10 सामान्य मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स (Mental Health Problems) जिनसे ज्यादातर लोग हैं अंजान

चिकित्सक द्वारा समीक्षित | द्वारा

अपडेट डेट दिसम्बर 10, 2019 . 6 मिनट में पढ़ें
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आज मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स का सामना लगभग हर इंसान कर रहा है लेकिन, शारीरिक स्वास्थ्य की तुलना में मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स ज्यादातर लोग कम जानकारी के आभाव में अनदेखा कर देते हैं। उन्हें लगता है कि दिखने वाले ये लक्षण किसी आम बीमारी के होंगे और बाद में ये ही लक्षण एक गंभीर मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स का रूप ले लेते हैं।
WHO में NCMH (नेशनल केयर ऑफ़ मेडिकल हेल्थ) के लिए की गई एक रिसर्च में कहा गया है कि कम से कम 6.5 प्रतिशत भारतीय किसी न किसी तरह के मानसिक विकार से पीड़ित हैं।

भारत में मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स की संख्‍या इसीलिए ज्यादा बढ़ रही है क्‍योंकि लोग मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स (Mental Health Problems) को कम आंकते हैं। आइए, जानते हैं ऐसी ही दस मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स जो लगती तो हैं समान्य लेकिन हैं काफी गंभीर

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1. डिप्रेशन

बात करें जब मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स की तो डिप्रेशन (अवसाद) नंबर एक पर आता है। यह एक सामान्य मानसिक स्वास्थ्य विकार है जिसे लोग सबसे कम आंकते हैं। दुनिया भर में विकलांगता के मुख्य कारणों में से एक कारण डिप्रेशन है। इस मानसिक बीमारी में मन लगातार कई हफ़्तो तक या महीनों तक बहुत उदास रहता है जिसके कारण मन में नकारात्मक विचार आते हैं। ज्यादा गंभीर अवस्था होने पर कभी-कभी अवसाद आत्महत्या का भी कारण बन जाता है। दुनियाभर में लगभग 300 मिलियन लोग अवसाद से ग्रसित हैं। पुरुषों की तुलना में महिलाएं इस मानसिक रोग से अधिक प्रभावित होती हैं।

सलाह-यदि आप या आपके परिवार में किसी को अवसाद के लक्षण दिखे तो किसी परिवारजन से या मनोचिकित्सक (साइकेट्रिस्ट) से तुरंत बात करें। इससे आपको डिप्रेशन से निकलने में मदद मिल सकती है।

2. बाइपोलर डिसऑर्डर 

यह एक जटिल मानसिक विकार है जिसे मैनिक डिप्रशेन भी कहा जाता है। दुनिया भर में लगभग 60 मिलियन लोग इस मानसिक बीमारी से प्रभावित हैं। बाइपोलर डिसऑर्डर की वजह से व्यक्ति के मूड में अचानक बदलाव आते रहते हैं। इस मानसिक स्वास्थ्य समस्या से ग्रसित व्यक्ति कभी बहुत खुश होता है तो कभी बिना किसी बात के उदास हो जाता है। बाइपोलर डिसऑर्डर का रोगी अक्सर मूड स्विंग, गुस्सा आने या उदास होने की शिकायत करता है। हालांकि इसकी वजह पूरी तरह से ज्ञात नहीं है फिर भी आनुवंशिक, न्यूरोकेमिकल, स्ट्रेस आदि के चलते यह बीमारी होती है।

सलाह- बाइपोलर डिसऑर्डर के इलाज के लिए कई प्रभावशाली दवाएँ उपलब्ध हैं जिन्हें सिर्फ डॉक्टर की सलाह से ही लेनी चाहिए। किसी मनोचिक्त्सक से सम्पर्क करें। इसके अलावा रोगी को अपने परिवारजनों और दोस्तों से बातचीत करनी चाहिए और उनसे अच्छे संबंध बनाकर रखने चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य पर अच्छे संबंधों का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

3. स्किजोफ्रेनिया

यह एक ऐसी मानसिक बीमारी है जिससे ग्रसित इंसान वास्तविक और काल्पनिक वस्तुओं को समझने में भूल कर बैठता है और वह यूं ही खोया-खोया रहता है।दुनिया भर में लगभग 23 मिलियन लोगों को इस सिजोफ्रेनिया नाम की मानसिक बीमारी ने घेर रखा है। इस समस्या से पीड़ित रोगी के लिए काम करना, पढ़ाई करना या सामाजिक रूप से बातचीत करना बहुत मुश्किल हो जाता है।

सलाह-ऐसे व्यक्ति को प्यार और सहानुभूति देने के साथ ही रोगी को मनोरोग चिकित्सक के पास ले जाएं। अपनों के प्यार और डॉक्टरी परामर्श से इस परेशानी से उबरा जा सकता है।

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4. डिमेंशिया 

दुनिया भर में लगभग 50 मिलियन लोग डिमेंशिया की मानसिक बीमारी से पीड़ित हैं। डिमेंशिया ग्रस्त व्यक्ति की याददाशत इतनी ज्यादा प्रभावित हो जाती है कि वे अपने रोजमर्रा के कामों को ठीक से नहीं कर पाते। यहां तक कि इंसान कभी-कभी अपना शहर, कौन-सा साल या महीना चल रहा है, यह सब भी भूल जाता है। अल्जाइमर रोग डिमेंशिया का सबसे आम कारण है। यह मानसिक बीमारी सिर की गंभीर चोट, स्ट्रोक आदि के कारण भी हो सकती है।

सलाह-डिमेंशिया का उपचार उसके कारण पर निर्भर करता है। कुछ दवाइयां और थेरेपी इसके उपचार के लिए इस्तेमाल की जाती है। जो डिमेंशिया के लक्षणों को कम करने में काफी मददगार होती हैं। इसके अलावा दिमाग को सक्रिय बनाएं रखने के लिए किसी न किसी रचनात्मक कार्य में रोगी को व्यस्त रखें। 

5. ऑब्सेसिव-कंपल्सिव डिसऑर्डर

ओसीडी (ऑब्सेसिव-कंपल्सिव डिसऑर्डर) एक प्रकार की मानसिक बीमारी है जिसमें लोग एक ही चीज को बार-बार करते हैं जैसे बार-बार वस्तुओं को गिनना, बार-बार जाकर देखना कि दरवाजा बन्द है कि नहीं, बार-बार हाथ धोना, एक ही बात को रिपीट करना या कुछ विचार उनके मन में बार-बार आते हैं। इसके चलते व्यक्ति को बेचैनी, डर और चिंता का सामना करना पड़ता है। इस मानसिक विकार से ग्रसित इंसान काम को बार-बार दोहराता है जिससे उसके दैनिक जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने लगता है।

सलाह-आज तक ओसीडी को ठीक नहीं किया जा सका है लेकिन इलाज से लक्षणों को कंट्रोल करने में मदद मिल सकती है जिससे पीड़ित के दैनिक दिनचर्या में कोई समस्या न आए। इसके दो मुख्य इलाज हैं, मनोचिकित्सा और दवाएं। दोनों के मेल से उपचार ज्यादा प्रभावी होता है।

6. पर्सनालिटी डिसऑर्डर 

मानसिक अस्वस्थ्यता के चलते पर्सनालिटी डिसऑर्डर से पीड़ित व्यक्तियों के व्यवहार में इतने ज्यादा बदलाव होते है कि इंसान उससे परेशान हो जाता है और उसका बुरा प्रभाव व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन पर पड़ता है। इस तरह के मानसिक विकार से पीड़ित व्यक्ति को खुद भी आभास नहीं होता है कि वह क्या कर रहा है? भीड़ में जाने से डरना, घर के बाहर निकलने में बहुत ज्यादा डरना आदि लक्षण पीड़ित में अक्सर देखने को मिलते हैं। इसके अलावा, ऐसा व्यक्ति बहुत अलग तरीके से सोचता और ऐसे व्यक्ति के व्यवहार में बदलाव लाना बहुत कठिन होता है।

सलाह- इस तरह के मानसिक विकार में व्यक्ति दवाओं के साथ-साथ डॉक्टर के द्वारा बताई गई थेरेपी का प्रयोग भी करते हैं। 

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7. पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD)

पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर एक ऐसी स्थिति है जिसका सीधा संबंध व्यक्ति के साथ घटी एक दर्दनाक या भयानक घटना के साथ होता है। जैसे यौन या शारीरिक उत्पीड़न, कोई गंभीर दुर्घटना, किसी प्रियजन की अस्वाभाविक मौत आदि। इस तरह की घटनाओं को या तो व्यक्ति अनुभव कर चुका होता है या उसे देख चुका होता है। हालांकि शारीरिक रूप से ऐसा व्यक्ति ठीक दिखता है लेकिन मानसिक रूप से वे काफी छतिग्रस्त होते हैं। इस तरह के मेंटल डिसऑर्डर से पीड़ित इंसान लंबे समय तक उन भयानक घटनाओं से उबर नहीं पाता है जिससे उसके जीवन का हर एक पहलू प्रभावित होता है। 

सलाह- इस तरह के मानसिक रोग से पीड़ित व्यक्ति को भावनात्मक रूप से सपोर्ट करें। समय और उचित देखरेख के साथ पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर के लक्षण कम हो जाते हैं।  हालत में जल्दी सुधार के लिए किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लें। पर्याप्त आराम के साथ व्यायाम करना और स्वस्थ पोषक आहार लेना भी इसके उपचार में शामिल है। 

8. जनरालाइज्ड एंग्जाइटी डिसऑर्डर

दैनिक कार्यों और क्रियाओं को लेकर अनावश्यक घबराहट और चिंता जनरालाइज्ड एंग्जाइटी डिसऑर्डर कहलाता है। ग्रसित व्यक्ति रोजमर्रा के कार्यों को करने में बेवजह घबराता है जबकि उसे पता होता है कि उसकी चिंता बेकार है। ये चिंताएं इतनी ज्यादा होती हैं कि इन्हें रोगी नियंत्रित नहीं कर पाता है और नतीजन चिडचिडापन, अनिद्रा, बैचैनी और मांसपेशियों का तनाव उसे घेर लेता है। ऐसे व्यक्ति में थकान, मिचली, उबकाई, सरदर्द, शरीर में दर्द, पसीना आना, सांस में तक़लीफ़ और चक्कर आना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।

सलाह- यदि आप लम्बे समय से एंग्जाइटी की समस्या से जूझ रहे हैं तो किसी अच्छे मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से मिलने में परहेज न करें। इलाज के साथ अपनी जीवनशैली में सुधार लाएं जैसे नियमित रूप से व्यायाम करना, स्वस्थ भोजन करना, पर्याप्त नींद लेना आदि को भी उपचार के तौर पर अपनाएं। 

9. पैनिक डिसऑर्डर 

यह एक तरह का एंग्जायटी डिसऑर्डर है। बिना वजह अचानक किसी बात का डर हावी होना या अचानक से घबराहट होने लगना, पैनिक डिसऑर्डर है। अचानक आंखों के आगे अंधेरा छा जाना, सांस की गति तेज होना, पूरे शरीर में तेज कपकपी, दिल की धड़कन बढऩा आदि कई ऐसे लक्षण हैं जो पैनिक डिसऑर्डर की ओर इशारा करते हैं। 

सलाह- पैनिक डिसऑर्डर से निजात पाने के लिए जीवनशैली में बदलाव जरुरी है। कई बार अव्यवस्थित दिनचर्या के कारण भी ऐसी समस्या देखने को मिलती है इसलिए मॉर्निंग वॉक और योगाभ्यास करने के साथ पर्याप्त नींद लें। इससे तनाव कम होगा और शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

अगर हमेशा रहने वाली बेचैनी आपकी रोजमर्रा के कार्यों को प्रभावित कर रही है तो डॉक्टरी सलाह लें।

10. भोजन विकार (ईटिंग डिसऑर्डर)

ईटिंग डिसऑर्डर यानी खाने का विकार एक गंभीर मानसिक समस्या है जिससे पीड़ित व्यक्ति बहुत ज्यादा या बहुत कम खाना खाता है या कैलोरीज घटाने के लिए अनहेल्दी तरीके अपनाता है जैसे-जबरदस्ती उल्टी करना, अत्यधिक व्यायाम करना आदि। आमतौर पर ईटिंग डिसऑर्डर तीन प्रकार के हैं-

  1. बुलिमिया नर्वोसा (कम समय में ज्यादा खाना),
  2. एनोरेक्सिया नर्वोसा (वजन बढ़ने के डर से बहुत कम खाना),
  3. बिंज ईटिंग (भूखे न होने पर भी बार-बार खाना)। खाने के इन विकारों की वजह से किडनी और हृदय समस्याएं हो सकती हैं।  

सलाह-ईटिंग डिसऑर्डर को खुद से कंट्रोल करना कठिन हो सकता है इसलिए जल्द से जल्द डॉक्टर से मदद लेनी चाहिए।

ये सभी बड़ी ही सामान्य 10 मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स जिनसे लगभग कोई न कोई इंसान प्रभावित है। इन मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स के अपने कुछ मनोवैज्ञानिक और बायोलॉजिकल कारण हैं जिनका इलाज समय रहते संभव है लेकिन इसके लिए जरुरी है मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं पर खुलकर बात करना।  

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