B’day Spl: लीसा रे कैंसर को मात देने के लिए करा चुकी हैं स्टेम सेल ट्रांसप्लांट, जानें इसकी प्रक्रिया

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अपडेट डेट जुलाई 21, 2020 . 5 मिनट में पढ़ें
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भारतीय-कनाडियन एक्ट्रेस लीसा रे कैंसर को मात देने वाली महिलाओं में से एक मानी जाती हैं। एक्ट्रेस लीसा रे कैंसर का शिकार थी जिसे मात देने के लिए उन्होंने स्टेम सेल ट्रांसप्लांट का सहारा लिया। अब वो एकदम स्वस्थ्य हैं हालांकि, अभी उनके स्वास्थ्य की देखरेख जारी है। कई लोग कैंसर जैसे गंभीर बीमारी का नाम सुनकर ही ट्राॅमा में चले जाते हैं। अगर आपका कोई परिचित या अन्य कैंसर जैसी गंभीर समस्या से पीड़ित है, तो उसे लीसा रे कैंसर से कैसे निपटी और कैसे अपने मानसिक संतुलन को बनाए रखा इसके बारे में जानना चाहिए।

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जानिए लीसा रे को था कौन सा कैंसर

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क्या है मल्टीपल माइलोमा?

लीसा रे मल्टीपल माइलोमा का शिकार थीं जो कि एक बहुत ही रेयर केस होता है। मल्टीपल माइलोमा ब्लड कैंसर का ही एक प्रकार होता है, जो प्लाज्मा सेल्स का कैंसर होता है। इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति के खून में व्हाइट बल्ड सेल संबंधी परेशानी होने लगती है। मल्टीपल माइलोमा के कैंसर में कैंसर कोशिकाएं बोन मैरो में एकत्रित होने लगती है और स्वस्थ कोशिकाएं को भी प्रभावित करना शुरू कर देती हैं। साल 1848 में पहली बार मल्टीपल माइलोमा को परिभाषित किया गया था। मल्टीपल माइलोमा के कारण गुर्दे के रोगों की संभावना भी बढ़ जाती है क्योंकि ये कैंसर कोशिकाएं असामान्य प्रोटीन पैदा करता हैं जो किडनी के कार्यों में बाधा बन सकता है।

मल्टीपल माइलोमा कैंसर होने के कारण क्या हैं?

मल्टीपल मायलोमा का कैंसर जिसे लीसा रे कैंसर भी कह सकते हैं मैलिग्नेंट प्लाज्मा सेल्स के कारण होता है। प्लाज्मा कोशिकाएं एंटीबॉडीज बनाती हैं, जो शरीर में कीटाणुओं के हमले के समय लड़ती है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती हैं। हमारे रक्षातंत्र में कई तरह की कोशिकाएं होती हैं। ये सभी कोशिकाएं मिलकर शरीर के अंदर बनने वाले संक्रमण या किसी बाहरी आक्रमण का मुकाबला करती हैं। जिनमें लिम्फोसाइट्स प्रमुख होती है। ये दो तरह की होती हैं पहली- टी-सेल्स और दूसरी- बी-सेल्स। हमारे शरीर पर जब कोई वायरस हमला करता है तो बी-सेल्स मजबूत होकर प्लाज्मा सेल्स बनाने का कार्य करता है। ये प्लाज्मा सेल्स अपनी सतह पर एंटीबॉडीज बनाते हैं, जो इस तरह की स्थितियों से शरीर की रक्षा करने में मदद करता है। इन एंटीबॉडीज को इम्युनोग्लोब्युलिन भी कहते हैं। लिम्फोसाइट्स शरीर के कई हिस्सों जैसे लिम्फ नोड, बोन मैरो, आंतों और खून में पाए जाते हैं, लेकिन प्लाज्मा सेल्स आमतौर पर बोन मैरो में ही पाए जाते हैं।

बोन मैरो हड्डियों के अंदर पाए जाने वाले कोमल टिशू को कहते हैं। प्लाज्मा सेल्स के अलावा बोन मैरो में और तरह के ब्लड सेल्स बनाने वाले हिस्से भी होते हैं। शरीर के किसी भी अंग में जब जरूरत से ज्यादा बढ़ोतरी होने लगे और कोशिकाएं अनियमित ढंग से विभाजित होने लगें तब कैंसर का जोखिम बन सकता है। जब प्लाज्मा सेल्स कैंसर से ग्रस्त होने लगते हैं, तो वे अनियंत्रित होकर तेजी विभाजित होने लगते हैं और गांठ का रूप में बदलने लगते हैं। इससे प्लाज्मासाइटोमा कहते हैं। अगर शरीर में इसकी वजह से सिर्फ एक ही गांठ बनती है तो इसे आइसोलेटेड या सोलिटरी प्लाज्मासाइटोमा कहते हैं, लेकिन अगर शरीर में इसके कारण एक से अधिक गांठे बनती हैं तो इसे मल्टीपल माइलोमा कहते हैं। जो प्लाज्मा सेल्स में बनते हैं। मल्टीपल माइलोमा के कारण प्लाज्मा सेल्स तेजी से बढ़ता है औप यह बोन मैरो में फैल जाता है। इसके कारण शरीर की दूसरी कोशिकाओं को बढ़ने के लिए पर्याप्त जगह नहीं मिल पाती है।

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मल्टीपल माइलोमा के लक्षण क्या हैं?

लीसा रे कैंसर के लक्षण यानी मल्टीपल माइलोमा के लक्षण कई होते हैं, जो कई बार बहुती ही सामान्य लक्षण जैसे होते हैं। इसके सभी लक्षण अलग-अलग समय या एक समय में भी देखे जा सकते हैं। इनमें शामिल हैंः

  • शरीर की हड्डियों में दर्द की शिकायत होना, विशेषकर आपकी रीढ़ की हड्डी या छाती की हड्डी में
  • जी मिचलाना
  • कब्ज की समस्या होना
  • भूख में कमी महसूस करना
  • मानसिक या उतावलापन या उलझन महसूस करना
  • थकान महसूस करना
  • बार-बार किसी तरह का संक्रमण होना, जैसे-फ्लू या अन्य संक्रमित स्वास्थ्य स्थितियां
  • वजन घटना
  • पैरों का कमजोर होना या सुन्न होना
  • बहुत ज्यादा प्यास लगना

एक्सपर्ट्स की मानें, तो मल्टीपल माइलोमा लगभग हमेशा एक सौम्य स्थिति के रूप में शुरू होता है जिसे मोनोक्लोनल गैमोपैथी कहा जाता है। हालांकि, इसके पीड़ितों की संख्या बहुत ही कम होती है। इसका जोखिम बढ़ती उम्र के दौरान अधिक होता है। भारत में इसकी स्थिति बहुत ही रेयर है। जनसंख्या का लगभग 1 फीसदी से भी कम मामले हर साल भारत में पाए जाते हैं। हालांकि, लीसा रे कैंसर के लक्षणों को शुरूआती दौन में ही समझ गई थीं और उचित उपाचर से इसको मात भी दी। इसके अलावा, मल्टीपल माइलोमा महिलाओं के मुकाबले पुरुषों में अधिक होता है।

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मल्टीपल माइलोमा की जांच कैसे की जा सकती है?

मल्टीपल माइलोमा की जांच करने के कई तरीके हैं, जिनमें शामिल हैंः

लैब टेस्ट

लैब टेस्ट के दौरान खून का नमूना लिया जाता है जिससे खून में प्रोटीन और बीटा -2 माइक्रोग्लोबुलिन की मात्रा जांची जाती है। खून में पाए जाने वाले प्रोटीन के प्रकार भी मायलोमा के खतरे की पुष्टि कर सकते हैं। इसके अलावा, किडनी के कार्य करने की क्षमता और कैल्शियम के स्तर की जांच के लिए भी ब्लड टेस्ट किया जा सकता है। अगर आपको मल्टिपल मायलोमा है तो आपके खून का प्रोटीन असमान होगा। इससे आपके खून में चिपचिपाहट दिखेगी जो कि असाधारण ब्लड सेल्स के बनने की वजह से होगी। ब्लड टेस्ट के अलावा डॉक्टर आपको यूरिन टेस्ट की भी सलाह दे सकते हैं।

इमेजिंग टेस्ट

हड्डियों की समस्याओं का पता लगाने के लिए एक्स-रे, एमआरआई, सीटी और पीईटी स्कैन जैसे इमेजिंग टेस्ट किए जा सकते हैं।

बोन मैरो टेस्टिंग

बोन मैरो टेस्ट करने के लिए डॉक्टर्स रीढ़ ही हड्डी से टिश्यू का एक टुकड़ा लेते हैं, जिसका परीक्षण करके मल्टीपल माइलोमा की स्थिति की पुष्टी की जा सकती है। इसके बोन मैरो बायोप्सी भी कहा जाता है।

ब्लड मोनोक्लोनल इम्म्यूनोग्लोबिन टेस्ट

इसके अलावा ब्लड मोनोक्लोनल इम्म्यूनोग्लोबिन टेस्ट और रेडियोलोजी टेस्ट भी करवाए जा सकते है। इनकी मदद से हड्डियों में कितने गहराई तक कैंसर पहुंचा है इसकी जांच की जा सकती है।

फिश टेस्ट (Fluorescence in situ hybridization)

फिश टेस्ट के जरिए मायलोमा कोशिकाओं का विश्लेषण किया जाता है। यह आनुवंशिक दोषों की तलाश करता है और यह निर्धारित करता है कि मायलोमा कोशिकाएं कितनी तेजी से गुणा करके फैल रही हैं।

टेस्ट के जरिए डॉक्टर मल्टीपल माइलोमा के स्टेज को निर्धारित करते हैं। इसके तीन तरण होते हैंः

  1. स्टेज I- यानी इसकी स्थिति की शुरूआत हो रही है।
  2. स्टेज II- यानी इसकी स्थिति गंभीर बन चुकी है, तत्काल रूप से उपचार की आवश्यकता है।
  3. स्टेज III- यानी इसकी स्थिति आक्रामकहो गई है, जो काफी हद तक अंगों और हड्डियों को प्रभावित कर चुकी है।

मल्टीपल माइलोमा का उपचार कैसे किया जाता है?

एक बार इसके लक्षणों का पता चलने और इसके स्टेज का निर्धारण करने के बाद डॉक्टर आपको उचित सलाह दे सकते हैं। लीसा रे कैंसर से लड़ी और उपचार के लिए स्टेम सेल ट्रांलप्लांट के विकल्प को अपनाया था।

लीसा रे कैंसर से खूब लड़ी और इसे मात देने के लिया स्टेम सेल ट्रांसप्लांट का सहारा

लीसा रे कैंसर से जूझने के दौरान भी सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव थीं। उ्होंने अपने स्वास्थ्य से जुड़ी स्थिति और उपचार की प्रक्रिया को सोशल मीडिया पर भी साझा किया हुआ है। लीसा रे कैंसर को मात देने के बाद खुद और भी अधिक मजबूत महसूस करती हैं। लीसा रे कैंसर से कैसे बाहर आई इसके बारे में उन्होंने अपनी किताब ‘क्लोज टू द बोन’ भी लिखी है।

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स्टेम सेल ट्रांसप्लांट क्या है?

स्टेम सेल ट्रांसप्लांट में बोन मैरो में कैंसर कोशिकाओं को खत्म करने के लिए कीमोथेरेपी की प्रक्रिया अपनाई जाती है। जिससे रोगी के शरीर में नई, स्वस्थ रक्त बनाने वाली स्टेम कोशिकाओं का विकास करने में मदद मिलती है। स्टेम सेल ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया आमतौर पर मल्टीपल माइलोमा के इलाज के लिए ही की जाती है। प्रत्यारोपण से पहले, रोगी के शरीर में माइलोमा कोशिकाओं की संख्या को कम करने के लिए दवा की खुराक दी जाती है।

स्टेम सेल ट्रांसप्लांट (एससीटी) ऑटोलॉगस या एलोजेनिक हो सकता है।

ऑटोलॉगस स्टेम सेल ट्रांसप्लांट

ऑटोलॉगस स्टेम सेल ट्रांसप्लांट में, मरीज के रोगग्रस्त कोशिकाओं को बदलने के लिए उसके खुद के शरीर के कोशिकाओं ‎का उपयोग करते हैं। इस प्रक्रिया के बाद संक्रमण होने का खतरा बहुत कम होता है।

एलोजेनिक स्टेम सेल ट्रांसप्लांट

एलोजेनिक स्टेम सेल ट्रांसप्लांट के दौरान, एक डोनर की स्टेम कोशिकाओं का उपयोग किया जाता है। इसकी प्रक्रिया से पहले रोगी और डोनर की स्टेम कोशिकाओं को मिलाया जाता है। इसलिए, आमतौर पर, भाई-बहन या परिवार के अन्य सदस्यों को ही डोनर के तौर पर चुना जा सकता है। हालांकि, प्रत्यारोपण होने के बाद भी इसकी प्रक्रिया कितनी अच्छे से काम करेगी यह बताना मुश्किल है।

लीसा रे कैंसर के लक्षणों और स्टेज को अच्छी तरह समझ गईं थीं। रिस्क को देखते हुए ही उन्होने अपने लिए ऑटोलॉगस स्टेम सेल ट्रांसप्लांट का विकल्प चुना था। हालांकि, हर किसी के लिए मल्टीपल माइलोमा का उपचार अलग-अलग हो सकता है।

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