक सूई होती है, जिसे शिशु के हाथ की नस में फिट कर दी जाती है और उसके ऊपरी टिप पर एक ट्यूब फिट कर दी जाती है, जो दूध एवं आवश्यक न्यूट्रिशन के साथ-साथ नसों के माध्यम से संपूर्ण शरीर के लिए लाभकारी होता है। इस ट्यूब की निगरानी भी मेडिकल एक्सपर्ट द्वारा की जाती है। इंट्रावेनस फीडिंग के दौरान प्रीमैच्योर बच्चों के लिए आवश्यक न्यूट्रिशन (Nutritional requirements of premature baby) की कमी ना हो, इसलिए इलेक्ट्रोलाइट्स के साथ चीनी का पानी पिलाया जाता है। इसके बाद कुल पेरेंटल न्यूट्रिशन (TPN) नामक घोल दिया जाता है। प्रोटीन, विटामिन, खनिज, चीनी, वसा और पानी से बनी टीपीएन फीडिंग डॉक्टर द्वारा प्रिस्क्राइब अनुसार ही दी जाती हैं और इस दौरान शिशु को डॉक्टर के निगरानी में रखा जाता है।
प्रीमैच्योर शिशु के लिए आवश्यक न्यूट्रिशन: गैवेज फीडिंग (Gavage feeding)
प्रीमैच्योर बेबी जब दूध को गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट के माध्यम से डायजेस्ट करने में सक्षम हो जाता है, तो उसे गैवेज या नासोगैस्ट्रिक (NG) फीडिंग करवाई जा सकती है। इस दौरान नाक या मुंह के माध्यम से एक छोटी ट्यूब डाली जाती है, जो सीधे बच्चे के पेट में जाती है। अब कम-कम मात्रा में प्रीमैच्योर बेबी को ब्रेस्ट मिल्क (Breast milk) या फॉर्मूला मिल्क (Formula milk) का सेवन करवाया जा सकता है। इस दौरान यह ध्यान देना बेहद आवश्यक माना गया है कि शिशु अगर दूध को आसानी से डायजेस्ट कर ले रहा है, तो दूध की मात्रा बढ़ाई जा सकती है।
प्रीमैच्योर शिशु के लिए आवश्यक न्यूट्रिशन: ब्रेस्ट फीडिंग और बॉटल फीडिंग (Breastfeeding and bottle feeding)
शिशु जब आसानी से दूध पीने लगे या समझ जाए तो पेरेंट्स शिशु को आसानी से फीड करवा सकते हैं। मां ब्रेस्ट मिल्क को पंप की सहायता से बॉटल में लेकर भी शिशु को स्तनपान (Breastfeeding) करवा सकती हैं। प्रीमैच्योर बच्चों के लिए आवश्यक न्यूट्रिशन की पूर्ति के लिए ऊपर बताये तीन अलग-अलग विकल्पों की मदद ली जा सकती है। वहीं अमेरिकन कॉलेज ऑफ ऑब्स्टेट्रिशियंस एंड गायनेकोलॉजिस्ट्स (American College of Obstetricians and Gynaecologists) में पब्लिश्ड रिपोर्ट के सानुसार बेबी डिलीवरी डेट के करीब तीन सप्ताह पहले शिशु का जन्म हो सकता है। इसलिए प्रीमैच्योर बेबी बर्थ से जुड़ी निम्नलिखित बातों को समझना ज़रूरी है।
प्रीमैच्योर बेबी:
20 सप्ताह से 26 सप्ताह के बीच जन्म पेरीविएबल बर्थ (Periviable birth) कहलाता है।
28 सप्ताह के पहले जन्म एक्ट्रीमली प्रीटर्म (Extremely preterm) कहलाता है।
28 सप्ताह से 32 सप्ताह के बीच जन्म वैरी प्रीटर्म (Very preterm) कहलाता है।
32 सप्ताह से 34 सप्ताह के बीच जन्म मॉडरेट प्रीटर्म (Moderate preterm) कहलाता है।
34 सप्ताह से 37 सप्ताह के बीच लेट प्रीटर्म (Late preterm) कहलाता है।
जेस्टेशनल वीक (Gestational week) शिशु के सर्वाइवल रेट पर भी असर डाल सकती है।
ऊपर बताये गए कारण समय से पहले शिशु के जन्म का कारण बन सकती हैं। वहीं अगर प्रीमैच्योर शिशु के लिए आवश्यक न्यूट्रिशन (Nutritional requirements of premature baby) पर ध्यान ना दिया जाए तो इससे जन्म लेने वाले शिशु में भी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
नैशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इन्फॉर्मेशन (National Center for Biotechnology Information) में पब्लिश्ड रिपोर्ट के अनुसार प्रीमैच्योर बच्चों में एनीमिया, एप्निया, जॉन्डिस, नेक्रोटाइजिंग एंट्रोकोलाइटिस, पेटेंट डक्टस आर्टेरीओसस, प्रीमेच्योरिटी रेटिनोपैथी, इंफेक्शन, रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम (RDS) एवं हाइपोथर्मिया जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए प्रीमैच्योर बच्चों के लिए आवश्यक न्यूट्रिशन का ध्यान रखना आवश्यक माना गया है।
नोट: नैशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इन्फॉर्मेशन (National Center for Biotechnology Information) में पब्लिश्ड रिपोर्ट के अनुसार प्रीमैच्योर बच्चों में इंफेक्शन का खतरा ज़्यादा होता है। इसलिए शिशु के इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाने के लिए माइक्रोन्यूट्रीएंट्स का सेवन मां के लिए आवश्यक बताया गया है। शिशु की मां को माइक्रोन्यूट्रीएंट्स के साथ-साथ विटामिन सी से भरपूर खाद्य पदार्थों का सेवन ज़रूर करना चाहिए। प्रीमैच्योर बेबी को ब्रेस्टफीडिंग से आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति की जा सकती है।
प्रीमैच्योर शिशु के जन्म के साथ-साथ पेरेंट्स के लिए कठिनाई भरा होता है और अस्पताल से कब छुट्टी मिलेगी यह समझ पाना भी कठिन होता है। नैशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन (National Library of Medicine) में पब्लिश्ड रिपोर्ट के अनुसार प्रीमैच्योर बेबी का वजन सामान्य बच्चों की तुलना में कम होता है। इसलिए भी उन्हें अस्पताल रखा जाता है। अस्पताल में डॉक्टर शिशु के सेहत लगातार नजर बनाये रखते हैं और शिशु की सेहत को ध्यान में रखते हुए कुछ दिनों में घर ले जाने की इजाजत दे देते हैं। हालांकि हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होने के बाद भी डॉक्टर समय- समय पर शिशु की जानकारी के लिए पेरेंट्स को डॉक्टर के कंसल्टेशन में रहने की सलाह देते हैं।
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डिस्क्लेमर
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