इन वजह से बच्चों का वजन होता है कम, ऐसे करें देखभाल

चिकित्सक द्वारा समीक्षित | द्वारा

अपडेट डेट अक्टूबर 6, 2020 . 5 मिनट में पढ़ें
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समय से पहले पैदा होने वाले शिशु का वजन कम होता है। कम वजन के शिशु को अक्सर कई स्ट्रगलर्स से गुजरना पड़ता है। कुछ शिशुओं का वजन जन्म से ही कम होता है। वहीं, कुछ बच्चों का वजन जन्म के बाद संपूर्ण पोषण ना मिलने के कारण कम होता है। दुनियाभर में यह एक बड़ी समस्या है। भारत में सालाना 33,41,000 बच्चों का जन्म समय से काफी पहले होता है। हर साल पांच वर्ष से कम उम्र के 3,61,600 बच्चों की मौत प्रीटर्म बर्थ से पैदा होने वाली समस्याओं के कारण हो जाती है। इन शिशुओं की देखभाल करना अपने आप में एक चुनौती होती है। आज हम इस आर्टिकल में कम वजन के शिशु की देखभाल, इसका कारण और लक्षणों के बारे में बताएंगे।

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शिशु को कम वजन का कब माना जाएगा?

जन्म से ही शिशुओं के स्वस्थ वजन का एक पैमाना होता है। इस पैमाने के अनुसार जन्म के वक्त शिशु का वजन 2.5-4.5 किलोग्राम होना चाहिए। हालांकि, जन्म के वक्त शिशुओं का औसतन वजन 3.5 किलोग्राम होता है। कम वजन के शिशुओं के पैदा होने के मामले बढ़ते जा रहे हैं। इसके पीछे असल वजह मल्टिपल प्रेग्नेंसी को माना जाता है। अमेरिका के चिल्डर्न्स हॉस्पिटल ऑफ फिलादेलफिया (Philadelphia) के मुताबिक, गर्भ में जुड़वा या इससे अधिक शिशुओं के होने पर इनका जन्म समय से पहले होता है। मल्टीपल प्रेग्नेंसी में आधे से अधिक शिशुओं का वजन कम होता है। वहीं, सिंगल प्रेग्नेंसी में यह आंकड़ा करीब 6 प्रतिशत होता है।

दूसरे बच्चों की तुलना में कम वजन के शिशु साइज में काफी छोटे होते हैं। इन शिशुओं का सिर सामान्य बच्चों की तुलना में काफी बड़ा दिखता है। इनके सिर से निचले हिस्से की बॉडी पतली और कमजोर होती है।

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दुनियाभर में कम वजन के शिशु के बढ़ते आंकड़े

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक, हर साल दुनियाभर में 1.5 करोड़ प्रीटर्म शिशुओं का जन्म होता है। हर 10 शिशुओं में से एक प्रीटर्म और कम वजन का होता है। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, 2015 में दुनियाभर में 1 करोड़ बच्चों की मौत प्रीटर्म से जुड़ी समस्याओं की वजह से हुई। विश्व में समय से पहले पैदा होने वाले बच्चों का 60 फीसदी हिस्सा अकेले एशिया में है।

मौजूदा समय में पांच वर्ष से पहले ही शिशु की मौत के पीछे प्रीमैच्योरिटी से जुड़ी समस्याएं सबसे बड़ा कारण है। कम वजन और प्रीमैच्योरिटी से शिशु को डिसेबिलिटी और आगे के जीवन में स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं होने का खतरा रहता है। करीब 85 प्रतिशत प्रीटर्म शिशुओं का जन्म 32 और 37 हफ्ते के गर्भाकाल के दौरान होता है।

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कम वजन वाले शिशु के लक्षण और विशेषताएं

  • इन बच्चों का नर्वस सिस्टम पूरी तरह से विकसित नहीं होता है।
  •  कम वजन वाले शिशुओं में ब्राउन फैट कम होता है। शिशुओं में गर्माहट को पैदा करने के लिए ब्राउन फैट बेहद ही जरूरी होता है। ब्राउन फैट कंधों, बैक, किडनी, गर्दन और बगलों के ऊपर होता है।
  • कम वजन के शिशु की बॉडी में लेटने पर ज्यादा मूवमेंट ना होने पर वो गर्माहट पैदा नहीं कर पाते हैं।
  • इन बच्चों के फेफड़ी पूरी तरह से विकसित नहीं होते हैं, जिसकी वजह से उन्हें सांस लेने में दिक्कत होती है।
  • इनकी इम्यूनिटी वीक होती है, जिसकी वजह से उन्हें संक्रमण का खतरा ज्यादा रहता है।
  • समय से पहले पैदा होने वाले शिशु की दिमाग की नसें पतली और अपरिपक्व होती हैं, जिसकी वजह से इनमें ब्लीडिंग का खतरा रहता है।

कम वजन के शिशुओं की देखभाल में सावधानी

कम वजन के शिशु की देखभाल करने वाली महिलाओं को हाइजीन और इंफेक्शन से बचने की विशेष हिदायत दी जाती है। इनकी देखभाल करने वाले लोगों को अपने हांथों को अच्छी तरह से वॉश करने चाहिए। बच्चे को उठाते-लेटाते वक्त भी पूरी तरह सतर्क रहना होगा। कम वजन के शिशु की त्वचा बेहद ही मुलायम और पतली होती है। जोर से पकड़ने से उसे चोट पहुंच सकती है और उस जगह पर इंफेक्शन हो सकता है।

कम वजन के शिशु की देखभाल क्यों जरूरी है?

कम वजन वाले शिशुओं में हाइपोर्थमिया (hypothermia), संक्रमण, सांस लेने में परेशानी और उनके अंगों के विकसित ना होने का खतरा रहता है। इन समस्याओं की वजह से शिशु बाहरी वातावरण को अपना नहीं पाते। इन कारणों से इन्हें मौत का खतरा रहता है। इन्हीं खतरों को देखते हुए कम वजन वाले शिशुओं को विशेष देखरेख की जरूरत पड़ती है।

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कम वजन के शिशु की देखभाल के तरीके

28-31 हफ्तों की अवधि में जन्म लेने वाले बच्चों का वजन 1.5 किलोग्राम से भी कम होता है। यदि ऐसे शिशु का जन्म घर पर हुआ है तो उसे तत्काल हॉस्पिटल में भर्ती कराना चाहिए।

स्तनपान और कप फीडिंग

कम वजन के शिशु और उसकी मां को पहले हफ्ते में अतिरिक्त देखभाल की जरूरत होती है। इस स्थिति में महिला के परिवार को उसे स्तनपान के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। विशेष रूप से स्तनपान तब तक कराया जाना चाहिए जब तक कि बच्चा अपने आप स्तनपान ना करने लगे।

34 और 36 हफ्तों के बीच पैदा होने वाले बच्चों को स्तनपान करने में कोई दिक्कत नहीं होती। जिन बच्चों का वजन कम होता है उन्हें स्तनपान करने में परेशानी आती है। इन बच्चों के लिए ब्रेस्टफीडिंग एक चुनौती होती है। इन शिशुओं को दिन और रात में हर दो घंटे बाद स्तनपान कराया जाना चाहिए।

34 हफ्ते की अवधि में पैदा होने वाला शिशु यदि ठीक से दूध नहीं पीता है तो उसे विशेष कप से फीडिंग कराई जाए। अतिरिक्त कम वजन वाले शिशु भी यदि खुद से स्तनपान कर लेते हैं तो फिर भी उन्हें भी कप से अतिरिक्त दूध पिलाया जाना चाहिए। कप से दूध पीने वाले हर बच्चे को उनके प्रति किलो वजन के हिसाब से 60ml मिल्क पिलाया जाना चाहिए।

स्तनपान कराने का तरीका

कम वजन के शिशु को स्तनपान कराने से पहले उसके होंठ पर दूध की कुछ बूंदे टपकाएं। शिशु के मुंह में निप्पल लगाने के बजाय पूरा ब्रेस्ट उसके मुंह में लगाएं। ऐसा करने से उसका माउथफुल होगा। ब्रेस्टफीडिंग के दौरान बीच में थोड़ा गैप दें। इससे शिशु को आराम करने के लिए समय मिलेगा। कम वजन वाले शिशु के लिए ब्रेस्टफीडिंग करना थोड़ा मुश्किल होता है।

कई बार ब्रेस्टफीडिंग के वक्त शिशु को खांसी या उल्टी आती है। इस स्थिति में दोबारा ब्रेस्टफीडिंग कराने से पहले उसे ठीक से सांस लेने का समय दें। यदि शिशु खुद से ब्रेस्टफीडिंग नहीं कर पाता है तो मां को अपने हांथ से ब्रेस्टफीडिंग करानी चाहिए। इसके लिए महिला को हैंड ब्रेस्टफीडिंग की तकनीक के बारे में जानकारी रखना जरूरी है। कम वजन के शिशु की बॉडी के लिए मौसम के अनुसार उचित तापमान बनाए रखें। मई-जून के महीने में उन्हें किसी चादर या कपड़े में लपेटने की जरूरत नहीं है।

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कम वजन के शिशु की देखभाल के लिए जरूर बातें

  • गर्दन, नैपी एरिया, उंगलियों और अंगूठों के आसपास हाइजीन का विशेष ध्यान रखें। शिशु की हल्की मसाज करें, लेकिन इसके एक घंटे बाद उन्हें नहला दें। ग्रामीण इलाकों में कुछ महिलाएं शिशु को बिना नहलाए प्रतिदिन सरसों के तेल से मालिश करती हैं। जो कि पूरी तरह से गलत है। इन बच्चों को रोजाना गुनगुने पानी से नहलाया जा सकता है।
  • शिशु को बाहर की प्रदूषित हवा के संपर्क में आने से बचाएं।
  • शिशु के कमरे को साफ और तरोताजा रखें।
  • कम से कम लोगों को शिशु के कमरे में आने दें।
  • शिशु के लिए कंगारू मदर केयर को यूज करें पिता भी इस थेरिपी का यूज कर सकते हैं। शिशु के जन्म के बाद उसे तुरंत ही सीने से चिपकाएं। इस तकनीक को कंगारू मदर केयर के नाम से जाना जाता है।
  • मां और शिशु को ढंकने के लिए अतिरिक्त चादर का इंतजाम होना चाहिए। शिशु के सिर को अच्छे से ढंका जाना चाहिए। कम वजन वाले शिशुओं के सिर को ना ढंकने से उनकी बॉडी की गर्माहट निकल जाती है।
  • कमरे में इन शिशुओं के लिए अतिरिक्त तापमान को बनाए रखने के लिए हीटर का इंतजाम होना चाहिए।
  • कम वजन के शिशु की डिलिवरी के दो दिन के बाद ही उन्हें नहलाना चाहिए। नहलाते वक्त हमेशा गुनगुने पानी का इस्तेमाल करें।

कम वजन के शिशु की देखभाल चुनौतीपूर्ण है लेकिन, कुछ विशेष सावधानियां बरतने पर यह काम आसान बन सकता है। यदि आपका बच्चा प्रीटर्म या उसका वजन कम है तो अब घबराए नहीं डॉक्टर से उसकी देखभाल के बारे में सही जानकारी प्राप्त करें।

हैलो हेल्थ ग्रुप चिकित्सा सलाह, निदान या उपचार प्रदान नहीं करता है

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