कोरोना का इलाज माने जा रहे एचआईवी ड्रग की ब्लैक मार्केट हो रही है तैयार

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अपडेट डेट जून 3, 2020 . 4 मिनट में पढ़ें
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कोरोना वायरस की बीमारी कोविड- 19 का इलाज ढूंढने के लिए दुनिया के तमाम वैज्ञानिक और शोधकर्ता अलग-अलग तरह की वैक्सीन के प्रभाव पर अध्ययन कर रहे हैं। इन्हीं शोध और अध्ययनों के आधार पर SARS-CoV-2 के इलाज के लिए एक एचआईवी ड्रग को काफी प्रभावशाली माना जा रहा है। दरअसल, यह ड्रग दो दवाओं के मिश्रण से मिलकर बना है और एचआईवी मरीज के इलाज में काफी असरदार साबित होता है। लेकिन, चौंकाने वाली बात यह है कि इस ड्रग के कोविड- 19 के इलाज में प्रभाव पर कोई निष्कर्ष निकलने से पहले ही एचआईवी ड्रग की ब्लैक मार्केट (कालाबाजारी) शुरू होने लगी है। जानें क्या है पूरा मामला…

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एचआईवी ड्रग की ब्लैक मार्केट कहां हो रही है तैयार

दुनियाभर में अलग-अलग कई जगह एचआईवी ड्रग कॉम्बो लोपीनावीर और रिटोनावीर (Lopinavir and Ritonavir) के कोरोना वायरस के मरीज के इलाज में प्रभाव पर अध्ययन चल रहा है। जो कि रशिया में कालेटरा और कालीडेवीर (Kaletra and Kalidavir) ब्रांड से उत्पादित होती है और भारत में भी अन्य नाम से इस दवा का उत्पादन होता है। जनवरी के अंत में चीन द्वारा इसके प्रभाव के बारे में इशारा करने के बाद रशिया की हेल्थ मिनिस्ट्री ने भी इसे कोविड-19 के संभावित इलाज के तौर पर देखा था। हालांकि, बाद में चीन ने कोरोना वायरस के इलाज में इसके प्रभाव पर अनिश्चितता बताई थी। उससे पहले भारत भी इस दवा को कोरोना के ट्रीटमेंट में प्रभावी मानकर ट्रायल शुरू कर चुका था। इन्हीं संभावनाओं के बाद रशिया में इस दवा के लिए ब्लैक मार्केट तैयार होनी अभी से शुरू हो गई है।

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एचआईवी ड्रग की कालाबाजारी पर क्या कहते हैं दवा उत्पादक

सट्टेबाजों ने कोरोना वायरस के फैलने के बाद वहां इस दवा की शॉर्टेज होने का सट्टा लगाया है, जिसके बाद वहां इस दवा को खरीदकर स्टोर करने की होड़ लग गई। जिससे महामारी के इलाज में इसकी जरूरत पड़ने पर वह इस दवा को दोगुने या तीगुने दामों पर बेच सकें। एक न्यूज वेबसाइट के मुताबिक, एचआईवी ड्रग बेचने वाले रशिया के एक ऑनलाइन ट्रेडर ने कहा कि, कुछ महीने पहले तक  लोग इस एचआईवी ड्रग के एक बॉक्स को 900 रूबल्स (रशियन करेंसी) करीबन 900 रु में खरीद रहे थे। लेकिन, सट्टा बाजार गर्म होते ही लोग इसके 100 से लेकर 700 बॉक्स को 3,800 रूबल्स (3,800 रु) प्रति बॉक्स खरीदना चाह रहे हैं। जिससे मार्केट से इसकी बड़ी मात्रा खरीदकर स्टोर कर सकें और मार्केट में इसके दामों को बढ़ाकर कालाबाजारी कर सकें। एक अनुमान के मुताबिक, एचआईवी ड्रग की ब्लैक मार्केट करने वाले लोग इसे बाद में 7000 से 8000 रूबल्स (7 से 8 हजार रु) तक बेच सकते हैं।

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एचआईवी ड्रग की ब्लैक मार्केट से HIV मरीजों को हो सकती है परेशानी

विशेषज्ञों का मानना है कि, रशिया या विश्व के अन्य देशों में इस तरह कोरोना के संभावित इलाज में प्रभावशाली एचआईवी ड्रग की कालाबाजारी होने से सबसे बड़ी दिक्कत एचआईवी के शिकार मरीजों को झेलनी पड़ेगी। क्योंकि, इससे उन्हें इस दवा को उपलब्ध करवाने या ऊंचे दामों में खरीदने में परेशानी का सामना करना पड़ेगा। इस दवा को बिना किसी निगरानी या ओवर द काउंटर लेने के बाद सेवन करने पर साइड इफेक्ट का सामना भी करना पड़ सकता है। हालांकि, यह ओवर द काउंटर खरीदी जाने वाली दवाओं की लिस्ट में शामिल नहीं है।

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भारत ने भी बताया था इसे कोरोना के इलाज में प्रभावशाली

भारत में मार्च की शुरुआत में 60 वर्ष से अधिक उम्र के एक इटालियन कपल कुछ लक्षणों के आधार पर जांच में कोरोना वायरस से ग्रसित पाया गया था। जिनको कोरोना वायरस की दवाई के रूप में एंटी-एचआईवी ड्रग लोपीनावीर और रिटोनावीर (Lopinavir and Ritonavir) का कॉम्बो दिया गया। डॉक्टरों के मुताबिक, दोनों की स्थिति सुधरने लगी थी। जिसके बाद इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने 60 वर्ष से अधिक उम्र के कोरोना वायरस पीड़ित लोगों को इस एंटी-एचआईवी ड्रग कॉम्बो के उपयोग को एमरजेंसी अप्रूवल दे दिया था। हालांकि, बाद में जयपुर के एक प्राइवेट हॉस्पिटल में कपल में से एक 69 वर्षीय व्यक्ति की कार्डिएक अरेस्ट की वजह से मौत हो गई थी। इसी दवा का क्लिनिकल ट्रायल चीन में किया गया था, जहां यह शुरुआती ट्रायल में खास नतीजा दिखाने में विफल रही थी।

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HIV दवा की कालाबाजारी : रेमडेसिवीर दवा को भी माना जा रहा संभावित इलाज

कोरोना वायरस के संभावित इलाज के रूप में रेमडेसिवीर दवा पर हुई स्टडी पर अपनी बात रखते हुए आईसीएमआर के एपिडेमियोलॉजी एंड कम्युनिकेबल डिजीज (Epidemiology and Communicable Disease) विभाग के प्रमुख, रमन गंगाखेडकर ने कहा था कि, ‘नई स्टडी के मुताबिक इबोला वायरस आउटब्रेक के दौरान इस्तेमाल की जाने वाली रेमडेसिवीर दवा को कोरोना वायरस के रिप्रोडक्शन में बाधा डालते हुए देखा गया है, जिस वजह से यह माना जा रहा है कि यह कोविड- 19 ट्रीटमेंट के दौरान इस्तेमाल हो सकती है। लेकिन हम विश्व स्वास्थ्य संगठन के नतीजों का इंतजार करेंगे और अगर डब्ल्यूएचओ ने इसके इस्तेमाल को मंजूरी दी तो हम इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन, चूंकि यह दवा अभी हमारे देश में मौजूद नहीं है और सरकार द्वारा अन्य फार्मासियुटिकल कंपनियों को इसके उत्पादन के लिए आमंत्रित किया जा सकता है।’

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कोविड-19 की ताजा जानकारी
देश: भारत
आंकड़े

1,435,453

कंफर्म केस

917,568

स्वस्थ हुए

32,771

मौत
मैप

बीसीजी वैक्सीन और हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वाइन दवा पर भी चल रहा है शोध

रेमडेसिवीर दवा के अलावा बीसीजी वैक्सीन और हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वाइन दवा पर भी कोरोना वायरस के इलाज में प्रभावशीलता पर शोध चल रहा है। हाल ही में हुए शोध में पता चला था कि, जिन देशों में टीबी जैसे लंग इंफेक्शन को खत्म करने के लिए बीसीजी टीके का इस्तेमाल हो रहा है, वहां कोरोना वायरस के मामले कम देखने को मिल रहे हैं। इसके अलावा, कोरोना वायरस के इलाज में हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वाइन ड्रग (Hydrocychloroquine drug) का प्रभाव देखने के लिए भी शोध किया जा रहा है। दरअसल, हाइड्रोक्सी कोलोरोक्वाइन एक एफडीए मान्यता प्राप्त एंटीमलेरियल ड्रग है जो कि मुंह द्वारा लिया जाता है। मलेरिया के अलावा, यह रूमेटाइड अर्थराइटिस और ल्यूपस एरिथेमेटोसस (rheumatoid arthritis and lupus erythematosus) बीमारी में भी इस्तेमाल की जाती है। यह कम उम्र के बच्चों के लिए नहीं दी जाती है, इसलिए इस दवा का सेवन सिर्फ डॉक्टर द्वारा बताए गए तरीके से ही करना चाहिए। हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वाइन टैबलेट्स का गलत इस्तेमाल करने से कई गंभीर दुष्प्रभावों का सामना करना पड़ सकता है।

कोरोना वायरस के लक्षणों को अनदेखा न करें। कोरोना वायरस से सावधानी ही इस बीमारी से दूर रहने का एकमात्र उपाय है। कोरोना से बचने के लिए हाइजीन का पूरा ख्याल रखें और साथ ही सोशल डिस्टेंसिंग को नजरअंदाज न करें।

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