बच्चों में पिनवॉर्म की समस्या और इसके घरेलू उपाय

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अपडेट डेट जुलाई 21, 2020 . 5 मिनट में पढ़ें
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विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमान के मुताबिक दुनिया भर में 30 फीसदी से अधिक बच्चों में पिनवॉर्म की समस्या देखी जाती है। ये छोटे और सफेद रंग के होते है, जो दिखने में धागे जैसे दिखाई देते हैं। बच्चों में पिनवॉर्म काफी आम होती है। खासकर नवजात शिशुओं और पांच से दश साल की उम्र के बच्चों में। हालांकि, अगर समय रहते बच्चों में पिनवॉर्म के लक्षणों को नजरअंदाज किया जाए, तो यह गंभीर स्थिति भी बन सकती है।

बच्चों में पिनवॉर्म की समस्या क्या है?

बच्चों में पिनवॉर्म की समस्या पेट के कीड़ों से जुड़ी होती है। बच्चों के पेट में ये कीड़े सफेद रंग के होते हैं जिनकी लंबाई आधे इंच से डेढ़ तक हो सकती है। यह कीड़े मलाशय के पास अंडे देते हैं और संक्रमण को बढ़ावा देने का कारण भी बनते हैं। बच्चों के पेट में कीड़े की समस्या को काफी आसानी से दूर किया जा सकता है। अधिकतर मामलों में डॉक्टर की खास सलाह की भी जरूरत नहीं होती है।

बच्चों में पिनवॉर्म की समस्या का कारण क्या है?

एक प्रकार के संक्रमण से पिनवॉर्म आंत में पनपते हैं और वहीं से शरीर में संक्रमण फैलता हैं। पेट के इन कीड़ों को मेडिकल भाषा में एंटोबियस वर्मीक्यूलरिस कहा जाता है। बच्चों में पिनवॉर्म बच्चे के द्वारा खाए जाने वाले आहार पर खुद को पोषित करके जिंदा रखते हैं और धीरे-धीरे शरीर को संक्रमित करते रहते हैं। बच्चों के साथ-साथ यह वयस्कों में भी हो सकती है। इसकी संभावना अधिक है कि अगर कोई व्यक्ति या बच्चा संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में रहे तो उसे भी पेट में कीड़े होने की समस्या हो सकती है। संक्रमित व्यक्ति के सोने पर मादा पिनवॉर्म, आंत से निकल कर मलाशय के आसपास की त्वचा पर अंडे देती हैं, जिससे  उस हिस्से में खुजली की भी समस्या होती है। जहां पर खुजली करने के दौरान इन कीड़ों के अंडे नाखूनो डमें चिपक सकते हैं, जो कई तरीकों से शरीर से अन्य लोगों में भी फैल सकता है, जिसमें शामिल हैंः

  • संक्रमित बच्चे या वसस्क द्वारा बाथरूम का इस्तेमाल करने के बाद हाथों को अच्छी तरीके न धोना
  • गंदे हाथों से, खिलौनों या अन्य चीजों को छुना या भोजन करना
  • जिस बच्चों में पिनवॉर्म की समस्या हो उसके कपड़े या बिस्तर का इस्तेमाल करना
  • इसके अलावा प्रदूषिक हवा और संक्रमित भोजन-पानी भी बच्चों में पिनवॉर्म का कारण बन सकता है।

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बच्चों में पिनवॉर्म के लक्षण क्या हैं?

बच्चों में पिनवॉर्म के लक्षण पता लगाने के लिए आप निम्न लिखित बातों को नोटिक कर सकते हैं, जिनमें शामिल हैंः

  • बार-बार मलाशय के आस-पास खुजली करना
  • बच्चे का बहुत चिड़चिड़ा होना
  • बिना बात के गुस्सा करना
  • बच्चे को सोने में समस्या होना
  • घबराहट होना
  • बेचैनी होना

बच्चों में पिनवॉर्म के लक्षण गंभीर कब हो सकते हैं?

अगर नीचे बचाए गए लक्षण आपके बच्चे में दिखाई देते हैं, तो बच्चों में पिनवॉर्म की समस्या गंभीर स्थिति हो सकती है, जिनमें शामिल हैंः

  • पेट दर्द होना
  • मल त्याग करते समय खून आना
  • बुखार होना
  • बच्चे की भूख में कमी होना
  • पोषित आहार के बाद भी लगातार बच्चे का वजन कम होना

निम्न स्थितियों में आपको जल्द से जल्द डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए और उचित उपचार करवाना चाहिए।

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बच्चे के शरीर को पिनवॉर्म कैसे प्रभावित करता है?

बच्चों में पिनवॉर्म की समस्या को गंभीर स्थिति नहीं मानी जाती है। आमतौर पर साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखकर इस समस्या से राहत पाई जा सकती हैं। हालांकि, अगर बच्चे के पेट में कीड़ा लंबे समय तक रहता है, तो इससे बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित हो सकता है, जिसमें शामिल हैंःॉ

कुपोषित होना

ये परजीवी कीड़े आंतों से खून बहने का कारण बनते हैं और पोषक तत्वों को खाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं, जिसके कारण पोषक तत्वों की कमी हो जाती है और बच्चों में दुर्बलता आ जाती है। इसकी स्थिति में इसकी पूरी संभावना हो सकती है कि बच्चे के पटे में एक दो नहीं बल्कि इन पेट के कीड़ों का एक गुच्छा हो सकता है। ऐसे में बच्चा जो भी खाएगा, वो कीड़ों का आहार बनता है। जिससे बच्चे के शरीर को पोषित होने के लिए उचित आहार नहीं मिलता है और बच्चा शारीर रूप से कमजोर होने लगता है। बच्चे का वजन भी तेजी से घटने लग सकता है। हड्डियां भी कमजोर होने लगती हैं।

इम्यून सिस्टम कमजोर होना

शरीर को उचित मात्रा में आहार मिलने और पेट के कीड़ों के कारण लगातार संक्रमित होने के कारण बच्चे का इम्यून सिस्टम भी कमजोर होने लगता है। जिससे बच्चे को अन्य बीमारियां होने का खतरा भी अधिक बढ़ जाता है। इसके कारण बच्चा सीजनल बीमारियों की चपेट में अधिक आ सकता है।

मानिसक समास्याएं

लगातार बीमार रहने और कमजोर होने के कारण बच्चा काफी सुस्त भी हो सकता है। जिसके कारण वो अपनी उम्र के बच्चों के दिमाग के मुकाबले काफी पीछे हो सकता है। साथ ही, किसी भी तरह का खेल खेलते समय बच्चे का बहुत जल्दी थक जाना, बहुत ज्यादा नींद आना, हमेशा चिड़चिड़ा रहने के कारण दूसरों बच्चों से झगड़ा करना भी शामिल हो सकता है।

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बच्चों में पिनवॉर्म का निदान कैसे किया जा सकता है?

बच्चों में पिनवॉर्म का निदान करने के लिए आपक बच्चे के मल का परीक्षण कर सकते हैं। अगर ऊपर बताए गए किसी भी तरह के लक्षण आपको बच्चे में दिखाई देते हैं, तो बच्चे के मल का निरीक्षण करें। अगर बच्चे के मल में सफेद रंग के छोटे-छोटे कीड़े दिखाई दें, तो आपको डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। इसके अलावा डॉक्टर आपको टेप टेस्ट का भी निर्देश दे सकते हैं।

टेप टेस्ट

टेप टेस्ट की प्रक्रिया बहुत ही आसान होती है। इसके लिए डॉक्टर आपको एक टेप देते हैं। सुबह सो कर उठने के बाद इस टेप को मलाशय के आसपास के हिस्सों पर लगाना होता है और फिर इसे हटा लेना होता है। इसके बाद भी टॉयलेट के लिए जाना होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि, मादा कीड़े बच्चे के सोते समय ही आंत से बाहर निकलकर मलाशय के आस-पास की त्वचा पर अंडे देती है। ऐसे में सो कर उठने पर वो अंडे टेप टेस्ट के दौरान टेप में चिपक जाएंगे। हालांकि, इस टेस्ट को लगातार तीन सुबह तक करना होता है। टेस्ट करने के बाद इन टेप को वापस डॉक्टर को टेस्ट की जांच करने के लिए दिया जाता है। जिसे डॉक्टर माइक्रोस्कोप के जरिए पिनवॉर्म के अंडे की जांच करते हैं और संक्रमण होने के कारणों की पुष्टि करते हैं।

बच्चों में पिनवर्म के लिए घरेलू उपचार

आमतौर पर बच्चों में पिनवॉर्म की समस्या से घरेलू उपचार से ही राहत पाई जा सकती हैं। जिसके लिए आप निम्न घेरलू उपचार अपना सकते हैंः

कच्चा लहसुन

कच्चे लहसुन को काटकर अपने बच्चे को खानें के लिए दें। वो इसे सादा या रोटी के साथ भी खा सकता है। इसके अलावा लहसुन का पेस्ट बनाएं फिर उसे बेस ऑयल या पेट्रोलियम जेली के साथ मिला कर बच्चे के मलाशय और इसके आसपास की त्वचा में लगा सकते हैं। लेकिन ध्यान रखें कि, इस तरह के घरेलू उपायों को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।

सेब का सिरका

सेब के सिरके में एंटी माइक्रोबियल गुण पाए जाते हैं, जो पिनवॉर्म को खत्म करने और दोबारा उन्हें पनपने से भी रोकते हैं। इसके एंटी माइक्रोबियल गुण पैरासाइट को खत्म करने में मददगार होते हैं। इसके लिए एक गिलास पानी में दो छोटे चम्मच सेब का सिरका मिलाकर बच्चे को पीने के लिए दें। इसका स्वाद बेहतर बनाने के लिए इसमें शहद भी मिला सकते हैं। इस घोल को दिन में दो बार पीने के लिए बच्चे को दें।

नारियल का तेल

नारियल के तेल में एंटी माइक्रोबियल गुण होते हैं, जो संक्रमण फैलाने वाले जीवाणु को पनपने से रोकते हैं। और इसके एंटी बैक्टीरियल गुण बैक्टीरिया खत्म करने में मदद करते हैं। इसके लिए आप खाना बनाने के लिए नारियल का तेल का इस्तेमाल कर सकते हैं और रात में सोते समय मलाशय और आसपास की त्वचा में नारियल तेल लगा सकते हैं। इससे खुजली और जलन में भी राहत मिलेगी।

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बच्चों के पेट में कीड़े होने पर इन बातों का भी ध्यान रखें

  • बच्चे को रोज सुबह अच्छे से नहलाएं। उसके मलाशय की त्वचा को भी अच्छे से साफ करें।
  • बच्चे के नाखूनों को छोटा और साफ रखें।
  • हर दिन अपने बच्चे को साफ कपड़ें और अंडरवियर पहनाएं।
  • हफ्ते में एक बार बच्चे के बिस्तर को धुलें। साथ ही, हर दिन बच्चे के बिस्तर को धूप में रखें।
  • बच्चे को हाईजीन के नियम बताएं। उसे हाथों को साफ रखने और शरीर की सफाई के बारे में बताएं।

हैलो हेल्थ ग्रुप चिकित्सा सलाह, निदान या उपचार प्रदान नहीं करता है

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