डिलिवरी में ब्लीडिंग हो सकती है जानलेवा! जानें क्या होता है प्लासेंटा एक्रीटा

चिकित्सक द्वारा समीक्षित | द्वारा

अपडेट डेट जुलाई 8, 2020 . 5 मिनट में पढ़ें
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डिलिवरी में ब्लीडिंग गंभीर समस्या है। बच्चे के जन्म के तुरंत बाद ही ब्लीडिंग होने लगती है। मेडिकल टर्म में डिलिवरी में ब्लीडिंग को प्लासेंटा एक्रीटा भी कहा जाता है। प्लासेंटा एक्रीटा में प्लासेंटा के कई प्रकार होते हैं। गर्भावस्था के समय में जब मां शिशु को जन्म देती है उस दौरान शिशु के साथ प्लासेंटा बाहर आ जाता है। यह सामान्य व प्राकृतिक प्रक्रिया है यदि ऐसा ना हो तो यह महिला के साथ डाक्टरों के लिए भी परेशानी उत्पन्न हो जाती है।

जमेशदपुर की सीनियर गायनेकोलाॅजिस्ट डा. प्रेमलता बतातीं हैं कि, ”शिशु के जन्म लेते ही प्लासेंटा मेंब्रेन (placenta membrane) भी बाहर आ जाता है। प्लासेंटा का मुख्य काम मां के द्वारा शिशु को पौष्टिक आहार, न्यूट्रिशन (nutrition), ऑक्सीजन (oxygen) और वो तमाम जरूरी चीजें पहुंचाने का होता है, जिसकी मदद से शिशु का विकास होता है। मां जो भी भोजन व पौष्टिक आहार का सेवन करती है वो शिशु को इसी प्लासेंटा की मदद से उस तक पहुंचता है। ऐसे में कई बार मां के द्वारा शिशु तक जरूरी व गैर जरूरी चीजें भी पहुंच जाती हैं। जैसे हार्मोन, प्लेटलेट्स सहित अन्य।”

प्लासेंटा शिशु के विकास में काफी अहम होता है। महिलाओं के यूट्रस (uterus) के इनर वाल में यह होता है जो शिशु के जन्म लेने के साथ ही निकल जाता है, इस दौरान ब्लीडिंग होती है, लेकिन वह कुछ समय के बाद रूक जाती है। यदि यह ना निकले तो इसके कारण डिलिवरी के बाद ब्लीडिंग होती है और वह रुकती नहीं है। अमूमन दवा या इंजेक्शन देकर बच्चे के जन्म के बाद ब्लीडिंग को रोक देते हैं। यदि खून नहीं रुकता है तो दूसरे विकल्पों को तलाशते हैं।

मुख्य रूप से प्लासेंटा एक्रीटा के हैं तीन प्रकार

डिलिवरी में ब्लीडिंग व प्लासेंटा एक्रीटा के मुख्य रूप से तीन प्रकार होते हैं। पहला एक्रीटा (acreta), दूसरा इनएक्रीटा (inacreta) और अंतिम व तीसरा परएक्रीटा (peracreta)। तीनों के अलग-अलग लक्षण होते हैं।

एक्रीटा में डिलिवरी के साथ नहीं निकलता प्लासेंटा

एक्रीटा की बात करें तो इस केस में प्लासेंटा और यूट्रस के बीच में सैपरेट होने वाली लाइन नहीं रहती है। वहीं यह यूट्रस से चिपका रहता है। ऐसे में जब गर्भावस्था का समय पूरा होने के बाद शिशु जन्म लेता है तो उस स्थिति में प्लासेंटा के यूट्रस से चिपके होने की वजह से वो शिशु के साथ बाहर नहीं निकल पाता। ऐसे में शिशु के निकलने के बाद भी यूट्रस में प्लासेंटा का मेंब्रेन (membrane) रह जाता है। इस कारण ही डिलिवरी में ब्लीडिंग होनी शुरू हो जाती है। इसके बाद डाक्टरों की जिम्मेदारी होती है कि वे ऑपरेशन करके या फिर दवा देकर अंदर रह गए प्लासेंटा को निकालें। यदि ये नहीं निकलेगा तो इससे मां को काफी परेशानी हो सकती है, बच्चे के जन्म के बाद अधिक ब्लीडिंग होने का यदि समय पर इलाज ना हो पाए तो इससे मां की जान तक जा सकती है। डाक्टरों की यही कोशिश रहती है कि डिलिवरी में ब्लीडिंग को रोका जा सके।

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प्लासेंटा यूट्रस में न रहकर अंदर तक चला जाए तो हो सकती है बड़ी परेशानी

दूसरा कारण होता है इनएक्रीटा। बकौल डा. प्रेमलता इनएक्रीटा की स्थिति में प्लासेंटा यूट्रस से निकल शरीर के अंदर तक चला जाता है। यह पहले से काफी घातक साबित हो सकता है। इस केस में भी शिशु के जन्म के साथ प्लासेंटा (मेंब्रेन) बाहर नहीं निकलता और यूट्रस में न रहकर मसल्स तक पहुंच जाता है। इस स्थिति में मरीज रिस्पांस नहीं कर पाता है। इस केस में भी डिलिवरी में ब्लीडिंग होती है। कई केस में तो बच्चे के जन्म के बाद ब्लीडिंग रुकती तक नहीं इससे जच्चा की जान को खतरा हो सकता है। इसी लक्षण को देख डाक्टर इलाज करते हैं। वहीं यूट्रस से प्लासेंटा को निकाल नहीं पाते, इसके बार डाक्टर उपचार करते हैं। मेडिकल ट्रीटमेंट के बाद ही मरीज को बचाया जा सकता है। डाक्टरों की कोशिश रहती है कि डिलिवरी में ब्लीडिंग को किसी प्रकार से रोका जा सके।

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तीसरा परएक्रीटा में एब्डॉमिनल सर्फेस तक पहुंच जाता है प्लासेंटा

एक्सपर्ट के अनुसार तीसरा प्रकार परएक्रीटा होता है। इस स्थिति में प्लासेंटा यूट्रीन वाल (uterine wall) को क्रास करते हुए यूट्रस को छोड़ एब्डामिनल सर्फेस (abdominal surface) तक पहुंच जाता है। यह एक पैथेलाजिक कंडीशन है और यह काफी रेयर होता है। इस अवस्था का सबसे अहम लक्षण होता है कि जैसे ही मां शिशु को जन्म देती है उस समय ही हेवी ब्लीडिंग (heavy bleeding) होने लगती है। कई परिस्थितियों में मरीज को होश तक नहीं रहता है। बता दें कि मेडिकल हिस्ट्री में डिलिवरी में ब्लीडिंग क्यों होती है और उसके सही-सही कारणों का अब तक पता नहीं लग सका है। ऐसे में देश-दुनिया के तमाम डाक्टर मरीज के शुरुआती लक्षण जैसे हेवी ब्लीडिंग को देखकर ही उपचार करते हैं।

इसलिए डिलिवरी के बाद अल्ट्रासाउंड है जरूरी

डिलिवरी के बाद अल्ट्रासाउंड इसलिए भी जरूरी है कि क्योंकि इसे करने बाद ही डाक्टर रिपोर्ट को देखकर यह पता लगाते हैं कि मां के गर्भ से शिशु के निकलने के बाद कहीं कुछ पदार्थ जो शिशु के साथ ही निकल जाने चाहिए थे वो मां की कोख में अभी भी तो फंसे नहीं रह गए हैं। अल्ट्रासाउंड की रिपोर्ट की मदद से उसकी जांच की जाती है। लक्षणों को देखकर ही मेडिकल ट्रीटमेंट किया जाता है।

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कुछ दवाएं जो हैं कारगर

इनएक्रीटा और परएक्रीटा की स्थिति में मरीज को कुछ इंजेक्शन दिए जाते हैं जिनमें

  • यूट्रो टॉनिक इंजेक्शन (uterotonic injection)
  • ऑक्सिटॉसिन इंजेक्शन (oxytocin injection)
  • मैथरेजीन इंजेक्शन (Methergine injection)
  • प्रोस्टाग्लैंडिंग इंजेक्शन (prostaglandin injection)
  • मैथोट्रीएक्सेट इंजेक्शन (methotrexate injection)

आदि इंजेक्शन मरीज को देकर उपचार किया जाता है।

प्लासेंटा एक्रीटा के दुष्परिणाम 

डाॅक्टर्स के अनुसार यह कोई असामान्य प्रक्रिया या बीमारी नहीं है बल्कि डिलिवरी में ब्लीडिंग गर्भावस्था के समय होने वाली एक प्रक्रिया है, लेकिन ब्लीडिंग के कारण कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। यह सिर्फ गर्भावस्था के समय जब मां शिशु को जन्म देती है उसके बाद ही इस अवस्था से संबंधित परेशानियों का पता चलता है। डिलिवरी में ब्लीडिंग के कारण महिला को कमजोरी, शिशु को ब्रेस्टफीडिंग न करा पाना, चक्कर आना, बेहोशी होना इसकी सामान्य परेशानियां हैं। ऐसे में डाक्टर इंजेक्शन और खून चढ़ाकर इलाज करते हैं। डिलिवरी में ब्लीडिंग होने की वजह से मां को काफी कमजोरी आती है, जिसकी भरपाई खून चढ़ाकर ही की जाती है।

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स्थिति और ज्यादा न बिगड़े इसलिए निकाल देते हैं बच्चेदानी

गायनेकोलाॅजिस्ट डाॅ. प्रेमलता बताती हैं कि, ”डिलिवरी में ब्लीडिंग के कारण स्थिति और ज्यादा ना बिगड़े ऐसा सोचकर या फिर एनएक्रीटा व परएक्रीटा की कंडिशन में महिला के हालात यदि ज्यादा बिगड़ जाए और जान का खतरा महसूस हो तो इस स्थिति में मरीज की बच्चेदानी को निकाल दिया जाता है। ऐसा तभी किया जाता है जब तमाम कोशिशों के बावजूद डिलिवरी के बाद ब्लीडिंग नहीं रुकती है। यदि बच्चेदानी को निकाल दिया जाए तो फिर वह महिला कभी मां नहीं बन सकती है।

प्लासेंटा एक्रीटा के बारे में पता चल जाए तो 

यदि आप प्लासेंटा एक्रीटा से ग्रसित हो और जांच में यह पता चल जाए तो उस परिस्थितियों में आपको मेडिकल स्पेशलिस्ट डाक्टरों से सलाह लेने की आवश्यकता है। जो इस प्रकार की परिस्थितियों से वाकिफ हों। टोरंटो माउंट सिनाई हास्पिटल के मेडिकल स्पेशलिस्ट जान किंगडम बताते हैं कि यदि आप ग्रामीण इलाकों में रहते हैं तो उस स्थिति में आपको बड़े शहरों की ओर रूख करना होगा क्योंकि इसका इलाज बड़े अस्पताल में ही संभव है। ताकि डिलिवरी व डिलिवरी में ब्लीडिंग का डाॅक्टर आसानी से हल निकाल सके। क्योंकि डिलिवरी में ब्लीडिंग जैसी परिस्थितियों में रेडियोलाॅजिस्ट, डायग्नोस्टिक इमेजिंग स्पेशलिस्ट, यूरोलाॅजिस्ट, आब्स्टेट्रिशियन की सलाह की आवश्यकता पड़ सकती है। जरूरत पड़ने पर खून भी चढ़ाना पड़ सकता है।

डिलिवरी में ब्लीडिंग की आशंका होने पर शिशु के जन्म के पहले से ही यह तमाम एहतियात बरतना जरूरी हो जाता है। 35 सप्ताह के बाद हर एक दिन गर्भवती की जांच करना जरूरी हो जाता है। क्योंकि उस अवस्था में ब्लीडिंग की काफी संभावना बनी रहती है। यदि ब्लीडिंग होती है तो उस स्थिति में इमरजेंसी सर्जरी की आवश्यकता पड़ सकती है। वहीं सर्जरी के पूर्व गर्भवती को अस्पताल के आसपास ही रहने की सलाह दी जाती है। वहीं गर्भवती को संभोग (intercource) करने व कठिन व्यायाम न करने की सलाह दी जाती है।

प्लासेंटा एक्रीटा का कैसे लगाया जाता है पता

कई बार प्लासेंटा एक्रीटा के बारे में अल्ट्रासाउंड में ही पता लग जाता है। वहीं कई बार डाक्टर कुछ जरूरी टेस्ट कर इस बात का पता लगाने की कोशिश करते हैं कि कहीं प्लासेंटा सामान्य की तुलना में ज्यादा या कम ग्रो तो नहीं कर रहा। प्लासेंटा की जांच करने के लिए मुख्य रूप से इमेज टेस्ट, अल्ट्रासाउंड व मैग्नेटिक रिसोनेंस इमेजिंग (एमआरआई) और ब्लड की जांच कर अल्फाफेटोप्रोटीन (alphafetoprotein) की जांच की जाती है। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि डिलिवरी में ब्लीडिंग की समस्या को काफी हद तक रोका जा सके और कम किया जा सके।

अधिक जानकारी के लिए डॉक्टर से संपर्क करें।

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