स्मोकिंग छोड़ने के लिए वेपिंग का सहारा लेने वाले हो जाएं सावधान!

By Medically reviewed by Dr. Shruthi Shridhar

अक्सर धूम्रपान छोड़ने की कोशिश करने वाले लोग वेपिंग को एक अच्छा विकल्प समझते हैं। पर हाल ही में आई नेशनल सेंटर फॉर हेल्थ रिसर्च की यह रिपोर्ट आपको चौंका देगी। इस रिपोर्ट के मुताबिक वेपिंग की वजह अबतक 450 से ज्यादा लोग गंभीर फेफड़ों की बीमारी का शिकार हो चुके हैं। इससे ये साफ है कि वेपिंग को पूरी तरह सुरक्षित कहना महज एक मिथक है। स्मोकिंग की तुलना में वेपिंग के कई प्रकार हो सकते हैं। ई-सिगरेट के प्रचलन के चलते कई बड़े ब्रांड्स ने इसके अलग-अलग प्रारूप बाजार में उतारे हैं। वेपिंग इसी का एक प्रकार है।

वेप मॉड(Vape Mods), जूल्स(Juuls) और वेप पेन(Vape Pen) कुछ आमतौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले ई-सिगरेट के प्रारूप हैं। इनमें से कुछ में निकोटिन,  या फिर फ्लेवरिंग का इस्तमाल भी होता है।

डॉक्टर्स कहते हैं कि कैंसर या फिर किसी भी बड़ी बीमारी के होने में लगभग 20 वर्ष का समय लगता है। स्मोकिंग की वजह से कैंसर होता है ये हम लंबे समय से देखते आए हैं। लेकिन ई-सिगरेट को समय से पहले ही कैंसर सुरक्षित घोषित कर दिया गया है।

आइए जानते हैं वेपिंग और ई-सिगरेट से जुड़े रोचक और चकित कर देने वाले कुछ सच।

क्या है वेपिंग (Vaping) और कैसे है ये परंपरागत सिगरेट से अलग?

आमतौर पर इस्तेमाल की जाने वाली सिगरेट में निकोटीन (तम्बाकु) का उपयोग होता है। इसका धुंआ नशीला होता है जिसकी वजह से इसकी लत लगना स्वाभाविक है। नए जमाने में इस सिगरेट की जगह ई-सिगरेट का उपयोग प्रचलन में है और यह आम धारणा है कि ई-सिगरेट के हानिकारक प्रभाव आम सिगरेट की तुलना में कम होते हैं।

परंपरागत रूप से उपयोग की जाने वाली सिगरेट में लगभग 7000 केमिकल्स होते हैं। ई-सिगरेट में कितने केमिकल्स होते हैं ये साफ तौर पर कहा नहीं जा सकता लेकिन अनुमान लगाया जाता है कि परंपरागत सिगरेट की तुलना में केमिकल्स की मात्रा कम होती है।

हैलो स्वास्थ्य से बातचीत के दौरान ई-सिगरेट को इस्तेमाल करने वाले ज्यादातर लोगों ने बताया कि ई-सिगरेट में पानी में घुले हुए निकोटीन की भाप को लिया जाता है जिसकी वजह से हानिकारक प्रभाव कम हो जाता है।

क्या सिगरेट छोड़ने का पहला स्टेप है वेपिंग?

कई लोगों में ऐसी धारणा है कि अगर वे रेगुलर स्मोकिंग की जगह ई-सिगरेट का इस्तेमाल करते हैं तो वे इस लत को छोड़ पाएंगें। लेकिन डॉक्टर्स की मानें तो ये केवल एक मिथक है। अगर आप ई-सिगरेट का इस्तेमाल ठीक उसी तरीके और गति से कर रहे हैं जैसे कि आप रेगुलर सिगरेट का उपयोग करते हैं तो आपकी हालत में सुधार होगा इसकी पुष्टि कर पाना मुश्किल है। कई बार ऐसे मामले भी सामने आए हैं जहां केवल इस मिथक की वजह से लोगों ने ई-सिगरेट का अधिक इस्तमाल किया और उनकी समस्याएं और अधिक बढ़ गईं।

ये बात पूरी तरह से सच है कि वेपिंग में आपके शरीर कम केमिकल्स जाएंगें लेकिन इससे आपकी स्मोकिंग की आदत छूटेगी या नहीं ये आपके इस्तमाल करने के तरीके पर निर्भर करता है।

ई-सिगरेट बन सकता है कैंसर का कारण !

फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) द्वारा जारी हुई एक रिपोर्ट में सामने आया है कि ई-सिगरेट में पाए जाने वाले कई पदार्थ कैंसर का कारण बन सकते हैं। पब्लिक लाइब्रेरी ऑफ साइंस जर्नल (Public Library of Science Journal) की रिपोर्ट के अनुसार ई-सिगरेट में कार्ट्रिज का उपयोग किया जाता है। इस कार्ट्रिज में उपयोग होने वाला फोर्मलडीहाइड (Formaldehyde) और बेंजीन (Benzene) कैंसर का महत्वपूर्ण कारण है।

साथ ही लंबे समय तक स्मोकिंग की वजह से आपको हृदय रोग (Heart Disease), ब्रोंकाइटिस (Bronchitis), एम्फायसिमा (Emphysema) की शिकायत हो सकती है। ई-सिगरेट में परंपरागत सिगरेट जैसे ही पदार्थों का इस्तमाल किया जाता है इसलिए पूरी तरह से इसे सुरक्षित कहना गलत होगा।

ई-सिगरेट बन सकता है डीएनए (DNA) का दुश्मन!

2018 में हुए अमेरिकन केमिकल सोसाइटी (American Chemical Society) के एक शोध में पाया गया है कि ई-सिगरेट के उपयोग से डीएनए भी नष्ट हो सकता है। डीएनए मानव शरीर में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जानकारी पहुंचाने का काम करता है। वेपिंग के दौरान बनने वाला एक्रोलिन (Acrolein Chemical) DNA में म्यूटेशन यानी हानिकारक बदलाव पैदा करता है जिसकी वजह से शरीर की कार्यप्रणाली पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। अब आप ही सोचिए जिस चीज को उपयोग करने से डीएनए पर प्रभाव पड़े उसे सुरक्षित कैसे कहा जा सकता है।

ई-सिगरेट से नहीं होता है पर्यावरण पर प्रभाव: ये भी है महज एक जुमला!

इस सिगरेट को स्मोकलेस और पर्यावरण फ्रेंडली मानने वाले भी गलतफहमी के शिकार हैं। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ हाइजीन एंड एन्वायरमेंटल हेल्थ (International Journal of Environmental Health) की रिपोर्ट में बताया गया है कि ई-सिगरेट से निकलने वाले वोलेटाइल आर्गेनिक कंपाउंड (VOC) और छोटे पार्टिकल्स पर्यावरण पर हानिकारक प्रभाव डाल सकते हैं। ई-सिगरेट से होने वाला धुआं भले ही दिखाई न दे लेकिन इससे निकलने वाली वेपर आपको हानि पहुंचाने के लिए काफी है।

क्या आप जानते हैं वेप पेन से आप जल भी सकते हैं?

2015 से 2017 के बीच कई मामले ऐसे भी सामने आए जिसमें ई-सिगरेट के मुंह में एक्सप्लोड होने के भी कई मामले सामने आए। ई-सिगरेट की वजह से आग लगने और एक्सप्लोड होने की भी खबरे सामने आई है। ई-सिगरेट में लिथियम आयन बैटरी का इस्तमाल किया जाता है जो कि बहुत अधिक गरम होने पर इस बैटरी में आग लग सकती है।

इन खतरों के कारण वेपिंग या ई-सिगरेट परंपरागत स्मोकिंग से ज्यादा घातक हो सकती है।

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