बॉडी में थे 8 ट्यूमर, फिर भी ब्लड कैंसर से नहीं मानी हार!

चिकित्सक द्वारा समीक्षित | द्वारा

अपडेट डेट जुलाई 15, 2020 . 5 मिनट में पढ़ें
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कैंसर एक ऐसी गंभीर बीमारी है जो बड़े से बड़े लोगों का हौसला तोड़ देती है, लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं जिनका हौसला ताड़ना इतना आसान नहीं हाेता है।  घर-परिवार, आस-पड़ोस या फिर किसी भी व्यक्ति के इस बीमारी से ग्रस्त होने की खबर हमें अंदर से हिला देती है। क्योंकि, सब जानते हैं कि कैंसर जानलेवा बीमारी है। कुछ ही लोग इस बात का ध्यान रखते हैं कि समय पर इलाज इस बीमारी को जड़ से खत्म कर देता है। अगर आप अपने आस-पास देखेंगे तो शायद आपको कुछ ऐसे लोग मिल जाएंगे जो इस बीमारी को हरा चुके हैं और आज अपने साहस की वजह से अन्य लोगों को इस बीमारी से लड़ने की ताकत दे रहे हैं।

कैंसर की कहानी आपकी जुबानी सीरीज में हम आपको ऐसे लोगों से मिलवाएंगे जो इस बीमारी से बहादुरी से लड़ चुके हैं या फिर लड़ रहे हैं। इस सीरीज में ऐसी सिचुएशन भी आएगी जब आपको लगेगा कि हिम्मत बड़ी से बड़ी समस्या को हरा सकती है। ऐसी ही एक कहानी है कैंसर सर्वाइवर संजय गीते की।  जिन्होंने कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के तीसरी स्टेज को मात दिया और एक आदर्श उदाहरण बने। उन्होंने यह स्थापित किया है कि कैसे एक सही माइंडसेट और कभी हार न मानने की आदत हमें जीवन के बुरे दिनों से बाहर निकाल सकती है। यहां तक कि रक्त कैंसर या ब्लड कैंसर का पता चलने के बाद भी उनके भीतर अपने आपको जागरुक और शिक्षित करने का जुनून एक चट्टान की तरह बना रहा। आज ब्लड कैंसर या रक्त कैंसर से लड़ने की उनकी कहानी एक मिसाल है कि कैसे हमारे जागरुक विचार हमें कई मुश्किलों से बाहर निकलने में मदद करते हैं, जिनका सामना हम जीवन में कर सकते हैं।

संजय एक इलेक्ट्रीकल इंजीनियर हैं, जिन्होंने अपना ग्रेजुएशन वीरमाताजीजाबाई टेक्नोलॉजी इंस्टिट्यूट से पूरा किया है। ब्ल्ड कैंसर या रक्त कैंसर को मात देकर एक हेल्दी लाइफ जी रहे संजय मुंबई के एक मैन्युफैक्चरिंग प्लांट में इंडस्ट्रियल ऑटोमेशन की फील्ड में कार्यरत हैं। वह एक मध्यम वर्गीय परिवार से आते हैं। उनकी परवर्शिश एक विनम्र माहौल में हुई। उनके माता-पिता शिक्षक हैं और उनकी पत्नी पेशे से वकील हैं।

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 रक्त कैंसर (ब्लड कैंसर) : इंजीनियर से बने फिल्ममेकर

इंडस्ट्रियल ऑटोमेशन फील्ड में मजबूत पकड़ बनाने की वजह से संजय विभिन्न मंचों पर इस संबंध में नियमित लेक्चर दिए हैं। इसके बाद उन्हें अहसास हुआ कि ऑडियो-विजुअल माध्यम अधिक प्रभावी है, जिसके चलते उन्होंने सामाजिक कल्याण और मुद्दों के लिए वो डॉक्युमेंटरी फिल्म बना रहे हैं।

उनका दावा है कि 2009 में मुंबई में पानी की कमी पर उन्होंने डॉक्युमेंटरी बनाई थीं। संजय ने जल संरक्षण के अनेकों तरीकों और हाउसिंग सोसाइटी के लिए उन्होंने वर्ष जल संग्रहण को लेकर ‘मुंबई जल सुरक्षा’ नामक एक डॉक्युमेंटरी बनाई थी। ब्लड कैंसर से लड़ने के बाद संजय डॉक्युमेंटरी फिल्ममेकिंग की स्क्रीनिंग्स के साथ वो अपने प्रोफेशनल करियर में काफी अच्छा कर रहे हैं। उनकी डॉक्युमेंटरी सभी जगह रिलीज हो रही हैं। वो संतुष्ट हैं और एक अच्छा जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

रक्त कैंसर: बॉडी में थे 8 ट्यूमर

2011 में जब संजय को अपनी नॉन-होडग्किन्स लिम्फोमा (Non-Hodgkin’s Lymphoma) स्टेज-3B का पता चला तो उनकी जिंदगी ने एक अहम मोड़ लिया। यह एक प्रकार का ब्लड कैंसर होता है। पता चलने के बाद पांच जनवरी को उनकी बायोप्सी की गई। उनकी बॉडी में दो ट्यूमर मिले। पहला ट्यूमर कॉलरबोन और दूसरा गर्दन के नजदीक पाया गया। 10 दिनों के भीतर डॉक्टर ने उनकी बॉडी में 8 गांठें होने की पुष्टि की।

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 भारत में ब्लड कैंसर या रक्त कैंसर की जानकारी का आभाव

इस पल ने उनकी जिंदगी को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया, जिसमें उन्होंने कभी यह कल्पना भी नहीं की थी कि उन्हें एक घातक बीमारी हो जाएगी। संजय ने तकरीबन ब्लड कैंसर या रक्त कैंसर से डेढ़ वर्ष की जंग लड़ी। डॉक्टरों ने उन्हें छह साइकल्स की कीमोथेरेपी कराने की सलाह दी। संजय ने अपने ब्लड कैंसर को समझने के लिए खुद रिसर्च की, लेकिन दुर्भाग्य से उन्हें अपनी बीमारी के संबंध में भारतीय वेबसाइट्स पर कोई शोध नहीं मिला।
इसके चलते उन्होंने अमेरिका के ऑनलाइन फोरम जैसे ल्युकेमिया एंड लिम्फोमा सोसाइटी (Leukemia & Lymphoma Society) को पढ़ना शुरू किया। इसकी वजह से उन्हें ब्लड कैंसर की कई दवाओं के बारी में जानकारी मिली, जिसने उन्हें यह समझने में मदद की उनकी बॉडी में क्या हो रहा है। साथ ही उन्हें ब्लड कैंसर या रक्त कैंसर की इन दवाओं के साइड इफेक्ट्स के संबंध में जानकारी मिली।

रक्त कैंसर : ऐसा रहा कीमोथेरेपी का अनुभव

संजय को लगता है कि लोगों को कैंसर के मुकाबले इसका इलाज बदतर लगता है। उनके मुताबिक, ‘हमारे देश में कीमोथेरेपी सबसे ज्यादा भयानक इलाज है।’ उनका मानना है कि कीमोथेरेपी के साइड इफेक्ट्स जैसे बालों का गिरना और लंबे वक्त तक इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है। लेकिन यदि आप तैयार हैं तो आप इन सब को मात दे सकते हैं।’ ब्लड कैंसर या रक्त कैंसर के इलाज के दौरान उन्हें मलेरिया की समस्या भी हो गया था, जिसका इलाज ब्लड कैंसर के ट्रीटमेंट के साथ किया गया।

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 रक्त कैंसर :  बीमारी में बेटी को किया प्रेरित

अपने जीवन की इस अशांत अवधि के दौरान, संजय की बेटी ऐश्वर्या इंजीनियरिंग की परीक्षा की तैयारी कर रही थीं। संजय ने अपनी बेटी को आश्वासन दिया और कहा कि वो अपनी इस जानलेवा बीमारी पर फतह हासिल कर सकते हैं। हालांकि, उन्हें पता था कि लंबे वक्त तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ेगा और आखिरकार वो ठीक हो जाएंगे। उन्होंने अपनी बेटी को सलाह दी कि वो इस बीमारी को प्रवेश परीक्षा की पढ़ाई को प्रभावित न करे दें। यह उसके लंबे करियर में एक बाधा बन सकता है। संजय को यह जानकर बेहद खुशी हुई कि उनकी बेटी ने प्रवेश परीक्षा पास कर ली है। ब्लड कैंसर के इलाज के दौरान उनकी बेटी ने पूछा कि उनका दिन कैसा रहा, उन्होंने बेटी को बताया ‘मैं आज जीवित हूं’ और यह अपने आपमें एक उत्सव मनाने जैसा है।’

मजबूत इच्छा शक्ति से जीती रक्त कैंसर की जंग

सही इलाज और इच्छा शक्ति की वजह से उनकी कीमोथेरेपी खत्म हुई और जून 2012 में पेट स्कैन (PET scan) में कोई भी कैंसर कोशिकाएं नहीं पाई गईं। इलाज को पूरा करने के लिए उन्हें अलगे तीन महीनों का और इंतजार करना था।
आखिरकार सितंबर 2012 में उनका इलाज समाप्त हो गया। तीन महीने की इस रिकवरी के दौरान उन्होंने अपनी जिंदगी के ऊपर विचार किया। संजय का भाई जो अमेरिका में एक मनोचिकित्सक के रूप में कार्यरत है, उन्होंने उन्हें इस समय को छुट्टियों के रूप में मनाने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि वो इस दौरान कुछ ऐसा करें, जो उन्होंने अपने जीवन में कभी न किया हो।

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रक्त कैंसर : बीमारी से निकलकर बनें रनर

बतौर इंजीनियर के रूप में संजय हमेशा विश्लेषणात्मक रूप में सोचते हैं, जो उन्हें स्ट्रॉन्ग मेंटल हेल्थ बनाए रखने में  मदद करता है। उन्होंने निर्णय लिया कि वे कुछ ऐसा करेंगे, जिससे उनके मस्तिष्क  अच्छे से विकसित होगा। उन्होंने पेटिंग और कहानी लेखन शुरू कर दिया। उन्होंने इन दोनों ही कार्यों में अपने कैंसर के अनुभव को प्रस्तुत किया। जल्द ही संजय को लॉन्ग डिस्टेंस रनिंग का एक नया शौक लग गया। इस शौक में उनकी बेटी ने भी उनके कदम से कदम मिलाए। कुछ दिनों के नियमित अभ्यास के बाद दोनों ने स्टैंडर्ड चार्टेड मुंबई मेराथॉन 2012 में हिस्सा लिया। वो अपनी चुप्पी को ब्लड कैंसर की लड़ाई लड़ने वाले के लिए एक उपलब्धि मानते हैं। जो पिछले एक साल के भीतर आठ ट्यूमर से लड़कर बाहर निकलता है।

अगर आपको विभिन्न प्रकार के कैंसर के बारे में जानकारी चाहिए तो हैलो स्वास्थ्य की वेबसाइट से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। ब्लड कैंसर या रक्त कैंसर के बारे में अधिक जानकारी के लिए डॉक्टर से संपर्क करें।

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