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World Women's Equality Day: जानें मल्टी टास्किंग महिलाओं का क्या सोचना है "विमेन इक्वैलिटी" को लेकर

World Women's Equality Day: जानें मल्टी टास्किंग महिलाओं का क्या सोचना है "विमेन इक्वैलिटी" को लेकर

समय बदला, लोगों के पहनावे के साथ उनका खानपान का तरीका भी बदला, अब लड़कियों को एज्युकेशन में भी लड़कों के बराबर अधिकार है। इतना ही नहीं अधिकतर जॉब सेक्टर में भी उनके लिए कई तरह की ऑपॉर्च्युनिटी उपलब्ध हैं। लेकिन फिर भी हर महिला को अपने जीवन में किसी न किसी मोड़ में यह महसूस हो ही जाता है कि आज भी लोग कहीं न कहीं पुरुषों और महिलाओं के बीच अंतर कर ही देते हैं। ये अंतर खासतौर पर छोटी-छोटी बातों में महसूस होता है, जिससे उनकी मेंटल हेल्थ प्रभावित होती है। अब उदाहरण के तौर पर कोरोना वायरस से बचाव के लिए लॉकडाउन को ही ले लीजिए। जब पुरुषों की तरह महिलाएं भी वर्क फ्रॉम होम में थीं और काफी जगाहों में अभी भी हैं। ऑफिस के काम का प्रेशर उन पर भी उतना ही है, जितना कि बाकी सब पर। उस दौरान लॉकडाउन के चलते सभी सदस्य घर पर ही थें, बल्कि जो जॉब के लिए बाहर थें वो भी घर पर लौट चुके थें। तो ऐसे में ब्रेकफास्ट से लेकर डिनर तक में सबकी अपेक्षाएं भी काफी थीं, जैसे कि हर संडे को महिलाओं से की जाती है कि आज वो घर पर हैं तो खाने में कुछ स्पेशल ही होगा। कुछ वर्किंग वूमन का मानना है कि 8 घंटे ऑफिस जाकर काम करना और फिर आकर घर संभालना उतना मुश्किल नहीं था, जितना कि वर्क फ्राॅम होम में ऑफिस टाइमिंग के दौरान ऑफिस के कामों के साथ वालों की जरूरतों का भी ध्यान रखना। देखा जाए तो इस लॉकडाउन में महिलाओं के ऊपर जिम्मेदारियां दोगुनी हो गई। जब कमाने वाले दोनों हैं, तो घर की जिम्मेदारी उठाने वाले दोनों क्यों नहीं।

अगर हम महिलाओं के जॉब की बात कर ही रहें है तो आज भी कई बार करियर ओरिएंटेड वूमन को जॉब सिर्फ इसलिए छोड़नी पड़ती है क्योंकि उसका पति या घर वाले नहीं चाहते हैं। ये छोटी-छोटी बातें उन्हें आज भी ये महसूस करवाती है कि लड़के और लड़कियों में फर्क किया जा रहा है। अगर लड़की खुद के लिए लड़ भी ले तो आज भी कई ऐसे जॉब सेक्टर हैं, जहां पर भी पुरुषों को ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है, खासतौर पर फैशन वलर्ड या ट्रेवलिंग संबंधित जॉब में। इसी तरह की स्थितियां कई बार महिलाओं के जीवन में आती हैं, जो उन्हें ये एसास दिलाती हैं कि तुम एक लड़की हो।

और पढ़ें : जानिए कैसी होनी चाहिए वर्किंग वीमेन डायट?

क्यों मनाया जाता है वूमन इक्वेलिटी डे

आज के समय में दुनियाभर में महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़कर अपना योगदान दे रही हैं। फिर चाहें बात राजनीति की हो या हो रॉकेट सांइस की। घर संभालने से लेकर बाहर अपनी एक पहचान बनाने वाली महिलाओं ने अपना एक अलग ही स्थान बनाया है। बावजूद इसके आज भी कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहां महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त नहीं हैं, जिसके लिए हर साल 26 अगस्त को महिला समानता दिवस को अंतराष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता है। 1920 में अमेरिकी संविधान में महिलाओं को वोट देने का आधिकार मिला था। इसी दिन की याद में महिला समानता दिवस मनाया जाने लगा। यह दिन महिलाओं और महिलाओं के अधिकारों के संघर्ष के लिए इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। हालांकि भारत में अभी भी महिला समानता के मायने अलग हैं। यहां अभी भी लोग महिलाओं को पुरुषों के समान दर्जा नहीं दे पाए हैं।

एक्सपर्ट की राय: वूमेन मेंटल हेल्थ ओर इक्वैलिटी पर

इस बारे में आर्यन ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल, मुंबई की डायरेक्टर डॉ.सुनीता दुबे का कहना है कि ” मैं एक डॉक्टर होने के साथ एक महिला भी हूं। मेरा मानना है कि आज भी महिलाओं के साथ कहीं न कहीं भेदभाव हो रहा है। भले ही हम वूमन इक्वैलिट की कितनी भी बात कर लें। जाे कि हम महिलाओं के मेंटल हेल्थ को हिला कर रख देती है। आज महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। हमने फैशन इंडस्ट्री से लेकर नौसेना तक में महिलाओं को झंडे गाड़ते देखा है। हालांकि सभी क्षेत्रों में महिलाओं के साथ होने वाले भेद-भाव के किस्से अक्सर सुनने को मिलते हैं।

आज भी क्षेत्र में महिलाओं को पुरुषों से कम सैलरी मिलना, आम बात हो गई है। हमारे देश में पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं के साथ अपराध का रेट भी बढ़ गया है। बलात्कार, दहेज हत्या और ऑनर किलिंग जैसे मामले तो आप अक्सर ही सुनते होंगे। ये अपराध हमारी सोच से भी ज्यादा तेजी से बढ़ रहे हैं। भारत में पुरुष प्रधानता इस कदर हावी है कि 21वीं सदी में भी लोग बेटे के जन्म की उम्मीद रखते हैं। बेटी होने पर उसे गर्भ में ही मरवा दिया जाता है। पेरेंट्स को ऐसा लगता है कि बूढ़े होने पर बेटा ही उनका सहारा बनेगा। हालांकि महिलाओं ने इस बात को भी गलत साबित कर दिया है।

इतना सब होने के बावजूद आज भी पेरेंट यह सोचते हैं कि बेटे की शादी करने पर उन्हें अच्छा-खासा दहेज मिलेगा। इसी के चलते दहेज मामले भी बढ़ते हैं। भारत में सेक्स अनुपात भी तेजी से बढ़ा है। साल 2011 में, भारत में हर 1000 लड़कों में 919 लड़कियां थीं। साल 2020 में भी यह आंकड़ा समान नहीं हो पाया है। अब यह आंकड़ा 108 लड़कों के बीच 100 लड़कियों तक जा पहुंचा है। ये आंकड़े भारतीय महिलाओं की हीन स्थिति को बयां करते हैं। इन सब बातों के बीच हम आपको उन महिलाओं के बारे में बताते हैं जिन्होंने अपने बुलंद हौसलों से पुरुषों को मात दे दी। इस कड़ी में आपको एक-दो नहीं सात महिलाओं की कहानी जानने को मिलेगी।”

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जानें क्या है माहिलाओं की राय वूमन इक्वैलिटी को लेकर

रिया शर्मा, सोशल वर्कर

दिल्ली की रहने वाली रिया शर्मा आज एक जाना-माना नाम बन चुकी हैं। रिया एक समाज सेविका हैं और साल 2017 में उन्हें UNICEF ग्लोबल गोल्स अवॉर्ड से नवाजा गया था। रिया एक एनजीओ चलाती हैं जिसका नाम Make Love Not Scars है। इस एनजीओ की शुरुआत साल 2014 में हुई थी। रिया ने यह एनजीओ एसिड अटैक पीड़ितों के लिए खोला। साथ ही, उन्होंने एसिड अटैक पीड़ितों के लिए विश्व का पहले पुनर्वास सेंटर का स्थापना की। 1992 में जन्मीं रिया बहुत छोटी सी उम्र में ही बड़ा मुकाम हासिल कर चुकी हैं। रिया ने एसिड अटैक पीड़ितों के लिए कुछ करने की उस वक्त ठानी थी जब वह कॉलेज के थर्ड ईयर में थीं।
उस वक्त रिया ने एसिड अटैक पीड़ितों पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी। इसी के बाद उन्हें इन पीड़ितों का साथ देने का ख्याल आया। रिया का यह एनजीओ पीड़ितों के इलाज, सर्जरी से लेकर उनके लिए कानूनी लड़ाई भी लड़ता है। इसके अलावा, रिया पीड़ितों का मानसिक तौर पर भी इलाज करवाती हैं। रिया का कहना है कि उनके जले हुए शरीर से ज्यादा गहरे घाव मन पर होते हैं। इस तरह के नाजुक हालात में रिया एसिड अटैक पीड़ितों को आत्म निर्भर बनाने की कोशिश करती हैं।

और पढ़ें : ये 7 आरामदायक सेक्स पोजीशन (पुजिशन) जिसे महिलाएं करती हैं पसंद

शालिनी गुप्ता, फैशन डिजाइनर( कायशा बाय शालिनी)

शालिनी गुप्ता एक फैशन डिजाइनर हैं। जब हमने इनसे वूमन इक्वैलिटी पर बात किया तो उनका कहना है कि “आज भी लड़के और लड़कियों के बीच भेदभाव है। फिर चाहें प्रोफैशनल लाइफ की बात हो या पर्सनल लाइफ की। क्या कभी किसी ने ये सोचा है कि ये भादभाव शुरू कहां से हुआ है। लड़के और लड़की में असमानता हमारे किचन से शुरू हुई है। मेरा मानना है कि पुरुषों के साथ-साथ कहीं न कहीं महिलाएं भी इसकी जिम्मेदार रही हैं। हमारी सास ने हमेशा हमें यही सिखाने की कोशिश की है कि किचन केवल बहू ही संभालेगी। बाहर नौकरी करने जाने देना उनकी तरफ से बहू के लिए एक छूट है। जो कि एक महिला द्वारा दूसरी महिला को मानसिक रूप से डाउन महसूस करवाना है। कभी उन्होंने ये क्यों नहीं सिखाया कि जब बहू और बेटे दोनों मिलकर कमाएंगे, तो किचन की जिम्मेदारी में भी दोनों ही मिलकर हाथ बटाएंगे। सबसे पहले तो ये सोच समाज से खत्म करनी चाहिए कि किचन केवल लड़िकयों की ही जिम्मेदारी होती है। इसके अलावा करियर की बात करें तो आज भी डिफेंस जैसे क्षेत्र में लड़कों को हो प्राथमिकता दी जाती है। ऐसे और भी कई क्षेत्र हैं। जिसकी वजह से कई बार लड़कियां काबिल होते हुए भी लड़कों से खुद को पीछे महसूस करती हैं। जो उनके मानिसक परेशानी की एक वजह है।”

सुप्रिया पॉल, जोश टॉक की शुरुआत की

क्या आपने जोश टॉक के बारे में सुना है? जी हां, जोश टॉक की शुरुआत सुप्रिया पॉल ने की थी। जोश टॉक एक ऐसा प्लैटफॉर्म है जहां लोग अपनी सफलता की कहानी सुनाते हैं। जोश टॉक में आने वाली सफल कहानी के वीडियो अक्सर वायरल होते हैं। साल 2018 में जोश टॉक की ओर से युवा वोटरों को जागरूक करने के लिए एक वर्कशॉप करवाई थी। इसमें 130 मिलियन नए युवा वोटरों को टारगेट किया गया था। इस वर्कशॉप की सफलता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि इसके शुरू के 15 वीडियो को 50 मिलियन यानी 5 करोड़ व्यू मिले थे।
सुप्रिया का कहना है, “जोश टॉक का मकसद उन युवाओं तक पहुंचना है जो देश की राजनीति को समझने से बहुत दूर हैं। आज-कल सब कुछ ऑनलाइन है इसलिए हमने युवाओं तक पहुंचने के लिए ऑनलाइन का रास्ता चुना। यह ऑफलाइन तरीकों से कहीं ज्यादा प्रभावशाली है।”

हैलो हेल्थ ग्रुप हेल्थ सलाह, निदान और इलाज इत्यादि सेवाएं नहीं देता।

लेखक की तस्वीर
Dr. Pranali Patil के द्वारा मेडिकल समीक्षा
Niharika Jaiswal द्वारा लिखित
अपडेटेड 26/08/2020
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