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हॉजकिन्स डिजीज: 20-40 उम्र के लोगों में होता है ये ब्लड कैंसर, बेहद कॉमन हैं लक्षण

के द्वारा मेडिकली रिव्यूड डॉ. प्रणाली पाटील · फार्मेसी · Hello Swasthya


Manjari Khare द्वारा लिखित · अपडेटेड 25/06/2021

हॉजकिन्स डिजीज: 20-40 उम्र के लोगों में होता है ये ब्लड कैंसर, बेहद कॉमन हैं लक्षण

हॉजकिन्स लिम्फोमा (Hodgkin lymphoma) को हॉजकिन्स डिजीज (Hodgkin’s disease) कहा जाता है, जो कि लिम्फेटिक सिस्टम का कैंसर (Lymphatic system cancer) है। लिम्फेटिक सिस्टम इम्यून सिस्टम को बॉडी से वेस्ट को बाहर निकालने और इंफेक्शन से लड़ने में मदद करता है। यह कैंसर या कहें कि हॉजकिन्स डिजीज लोगों को किसी भी उम्र में प्रभावित कर सकती है, लेकिन यह 20-40 साल के लोगों में आम है। 55 वर्ष के बाद भी लोग इस कैंसर से प्रभावित होते हैं । हॉजकिन्स डिजीज में लिम्फेटिक सिस्टम की कोशिकाएं असामान्य रूप से वृद्धि करती है और इसके बाहर तक फैल जाती हैं। हॉजकिन्स लिम्फोमा लिम्फेटिक सिस्टम में होने वाले दो कैंसर में से एक है। इसका दूसरा प्रकार नॉन हॉजकिन्स लिम्फोमा (Non Hodgkin’s lymphoma) भी बेहद कॉमन है। एडवांस डायग्नोसिस और ट्रीटमेंट से हॉजकिन्स लिम्फोमा का इलाज संभव है।

हॉजकिन्स डिजीज के लक्षण (Hodgkin’s disease Symptoms)

हॉजकिन्स डिजीज के सबसे कॉमन लक्षणों में लिम्फ नोड्स में सूजन आना (Swollen lymph nodes) है। जिसका कारण स्किन के अंदर लंप (Lump) का बनना है। यह लम्प सामान्यत: दर्द का कारण नहीं बनते। यह लम्प कई जगहों पर बन सकते हैं। जिसमें गर्दन की साइड में, आर्मपिट (Armpit) में या कमर के आसपास। इसके अलावा हॉजकिन्स डिजीज के लक्षणों में निम्न शामिल हैं।

अगर ये लक्षण नजर आते हैं तो डॉक्टर से संपर्क करें। ये किसी दूसरी कंडिशन के लक्षण भी हो सकते हैं, लेकिन सही डायग्नोसिस जरूरी है।

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हॉजकिन्स लिम्फोमा के कारण क्या हैं? (Hodgkin’s disease Causes)

हॉजकिन्स डिजीज (Hodgkin’s disease)

डॉक्टर हॉजकिन्स लिम्फोमा (Hodgkin’s lymphoma) के कारण के बारे में ठीक से बता नहीं पाते हैं, लेकिन इसकी शुरुआत तब होती है जब संक्रमण से लड़ने वाली कोशिकाएं जिन्हें लिम्फोसाइट (Lymphocyte) कहते हैं, वे जेनेटिक म्यूटेशन (Genetic mutation) विकसित करने लगती हैं। म्यूटेशन की वजह से कोशिकाएं तेजी से मल्टिप्लाय होती हैं, जिससे कई रोगग्रस्त कोशिकाएं कई गुना बढ़ती जाती हैं। म्यूटेशन के कारण बहुत बड़ी संख्या में ओवरसाइज और एब्नॉर्मल लिम्फोसाइट (Abnormal lymphocyte) लिम्फेटिक सिस्टम में इक्ठ्ठे हो जाते हैं और वे स्वस्थ कोशिकाओं को बाहर निकाल देते हैं। इस तरह हॉजकिन्स डिजीज (Hodgkin’s disease) के लक्षण नजर आने लगते हैं।

हॉजकिन्स डिजीज के कई प्रकार हैं। कौन सी कोशिकाएं बीमारी में शामिल है और उनका व्यवहार कैसा है डायग्नोसिस इस पर आधारित होता है। जिस प्रकार लिम्फोमा के बारे में पता चलता है, वैसा ही ट्रीटमेंट दिया जाता है।

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हॉजकिन्स डिजीज के रिस्क फैक्टर्स (Hodgkin’s disease Risk Factors)

निम्न फैक्टर्स हॉजकिन्स डिजीज के रिस्क को बढ़ा सकते हैं।

उम्र (Age)

हॉजकिन्स डिजीज सामान्यत: 15 से 30 साल की उम्र के बीच में और 55 साल के बाद डायग्नोस होता है।

फैमिली हिस्ट्री (Family History)

फैमिली में किसी को हॉजकिन्स लिम्फोमा (Hodgkin’s lymphoma) होने पर परिवार के दूसरे सदस्यों को भी इस बीमारी का खतरा बढ़ जाता है।

पुरुष

पुरुषों में महिलाओं की तुलना में हॉजकिन्स लिम्फोमा (Hodgkin’s lymphoma) होने की संभावना ज्यादा रहती है।

एपस्टीन बार वायरस इफेक्शन (Epstein-Barr virus infection)

इस इंफेक्शन का शिकार होने वाले लोगों में हॉजकिन्स डिजीज (Hodgkin’s disease) होने का खतरा ज्यादा होता है।

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हॉजकिन्स डिजीज का पता कैसे लगाया जाता है? (Hodgkin’s disease diagnosis)

डॉक्टर मरीज से पर्सनल और फैमिली हिस्ट्री के बारे में पूछेंगे। डॉजकिन्स डिजीज का पता लगाने के लिए वे कुछ टेस्ट करने के लिए भी कहेंगे। जिसमें निम्न शामिल हैं।

फिजिकल एग्जाम (Physical Exam)

इसमें डॉक्टर अंडरऑर्म, नेक और कमर के सूजे हुए लिम्फ नोड्स को चेक करेंगे। इसके साथ ही वे स्प्लीन की सूजन और लिवर की भी जांच करेंगे।

ब्लड टेस्ट (Blood test)

ब्लड सैम्पल के जरिए कैंसर का पता लगाने की कोशिश की जाएगी। लेब में ब्लड में ऐसी किसी संभावना की तलाश की जाएगी जो कैंसर का कारण हो सकती है।

इमेजिंग टेस्ट्स (Imaging test)

डॉक्टर हॉजकिन्स लिम्फोमा के लक्षणों की जांच करने के लिए इमेजिंग टेस्ट्स रिकमंड कर सकता है। जिसमें एक्स रे, सीटी स्कैन (CT Scan) और पॉजिस्ट्रॉन इमिशन टोमोग्राफी (Positron emission tomography) शामिल है।

बायोप्सी (Biopsy)

डॉक्टर लिम्फ नोड बायोप्सी भी रिकमंड कर सकते हैं। जिसमें लेब टेस्टिंग के लिए लिम्फ नोड के कुछ टिशूज को लिया जाता है। जिसमें एब्नॉर्मल सेल्स के बारे में पता लगाने की कोशिश की जाती है।

बोन मैरो सैम्पल (Bone Marrow sample)

बोन मैरो बायोप्सी भी डॉक्टर रिकमंड कर सकते हैं, जिसमें नीडल के जरिए हिपबोन से बोन मैरो का सैम्पल लिया जाता है। इस सैम्पल से हॉजकिन्स लिम्फोमा सेल्स के बारे में पता लगाया जाता है।

हॉजकिन्स लिम्फोमा की स्टेज (Hodgkin’s lymphoma stages)

हॉजकिन्स डिजीज (Hodgkin’s disease)

डॉक्टर के द्वारा कैंसर को डायग्नोस करने के बाद इसकी स्टेज र्निधारित कर दी जाती है। जो निम्न प्रकार है।

स्टेज 1 – कैंसर एक लिम्फ नोड रीजन या एक ही अंग तक ही सीमित है

स्टेज 2- इस स्टेज में कैंसर दो लिम्फ नोड्स रीजन में होता है या कैंसर ने एक अंग और पास के लिम्फ नोड्स पर हमला किया है, लेकिन कैंसर अभी भी डायफ्राम के ऊपर या नीचे शरीर के एक हिस्से तक सीमित है।

स्टेज 3 – जब डायफ्राम के ऊपर और नीचे दोनों तरफ के लिम्फ नोड्स तक कैंसर फैल चुका होता है तो इसे स्टेज 3 माना जाता है। कैंसर ऊतकों के किसी एक हिस्से में हो सकता है या लिम्फ नोड के पास के ऑर्गन में हो सकता है।

स्टेज-4 यह हॉजकिन्स लिम्फोमा की एडवांस्ड स्टेज है। इसमें कैंसर कोशिकाएं एक या अधिक अंगों तक पहुंच चुकी होती हैं। स्टेज 4 में हॉजकिन्स लिम्फोमा ना सिर्फ लिम्फ नोड्स को प्रभावित करता है, बल्कि शरीर के अन्य हिस्सों जैसे कि लिवर, लंग्स और हड्डियों को भी प्रभावित कर देता है।

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हॉजकिन्स डिजीज का इलाज कैसे किया जाता है? (Hodgkin’s disease treatment)

हॉजकिन्स डिजीज का इलाज इसकी स्टेज पर आधारित होता है। इस बीमारी का इलाज मुख्यत: कीमोथेरिपी (Chemotherapy) और रेडिएशन (Radiation) है। रेडिएशन थेरिपी में हाय एनर्जी रेडिएशन बीम्स का उपयोग कैंसर सेल्स को खत्म करने के लिए किया जाता है। वहीं कीमोथेरिपी में ऐसी दवाओं का उपयोग किया जाता है जो कैंसर कोशिकाओं को खत्म करती हैं। कीमोथेरिपी में उपयोग होने वाली दवाओं को ओरली देने के साथ ही वेन्स में भी इंजेक्ट किया जाता है। यह मेडिकेशन पर निर्भर करता है।

केवल रेडिएशन थेरिपी अर्ली स्टेज के हॉजकिन्स कैंसर का इलाज करने के लिए पर्याप्त है। कैंसर के एडवांस स्टेज में पहुंचने पर या इसके शरीर में ज्यादा फैल जाने पर टार्गेट ड्रग्स के साथ ही कीमोथेरिपी दी जाती है।

इम्यूनोथेरिपी (Immunotherapy) और स्टेम सेल्स ट्रांसप्लांट (Stem cells transplant) भी इस बीमारी के इलाज में उपयोग किया जाता है, लेकिन ऐसा तब होता है जब मरीज रेडिएशन थेरिपी और कीमोथेरिपी के प्रति रिस्पॉन्ड नहीं करता। स्टेम सेल्स ट्रांसप्लांट बोन मैरो में कैंसर सेल्स को हेल्दी सेल्स को ट्रांसप्लांट करके रिप्लेस कर दिया है।

ट्रीटमेंट के बाद डॉक्टर मरीज का रेगुलर फॉलोअप लेता है। इसलिए ट्रीटमेंट के बाद डॉक्टर से मिलते रहे।

उम्मीद करते हैं कि आपको हॉजकिन्स डिजीज से संबंधित जरूरी जानकारियां मिल गई होंगी। अधिक जानकारी के लिए एक्सपर्ट से सलाह जरूर लें। अगर आपके मन में अन्य कोई सवाल हैं तो आप हमारे फेसबुक पेज पर पूछ सकते हैं। हम आपके सभी सवालों के जवाब आपको कमेंट बॉक्स में देने की पूरी कोशिश करेंगे। अपने करीबियों को इस जानकारी से अवगत कराने के लिए आप ये आर्टिकल जरूर शेयर करें।

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