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दादा-दादी का साथ बच्चों के विकास के लिए क्यों है जरूरी?

दादा-दादी का साथ बच्चों के विकास के लिए क्यों है जरूरी?

बच्चे का पहला स्कूल उसका घर होता है। वहीं अगर बात की जाए ग्रैंडपेरेंट्स के बारे में तो बच्चे अपने दादा-दादी का साथ मिलने से बच्चे बहुत कुछ सीखते हैं। दादा-दादी का साथ बच्चों के साथ रहना एक अनोखा एहसास है, वह न केवल बच्चे को जीवन की सीख देते हैं बल्कि, बच्चे को प्यार और खुशियां भी देते हैं। हम सबको याद होता है कि जब हम बचपन में हमारी दादी-नानी से कहानियां सुनते थे। इन कहानियों के जरिए वे हमें समाज और जीवन का आईना दिखाते थे। इसके अलावा वे इन कहानियों से हमें अच्छी आदतें सीखाने की भी कोशिश करते थे। कई मामलों में देखा जाता है कि बच्चों का पेरेंट्स के साथ बहुत ही फ्रेंडली रिश्ता बन जाता है। ऐसे में वे अपनी बातें पेरेंट्स के साथ शेयर न करने के बजाय ग्रैंडपेरेंट्स के साथ शेयर करने ज्यादा सहज होते हैं।

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बच्चों के लिए क्यों जरूरी है दादा-दादी का साथ

इसमें कोई दो राय नहीं है कि ग्रैंडपेरेंट्स का अनुभव पेरेंट्स से बेहतर होता हैं। उन्हें जीवन का भी काफी अनुभव होता है, जो वह अपने ग्रैंड-चिल्ड्रन के साथ समय-समय पर शेयर करते हैं। बच्चे भी अपने दादा-दादी का साथ खूब एंजॉय करते हैं। बच्चे दादा-दादी से खुलकर बात करने में ज्यादा सहज होते हैं। दादा-दादी जिंदगी में बहुत कुछ देख और समझ चुके होते हैं, जिसके कारण वे मुश्किल चीजों का हल भी कई बार अपने अनुभव से चुटकियों में हल कर देते हैं। बच्चे भी उनसे वे सब चीजें सीखते हैं।

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बच्चों के लिए दादा-दादी का साथ है किताबों जैसा

जब बच्चे छोटे होते हैं, तो जीवन के बहुत से सबक के बारे में वह किसी किताब या प्री-स्कूल से नहीं बल्कि अपने दादा-दादी से ही सीखते हैं। बच्चे भगवान के आगे हाथ जोड़ना, बड़ों का सम्मान करना, छोटों को प्यार करना यह सब उनके बड़े ही उन्हें सिखाते हैं। इतना ही नहीं अपने रीति-रिवाज, परंपराओं और संस्कृति की जानकारी भी उन्हें दादा-दादी से ही मिलती है। ऐसे में बच्चों के लिए दादा-दादी का साथ बहुत जरूरी होता है। वे अपनी परंपराओं और संस्कृति के बारे में दादा-दादी से ही सीखते हैं।

दादा-दादी का साथ मिलने से क्या सीखते हैं बच्चे

परिवार के बारे में

दादा-दादी का साथ रहना बच्चों के लिए इस मायने में भी जरूरी होता है कि वे अपने परिवार और अपने रीति-रिवाजों के बारे में समझ पाते हैं। अपने घर व परिवार के बारे में जितनी जानकारी दादा-दादी को होती हैं, उतना पेरेंट्स को नहीं होतीं। इसलिए वे बच्चो से उन सबके बारे में बात करते हैं, उन्हें सभी रिश्तेदारों व पुरखों के बारे में बताते हैं। जिससे बच्चे में रिश्तो की समझ बनती है।

संस्कार की सीख

सुबह उठकर बड़ों के पैर छूना, किसी से मिलने पर नमस्कार करना, भगवान को रोजाना प्रणाम करना, सबसे प्यार से बात करना ऐसी बहुत सी चीजें हैं, जो दादा-दादी बच्चो को बहुत अच्छे से सिखा सकते हैं। ये किसी एक धर्म पर लागू नहीं होता है। ग्रैंडपेरेंट्स एक तरह से बच्चों के लिए उनकी जड़ों को समझाने का जरिया होता है। इसके अलावा वे उन्हें जीवन के जरूरी पाठ भी पढ़ाते हैं। यह सब कुछ ऐसी बातें हैं, जिसे सीख कर बच्चे अच्छा बनने की कोशिश करते हैं।

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दादा-दादी का साथ मिलने से बच्चे सीखते हैं धैर्य रखना

आज जिस तरह की हम फास्ट लाइफस्टाइल जी रहे हैं। इसका असर हमारे बच्चों पर भी साफ देखने को मिलता है। अडल्ट्स के साथ-साथ बच्चों में भी आज धैर्य की कमी देखने को मिलती है। वहीं कई अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि दादा-दादी का साथ मिलने पर बच्चों में धैर्य बढ़ता है। आमतौर पर देखा जाता है कि ग्रैंडपेरेंट्स अपनी लाइफ का एक बड़ा हिस्सा जी चुके होते हैं और वे संयम और धैर्य रखने की कला को अच्छे से सीख चुके होते हैं। ऐसे में जब बच्चे अपने दादा-दादी के साथ रहते हैं, तो वे देखते है कि कैसे वे कठिन से कठिन परिस्थितियों में अपने आपा नहीं खोते हैं और यहीं से बच्चे भी उनसे यह सीख सकते हैं। वहीं देखा जाता है कि जो बच्चे न्यूक्लियर फैमिली में रहते हैं। वे ज्वॉइंट फैमिली में रहने वाले बच्चों की तुलना ज्यादा जिद्दी और गुस्सैल होते हैं।

कविताओं और कहानियों से बच्चे लेते हैं सीख

हम सबने बचपन में दादा-दादी से कई कहानियां और किस्से सुने होंगे। उनके पास कहानियों और कविताओं का अच्छा संग्रह होता है। इन कहानियों से बच्चे को नैतिक शिक्षा भी मिल जाती है। आपने महसूस किया होगा कि आपके ग्रैंडपेरेंट्स के पास कभी इन किस्सों का स्टॉक खत्म नहीं होता। इन किस्से-कहानियों से बच्चे की सोचने समझने की शक्ति तो बढ़ती ही है और वो खुद से भी नए-नए विचारों को सोच पाता है। भले ही आज इंटरनेट पर दादी-दादी की कहानियां टेक्स्ट में उपलब्ध हैं, लेकिन बच्चों को मजा तो उनकी गोद मे बैठ कर सुनने में ही आता है। जहां वे अपनी जिज्ञासाओं और सवालों को कई बार पूछ सकते हैं और दादा-दादी हर बार पहली बार की तरह उन्हें समझाते हैं। ऐसे में बच्चों का दादा-दादी का साथ उन्हें एक अच्छा सुनने वाला भी बनाता है और वे अपनी बात कहने के साथ-साथ दूसरे की बात सुनने के लिए धैर्य रखना सीखते हैं।

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बच्चे पेरेंट्स से ज्यादा उन पर विश्वास करते हैं

बच्चों द्वारा कुछ गलत होने पर या कुछ बातो में बच्चे माता-पिता से बात करने में झिझकते हैं, लेकिन वही वे अपने दादा-दादी से आसानी से शेयर कर लेते हैं। इसका कारण ये होता है कि, उन्हें लगता है कि दादा-दादी उन्हें समझेंगे भी और उस समस्या का बिना डांट लगाए हल भी निकल देंगे। इससे बच्चो में शेयरिंग पॉवर भी बढ़ती हैं और उनकी समस्या भी हल हो जाती हैं।

बच्चों को जीवन मे दादा-दादी का साथ मिलना उनके बचपन को पूरा बनाता है क्योंकि वे ही परिवार और संस्कारों की नींव बच्चों में रखते हैं। बच्चों के विकास में इन की सबसे बड़ी भूमिका होती है और हर बचपन को इनकी जरूरत होती हैं।

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सूत्र

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लेखक की तस्वीर
Dr. Abhishek Kanade के द्वारा मेडिकल समीक्षा
Nikhil Kumar द्वारा लिखित
अपडेटेड 09/10/2019
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