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अगर आपके ऑफिस में किसी को है क्रॉनिक डिजीज तो उसे ऐसे करें सपोर्ट

अगर आपके ऑफिस में किसी को है क्रॉनिक डिजीज तो उसे ऐसे करें सपोर्ट

हाल ही में कैंसर और करियर की ओर से किए शोध से पता चला है कि वर्कप्लेस में वैसे साथी कर्मचारी जो शारिरिक बीमारी से जूझ रहे हैं, उनके प्रति आफिस के 88 फीसदी कर्मी फिक्रमंद होते हैं। वहीं 89 फीसदी कर्मी ऐसा सपोर्टिव माहौल बनाते हैं जिससे क्रॉनिक बीमारी से लड़ने में साथी कर्मचारी का मनोबल हमेशा उंचा उठे। एक्सपर्ट बताते हैं कि क्रॉनिक बीमारियों से जूझ रहे कर्मचारियों की मदद कंपनियां कर सकती हैं। इसके लिए कंपनी के लीडर के साथ तमाम कर्मचारियों को क्रॉनिक डिजीज के बारे में जागरूक कर और साथी बीमार कर्मचारी से अच्छा अपनाने की सलाह देकर अच्छा आफिस में माहौल बनाया जा सकता है। आइए जानते हैं को वर्कर को सपोर्ट करने के लिए कुछ जरूरी टिप्स…

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नौकरी जाने का भी रहता है खतरा

किसी किसी की जिंदगी में अचानक एक ऐसा समय आ जाता है जब उसे किसी क्रानिक बीमारी के बारे में पता चलता है। जैसे ही उसे इस बीमारी का पता चलता है वो अंदर से टूट जाता है, वो अपनी जिंदगी की फिक्र के साथ उसे इस बात का भी डर रहता है कि कहीं उसकी नौकरी न चला जाए। वहीं इस समय यदि को वर्कर को सपोर्ट किया जाए तो वो बची जिंदगी को तनावमुक्त होकर बीमारी का डटकर सामना कर सकता है। वहीं यदि कोई उसकी मदद करने से इनकार कर दें तो ऐसा हो सकता है कि व्यक्ति तनाव ग्रसित हो जाए। यदि उस समय किसी को मदद न मिले तो उसके तनाव में जाने की संभावनाएं बढ़ जाती है।

मौजूदा समय में यूनाइटेड स्टेट्स में क्रॉनिक डिजीज के कारण सर्वाधिक मौतें होती हैं। वहीं यदि को वर्कर को सपोर्ट करने के लिए यदि वर्किंग कंडीशन में थोड़ा बदलाव किया जाए, सभी सपोर्ट करें तो मदद की जा सकती है। नेशनल इंस्टीट्यूट्ल आफ हेल्थ एंड द सेंटर आफ डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन की ओर से वर्कशाप भी कराया गया। इसमें क्रॉनिक डिजीज से बचाव को लेकर और वर्कप्लेस में को वर्कर को सपोर्ट करने संबंधी कई बातें बताई गई हैं। यदि उसे कोई फॉलो करेगा तो उससे न केवल साथी कर्मचारी की तबीयत में सुधार होगा, बल्कि वो बीमारी का निडर होकर सामना कर सकेगा।

एक नजर डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों पर

  • डब्ल्यूएचओ के आंकड़े बताते हैं कि सालाना 12.2 मीलियन लोग युवावस्था में ही नॉन कम्युनिकेबल डिजीज के कारण मर जाते हैं।
  • कई देशों में आधे से ज्यादा लोग इनफॉर्मल सेक्टर में काम करते हैं, जहां उन्हे किसी प्रकार की हेल्थ बेनीफिट नहीं दी जाती
  • बड़ी कंपनियों में कर्मचारियों को ऑक्यूपेशनल हेल्थ बेनीफिट दिया जाता है, वहीं समय समय पर उसकी निगरानी भी की जाती है। लेकिन यह भी सच है कि करीब 85% कर्मचारी छोटी कंपनियों, इनफॉर्मल सेक्टर, खेती, प्रवासी हैं। जिन्हें किसी प्रकार के ऑक्यूपेशनल हेल्थ कवरेज नहीं मिलती है।
  • ज्यादातर देशों में स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के कारण जीडीपी की 4-6 फीसदी की आर्थिक हानि होती है।
  • करीब 70 फीसदी कर्मचारियों के पास किसी प्रकार का कोई इंश्योरेंस नहीं है, यदि वो किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हो जाए या चोट लग जाए तो इलान नहीं करवा पाएंगे।
  • शोध यह पताते हैं कि वर्कप्लेस में यदि स्वास्थ्य संबंधी अच्छी सेवाएं दी जा रही है उस स्थिति में लोग 27 फीसदी कम बीमार पड़ते हैं वहीं करीब 26 फीसदी हेल्थ से संबंधित खर्च बचता है

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काफी मुश्किल हो जाता है कुछ भी कहना

जहां तक को वर्कर को सपोर्ट करने की बात है तो यदि इस बात का हमको पता चल जाए कि हमारा को वर्कर किस क्रॉनिक बीमारी से पीड़ित है तो उस स्थिति में यह काफी उलझन भरा हो जाता है कि उससे क्या और कैसे कहें। कैंसर एंड करियर की एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर रेबेका निल्स बताती हैं किक्रॉनिक डिजीज से ग्रसित को वर्कर को सपोर्ट करने की जहां तक बात है तो यदि आप भी उस स्थिति से गुजर चुकें हो तो उसे सपोर्ट करना काफी आसान हो जाता है। आप उसे सही व गलत की सलाह दे सकते हैं। कई मामलों में ऐसा करके भी आप उसपर अतिरिक्त प्रेशर बनातेहैं। नेल्स कैंसर से पीड़ित लोगों के साथ काम करती हैं, वहीं वो जहां काम करते हैं उन्हें काम करने को लेकर बेहतर वातावरण मिले इसके लिए काम करती हैं।

हाल ही में एक आर्गेनाइजेशन ने सर्वे कराया, जिसमें करीब हजार अमेरिकन एडल्ट को शामिल किया गया था। इस शोध में यह बात सामने आई कि 88 फीसदी को वर्कर अपने वैसे साथी जो क्रॉनिक बीमारी से जूझ रहा है या फिर किसी दूसरे बीमारी से ग्रसित है उसे खुलकर सपोर्ट करते हैं।

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शोध में यह बातें आई सामने

  • कितना व किस प्रकार का इमोशनल सपोर्ट आप अपने साथी को देते हैं।
  • आप अपने साथी से कितने दफा उनके स्वास्थ्य संबंधी जानकारी लेते हैं।
  • काम को लेकर आप किस प्रकार का मदद करते हैं।

शोध में यह बात सामने आई कि जहां तक सपोर्ट की बात है तो क्रॉनिक बीमारी से पीड़ित व्यक्ति और को वर्कस के साथ मैनेजमेंट में एक प्रकार का गैप है। जिस कारण उन्हे जो सहायहा मिलती चाहिए थी वो नहीं मिल पा रही है। एक्सपर्ट बताते हैं कि ऐसा जागरूकता में और ट्रेनिंग में कमी के कारण भी हो सकता है।

को वर्कर को सपोर्ट करने के लिए दिखाएं सहानुभूति

क्रॉनिक बीमारी से पीड़ित को वर्कर को सपोर्ट करने के लिए आप उनके साथ सहानुभूति दिखा सकते हैं। आप चाहे तो कह सकते हैं कि मैं नहीं जानता कि मुझे अभी क्या कहना चाहिए, लेकिन मैं यहां तुम्हारी देखभाल करूंगा। वहीं हम कुछ ऐसा सोचेंगे जिससे हमें आसानी से लाइफ गुजार सके। वहीं यह तो कतई नहीं कहना चाहिए कि मुझे भरोसा ही नहीं हो रहा कि तुमने बीमारी के बारे में मुझे पहले क्यों नहीं बताया। ऐसा बोलने में पीड़ित गिल्टी महसूस कर सकता है।

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उन्हें अपने निर्णय खुद लेने दें

एक्सपर्ट बताते हैं कि इस बात को लेकर आप सजग रहें कि जब आपका को वर्कर प्राइवेसी चाहे तो उसमें दखलअंदाजी न करें। वहीं जब वो अपने हेल्थ से संबंधित किसी बात को शेयर करना चाहे तो आप सपोर्ट करें। ऐसा कर आप क्रानिक बीमारी से पीड़ित को वर्कर को सपोर्ट कर सकते हैं। कोशिश करें कि उनकी जैसी प्रतिक्रिया उसी के हिसाब से रिएक्ट करें।

वहीं आफिस में एक दूसरे से सजग होकर बातें शेयर करनी चाहिए। मान लें यदि आप किसी बीमारी के बारे में किसी ऐसे से बात करना चाह रहे हैं जिसे खुद ऐसी बीमारी है। तो उस स्थिति में वो सुनना चाह रहा है यह नहीं उसके मन को टटोल कर ही अपनी बातें रखें।

उनकी प्राइवेसी की इज्जत करनी चाहिए

यदि आपका को वर्कर किसी क्रानिक डिजीज से ग्रसित है तो उस स्थिति में को वर्कर को सपोर्ट कने के लिए उसकी प्राइवेसी को सपोर्ट करना उचित होगा। वहीं यदि आपका को वर्कर आपसे कुछ शेयर करता है तो इसका कतई मतलब नहीं होता है कि वही बात किसी और को भी बताए। हर कोई हर किसी को अपने दिल की बात नहीं बताता। वहीं आप जहां काम करते हैं यदि वहां पर कोई आपको हेल्थ से जुड़ी कोई भी बात बताता है तो आपकी जिम्मेदारी बनती है कि आप उसे किसी से शेयर न करें। जबतक वो न चाहे।

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उनके काम में मदद कर करें हेल्प

क्रॉनिक बीमारी से पीड़ित को वर्कर को सपोर्ट करने के लिए आप उनके काम में हाथ बंटा सकते हैं। इससे दोनों के बीच न केवल बॉन्डिंग और मजबूत होगी। बल्कि साथी कर्मचारी का मनोबल भी ऊंचा बढ़ेगा। कई मामलों में आप उसे बिना बताए भी काम संबंधी जो भी उसकी जरूरत है उसे कर सकते हैं। ताकि उसपर कम तनाव पड़े।

स्थिति को न करें नजरअंदाज

जरूरी है कि क्रॉनिक बीमारी से ग्रसित साथी कर्मचारी केहौसले को बढ़ाने के को वर्कर को सपोर्ट करें। ऐसे में हमें अपने साथी को कभी इग्नोर नहीं करना चाहिए। बल्कि आप यह सोचना चाहिए कि यदि आप उसकी जगह होते तो आपको कैसा लगता। ऐसे में उसको परेशानी न हो इसका पूरा ख्याल रखना चाहिए।

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को वर्कर को सपोर्ट करने के लिए लीडरशिप की अहम भूमिका

द कैंसर एंड करियर्स की ओर से किए गए शोध में यह बात सामने आई कि अमेरिकन वर्कस अपने लीडर्स से ज्यादा सपोर्ट की चाह रखते हैं। वहीं 59 फीसदी को यह विश्वास ही नहीं है कि उनका मैनेजमेंट अपने बीमार साथियों को भला किस प्रकार सपोर्ट करेगा।

वहीं वैसे कर्मचारी जिन्होंने पहले वैसे को वर्कर के साथ काम किया है जो कैंसर अन्य क्रॉनिक बीमारी से पीड़ित थे, उनमें 90 फीसदी लोगों का मानना है कि मैनेजमेंट जो कर रही है उससे कहीं अधिक और साथी कर्मचारी के लिए करना चाहिए। ऐसा कर को वर्कर को सपोर्ट किया जा सकता है।

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शोध में सामने आए तथ्यों पर एक नजर

  • 45% लोगों का मानना था क्रॉनिक बीमारी से पीड़ित कर्मियों के लिए मैनेजमेंट उनके हिसाब से आफिस का शिड्यूल तय करें, वहीं स्पेशल इक्वीप्मेंट के साथ नई टेक्नोलाजी मुहैय्या कराए, जिससे काम आसान हो।
  • 37% लोगों का यह मानना था कि मैनेजमेंट ने को वर्कर को सपोर्ट करने के लिए अच्छा माहौल बनाया।
  • 35% लोगों ने माना कि को वर्कर को सपोर्ट करने के लिए उसकी प्राइवेसी को और ज्यादा प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • 33% लोगों ने माना कि को वर्कर को सपोर्ट करने के लिए कंपनी को और बेहतर पॉलिसी बनानी चाहिए।
  • 16% लोगों ने मानना कि को वर्कर को सपोर्ट करने की बजाय जिस प्रकार से कंपनी कैंसर से पीड़ित कर्मी के साथ व्यवहार कर रही है, उससे हमारी भी कंपनी के प्रति ईमानदारी कम हो रही है।

यह काफी चौकाने वाले तथ्य हैं कि को वर्कर को सपोर्ट करने के लिए साथी कर्मचारी को क्या करना चाहिए यह उन्हें मालूम ही नहीं है। ऐसे में उनका अपने लीडरशिप पर भी धीरे धीरे कर विश्वास उठता जा रहा है।

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मौजूदा बेनीफिट, पॉलिसी और प्रोसिजर की लें अच्छी तरह जानकारी

को वर्कर को सपोर्ट करने के लिए जरूरी है कि आप जिस कंपनी में हो तो समस्या से जुड़ी बेनीफिट उठाने के लिए पॉलिसी और प्रोसिजर की अच्छे से जानकारी हासिल कर लेनी चाहिए। क्योंकि सिर्फ सैलेरी से किसी का काम नहीं चलता है बल्कि पूरे पैकेज से काम चलता है। वहीं यदि आपके कंपनी की पॉलिसी आउटडेटेड है तो आपको उसके बारे में फिर से सोचने की जरूरत है। एक्सपर्ट बताते हैं कि कुछ कंपनियां अपने कर्मियों के लिए लीव बैंक जैसी पॉलिसी लाती है। ऐसे में जब कोई बीमार होता है तो लीव बैंक से छुट्टी ले लेता है उस दरम्यान उसे सैलरी भी मिलते रहती है वहीं जब वो ठीक होकर काम पर लौटता है तो अतिरिक्त काम कर या फिर छुट्टी न लेकर लीव बैंक से ली गई छुट्टियों को एडजस्ट कर सकता है।

पॉलिसी को एक दूसरे से शेयर करें

जरूरी है कि को वर्कर को सपोर्ट करने के लिए वहीं खासतौर पर तब जब आपका साथी किसी बीमारी से पीड़ित है तो उस स्थिति में आप कंपनी की पॉलिसी को एक दूसरे से शेयर करें। जब आपकी तबीयत खराब हो तो उस स्थिति में कंपनी पॉलिसी आदि को याद रखना काफी मुश्किल हो जाता है, ऐसे में को वर्कर को सपोर्ट करना चाहिए वहीं वैसी लाभकारी पॉलिसी के बारे में बताकर आपको लाभ पहुंचाना चाहिए। कंपनी की ओर से भी समय समय पर कर्मचारी संबंधी बेनीफिट की बातों को सार्वजनिक करना चाहिए, वहीं यदि नई पॉलिसी आए तो उसकी जानकारी कर्मचारियों को देनी चाहिए।

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क्या और कब करना है, इसकी मैनेजर को होनी चाहिए पूरी ट्रेनिंग

अपने को वर्कर को सपोर्ट करने के लिए मैनेजर पूरी तरह से ट्रेंड होना चाहिए। तभी जरूरत पड़ने पर वो अपने साथी ही मदद कर सकता है। मान लें यदि कोई बीमार पड़ जाता है वहीं वो मैनेजर के पास मदद मांगने के लिए जाता है तो उस स्थिति में मैनेजर को पॉलिसी के बारे में जानकारी ही नहीं है, उस स्थिति में वो उसकी मदद नहीं कर पाएगा। पॉलिसी होने के बावजूद को वर्कर लाभ से वंचित हो जाएगा। ऐसे में यह मैनेजमेंट की भी जिम्मेदारी बनती है कि वो को वर्कर को सपोर्ट करने के लिए मैनेजर को भी पूरी ट्रेनिंग दे।

यह काम जो मैनेजमेंट को अपने स्तर से करने चाहिए

  • कर्मचारियों से राय लेनी चाहिए कि वो कैसे मैनेजमेंट को अच्छे से सपोर्ट कर सकते हैं, राय नहीं बनानी चाहिए।
  • कर्मचारियों को अच्छा समय व कम्युनिकेशन प्रदान कर काम को बेहतर तरीके से करवाना चाहिए
  • कार्यों के बारे में चर्चा करने के लिए अलग से समय निर्धारित करें, अन्य टीम के सदस्य अपने सहकर्मी की मदद करने के लिए ले सकते हैं।
  • इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि कौन-सी मेडिकल से जुड़ी जानकारी शेयर करनी है वहीं किससे शेयर करनी है।
  • को वर्कर से इजाजत लेकर साथी कर्मचारी की तबीयत के बारे में समय समय पर हाल लेते रहना चाहिए

क्योंकि बीमारी के समय काफी चैलेंजिंग भरा होता है, व्यक्ति खुद यह नहीं समझ पाता है कि उसे क्या करना है व क्या नहीं। ऐसे में को वर्कर को सपोर्ट करना जरूरी हो जाता है। यही वो समय है जब साथी को हमारी सबसे ज्यादा जरूरत होती है।

हैलो हेल्थ ग्रुप हेल्थ सलाह, निदान और इलाज इत्यादि सेवाएं नहीं देता।

सूत्र

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ADDRESSING CHRONIC DISEASE IN THE WORKPLACE: https://vitalrecord.tamhsc.edu/health-at-work-addressing-chronic-disease-in-the-workplace/  Accessed July 15, 2020

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Satish singh द्वारा लिखित आखिरी अपडेट 16/07/2020 को
डॉ. प्रणाली पाटील के द्वारा मेडिकली रिव्यूड
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