शिशुओं में अनुवांशिक विकार के ये हो सकते हैं कारण, जान लें इनके बारे में

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अपडेट डेट जनवरी 15, 2020 . 4 मिनट में पढ़ें
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गुणसूत्रों या जीन्स में असमानता शिशुओं में अनुवांशिक विकार का कारण बनती है। इससे बच्चा मेंटली या फिजिकली डिसेबल हो सकता है। हमारी बॉडी में करोड़ों कोशिकाएं होती हैं। प्रत्येक कोशिका में 46 क्रोमोसोम पाए जाते हैं, जो 23-23 के जोड़े में होते हैं। इसमें से आधे गुणसूत्र बच्चे में उसकी मां से जाते हैं और आधे पिता से।

इन गुणसूत्रों में हमारे डीएनए या जीन होते हैं, जो यह र्निधारित करते हैं कि हम कैसे दिखेंगे? और हमारी बॉडी का विकास कैसे होगा? आंखों के रंग से लेकर बीमारियों के खतरों तक हमें इनके द्वारा पता चल जाता है। जिन शिशुओं में अनुवांशिक विकार यानी जेनेटिक डिसऑर्डर होता है उनके मानसिक और शारीरिक विकास धीमा होने का खतरा होता है। शिशुओं में अनुवांशिक विकार होने के कारण उनमें शारीरिक असमानता और आजीवन रहने वाली बीमारियों का खतरा भी रहता है।

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शिशुओं में अनुवांशिक विकार कैसे होता है?

भ्रूण की प्रत्येक कोशिका 46 गुणसूत्रों से बनती है, जो 23 गुणसूत्र के दो अलग-अलग जोड़े होते हैं। एक भ्रूण को बनाने के लिए 23 गुणसूत्रीय दो कोशिकाएं एक साथ आकर मिलती हैं और 46 जोड़ी जायगोट बनता है। इसके बाद ही यह भ्रूण का रूप लेता है। कुछ मामलों में कोशिकाओं के विभाजन के दौरान गुणसूत्रों का एक अतिरिक्त जोड़ा दोनों गुणसूत्र के जोड़ो में से किसी एक में मिल जाता है। यहां गुणसूत्र के दो जोड़े होने के बजाय तीन जोड़े हो जाते हैं। इस प्रकार की अनियमित्ता के चलते बच्चे में सामान्य शारीरिक और जन्मजात बदलाव पैदा होते हैं। इसे ही जेनेटिक डिसऑर्डर या शिशुओं में अनुवांशिक विकार कहा जाता है।

कुछ शिशुओं में अनुवांशिक विकार पैतृक होते हैं, जो बच्चे में अपने माता-पिता से आते हैं। इसके अतिरिक्त दूसरे अनुवांशिक बदलाव बच्चे में पहली बार आते हैं। माता पिता के जीन में परिवर्तन या गुणसूत्र में बदलाव हो सकता है। बिना किसी शारीरिक समस्या के उन्हें इसका अहसास नहीं होता।

क्यों होते हैं शिशुओं में अनुवांशिक विकार?

  • परिवार में जेनेटिक डिसऑर्डर होना
  • इसके पहले बच्चे में आनुवंशिक विकार होना
  • किसी एक पैरेंट के गुणसूत्र में असमानता
  • 35 वर्ष या इससे अधिक उम्र में गर्भधारण करना
  • 40 वर्ष या इससे अधिक उम्र में पिता बनना
  •  कई बार गर्भपात होना या मृत बच्चे का जन्म लेना

हालांकि, यह जानना जरूरी है कि कुछ जन्मदोष विकास में देरी या पिता के दवाइयों के संपर्क में आने से और एल्कोहॉल के सेवन के चलते होते हैं।

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शिशुओं में अनुवांशिक विकार के प्रकार

गुणसूत्रीय समस्या अतिरिक्त गुणसूत्र या गुणसूत्र की कमी के चलते हो सकती है। ज्यादातर मामलों में एक अतिरिक्त या कम गुणसूत्र भ्रूण के विकास में बाधा बन जाते हैं और प्रेग्नेंसी का अंत मिसकैरिज पर होता है। वहीं कुछ गुणसूत्र के चलते ऐसी भी परिस्थितयां होती हैं, जिनमें शिशु जन्म लेता है।

डाउन सिंड्रोम (ट्राईसोमी 21)

यह गुणसूत्र की सबसे ज्यादा कॉमन असमानता है, जिसमें बच्चा जीवित रह सकता है। ऐसे मामले 600 डिलिवरी में से एक में सामने आते हैं। हालांकि, पैरेंट्स की उम्र बढ़ने के साथ इसकी संभावना ज्यादा रहती है। इसलिए 45 वर्ष की उम्र में महिला के गर्भवती होने पर उसके बच्चे में डाउन सिंड्रोम का खतरा बड़ जाता है।

ऐसे बच्चों के जीवन की गुणवत्ता को सुधारने के लिए अनेक प्रकार की सेवाएं शुरू की गई हैं। इसमें चुनौतियां जरूर हो सकती हैं लेकिन, समुचित सहायता ऐसे लोगों को एक खुशनुमा जीवन जीने में मदद मिलती है।

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पटाऊ सिंड्रोम (ट्राईसोमी 18) और एडवर्ड सिंड्रोम (ट्राईसोमी 13)

पटाऊ सिंड्रोम और एडवर्ड सिंड्रोम के मामले डाउन सिंड्रोम के मुकाबले बेहद ही कम आते हैं। करीब 4,000 डिलिवरी में एक बच्चा इनसे पीड़ित हो सकता है। लेकिन, इन विकारों की स्थिति और भी ज्यादा गंभीर होती है।

इन अनुवांशिक विकारों के साथ पैदा हुए शिशुओं में कई तरह की स्वास्थ्य से संबंधित परेशानियां होती हैं। उनके दिल में भी डिफेक्ट हो सकता है। स्थिति इतनी भयावाह होती है कि वह शुरुआती एक साल तक जीवित नहीं रह पाते। इस अनुवांशिक विकार में बच्चे की नाक के नीचे और होंठ के ऊपर का हिस्सा गायब हो सकता है।

टर्नर सिंड्रोम

यह अनुवांशिक विकार सिर्फ महिलाओं में ही देखा जाता है। ऐसे मामले भी 4,000 बच्चों में से किसी एक में सामने आते हैं। इसमें दो X गुणसूत्र प्राप्त करने के बजाय टर्नर सिंड्रोम वाले बच्चे के पास सिर्फ एक X गुणसूत्र (45X) होता है।

टर्नर सिंड्रोम शिशु की बौद्धिकत्ता को प्रभावित नहीं करता है। यह उसकी लंबाई और फर्टिलिटी को प्रभावित करता है। इस सिंड्रोम से ग्रसित बच्चे को हार्ट डिफेक्ट्स, असामान्य गर्दन जैसी स्वास्थ्य से संबंधित कुछ समस्याएं हो सकती हैं लेकिन, निगरानी और उपचार के साथ टर्नर सिंड्रोम वाली महिला लंबा और स्वास्थ्य जीवन व्यतीत कर सकती है।

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क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम

यह एक अन्य सेक्स गुणसूत्र विकार है। यह पुरुषों को प्रभावित करता है। इसमें एक अतिरिक्त गुणसूत्र X (46XXY) होता है। ऐसे मामले सिर्फ 500 से लेकर 1000 डिलिवरी में से एक में सामने आता है।

इस विकार से पीड़ित लड़कों में टेस्टोस्टेरॉन का उत्पादन कम होता है। क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम से पीड़ित लड़के अक्सर लंबे होने के साथ कुछ भी सीखने में असमर्थ होते हैं। इस विकार से पीड़ित कई लड़कों को छोटी-मोटी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझना पड़ता है और वह आसानी से हेल्दी और लंबा जीवन जीते हैं।

शिशुओं में अनुवांशिक विकार का पता लगाने के टेस्ट

शिशुओं में अनुवांशिक विकार का पता लगाने के लिए कुछ तरह के टेस्ट काफी कारगर होते हैं, जिनमें एमनियोसेंटेसिस टेस्ट प्रमुख माना जाता है। साल 1970 के दशक की शुरुआत तक, शिशुओं में अनुवांशिक विकार या जन्मजात विसंगतियों का जन्म से पहले निदान करने की दिशा में एमनियोसेंटेसिस टेस्ट द्वारा गुणसूत्र संबंधी असामान्यताओं का पता लगाना था।

क्या है एमनियोसेंटेसिस टेस्ट?

एमनियोसेंटेसिस टेस्ट एक डायग्नोस्टिक टेस्ट है। जिसकी मदद से डॉक्टर मां की गर्भ में पल रहे शिशुओं में अनुवांशिक विकार का पता लगा सकते हैं। इस टेस्ट को करने के लिए डॉक्टर मां की गर्भ से एमनियोटिक द्रव का थोड़ा सा नमूना लेते हैं। इस द्रव में गर्भ में पल रहे शिशु की कुछ कोशिकाएं होती हैं और प्रयोगशाला में इनका परीक्षण किया जाता है। एमनियोसेंटेसिस टेस्ट आमतौर पर दूसरी तिमाही में 15 से 18 सप्ताह की गर्भावस्था के बीच किया जाता है। डॉक्टर इस टेस्ट की सलाह तभी देते हैं जब उन्हें शिशुओं में अनुवांशिक विकार होने की संभावना नजर आती है।

अंत में हम यही कहेंगे कि शिशुओं में अनुवांशिक विकार के कारण, प्रकार और उपचार को समझना बेहद जरूरी है। प्रेग्नेंसी से पहले गुणसूत्र की इन समस्याओं से बचने के लिए नियमित तौर पर अपने डॉक्टर के पास जाएं। इससे समय रहते इस समस्या की पहचान संभव होगी बल्कि, उचित उपचार भी हो पाएगा।

हैलो स्वास्थ्य किसी भी तरह की मेडिकल सलाह नहीं दे रहा है। अगर आपको किसी भी तरह की समस्या हो तो आप अपने डॉक्टर से जरूर पूछ लें।

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