धारा 377 हटने के बाद भी LGBTQ के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं बड़ी चुनौती

चिकित्सक द्वारा समीक्षित | द्वारा

अपडेट डेट नवम्बर 25, 2019 . 4 मिनट में पढ़ें
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24 नवंबर 2019 की शाम को दिल्ली के बाराखंबा रोड से लेकर जंतर मंतर तक हर साल की तरह इस साल भी क्वीर परेड निकाली गई। यह परेड ना सिर्फ सामाजिक भेदभाव के प्रति अनोखे ढंग से विरोध जताने का तरीका है, बल्कि एलजीबीटीक्यू समुदाय के लोग अपनी पहचान पर गर्व करते हुए नाचते-गाते नारे लगाते हुए इस परेड में शामिल होते हैं।

6 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने भारतीय दंड संहिता के अनुच्छेद 377 को असंवैधानिक करार दिया था। एलजीबीटीक्यू समुदाय के लिए कानूनी रूप से यह एक बड़ी जीत थी। कानूनी मान्यता मिलने के बाद भी आज भी वह सामाजिक भेदभाव के चलते स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। एचआईवी और एसटीडी/ एसटीआई जैसे यौन रोगों का खतरा इस समूह को सबसे ज्यादा है। तमाम सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं तक उनकी पहुंच ना के बराबर है। helloswasthya.com ने परेड में मौजूद कुछ लोगों से खास बातचीत की। इस दौरान कई चौंकाने वाले तथ्य समाने आए, जो कहीं न कहीं इस देश के एक आम नागरिक को अपनी सोच को बदलने के लिए मजबूर कर सकते हैं।

क्वीर प्राइड परेड
फोटो साभार- अभिषेक गुप्ता

हमसफर ट्रस्ट के प्रोग्राम ऑफिसर और यूथ लीड, बैंकॉक और इम्पेक्ट (MPACT) की संचालन समिति के बोर्ड मेंबर गौतम यादव ने कहा, ”सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर और काउंसलर जैसे अन्य स्टाफ को एलजीबीटीक्यू समुदाय के प्रति संवेदनशील होने की जरूरत है। कई बार यह लोग समुदाय के लोगों से भेदभाव करते हैं। काउंसलर टेस्ट कराने वाले व्यक्ति से कुछ ऐसे व्यक्तिगत सवाल पूछता है, जिसको लेकर टेस्ट कराने वाला असहज महसूस करता है।”

आपको बता दें कि एचआईवी और एलजीबीटीक्यू समुदाय के लिए किए गए अपने कार्यों के लिए गौतम यादव को एपकॉम की तरफ से एशिया एंड पेसिफिक एचआईवी हीरो अवॉर्ड 2017 मिल चुका है।

यादव एशिया पेसिफिक के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की यूएनएड्स (UNAIDS) की यूथ एडवाइजरी फोरम के पूर्व बोर्ड मेंबर और यंग पीपल लिविंग विद एचआईवी पॉजिटिव कमिटी के संचालक सदस्य रह चुके हैं। एचआईवी के सवाल पर यादव ने कहा, ”यदि एलजीबीटीक्यू समुदाय का व्यक्ति एचआईवी या किसी एसटीडी/एसटीआई से पॉजिटिव हो जाता है, तो काउंसलर उसे एक गलती कहता है कि आपने गलत किया है, इसलिए आप पॉजिटिव हो गए हैं।”

उद्योग जगत में भी होता है भेदभाव

कॉरपोरेट कंपनियों के संबंध में गौतम यादव ने एक हैरान करने वाली बात कही। उन्होंने कहा, ”आज भी कई ऐसी कंपनियां हैं, जो कैंडिडेट की जॉइनिंग कराने से पहले उसके कई मेडिकल टेस्ट कराती हैं। इन मेडिकल जांचों में कैंडिडेट को बिना बताए उसका एचआईवी टेस्ट भी कर लिया जाता है। यदि रिपोर्ट पॉजिटिव आती है तो उसे ऑफिस में शेयर कर दिया जाता है।’ उन्होंने कहा, ‘कई ऐसी कंपनियां हैं, जहां पर एचआईवी टेस्ट अनिवार्य है।” यादव ने कहा, ”प्राइवेट क्लिनिक्स में एचआईवी को लेकर प्री और पोस्ट टेस्ट काउंसलिंग नहीं होती, जो एक बड़ा मुद्दा है। मुझे लगता है कि सरकार और अस्पतालों को इस तरफ ध्यान देना चाहिए। कई बार काउंसलिंग न मिलने पर टेस्ट पॉजिटिव आने पर टेस्ट कराने वाले के लिए मानसिक रूप से स्थिर रह पाना एक बड़ी चुनौती होती है।”

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एचआईवी बिल अभी भी अधूरा

फोटो साभार- अभिषेक गुप्ता
फोटो साभार- अभिषेक गुप्ता

यादव ने कहा, ”सरकार एचआईवी बिल तो लेकर आई, लेकिन उसमें कई ऐसी मुद्दे हैं, जो अनछुए हैं। भारत में एचआईवी पॉजिटिव लोगों के लिए कोई स्वास्थ्य बीमा योजना नहीं है। यानी कि एचआईवी पॉजिटिव लोगों को हेल्थ कवर नहीं मिलता है।” उन्होंने कहा, ”सरकारी और निजि स्वास्थ्य क्षेत्र दोनों में ही रिफॉर्म की जरूरत है। इन रिफॉर्म्स के लिए सरकार को सबसे पहले आधारभूत संरचना बदलनी पड़ेगी, उसके बाद ही ऐसे बदलाव संभव हैं।”

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जमीनी स्तर पर बदलाव की जरूरत

गे प्राइड परेड

एमिटी यूनिवर्सिटी नोएडा की छात्रा ने अस्मि ने कहा, ‘एलजीबीटीक्यू समुदाय के लोगों को अस्पतालों और क्लिनिक्स में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। उनकी सेक्शुएलिटी के आधार पर उन्हें जज किया जाता है।” उन्होंने कहा, ”मैं खुद एक बार गायनोकोलॉजिस्ट के पास गई थी। उन्होंने मेरी सेक्शुएलिटी को लेकर कई ऐसे सवाल खड़े किए जो मुझे शर्मिंदिगी महसूस करा रहे थे। हमारी सेक्शुएलिटी के आधार पर हमें पहले ही गलत मान लिया जाता है। काउंसलर कुछ ऐसे सवाल पूछ लेते हैं, जो असहज करने वाले होते हैं।’

”सुविधाएं तो हैं, लेकिन पहुंच न के बराबर”

वहीं, हमसफर ट्रस्ट के प्रोग्राम ऑफिसर मनोज बेंजवाल ने कहा, ‘मुख्य धारा के समाज के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हैं, लेकिन एलजीबीटीक्यू समुदाय के लिए कई चुनौतियां हैं। सरकार ने सुविधाएं तो दी हैं, लेकिन उनकी पहुंच एलजीबीटक्यू तक न के बराबर है। अस्पतालों में तैनात स्टाफ एलजीबीटीक्यू समुदाय के प्रति संवदेनशील नहीं है। यहीं से सारी समस्याएं शुरू होती हैं।’

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”अस्पताल में एक ही विंडों पर हों सारे टेस्ट”

बेंजवाल ने कहा, ”अस्पतालों के स्टाफ की ट्रेनिंग बहुत जरूरी है। राइट टू प्राइवेसी एक्ट का भी पालन बहुत जरूरी है। इस संबंध में काउंसलर या डॉक्टर को क्या पूछना है और क्या नहीं पूछना है। इसको लेकर जागरुकता आवश्यक है।” उन्होंने कहा, ”सरकारी अस्पतालों में एचआईवी विभाग में एक ही विंडो पर सारे टेस्ट की सुविधा मिलनी चाहिए। जिन लोगों का एचआईवी टेस्ट पॉजिटिव आता है, उन्हें उसके बाद भी कई टेस्ट कराने पड़ते हैं। यह टेस्ट अस्पताल के अलग-अलग फ्लोर या विभागों में होते हैं। इस स्थिति में एचआईवी स्टेट्स को लेकर डिपार्टमेंट के चक्कर लगाना लोगों के लिए मुश्किल होता है। इस स्थिति में एचआईवी टेस्ट की जानकारी अन्य लोगों के सामने आने का खतरा रहता है, जिसके चलते ज्यादातर लोग इलाज बीच में ही छोड़ देते हैं।’

क्वीर परेड
फोटो साभार- अभिषेक गुप्ता

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