बिल गेट्स ने कहा, 20 सालों में कुपोषण को हराना होगा

By Medically reviewed by Dr. Radhika apte

बिल गेट्स ने एक अहम बयान दिया है। कैंब्रिज यूनियन सोसाइटी के प्रोफेसर हॉकिंग फेलोशिप के कार्यक्रम में उन्होंने यह महत्वपूर्ण बात कही। कार्यक्रम में मौजूद लोगों को संबंधोति करते हुए उन्होंने कहा कि यदि हमें यह पता चल जाए कि हमारा डाइजेशन सिस्टम किस तरह कार्य करता है तो हम अगले 20 सालों में कुपोषण से निजात पा सकते हैं। कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि उम्मीद है कि हमें अगले कुछ दशकों में ग्लोबल हेल्थ में प्रगति नजर आएगी।

बिल गेट्स के मुताबिक, दुनिया में कुपोषण सबसे बड़ी समस्या है, जिसे निजात पाना जरूरी है। उनके मुताबिक, हर साल पांच वर्ष से कम उम्र के 20 लाख से ज्यादा बच्चों की मौत भोजन की कमी से हो जाती है। बिल गेट्स का मानना है कि अगले 20 वर्षों में हम इस आंकड़े को कम कर पाने में सक्षम होंगे। इसके इलाज की चाबी मनुष्य के शरीर में छुपी हुई है।

बिल गेट्स ने कहा कि बॉडी के अंगों को समझने की जरूरत

बिल गेट्स ने कहा कि मुझे लगता है कि हमें मनुष्य की बॉडी के छोटे-छोटे अंगे के भीतर पोषण को बेहतर तरीके से समझने की जरूरत है। उदाहरण के लिए हमारे शरीर के छोटे-छोटे बैक्टीरिया कई जरूरतों को पूरा करते हैं। बिल गेट्स ने यहां पर गट और डाइजेस्टिव ट्रैक के भीतर मौजूद बैक्टीरिया के संबंध में यह बात कही।

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अभी तक सीमित अध्ययन उपलब्ध

बिल गेट्स ने कहा कि मौजूदा समय में इस संबंध में सीमित शोध किया गया है। दरअसल, इसका कोई वास्तविक साक्ष्य नहीं है कि प्रोबायोटिक्स मिल्क और इसके जैसे प्रोडक्ट्स का सेवन करने से इस समस्या में मदद सहायता मिलती है। वहीं, दूसरी तरफ एक्सपर्ट्स और डॉक्टरों का मानना है कि कुपोषित बच्चों की डाइजेस्टिव ट्रैक में बैक्टीरिया अलग तरह के होते हैं। सैद्धांतिक रूप से बदतर परिस्थितियों में भूख से मर रहे बच्चों को अधिक भोजन और इलाज से फायदा मिल सकता है। विशेष रूप से इससे डाइजेशन के बैक्टीरिया को टारगेट किया जा सकता है।

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गट बैक्टीरिया से इलाज संभव

अपनी इस बात को लोगों के बीच रखने के लिए बिल गेट्स ने एक बायोलॉजिस्ट के शोध का हवाला दिया। वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के जैफ गोरडोन नामक इस बायोलॉजिस्ट ने एक शोध किया था। इस शोध को 2013 में प्रकाशित किया गया। बायोलॉजिस्ट ने जुड़वा बच्चों में माइक्रोबायोम्स पर शोध किया था। उन्होंने अपने शोध में कहा कि एक जुड़वा बच्चा हेल्दी रह सकता है जबकि, दूसरा बच्चा कुपोषित हो सकता है। ऐसे मामलों में दोनों बच्चों में समान जीन और समान फूड मिलने के बाद भी उनके माइक्रोबायोम्स अलग-अलग होते हैं।

बायोलॉजिस्ट ने कुपोषित बच्चे के कुछ गट बैक्टीरिया को एक चूहे में ट्रांसप्लांट करने के बाद पाया कि चूहे के लिए पोषक तत्वों को बॉडी में डाइजेस्ट कर पाना मुश्किल था।

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सबकी पहुंच तक हो ट्रीटमेंट

बिल गेट्स ने कहा, ‘माइक्रोबायोम की यह थेरेपी अभी तक शुरुआती चरण में है। लेकिन, मुझे लगता है कि हमें इसे कारगर बनाने का एक रास्ता मिलेगा।’ इन थेरेपी की प्रभाविकता के इतर गेट्स ने कहा कि इस प्रकार की थेरेपी का ट्रीटमेंट बेहद ही सस्ता होना चाहिए, जिससे यह आम लोगों तक पहुंच सके। मौजूदा समय में इस्तेमाल होने वाल ट्रीटमेंट महंगा है।

कुपोषण के कारण लड़कियों की सबसे ज्यादा मौतें हुई हैं

बिल गेट्स ने कहा कि सैंपल रजिस्ट्रेशन रेट (IMR) के अनुसार, 2016 में 34 में से केवल एक गर्ल चाइल्ट के जीवित बच जाने की संभावना थी। यानी 34 लड़कियां पैदा होने के बाद कुछ ही समय बाद केवल एक ही लड़की जिंदा बची, बाकी सबकी मौत हो गई। वहीं 2017 के सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे (SRS) के अनुसार, 29 राज्यों में से केवल पांच राज्यों में एक गर्ल चाइल्ड के जीवित रहने की अधिक संभावना थी। ये वाकई भयावह रिजल्ट हैं। यानी गर्ल चाइल्ड की मृत्यु दर अधिक है। सैंपल रजिस्ट्रेशन रेट के अनुसार मरने वाली लड़कियों की उम्र एक साल से भी कम थी।

लड़कियों की मृत्यु दर

ज्यादातर सभी राज्यों में लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की मृत्युदर अधिक पाई गई है। कुछ राज्यों में जैसे कि छत्तीसगढ़, दिल्ली, मध्यप्रदेश, तमिलनाडू और उत्तराखंड को छोड़कर अन्य सभी राज्यों में गर्ल चाइल्ड की मृत्युदर अधिक पाई गई। ये सभी रिपोर्ट्स तीन साल के सर्वे पर बेस्ड है। साल 2015 से 2017 तक में सर्वे किया गया था। 0-4 वर्ष तक की गर्ल चाइल्ड की मृत्यु दर 8.9 थी, वही भारत के ग्रामीण इलाको में शहरी क्षेत्रों की तुलना में अधिक मृत्युदर 10.0 पाई गई। वहीं शहरी क्षेत्रों में मृत्युदर यानी गर्ल चाइल्ड मोरेलिटी 6.0 थी। आपको जानकर हैरानी होगी कि 19.8% गर्ल चाइल्स की डेथ अप्रशिक्षित अधिकारियों की वजह से हुई।

सही स्वास्थ्य सुविधाएं न मिल पाने के कारण कम उम्र में ही महिलाओं की मृत्यु हो जाती है। देश भर में केरला ही ऐसा राज्य है जहां का सेक्स रेशियो सही है। ज्यादातर राज्यों में सेक्स रेशियो यानी लिंग अनुपात में भारी अंतर देखने मिलता है। ज्यादातर पूर्वी और उत्तरी राज्यों में पुरुषों की संख्या महिलाओं से अधिक है। वहीं 100 जिले की महिलाएं निरक्षर यानी बिल्कुल भी पढ़ी लिखी नहीं हैं। महिलाओं को स्कूल इनरॉलमेंट पुरुषों की अपेक्षा 50 % तक कम है।

हैलो स्वास्थ्य किसी भी तरह की मेडिकल सलाह नहीं दे रहा है। अगर आपको किसी भी तरह की समस्या हो तो आप अपने डॉक्टर से जरूर पूछ लें।

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रिव्यू की तारीख अक्टूबर 9, 2019 | आखिरी बार संशोधित किया गया फ़रवरी 6, 2020