बच्चों की नींद के पैटर्न को अपने शेड्यूल के हिसाब से बदलें

By Medically reviewed by Dr. Pranali Patil

बच्चों की नींद का समय ही नए पेरेंट्स के लिए उनके खुद के लिए बचा थोड़ा समय रह जाता है। यह समय उनके लिए आराम करने और अन्य जरूरी काम निपटाने का मौका होता है। यह वो समय है जब शायद वे खुद झपकी ले लेते हैं? सभी पेरेंट्स इस बात से सहमत होंगे कि पेरेंटिंग कोई आसान काम नहीं है और साथ ही आपको अपना सारा काम और यहां तक कि अपनी खाने की आदतों को भी बच्चों के सोने के लिहाज से बदलनी पड़ जाती हैं। ऐसे में खुद को थोड़ा समय देने के लिए आप बच्चे की नींद के पैटर्न में बदलाव कर सकते हैं।

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बच्चों की नींद के लिए सामान्य टिप्स

बच्चों की नींद क्यों जरूरी है?

जब एक बच्चा सोता है, तो उसके अंदर बहुत से बायोलॉजिकल प्रोसेस होते हैंः

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इन वजहों से बदलता है बच्चों की नींद का पैटर्न

  • हर बच्चे की उम्र, परिपक्वता और उनके विकास की गति सोने के समय में बदलाव का कारण होती है।
  • बच्चों के सोते समय घर में और क्या चल रहा है, यह भी बच्चों की नींद के पैटर्न पर असर डालता है।
  • माता-पिता बच्चे को दिन में कितनी देर सुलाते हैं यह भी उनकी नींद के पैटर्न पर असर डालता है।
  • परिवार की लाइफस्टाइल भी बच्चों की नींद को प्रभावित करती है।
  • एक्टिव बच्चे शारीरिक रूप से अधिक थक जाते हैं और सोना चाहते हैं।
  • घर में होने वाला शोर भी बच्चों की नींद के पैटर्न के लिए जिम्मेदार है।
  • आहार और दूध का सेवन। जिन बच्चों को भूख ज्यादा लगती है वे जल्दी जाग जाते हैं। प्रोटीन और आयरन बच्चे के दिमाग और उनके विकास के लिए जरूरी हैं।

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बच्चों की दिन की नींद किस उम्र से होती है कम

आम तौर पर 14 महीने की उम्र बच्चा दिन में कम सोने लगता है। कुछ टॉडलर्स इससे कम उम्र में दिन में सोना छोड़ देते हैं और कुछ इससे बड़े होने के बाद भी दिन में सोना जारी रखते हैं। लेकिन, आमतौर पर बच्चों के लिए 14 महीने को दिन की नींद छोड़ने के लिए औसत आयु माना जाता है। एक सामान्य पैटर्न यह है कि सुबह की नींद थोड़ी देर से आती है। दोपहर की नींद पहले आती है और शाम की नींद को दोपहर के भोजन के बाद एक साथ दिया जाता है।

दो बार सुलाने की बजाए जब आप बच्चे को एक बार सुलाते हैं, तो कुछ दिन ऐसे होंगे जब आपका बच्चा और सोना चाहेगा। कुछ दिनों में वे एक नींद के लिए पूरी तरह से कंफर्टेबल हो जाते हैं।  जब वे विकास के दौर से गुजर रहे होते हैं, तो उनके अधिक थके होने की संभावना होती है। आप देखते हैं कि जब वो दिन में नहीं सोते, तो उन्हे रात में थोड़ा जल्दी सोने की जरूरत होती है या अगर वे सुबह बहुत जल्दी उठते हैं, तो उन्हें दिन में दो बार सोने की जरूरत होती है।

बच्चों की नींद के लिए माता-पिता को फ्लेक्सिबल रहना पड़चा है। बच्चे को दो बार से एक बार सुलाने के लिए माता-पिता को अच्छी तरह से मैनेज करने में अधिक समय और थोड़ी संवेदनशीलता की जरूरत होती है।

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बच्चों की नींद में बदलाव लाने के जरूरी टिप्स

  •  अगर आपका बच्चा लगभग 14 महीने का है और अभी भी दो टाईम की नींद ले रहा है, तो ऐसे संकेतों को देखें कि वह कब एक टाइम की नींद को छोड़ने के लिए तैयार हैं। जब बच्चा एक ही टाइम सोता है, तो वह देर तक सोता है, जिससे पेरेंट्स को ज्यादा समय मिलता है।
  • अगर आपका बच्चा सोने के समय बिल्कुल एक्टिव और सतर्क रहता है, तो उनके इशारों को समझें, वह दिन में सोना छोड़ने के लिए तैयार हैं।
  • जब बच्चों की नींद में बदलवा करना हो, तो दोपहर का भोजन जल्दी कराएं और फिर अपने बच्चे को सुलाएं।
  • बच्चों को दोपहर का भोजन लगभग 11 से 12 बजे के बीच कराएं और फिर कुछ घंटों की नींद उनके स्लीपिंग पैटर्न को बदलने में मदद करती है।
  • अगर आपके बच्चे को दौड़ना या चलना पसंद है, तो उसे सुबह या शाम को जागने के बाद उसे चलने दें।
  • अगर वे दिन में दो बार नींद ले रहे हैं या वे दोपहर 3 बजे के बाद जाग रहे हैं, तो वे रात को सोने के लिए अनिच्छुक हो सकते हैं।
  • दिन और रात दोनों समय सोने के लिए एक ही रूटिन को फॉलो करें। कंसिस्टेंसी जरूरी है।
  • अपने टॉडलर के थके हुए इशारों के प्रति संवेदनशील रहें। वे आपको बताएंगे कि उन्हें अभी भी कितनी नींद की जरूरत है।
  • अपने बच्चे की नींद और रूटिन के लिए फ्लेक्सिबल रहें।

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