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एमनियॉटिक फ्लूइड क्या है? गर्भ में पल रहे शिशु के लिए के लिए ये कितना जरूरी है?

एमनियॉटिक फ्लूइड क्या है? गर्भ में पल रहे शिशु के लिए के लिए ये कितना जरूरी है?

एमनियॉटिक फ्लूइड (Amniotic fluid) क्या है?

गर्भवती महिला जैसे ही गर्भ धारण करती है, यूट्रस में फीटस का निर्माण हो जाता है। फीटस युट्रस के अंदर रहता है, जिसे एमनियॉटिक फ्लूइड पूरी तरह से कवर करता है। एमनियॉटिक फ्लूइड से ही गर्भ में पल रहा शिशु सुरक्षित रहता है और इसी से ही शिशु को संपूर्ण पोषण मिलता है। एमनियॉटिक फ्लूइड गर्भवती महिला के शरीर से बनता है और फिर यह शिशु तक पहुंचता है। गर्भधारण के 12 दिनों के बाद ही एमनियॉटिक तरल बनने लगता है। प्रेग्नेंसी के आधे समय तक एमनियॉटिक फ्लूइड मां के शरीर में मौजूद पानी से बनता है। इसके बाद गर्भ में पल रहे शिशु के यूरिन से एमनियॉटिक फ्लूइड बनने लगता है।

प्रेग्नेंसी में एमनियॉटिक तरल कैसे बनता है?

प्रेग्नेंट लेडी के शरीर में मौजूद खनिज-तत्व और पानी से एमनियॉटिक तरल बनता है। हेल्थ एक्सपर्ट के अनुसार प्रेग्नेंसी के 12वें हफ्ते में पहुंचने के बाद भ्रूण में प्रोटीन, फैट, कार्बोहाइड्रेट, फॉस्फोलिपिड और यूरिया जैसे अन्य आवश्यक तत्वों का निर्माण होने लगता है।

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एमनियॉटिक फ्लूइड या प्रेग्नेंसी में एमनियॉटिक तरल के बारे में जान लें ये बातें

  • एमनियॉटिक फ्लूइड का निर्माण सबसे पहले मां के शरीर से होता है, लेकिन धीरे-धीरे ये शिशु के यूरिन से भी बनता है। एमनियॉटिक फ्लूइड में शिशु की यूरिन की मात्रा ज्यादा होती है।
  • इसमें महत्वपूर्ण पोषक तत्व, हॉर्मोंस और एंटीबॉडीस भी होते हैं और यह बच्चे को चोट लगने से बचाने में मददगार होता है।
  • प्रेग्नेंसी के दौरान एमनियॉटिक फ्लूइड की मात्रा कम होने या अत्यधिक होने पर इससे परेशानी हो सकती है। वैसे प्रेग्नेंसी के 36वें हफ्ते में इस फ्लूइड की मात्रा सबसे ज्यादा होती है और जैसे-जैसे डिलिवरी का वक्त नजदीक आता है एमनियॉटिक तरल की मात्रा कम होने लगती है।

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गर्भावस्था में एमनियॉटिक फ्लूइड की जरूरत क्यों होती है?

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एमनियॉटिक तरल निम्नलिखित तरह से गर्भावस्था में सहायक होता है

1. फीटस का सुरक्षा कवच

गर्भ में पल रहे शिशु को किसी भी तरह की बाहरी चोट या दवाब से बचाने में एमनियॉटिक फ्लूइड की अहम भूमिका होती है।अगर गर्भवती महिला किसी वजह से गिर जाती हैं या उन्हें चोट लगती है तो एमनियॉटिक फ्लूइड शिशु की रक्षा करता है।

2. टेम्प्रेचर नियंत्रित रहता है

फ्लूइड शिशु को वॉर्म रखने में सहायक होता है और सामान्य तापमान बनाए रखने में मददगार होता है। यह शिशु के लिए काफी लाभकारी होता है।

3. इंफेक्शन से बचाता है

एमनियॉटिक फ्लूइड में मौजूद एंटीबॉडीस शिशु को इंफेक्शन से बचाए रखते हैं। इंफेक्शन की वजह से कई शारीरिक समस्या हो सकती है लेकिन, इससे आसानी से बचा जा सकता है।

4. लंग्स और डायजेस्टिव सिस्टम का विकास

गर्भ में पल रहे शिशु को सांस लेने में एमनियॉटिक तरल मदद करता है। यही नहीं यह लंग्स और डायजेस्टिव सिस्टम के विकास में भी सहायक होता है।

5. मांसपेशियों और हड्डियों का विकास

गर्भ में पल रहा शिशु एमनियॉटिक तरल से पूरी तरह से ढ़का होता है। इसी की मदद से शिशु को गर्भ में मूवमेंट करने में आसानी होती है, जिससे शिशु की मांसपेशियों और हड्डियों का विकास होता है

6. लूब्रिकेशन

एमनियॉटिक फ्लूइड शिशु के हाथ और पैर की उंगलियों को एक साथ विकसित करने में सहायक होता है। एमनियॉटिक तरल की मात्रा कम होने पर विकास पर नेगेटिव प्रभाव पड़ता है।

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7. अंबिकल कॉर्ड सपोर्ट

एमनियॉटिक फ्लूइड अंबिकल कॉर्ड को दबने से बचाता है। अंबिकल कॉर्ड ही शिशु तक आहार और ऑक्सिजन पहुंचाने का काम करता है। शिशु के बेहतर विकास में एमनियॉटिक तरल की अहम भूमिका होती है। इसलिए गर्भवती महिला को आहार और तरल पदार्थों का विशेष ख्याल रखना चाहिए।

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गर्भावस्था की शुरुआत से अंत तक एमनियॉटिक फ्लूइड की मात्रा कितनी होनी चाहिए?

10वें हफ्ता में – 10-20 ml

16वें हफ्ता में – 250 ml

33वें हफ्ता में – 800 ml

38वें हफ्ता से 39वें हफ्ता में – 1000 ml

40वें हफ्ता में – 800 ml और एमनियॉटिक तरल की मात्रा कम होने लगती है।

अगर किसी कारण शरीर में एमनियॉटिक फ्लूइड की मात्रा कम होती हैं तो इसे आहार में विशेष ध्यान देकर बढ़ाया जा सकता है। इसलिए अगर आप प्रेग्नेंसी प्लानिंग कर रहीं हैं या आप गर्भवती हैं तो अपने आहार में निम्नलिखित खाद्य और पे पदार्थ शामिल करें। जैसे-

ज्यादा से ज्यादा तरल पदार्थों का सेवन करें

सामान्य दिनों के साथ-साथ गर्भावस्था के दौरान भी ज्यादा से ज्यादा पानी पीएं। रिसर्च के अनुसार शरीर में पानी की सही मात्रा एमनियॉटिक फ्लूइड के लेवल को बैलेंस्ड रखने में मददगार होता है। तरल पदार्थों के सेवन से प्रेग्नेंसी के 37वें हफ्ते से प्रेग्नेंसी के 41वें हफ्ते में भी एमनियॉटिक तरल को संतुलित रहने में मदद करता है। आप तरल पदार्थों के रूप में फलों का जूस या फिर सब्जियों का सूप भी ले सकते हैं। अगर आपको किसी फल या सब्जी से एलर्जी है तो बेहतर होगा कि आप उसे डायट में न शामिल करें। अधिक जानकारी के लिए आप डॉक्टर से भी परामर्श कर सकते हैं।

प्रेग्नेंसी में एमनियॉटिक तरल में कमी : डायट का ख्याल रखें

गर्भवती महिला आपने डायट का ध्यान तो रखती हैं लेकिन, प्रेग्नेंसी के दौरान लीन प्रोटीन, साबुत अनाज और ज्यादा से ज्यादा मौसमी फलों और सब्जियों का सेवन करें।

कभी-कभी प्रेग्नेंसी में एमनियॉटिक तरल की मात्रा में या लेवल में कमी होने के कारण डॉक्टर बेड रेस्ट की सलाह देते हैं। आराम करने से शरीर में ब्लड फ्लो बेहतर होता है और जो प्लासेंटा में ब्लड फ्लो बढ़ाने में मदद करता है। इससे एमनियॉटिक तरल का लेवल भी ठीक होता है। बेड रेस्ट की सलाह डॉक्टर गर्भवती महिला को दूसरी तिमाही या तीसरे ट्राइमेस्टर की शुरुआत में आराम करने की सलाह देते हैं। हालांकि ज्यादा आराम करना भी गर्भवती महिलाओं के लिए परेशानी हो जाती है। इसलिए इस दौरान आराम करते-करते आप किताबे पढ़ें, गाने सुने या आराम करते हुए कोई अन्य मजेदार काम आप करना चाहें तो आप कर सकती हैं।

लो एमनियॉटिक फ्लूइड गर्भावस्था के किसी भी हफ्ते में हो सकता है, जिसका गर्भ में पल रहे शिशु के सेहत पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। कभी-कभी गर्भ में पल रहे शिशु में मूवमेंट कम होना और वजायनल डिस्चार्ज होना लो एमनियॉटिक फ्लूइड की ओर इशारा करता है। ऐसी स्थिति में जल्द से जल्द डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। एमनियॉटिक तरल कम होने की स्थिति में डॉक्टर इसके लिए इलाज कर सकते हैं और इसके लेवल को संतुलित रख सकते हैं। यह ध्यान रखें की प्रेग्नेंसी के अलग-अलग स्टेज पर एमनियॉटिक तरल की मात्रा बदलती रहती है। एमनियॉटिक तरल गर्भवती महिला के सेहत पर भी निर्भर करता है। इसलिए प्रेग्नेंसी के दौरान डॉक्टर द्वारा बताए गई जांच अवश्य करवाएं।आप स्वास्थ्य संबंधि अधिक जानकारी के लिए हैलो स्वास्थ्य की वेबसाइट विजिट कर सकते हैं। अगर आपके मन में कोई प्रश्न है तो हैलो स्वास्थ्य के फेसबुक पेज में आप कमेंट बॉक्स में प्रश्न पूछ सकते हैं।

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सूत्र

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लेखक की तस्वीर
Nidhi Sinha द्वारा लिखित आखिरी अपडेट 17/10/2020 को
Dr. Shruthi Shridhar के द्वारा एक्स्पर्टली रिव्यूड