प्रदूषण से भारतीयों की जिंदगी के कम हो रहे सात साल, शिशुओं को भी खतरा

चिकित्सक द्वारा समीक्षित | द्वारा

अपडेट डेट दिसम्बर 5, 2019 . 3 मिनट में पढ़ें
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देश की राजधानी दिल्ली में बढ़ने वाला प्रदूषण हर किसी के लिए परेशानी का सबब बन रहा है। चाहें वे ऑफिस जाने वाले लोग हो, घर में रहने वाले, मां हो या दुनिया में आने वाला शिशु ही क्यों ना हो सभी को प्रदूषण प्रभावित कर रहा है। हर साल दिवाली के बाद दिल्ली की आबोहवा बदल जाती है और एक बार फिर वही हुआ है। दिल्ली के चारो तरफ छाई धुंध ने स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां खड़ी कर दी है। गुरुवार(29/10/2019) को जारी किए गए एक नए विश्लेषण में कहा गया है कि इंडो-गंगेटिक प्लेन्स (IGP) क्षेत्र में रहने वाले लोगों को गंभीर वायु प्रदूषण के कारण अपने जीवन के 7 साल खोने पड़ सकते हैं।

शिकागो यूनिवर्सिटी के एनर्जी पॉलिसी इंस्टिट्यूट (EPIC) द्वारा जारी एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स (AQLI) से पता चलता है कि इस क्षेत्र में 1998 से 2016 तक प्रदूषण में 72% की बढ़त हुई है, जो भारत की 40% आबादी को प्रभावित करता है। हालांकि, 1998 में आई रिपोर्ट में प्रदूषित हवा से लोगों के जीवन पर प्रभाव केवल 3.7  प्रतिशत बताया गया था, जो अब बढ़कर 7 प्रतिशत हो गया है।

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विश्लेषण में यह भी कहा गया है कि आईजीपी क्षेत्र के नागरिकों में दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल शामिल हैं, जो वायु प्रदूषण के उच्च स्तर के संपर्क में हैं और इसलिए उनके जीवन में से कुछ समय साल दर साल कम हो रहा है।

प्रदूषण का नवजात शिशु पर असर

वायु प्रदूषण न केवल कई स्वास्थ्य जोखिम पैदा करता है। बल्कि, प्रदूषित हवा के संपर्क में आने से मां की कोख में मौजूद शिशुओं पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।

पर्यावरण स्वास्थ्य परिप्रेक्ष्य जर्नल (Environmental Health Perspectives) में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान दूषित हवा में मौजूद नुकसानदायक पदार्थों के संपर्क में आने वाली प्रेग्नेंट महिला की डिलिवरी के बाद होने वाले बच्चों में तनाव से लड़ने की क्षमता कम हो सकती है। इसके अलवा इससे हृदय की दर(cardiovascular), रेस्पिरेट्री(respiratory) और डाइजेस्टिव सिस्टम(digestive system) के कार्य करने की क्षमता पर भी असर पड़ता है। दिल और दिमाग का तनावपूर्ण अनुभवों के लिए प्रतिक्रिया देना जरुरी है। इसके अलावा यह जीवन भर के तनाव के और दूसरे भावनात्मक मामलों के लिए भी जरुरी हैं।

हार्ट रेट  में बदलाव होने से इन शिशुओं को जीवन में मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। वायु प्रदूषण की वजह से हार्ट रेट में बदलाव के नकारात्मक प्रभावों को पहले भी बच्चों, किशोरों और वयस्कों पर हुए अध्ययनों में देखा जा चुका है। इन अध्ययनों में हृदय रोग, अस्थमा, एलर्जी और साइकोलॉजी या व्यवहार संबंधी परेशानियां पाई गईं।

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क्या है अध्ययन

इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 237 बोस्टन स्थित मां और उनके शिशुओं को निगरानी में रखा और देखा कि गर्भावस्था के दौरान मां किस तरह के दूषित कणों के संपर्क में थी। इसके लिए सेटेलाइट डेटा और वायु प्रदूषण मॉनीटर का उपयोग किया गया। छह महीने की उम्र में शिशुओं के हृदय की दर और सांस का अध्ययन कर शोधकर्ताओं ने पाया कि गर्भावस्था के दौरान मां जितने ज्यादा वायु प्रदूषण के संपर्क में थी उन बच्चों में तनाव के समय शिशु की हृदय गति में कमी उतनी ज्यादा थी।

प्रदूषण से कम होती जिंदगी

1998 में हुए एक अध्ययन में सामने आया कि इंडो-गंगेटिक प्लेन्स (IGP) क्षेत्र के बाहर रहने वाले लोगों ने अपने जीवन के लगभग 1.2 साल वायु प्रदूषण के कारण कम कर दिए थे, वायु गुणवत्ता को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दिशा-निर्देशों का पालन करके इसे रोका जा सकता था। वहीं 2016 में गैर-आईजीपी राज्यों में रहने वालों ने आईजीपी क्षेत्र में 7 वर्षों की तुलना में अपने जीवन के लगभग 2.6 साल खो दिए।

विश्लेषण जारी करने के दौरान, सहारा हॉस्पिटल लखनऊ के चेस्ट सर्जन डॉ गिरिश कुमार ने वायु प्रदूषण के चलते स्वास्थ्य पर होने वाले असर को एक चिंताजनक विषय बताया है। उन्होंने कहा, “यह दिल्ली में एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल है। पिछले 10 सालों में लाख कोशिशों के बाद भी वायु प्रदूषण में किसी तरह का सुधार नहीं हुआ है। मैं 28 साल के नॉन स्मोकर को चरण 4 फेफड़ों के कैंसर के साथ जूझते देख रहा हूं। यह मेरे लिए बहुत दर्दनाक अनुभव है। मुझे इस बात पर गुस्सा भी आता है और चिंता भी होती है कि हम वायु प्रदूषण की वजह से युवा लोगों को खो रहे हैं। ”

1988 में  90 प्रतिशत फेफड़े के कैंसर के मामले धूम्रपान करने वालों में थे, लेकिन अब गैर-धूम्रपान करने वालों में 50% ऐसे मामले देखे जा रहे हैं। “वायु प्रदूषण एक ग्रुप 1 कार्सिनोजेन है। प्रदूषित हवा में सिगरेट के धुएं की तरह नुकसान करने वाले पदार्थ हैं।

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ईपीआईसी ने इस साल के शुरू में दिल्ली के लिए एक समान अध्ययन जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम(NCAP) लागू होने पर दिल्ली के निवासी अपना जीवनकाल 3.35 साल बढ़ा सकते हैं। एनसीएपी(NCAP) का टार्गेट है कि पीएम 2.5 (ठीक, सम्मानित प्रदूषण कणों) को बीस से तीस प्रतिशत तक कम किया जा सके।

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