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बिना इस सिस्टम के हिल भी नहीं सकते हैं आप, बॉडी को सपोर्ट करता है मसक्यूलोस्केलेटल सिस्टम

बिना इस सिस्टम के हिल भी नहीं सकते हैं आप, बॉडी को सपोर्ट करता है मसक्यूलोस्केलेटल सिस्टम

मसक्यूलोस्केलेटल सिस्टम शरीर को सपोर्ट और स्टेबिलिटी प्रदान करता है। शरीर के मूवमेंट के लिए मसक्यूलोस्केलेटल सिस्टम बहुत जरूरी है। मसक्यूलोस्केलेटल सिस्टम स्केलेटन की बोंस ( bones of the skeleton), मसल्स (muscles), कार्टिलेज (cartilage),टेंडन्स(tendons), लिगामेंट(ligaments,) जॉइंट्स (joints) से मिलकर बना होता है। साथ ही कुछ कनेक्टिव टिशू होते हैं, जो ऑर्गन को जोड़ने के साथ ही सपोर्ट देने का काम भी करते हैं। मसक्यूलोस्केलेटल सिस्टम शरीर के भार को सहारा देने का काम करता है। साथ ही मसल्स के साथ बोंस मिलकर बॉडी की पुजिशन को मेंटेन करती हैं और नियंत्रण का काम करती हैं। अगर मसक्यूलोस्केलेटल सिस्टम न हो, तो शरीर न चल पाएं, न खड़ा हो पाएगा और न ही भाग पाएगा। अब तो आप समझ ही गए होंगे कि मसक्यूलोस्केलेटल सिस्टम हमारे शरीर के लिए कितना महत्वपूर्ण है। आप ये बात जानते होंगे कि हमारे शरीर में कुल 206 हड्डियां होती हैं। कम ही लोगों को हड्डियों के काम के बारे में जानकारी होती है। जानिए हमारे शरीर में बोंस के फंक्शन के बारे में,

  • हड्डियां शरीर को सपोर्ट देती हैं
  • मिनिरल्स और लिपिड्स को स्टोर करती हैं
  • ब्लड सेल्स प्रोड्यूस करती हैं
  • बॉडी ऑर्गन को प्रोटक्ट करती हैं
  • मसल्स को स्ट्रेंथ और डायरेक्शन देती हैं

जब हड्डियां चोट लगने या फिर किन्हीं अन्य कारणों से टूट जाती हैं, तो शरीर के उस हिस्से में मूवमेंट नहीं हो पाता है। मसक्यूलोस्केलेटन डिसऑर्डर के कारण मसल्स, बोंस और जॉइंट्स प्रभावित होते हैं। मसक्यूलोस्केलेटन डिसऑर्डर के कारण कार्पल टनल सिंड्रोम, ऑस्टियोआर्थराइटिस, फाइब्रोमायल्जिया (fibromyalgia), बोन फैक्चर आदि की समस्याएं हो सकती हैं।

और पढ़ें : अर्थराइटिस का आयुर्वेदिक इलाज कैसे करें? जानें क्या करें और क्या नहीं

मसक्यूलोस्केलेटल सिस्टम डिसऑर्डर के बारे में जानकारी (Musculoskeletal Disorders)

मसक्यूलोस्केलेटल सिस्टम डिसऑर्डर
मसक्यूलोस्केलेटल सिस्टम डिसऑर्डर

उम्र बढ़ने के साथ ही मसक्यूलोस्केलेटन डिसऑर्डर का खतरा भी बढ़ने लगता है। मसक्यूलोस्केलेटन डिसऑर्डर कॉमन है। इस समस्या के चलते दर्द के साथ ही विभिन्न क्रियाओं को करने में दिक्कत महसूस हो सकती है। अगर समय पर समस्या का इलाज कराया जाए, तो बीमारी के लक्षणों से निजात पाई जा सकती है। मसक्यूलोस्केलेटन डिसऑर्डर के कारण अर्थराइटिस की समस्या ( Arthritis), गाउट (Gout), एंकीलोसिंग स्पॉन्डिलाइटिस (ankylosing spondylitis), मस्कुलोस्केलेटल पेन (Musculoskeletal Pain), मायालजिया (Myalgia) आदि समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। जानिए क्या हैं बीमारी के लक्षण, कारण और उपाय।

जानिए अर्थराइटिस की बीमारी और उसके प्रकार (Types of Arthritis)

अर्थराइटिस की समस्या से आज बच्चे से लेकर बूढ़े व्यक्ति को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। अर्थराइटिस को पहले भले ही बुढ़ापे की बीमारी माना जाता था लेकिन अब ये बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है। अर्थराइटिस की समस्या के कारण जॉइंट्स में पेन होता है।अर्थराइटिस को गठिया के दर्द के नाम से भी जाना जाता है। अक्सर लोग घुटने के दर्द को ही अर्थराइटिस के नाम से जानते हैं, जो कि सच नहीं है। शरीर में दो बोंस के बीच में जुड़ाव वाले स्थान अगर आपको दर्द की समस्या होती है, तो उसे अर्थराइटिस कहते हैं। यानी हाथों के ज्वाइंट्स में दर्द से लेकर घुटने के दर्द को अर्थराइटिस की समस्या कहा जा सकता है। लक्षणों के आधार पर अर्थराइटिस को तीन मुख्य भागों में बांटा गया है। जानिए अर्थराइटिस के प्रकार।

जॉइंट्स पेन का कारण हो सकता है ऑस्टियोअर्थराइटिस (Osteoarthritis)

Osteoarthritis
ऑस्टियोअर्थराइटिस

कार्टिलेज स्मूथ इलास्टिक टिशू होते हैं, जो बोंस के आखिरी हिस्से को प्रोटक्ट करने का काम करते हैं। कार्टिलेज नर्व को भी सुरक्षा प्रदान करते हैं। जब किन्हीं कारणों से कार्टिलेज को नुकसान पहुंचता है, तो ऑस्टियोअर्थराइटिस की समस्या पैदा होती है। इस कारण से व्यक्ति को जॉइंट्स में पेन यानी दर्द का एहसास होता है। ऑस्टियोअर्थराइटिस अर्थराइटिस का कॉमन टाइप है। ये समस्या पुरुषों के साथ ही महिलाओं को भी हो सकता है। ऑस्टियोअर्थराइटिस की समस्या होने पर निम्न लक्षण दिखाई पड़ते हैं।

  • जॉइंट्स के आसपास स्वैलिंग
  • जॉइंट्स में झनझनाहट होना
  • जोड़ों को मोड़ने में दिक्कत
  • जोड़ों में दर्द का कम या ज्यादा होना

इस बारे में जनरल फिजिशन डॉक्टर अशोक रामपाल का कहना है कि ऑस्टियोआर्थराइटिस की समस्या का इलाज न होने पर भविष्य में लोगों के लिए काफी गंभीर स्थिति बन सकती है। जोड़ों की हड्डी पर चढ़ी कार्टिलेज की लेयर एक समय के बाद कमजोर होती जाती है। जिसके परिणामस्वरूप हमारे ज्वाइंट्स का सरफेस खुरदराहो जाता है। जिसकी वजह से लोगों को ज्वाइंट पेन, घुटनों में सूजन, जोड़ों में दर्द और अकड़न आदि लक्षण नजर आने लगते हैं। लोगों सबसे बड़ी गलती यह करते हैं कि इसे आम घुटनों का दर्द समझकर अनदेखा कर देते हैं और स्थिति गंभीर होना वहीं से शुरू होती है। यदि समय रहते इलाज शुरू हो जाए तो जोड़ों को खराब होने से बचाया जा सकता है। क्योंकि कार्टिलेज के बिना बोंस का मूवमेंट संभव नहीं है।

ऑस्टियोअर्थराइटिस की समस्या का मुख्य कारण कार्टिलेज का टूटना है। कार्टिलेज के बिना बोंस का मूवमेंट संभव नहीं है। ऑस्टियोअर्थराइटिस की समस्या होने पर बोंस पर रगड़ पड़ती है। इस कारण से जॉइंट्स मूवमेंट के दौरान समस्या आती है। अगर ऑस्टियोअर्थराइटिस के लक्षण दिखने पर बीमारी का इलाज कराया जाए, तो समस्या से निजात पाने में मदद मिलती है।

ऑस्टियोअर्थराइटिस की समस्या से निजात पाने के लिए समय पर डॉक्टर से जांच कराना बहुत जरूरी है। डॉक्टर एक्स-रे, ब्लड टेस्ट,जॉइंट फ्लूइड एनालिसिस या फिर गंभीर मामलों की जांच के लिए एमआरआई कराने की सलाह दे सकते हैं। जांच के बाद समस्या का पता चल जाता है और डॉक्टर आपको कुछ दवाओं का सेवन करने की सलाह दे सकते हैं। कुछ पॉइंट्स के माध्यम से ऑस्टियोअर्थराइटिस के उपाय के बारे में जानिए।

  • लाइफस्टाइल में सुधार करके आप बीमारी के लक्षणों को कम कर सकते हैं।
  • वजन बढ़ने के साथ ही ऑस्टियोअर्थराइटिस की समस्या भी बढ़ने लगती है। वेट कंट्रोल करें।
  • आप डॉक्टर से सलाह लेने के बाद रोजान हल्के व्यायाम कर सकते हैं।
  • आपको जिस जॉइंट्स में अधिक समस्या हो रही है, वहां पर अधिक जोर न लगाएं।
  • जोड़ों में दर्द से राहत के लिए डॉक्टर पेन किलर या क्रीम लगाने की सलाह देंगे, जरूरत पड़ने पर उन्हें यूज करें।
  • डॉक्टर से सलाह लेने के बाद आप जोड़ों की सिकाई भी कर सकते हैं। इससे मसल्स को रिलेक्स मिलेगा।

और पढ़ें : जोड़ो में दर्द का आयुर्वेदिक इलाज क्या है? जॉइंट पेन में क्या करें और क्या नहीं?

जोड़ों के डैमेज कारण बन सकता है रूमेटाइड अर्थराइटिस (Rheumatoid Arthritis)

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रूमेटाइड अर्थराइटिस

रूमेटाइड अर्थराइटिस एक ऑटोइम्यून डिजीज है। रूमेटाइड अर्थराइटिस की समस्या के कारण जॉइंट्स में दर्द होता है। ये बीमारी जोड़ों के डैमेज होने का कारण भी बन सकती है। अगर आपके एक हाथ के जॉइंट्स में दर्द की समस्या है, तो संभव है कि इस बीमारी के कारण आपके दूसरे हाथ के ज्वाइंट्स में भी दर्द हो। यानी रूमेटाइड अर्थराइटिस की बीमारी के कारण शरीर के दोनों भाग प्रभावित होते हैं।

रूमेटाइड अर्थराइटिस बीमारी में इम्यून सिस्टम (immune system) गलती से शरीर के टिशू यानी ऊतकों पर हमला करने लगता है। इस कारण से जॉइंट्स की लाइनिंग को नुकसान पहुंचता है। रूमेटाइड अर्थराइटिस के कारण फिजिकल डिसएबिलीटी भी हो सकती है।

रूमेटाइड अर्थराइटिस क्रॉनिक डिजीज है, जिसके कारण जोड़ों में सूजन और दर्द होता है। इसे पुराने अर्थराइटिस का नतीजा भी कह सकते हैं। रूमेटाइड अर्थराइटिस के लक्षण एक निश्चत पीरियड फ्लेयर्स ( flares or exacerbations) में दिखाई पड़ते हैं। वहीं दूसरा समय रेमिशन (remission)होता है, जब बीमारी के लक्षण दिखना बंद हो जाते हैं। बीमारी के लक्षण दिखने पर जांच कराना बहुत जरूरी हो जाता है ताकि बीमारी को नियंत्रित किया जा सके। जानिए रूमेटाइड अर्थराइटिस के लक्षण।

  • जोड़ों में दर्द (joint pain)
  • जोड़ों में सूजन (joint swelling)
  • जॉइंट्स स्टिफनेस (joint stiffness)
  • जॉइंट्स फंक्शन में दिक्कत (loss of joint function)

इस बीमारी से छुटकारा पाया जा सकता है। रूमेटाइड अर्थराइटिस की बीमारी से बचने के लिए निम्न बातों पर ध्यान जरूर दें।

  • रूमेटाइड अर्थराइटिस के कारण पेशेंट का हाई एरिथ्रोसाइट सेडीमेंटेनेश रेट (ESR) होता है, जो स्वैलिंग के बारे में जानकारी देता है। डॉक्टर जांच के दौरान इसे चेक कर सकते हैं।
  • जोड़ों में दर्द होने पर लापरवाही न बरतें और तुरंत डॉक्टर से जांच कराएं।
  • डॉक्टर लक्षण दिखने पर पेशेंट को एमआरआई और अल्ट्रासाउंड टेस्ट की सलाह देते हैं।
  • आपको दर्द से राहत के लिए डॉक्टर नॉनस्टेराइडल एंटी-इंफ्लामेट्री मेडिसिन्स देंगे, जो आपको दर्द और सूजन से राहत दिलाने का काम करेगी।
  • आपको रूमेटाइड अर्थराइटिस से राहत पाने के लिए व्यायाम करना चाहिए। डॉक्टर आपको थेरिपी लेने की सलाह भी दे सकते हैं।
  • रूमेटाइड अर्थराइटिस से बचने के लिए आपको सर्जरी की सलाह भी दी जा सकती है।

और पढ़ें : सावधान: शरीर के इन हिस्सों में दर्द हो सकते हैं हड्डी के रोग के लक्षण

सोरायसिस के कारण भी हो सकता है सोरियाटिक अर्थराइटिस (Psoriatic arthritis)

Psoriatic arthritis
सोरियाटिक अर्थराइटिस

जिन लोगों को सोरायसिस की समस्या होती है, उन लोगों में सोरियाटिक अर्थराइटिस की संभावना बढ़ सकती है। सोरियाटिक अर्थराइटिस के कारण जोड़ों की त्वचा में लाल पैचेज पड़ सकते हैं। सोराइसिस की समस्या पहले और फिर जोड़ों में दर्द की समस्या शुरू हो सकती है। ये बीमारी फिंगरटिप, रीढ़ की हड्डी आदि में हो सकती है। सोरियाटिक अर्थराइटिस के कारण जोडों में दर्द की समस्या, सूजन आदि लक्षण देखने को मिलते हैं। जानिए बीमारी के मुख्य लक्षणों के बारे में।

  • हाथों और पैरों की फिंगर में सूजन
  • पैरों में दर्द होना
  • लोअर बैक में दर्द
  • नाखूनों का रंग बदलना
  • आंखों के आसपास सूजन
  • थकान का एहसास
  • मूवमेंट में दिक्कत होना

सोरियाटिक अर्थराइटिस (Psoriatic arthritis) की समस्या तब शुरू होती है, जब इम्यून सिस्टम हेल्दी सेल्स पर अटैक करना शुरू कर देता है। एब्नॉर्मल इम्यून रिस्पॉन्स के कारण जॉइंट्स में सूजन के साथ ही स्किन सेल्स का ओवरप्रोडक्शन होने लगता है। इम्यून सिस्टम हेल्दी सेल्स पर अटैक क्यों करती हैं, अब तक इसका कारण स्पष्ट नहीं हो पाया है। फैमिली हिस्ट्री सोरियाटिक अर्थराइटिस का कारण बन सकती है। रिचर्स में ये बात सामने आई है कि कुछ जैनेटिक मार्कर सोरियाटिक अर्थराइटिस का कारण बनते हैं। 30 से 50 की उम्र में सोरियाटिक अर्थराइटिस की संभावना बढ़ जाती है। जानिए इस बीमारी से राहत पाने के उपाय क्या हैं?

  • अगर आपको सोरायसिस की समस्या है, तो आपको शरीर में दिखने वाले लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए। आप डॉक्टर से जांच करा सकते हैं।
  • अपनी लाइफस्टाइल में सुधार करें और रोजाना व्यायाम करें।
  • खाने में फ्रूट्स, वेजीटेबल्स के साथ ही पौष्टिक आहार शामिल करें।
  • अत्यधिक फैट बीमारी को गंभीर बना सकता है, इसलिए वजन को बढ़ने न दें।
  • अगर आपको जोडो़ं में दर्द का एहसास हो रहा है, तो दवा का सेवन करें और सिकाई करें।

और पढ़ें : टीवी देखते हुए भी कर सकते हैं बेस्ट एक्सरसाइज, जानिए कौन-कौन सी वर्कआउट है बेस्ट

गाउट (Gout) के कारण जोड़ों में होता है अचानक से दर्द

अर्थराइटिस के कॉम्प्लेक्स फॉम को गाउट कहते हैं। गाउट की समस्या के कारण व्यक्ति को अचानक से जोड़ों में दर्द ( पैर के निचले हिस्से, घुटने, टखने,) की समस्या और सूजन का सामना करना पड़ सकता है। टहलते समय, रात को सोते समय या फिर बैठने के दौरान अचानक से गाउट अटैक हो सकता है। इस कारण से पैरों के जॉइंट्स में जलन का एहसास हो सकता है। अचानक से उत्पन्न हुआ दर्द अपने आप ठीक भी हो सकता है। ब्लड में यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ने के कारण गाउट की समस्या होती है। ये बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है। पुरुषों को महिलाओं की अपेक्षा ये बीमारी अधिक होती है। जानिए गाउट अटैक के दौरान कौन से लक्षण दिखने को मिलते हैं।

  • जॉइंट्स में अचानक से दर्द
  • जॉइंट्स के आसपास सूजन
  • जॉइंट्स में जलन का एहसास

गाउट की समस्या उन लोगों में आम है, जिन्हें गठिया की समस्या है। गठिया की समस्या लंबे समय तक रहने से गाउट की संभावना बढ़ जाती है। अगर बीमारी के लक्षण दिखने पर जांच और ट्रीटमेंट करा लिया जाए, तो गंभीर लक्षणों से बचने में मदद मिल सकती है। जानिए गाउट की समस्या होने पर क्या उपाय अपनाएं जा सकते हैं?

  • डॉक्टर जांच के बाद आपको ब्लड में यूरिक एसिड कम करने की दवाएं जैसे कि प्रोबेनेसिड, एलोप्यूरिनॉल आदि देंगे। इन्हें नियमित लें।
  • दर्द को कम करने के लिए कॉलचिसाइन, सूजन और जलन को कम करने के लिए मेडिसिन्स देंगे। आपको समय पर दवाओं का सेवन करना चाहिए।
  • डायट में उन फूड्स को शामिल करें, जो वजन को कंट्रोल कर सके।
  • ऐसे फूड को खाने में न शामिल करें, जिनमे यूरिक एसिड हो।
  • जोड़ों में सूजन कम करने के लिए आइस पैक का यूज करें।
  • पानी की पर्याप्त मात्रा का सेवन करें।
  • आप हल्के व्यायाम के साथ ही मेडिटेशन करें।
  • नॉनवेज में क्या खाना चाहिए और क्या नहीं, इस बारे में डॉक्टर से जरूर पूछें।

एन्काइलॉसिंग स्पॉन्डिलाइटिस (Ankylosing spondylitis)

एन्काइलॉसिंग स्पॉन्डिलाइटिस(Ankylosing spondylitis)ऑटोइम्यून डिजीज है। ऑटोइम्यून डिजीज शरीर के इम्यून सिस्टम के कारण होने वाली बीमारी है। ये अर्थराइटिस का एक प्रकार है। एन्काइलॉसिंग स्पॉन्डिलाइटिस के कारण स्पाइन यानी रीढ़ की हड्डी प्रभावित होती है। इस कंडीशन के कारण व्यक्ति को चलने-फिरने में समस्या खड़ी हो जाती है। ये बीमारी गर्दन से फैलती है और निचले भाग के जॉइंट्स को डैमेज कर सकती है। एन्काइलॉसिंग स्पॉन्डिलाइटिस की समस्या के स्पाइन बोंस फ्यूज (लम्बर वर्टिब्रे बोन में फ्यूजन, सेक्क्रोइलिक जॉइंट बोन में फ्यूजन) होने के कारण होती है। एन्काइलॉसिंग स्पॉन्डिलाइटिस जैनेटिक डिजीज है। जानिए एन्काइलॉसिंग स्पॉन्डिलाइटिस होने पर शरीर के कौन से हिस्से प्रभावित हो सकते हैं।

  • पीठ का निचला हिस्सा
  • नितंब (Buttocks)
  • कंधे
  • हाथ
  • रिब केज
  • हिप्स
  • जांघे
  • फीट
  • हील्स

एन्काइलॉसिंग स्पॉन्डिलाइटिस की समस्या होने पर निम्न लक्षण दिख सकते हैं।

  • लंबे समय तक बैठने से दर्द
  • रीढ़ की हड्डी में दर्द
  • थकान का एहसास
  • जोड़ों में सूजन
  • सांस लेने में दिक्कत

एन्काइलॉसिंग स्पॉन्डिलाइटिस की समस्या से बचने के लिए आपको बीमारी के लक्षण दिखने पर डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। डॉक्टर आपको नॉनस्टेरॉइडल एंटी-इंफ्लमेट्री ड्रग देंगे। कुछ लोगों को एन्काइलॉसिंग स्पॉन्डिलाइटिस के कारण आंखों में भी समस्या हो सकती है। ऐसे में डॉक्टर आंखों की जांच भी कर सकते हैं। फिजिकल थेरेपिस्ट की मदद के साथ ही व्यायाम और पौष्टिक आहार बीमारी के लक्षणों कम करने में मदद करता है।

मसक्यूलोस्केलेटल पेन (Musculoskeletal Pain)

मसक्यूलोस्केलेटल पेन के कारण बोंस, मसल्स, लिगामेंट, टेंडन और नर्व प्रभावित होती हैं। लोअर बैक पेन को कॉमन मसक्यूलोस्केलेटल पेन माना जाता है। फाइब्रोमयाल्जिआ (fibromyalgia) कंडीशन में दर्द पूरे शरीर में फैल सकता है। मसक्यूलोस्केलेटल पेन का मुख्य कारण बोंस, जॉइंट्स , टेंडन या लिगामेंट इंजरी हो सकता है। कार एक्सीडेंट या स्पोर्ट्स इंजरी भी मसक्यूलोस्केलेटल पेन का कारण बन सकती है। मसक्यूलोस्केलेटल पेन के लक्षण इंजरी के स्थान पर स्पष्ट दिख सकते हैं। जानिए मसक्यूलोस्केलेटल पेन के दौरान क्या लक्षण दिखाई देते हैं।

  • स्टिफनेस
  • सोरनेस
  • सूजन
  • रेडनेस
  • जॉइंट्स में क्रैकिंग
  • मूवमेंट में दिक्कत
  • कमजोरी का एहसास
  • मांसपेशियों में ऐंठन

फिजिकल थेरिपिस्ट मसक्यूलोस्केलेटल पेन से राहत दिलाने में मदद कर सकता है। डॉक्टर पहले जांच करते हैं कि व्यक्ति को किस कारण से मसक्यूलोस्केलेटल पेन हो रहा है। फिर बीमारी के अनुसार ही डॉक्टर मेडिकेशन, हैंड ऑन थेरिपी, अल्टरनेटिव थेरिपी, कुछ डिवाइस यूज करने की सलाह या फिर सर्जरी की सलाह दे सकते हैं।मसक्यूलोस्केलेटल पेन से बचने का बेहतर उपाय ये भी है कि आप आइस या हीट पैक का इस्तेमाल सिकाई के लिए करें। बर्फ सूजन की समस्या को कम करने का काम करता है। कॉग्नेटिव बिहेवियरल थेरिपी (Cognitive behavioral therapy) की हेल्प से पेन मैनेज करने के बारे में जानकारी मिल सकती है। आप इस बारे में अधिक जानकारी के लिए डॉक्टर से संपर्क करें।

और पढ़ें : टांगों में दर्द का आयुर्वेदिक इलाज क्या है? टांगों में दर्द होने पर क्या करें और क्या ना करें?

मायालजिया (Myalgia)

मायालजिया
मायालजिया

मसल्स में पेन यानी दर्द को मायालजिया(Myalgia)कहते हैं। ये शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है। इंजुरी या ओवरएक्जर्शन के कारण मायालजिया की समस्या हो सकती है। मसल्स में पेन एक स्थान से दूसरे स्थान में फैल सकता है। अगर चोट गहरी है, तो मसल्स पेन अधिक हो सकता है। मसल्स पेन क्रॉनिक कंडीशन फाइब्रोमायल्गिया ( fibromyalgia)का कारण बन सकता है। जानिए मायालजिया की समस्या होने पर क्या लक्षण दिखाई पड़ते हैं।

  • टेंडरनेस
  • सूजन
  • लालिमा
  • बुखार

मसल्स पेन कई कारणों से हो सकता है। इलेक्ट्रोलाइट इम्बैलेंस, मेडिकेशन साइड इफेक्ट, मसल्स रप्चर, टेंशन, वायरल इंफेक्शन आदि मसल्स पेन का कारण बन सकते हैं। डॉक्टर मसल्स पेन का कारण जानने के लिए जांच करेंगे और फिर उपचार करेंगे।

जानिए किन कारणों से होता है बोन फ्रैक्चर(Bone Fractures)?

बोन फ्रैक्चर
बोन फ्रैक्चर

बोन फ्रैक्चर से मतलब हड्डियों के टूटने से है। हड्डी कई कारणों से टूट सकती है। स्पोर्ट्स इंजुरी, कार एक्सीडेंट, ऊचांई से गिरने या फिर पैर के फिसले आदि कारणों से हड्डी टूट सकती है। हड्डी टूटने के कारण दर्द होता है और इसे ठीक होने में भी समय लगता है। फैक्चर के कारण बोंस दो भागों में बंट सकती हैं।फैक्चर को ठीक करने के कई तरीके होते हैं। डॉक्टर फैक्टर के प्रकार के अनुसार ही ट्रीटमेंट देते हैं।

फैक्चर के कुछ प्रकार जैसे कि ओपन फैक्चर, कंप्लीट फैक्चर, डिसप्लेस्ड फैक्चर, पार्शियल फैक्चर, स्ट्रेस फैक्चर, स्पाइरल फैक्चर, कंप्रेशन फैक्चर आदि फैक्चर के कुछ प्रकार हैं। हड्डी किसी भी उम्र में टूट सकती है। सावधानी आपको बोन फ्रैक्चर से बचा सकती है। जिन लोगों को ऑस्टियोपोरोसिस (osteoporosis) की समस्या होती है, उन लोगों को बोन फैक्चर आसानी से हो जाता है।ऑस्टियोपोरोसिस की बीमारी में हड्डयां कमजोर हो जाती हैं और जरा से झटके से टूट सकती हैं। बोन फ्रैक्चर होने पर निम्न लक्षण दिख सकते हैं।

  • फैक्चर वाले अंग को उठाने में कठिनाई
  • अधिक दर्द
  • सूजन
  • टूटी हड्डी का उभार दिखना

बोन फैक्चर होने या हड्डी टूटने पर डॉक्टर आपकी जांच करेंगे और कारण पूछेंगे। डॉक्टर एक्स-रे के माध्यम से फैक्चर को डायग्नोज करेंगे। डॉक्टर एमआरआई भी कर सकते हैं। डॉक्टर टूटी हड्डी को जोड़ेगे और कुछ दिनों तक उस स्थान को न हिलाने की सलाह देंगे। डॉक्टर हड्डी जोड़ने के बाद उस पर प्लास्टर चढ़ाएंगे। दर्द को कम करने के लिए आपको मेडिसिन्स दी जाएगी। हड्डियों को मजबूत बनाने के लिए खाने में विटामिन सी और विटामिन डी की भरपूर मात्रा लें। रोजाना एक्सरसाइज हड्डियों को मजबूत बनाने का काम करती है। आप वॉक, रनिंग, डांसिंग और वेट ट्रेनिंग के माध्य से बोंस को स्ट्रॉन्ग बना सकते हैं।

जानिए क्या होती हैं जॉइंट और टेंडन डिजीज (Joint and tendon diseases)

दो या दो से अधिक बोंस जब एक स्थान में मिलती हैं, तो उसे जॉइंट कहा जाता है। नी, हिप, एल्बो, शोल्डर आदि जॉइंट हैं, जिनमे इंजुरी या डिजीज हो सकती है। वहीं टेंडन्स थिक फाइबर होते हैं, जो मसल्स को बोंस से जोड़ने का काम करते हैं। कई बार थिक फाइबर किन्हीं कारणों से ब्रेक हो जाते हैं, जो टेंडन डिजीज का कारण बनते हैं। जानिए जॉइंट और टेंडन डिजीज के बारे में अधिक जानकारी।

बसाइटिस (Bursitis)

बसाइटिस (Bursitis) पेनफुल कंडीशन है, जिसके कारण स्मॉल, फ्लूड- फिल्ड सेक बर्सी ( bursae)प्रभावित होती है। बर्सी जॉइंट्स की हड्डियों, टेंडन और मसल्स को कुशन करने का काम करती है। जब बर्सी में सूजन की समस्या हो जाती है, तो बसाइटिस की समस्या हो जाती है। घुटने, एड़ी और पैर की उंगली में बर्साइटिस की समस्या हो सकती है। प्रॉपर ट्रीटमेंट की हेल्प से बसाइटिस की समस्या को हफ्ते भर में ठीक किया जा सकता है।

जॉइंट डिसलोकेशन (joint dislocation)

जॉइंट की इंजरी के कारण जॉइंट डिसलोकेशन की समस्या होती है। जब जॉइंट्स की पुजिशन अधिक फोर्स के कारण चेंज हो जाए, तो उसे जॉइंट डिसलोकेशन कहा जाता है। शोल्डर और फिंगर में जॉइंट डिसलोकेशन की समस्या अधिक होती है। उस स्थान में सूजन और दर्द का अधिक एहसास होता है। ऐसी घटना स्पोर्ट्स जैसे कि फुटबाल, हॉकी आदि में अधिक देखने को मिलती है।

टेंडनाइटिस (Tendinitis)

टेंडन लिगामेंट होते हैं। टेंडन का संयोजन कोलेजन से होता हैं। टेंडन टिशू मसल्स को बोंस से जोड़ने का काम करते हैं। किन्हीं कारणों से टेंडन सूजन या जलन हो जाती है, तो उसे टेंडनाइटिस कहा जाता है। टेंडनाइटिस की समस्या कोहनी, कंधों, रिस्ट या घुटने में हो सकती है। टेंडनाइटिस के कारण प्रभावित स्थान में अचानक से दर्द का एहसास हो सकता है। टेंडनाइटिस इंजुरी के कारण हो सकती है। आपको इस समस्या से बचने के लिए किसी भी काम को सावधानी से करने की जरूरत है, ताकि चोट न लगे।

रप्चर्ड टेंडन ( Ruptured Tendon)

फाइबरस टिशू टेंडन में अधिक फोर्स रप्चर्ड टेंडन का कारण बन सकता है। ऐसा अधिक वजन उठाने के कारण या फिर अधिक वजन गिरने के कारण भी हो सकता है। रप्चर्ड टेंडन सीरियस प्रॉब्ल है, जो परमानेंट डिसएबिलिटी का कारण भी बन सकती है। रप्चर्ड टेंडन के लक्षणों के आधार पर उसका ट्रीटमेंट सर्जरी के माध्यम से या फिर अन्य मेडिकेशन से किया जाता है।

टेनिस एल्बो (Tennis elbow)

टेंडन में सूजन टेनिस एल्बो (Tennis elbow)का कारण बन सकती है। टेनिस एल्बो के कारण कोहनी में सूजन आ जाती है। ये समस्या किसी भी व्यक्ति को हो सकती है। ये जरूरी नहीं है कि टेनिस एल्बो की समस्या केवल खिलाड़ियों को ही हो। एक या दो फिंगर का यूज अधिक करने वाले लोगों को भी टेनिस एल्बो की समस्या हो सकती है। टाइपिंग, वेट लिफ्टिंग, टेनिस, क्रिकेट, पेंटिंग आदि के कारण भी कोहनी में दर्द की समस्या हो सकती है। जो लोग भारी सामान को अचानक से उठाते हैं, उन्हें भी कोहनी में दर्द की समस्या हो सकती है। डॉक्टर इस समस्या से उबरने के लिए ओवर-द-काउंटर मेडिसिन्स लेने की सलाह दे सकते हैं।

कार्पल टनल सिंड्रोम(Carpal Tunnel Syndrome)

जब हाथ या फिर कलाई में किन्हीं कारणों से नस दब जाती है, तो कार्पल टनल सिंड्रोम की समस्या उत्पन्न हो जाती है। कार्पल टनल सिंड्रोम के कारण हाथों में झुनझुनी का एहसास हो सकता है। साथ ही रिस्ट यानी कलाई में दर्द भी हो सकता है। जो लोग हाथों की कलाई का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं, उन्हें कार्पल टनल सिंड्रोम (Carpal Tunnel Syndrome) होने की अधिक संभावना रहती है। इस कारण से नींद न आने की समस्या भी हो सकती है।

हड्डियों की बीमारी या बोन डिजीज क्या है( Bone diseases)?

हड्डियां शरीर को गति, आकार और सहारा देती हैं। बोंस लीविंग टिशू हैं, जो जीवनभर बनती हैं।जब किन्हीं कारणों से हड्डियों में विषमता पाई जाए, तो उसे हड्डी की बीमारी यानी बोन डिजीज कहते हैं। बोन डिजीज के कारण हड्डियां कमजोर हो सकती हैं। कम उम्र में हड्डियां मजबूत होती हैं लेकिन उम्र बढ़ने के साथ ही हड्डियां कमजोर होने लगती हैं। अगर शरीर पर ध्यान न दिया जाए, तो हड्डियों की कमजोरी परेशानी का कारण बन सकती है। जानिए बोंस डिजीज कितने प्रकार की हो सकती है।

बोंस डेंसिटी कम होने के कारण होता है ऑस्टियोपीनिया ( Osteopenia)

जब बोंस डेंसिटी में कमी आ जाती है, तो ऑस्टियोपीनिया ( Osteopenia)की समस्या पैदा होने लगती है। जब बोंस को पर्याप्त मात्रा में मिनिरल्स नहीं मिल पाते हैं, तो हड्डियां पतली हो जाती है। इस कारण से हड्डी टूटने का खतरा भी बढ़ जाता है। ये बीमारी माता-पिता से बच्चों को मिल सकती है।ऑस्टियोपीनिया की बीमारी से बचने के लिए डायट में कैल्शियम और विटामिन-डी की उचित मात्रा को शामिल करना चाहिए। इस बीमारी के लक्षण आमतौर पर दिखाई नहीं पड़ते हैं। डॉक्टर बॉडी मिनरल डेंसिटी (BMD)की सहायता से जांच कर ऑस्टियोपीनिया के बारे में पता लगा सकते हैं।

विटामिन डी की कमी से होता है ओस्टियोमलेशिया ( Osteomalacia)

ओस्टियोमलेशिया ( Osteomalacia) हड्डियों से जुड़ी बीमारी है। इस बीमारी का कारण हड्डियों में विटामिन डी की कमी हो जाता है। इस कारण से बोंस सॉफ्ट हो जाती हैं। एडल्ट में होने वाली इस बीमारी के कारण हड्डियां बहुत नाजुक हो जाती हैं और हल्के झटके में टूटने का खतरा बढ़ जाता है। प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं में ओस्टियोमलेशिया डिजीज की संभावना बढ़ जाती है। इस बीमारी के कारण हाथ-पैरों में झुनझुनाहट का एहसास हो सकता है। विटामिन डी हड्डियों की मजबूती के लिए बहुत जरूरी है। सूर्य के माध्यम से विटामिन डी आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। इस बीमारी से बचने के लिए विटामिन डी के साथ ही जरूरी मिनिरल्स भी लेने चाहिए।

बच्चों में कमजोर हड्डियों के कारण बनता है रिकेट्स (Rickets)

रिकेट्स कंडीशन के कारण बच्चों की बोंस कमजोर, सॉफ्ट हो जाती हैं। इस कारण से बच्चों के पैर टेढ़ापन, बोंस पेन, बड़ा सिर आदि समस्याएं हो सकती हैं। बच्चों को रिकेट्स की समस्या के कारण बोंस फैक्चर, मांसपेशियों में ऐंठन, स्पाइन का अलग आकार या डिसएबिलिटी आदि का सामना करना पड़ता है। शरीर में पर्याप्त मात्रा में विटामिन डी और कैल्शियम की कमी के कारण रिकेट्स रोग होता है।

पगेट सिंड्रोम ( Paget’s syndrome)

जब बोंस के नए टिशू धीरे-धीरे पुराने बोंस टिशू को बदल देते हैं, तो पगेट सिंड्रोम की समस्या उत्पन्न होती है। इस कारण से हड्डियां नाजुक हो जाती हैं।ये समस्या पेल्विस, स्कल, स्पाइन और पैरों की हड्डियों में मुख्य रूप से पाई जाती है। उम्र बढ़ने के साथ ही बीमारी का खतरा भी बढ़ता जाता है। हड्डियों का टूटना, सुनने की क्षमता में कमी आना इस सिंड्रोम के लक्षण हैं।

एकोंड्रोप्लेजिया (Achondroplasia)

एकोंड्रोप्लेजिया डिसऑर्डर के कारण कार्टिलेज परिवर्तन बाधित होता है। इसे बोंस ग्रोथ डिसऑर्डर भी कहा जाता है। ये मुख्य रूप से हाथों और पैरों की हड्डियों में परेशानी पैदा करता है। इस कारण से लंबाई अधिक नहीं बढ़ पाती है। एल्बो में कम मोशन, बड़ा सिर, छोटी फिंगर आदि लक्षण दिखाई पड़ते हैं।

ऑस्टियोजेनेसिस इम्परफेक्टा ( Osteogenesis imperfecta)

ऑस्टियोजेनेसिस इम्परफेक्टा को ब्रिटल बोन डिजीज भी कहते हैं। ये जेनेटिक डिसऑर्डर डिजीज है, जो हड्डियों को प्रभावित करती है। इस कारण से हड्डियां आसानी से टूट जाती हैं। टाइप 1 कोलेजन में डिफेक्ट के कारण ऑस्टियोजेनेसिस इम्परफेक्टा की समस्या उत्पन्न होती है।

ऑस्टियोमाइलाइटिस ( Osteomyelitis)

ऑस्टियोमाइलाइटिस बोंस का इन्फेक्शन है।ऑस्टियोमाइलाइटिस के कारण हड्डियों में दर्द की समस्या होती है। फीवर के साथ ही व्यक्ति को कमजोरी का एहसास भी होता है। बच्चों में हाथ-पैरो में और एडल्ट में फीट, स्पाइन और हिप्स में ऑस्टियोमाइलाइटिस इन्फेक्शन पाया जाता है। ऑस्टियोमाइलाइटिस इन्फेक्शन स्टेफिलोकोकस बैक्टीरिया के कारण होता है।

ऑस्टियोपोरोसिस ( Osteoporosis)

ऑस्टियोपोरोसिस ( Osteoporosis) के कारण बोंस वीक हो जाती हैं। ऑस्टियोपोरोसिस कंडीशन के कारण शरीर की हड्डियां धीमे-धीमे कमजोर होने लगती हैं। अचानक से धक्का लगने पर बोंस फैक्चर भी हो जाता है। पहले हड्डियों की डेंसिटी कम होती है और फिर बोंस टूटना शुरू होती हैं। महिलाओं में मेनोपॉज के बाद ऑस्टियोपोरोसिस कंडीशन देखने को मिलती है।

और पढ़ें : विटामिन डी की कमी को कैसे ठीक करें?

बोंस को रखना है मजबूत तो डायट में शामिल करें ये फूड्स (Food for healthy bones)

हेल्दी बैलेंस्ड डायट अपनाकर बोंस को मजबूत बनाया जा सकता है। अगर कम उम्र से ही बोंस की देखभाल की जाए, तो पूरी जिंदगी आपकी हड्डियां मजबूत बनी रहेंगी। बोंस को मजबूत रखने के लिए सिर्फ कैल्शियम की जरूरत नहीं होती है। कैल्शियम के साथ ही विटामिन डी भी बहुत जरूरी होता है। विटामिन डी कैल्शियम को अवशोषित करने का काम करता है। जानिए हड्डियों को मजबूत करने के लिए क्या खाना चाहिए?

आहार में शामिल करें कैल्शियम फूड्स

  • दूध, पनीर और अन्य डेयरी
  • हरी पत्तेदार सब्जियां, ब्रोकोली, गोभी और भिंडी
  • सोयाबीन
  • टोफू
  • सोया ड्रिंक्स कैल्शियम के साथ
  • नट्स
  • फोर्टिफाइड फ्लोर से बनी ब्रेड

विटामिन डी के लिए फूड्स

  • ऑयली फिश( सैलमन, सार्डिन और मैकेरल)
  • अंडे
  • फोर्टिफाइड फैट स्प्रेड्स
  • फोर्टिफाइड ब्रेकफास्ट सीरियल्स
  • पाउडर मिल्क

अगर आप खाने में कैल्शियम और विटामिन से भरपूर भोजन लेगें, तो आपकी बोंस हमेशा मजबूत रहेंगी। अगर आपको डॉक्टर ने कैल्शिय सप्लीमेंट लेने की सलाह दी है, तो उसका रोजाना सेवन करें।

ये फूड कर सकते हैं हड्डियों को कमजोर

कुछ फूड आपकी बोंस को वीक करने का काम भी करते हैं। आपको चाय या फिर कॉफी अधिक नहीं पीनी चाहिए। साथ ही चॉकलेट ज्यादा खाना भी आपकी बोंस को कमजोर कर सकता है। बच्चों से लेकर बड़ों तक के पसंदीदा सॉक्ट ड्रिंक्स शरीर से कैल्शियम को कम करते हैं। इस कारण से बोंस वीक हो सकती हैं। अगर आप खाने में दिए गए फूड्स की मात्रा को सीमित कर देंगे, तो ये आपकी हड्डियों की सेहत के लिए बेहतर होगा।

हड्डियों को मजबूत रखने के लिए करें ये एक्सरसाइज ( Bones Exercises)

हड्डियों को मजबूत रखने के लिए पौष्टिक आहार के साथ ही व्यायाम भी बहुत जरूरी है। कुछ व्यायाम आपकी बोंस को स्ट्रेंथ देते हैं। अगर आप रोजाना कुछ समय एक्सरसाइज करेंगे, तो आपकी हड्डियां मजबूत रहेंगी। उम्र बढ़ने के साथ ही महिलाओं और पुरुषों की हड्डियां कमजोर होने लगती हैं। ऐसे में बोंस फैक्चर का खतरा भी बढ़ जाता है। जानिए कौन सी एक्सरसाइज हड्डियों को मजबूत बनाने का काम करती हैं?

महिलाओं के लिए बोंस एक्सरसाइज

आप फूट स्टंप्स ( Foot stomps),बायसेप्स कर्ल्स (Bicep curls),शोल्डर लिफ्ट ( Shoulder lifts), हैमस्ट्रिंग कर्ल (Hamstring curls), हिप लैग लिफ्ट (Hip leg lifts), स्क्वाट (Squats), बॉल सिट ( Ball sit), स्टैंडिंग ऑन वन लेग (Standing on one leg) आदि एक्सरसाइज कर सकती हैं। अगर आपको हड्डियों से संबंधित कोई समस्या है, तो बेहतर होगा कि आप एक्सपर्ट से राय लेने के बाद ही एक्सरसाइज करें। बोंस के कमजोर होने पर कुछ एक्सरसाइज आपको हार्म भी पहुंचा सकती हैं। बेहतर होगा कि आप बिना सलाह के व्यायाम न करें।

पुरुषों के लिए बोंस एक्सरसाइज

पुरुष लोग बोंस एक्सरसाइज में वेट बियरिंग एक्सरसाइज (Weight-Bearing Exercise) कर सकते हैं। वेट बियरिंग एक्सरसाइज में ब्रिस्क वॉकिंग (Brisk walking), रनिंग, डांसिंग, जंपिंग रोप, पिकलबॉल, स्पोर्ट्स में बास्केटबॉल, सॉकर्स, वॉलीबॉल आदि कर सकते हैं। महिलाएं और पुरुष दोनों ही हड्डियों को मजबूत करने के लिए कॉमन एक्सरसाइज कर सकते हैं। आप एक्सपर्ट से राय लेने के बाद ही एक्सरसाइज करें।

कमजोर हड्डियों के साथ जीना बहुत मुश्किल है। अगर बचपन से ही बोंस स्ट्रेंथ पर ध्यान दिया जाए, तो बोंस डिजीज का खतरा कम किया जा सकता है। हम उम्मीद करते हैं कि आपको इस आर्टिकल के माध्यम से मसक्यूलोस्केलेटल सिस्टम के बारे में जानकारी मिल गई होगी। आप अधिक जानकारी के लिए डॉक्टर से संपर्क कर सकते हैं। आप स्वास्थ्य संबंधि अधिक जानकारी के लिए हैलो स्वास्थ्य की वेबसाइट विजिट कर सकते हैं। अगर आपके मन में कोई प्रश्न है, तो हैलो स्वास्थ्य के फेसबुक पेज में आप कमेंट बॉक्स में प्रश्न पूछ सकते हैं।

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सूत्र

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Bhawana Awasthi द्वारा लिखित आखिरी अपडेट 17/08/2021 को
डॉ. प्रणाली पाटील के द्वारा मेडिकली रिव्यूड
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