प्रेग्नेंसी में हाॅर्मोनल बदलाव के कारण भ्रूण के विकास में मिलती है मदद

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Update Date जनवरी 24, 2020 . 4 मिनट में पढ़ें
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प्रेग्नेंसी के शुरुआती पहले हफ्ते से लेकर 42वें हफ्ते तक गर्भवती महिला के शरीर में कई तरह के शारीरिक और मानसिक बदलाव होते हैं। महीलाओं के शरीर में ये  बदलाव प्रेग्नेंसी में हाॅर्मोनल बदलाव के कारण होते हैं। ये प्रेग्नेंसी में हॉर्मोनल बदलाव गर्भवती महिला और शिशु दोनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। इस दौरान रिलीज होने वाले हॉर्मोन शिशु के विकास, गर्भवती महिला के इम्यून सिस्टम को स्ट्रॉन्ग बनाने के लिए बेहद जरूरी है।

प्रेग्नेंसी में हाॅर्मोनल बदलाव

प्रेग्नेंसी में हाॅर्मोनल बदलाव में मुख्य रूप से कुछ हॉर्मोन्स में बदलाव देखने को मिलते हैं। ऐसे ही कुछ हॉर्मोन्स हैं:

  • ह्यूमन कोरियॉनिक  गोनाडोट्रॉपिन (Human chorionic gonadotropin (hCG))
  • प्रोजेस्ट्रॉन (Progesterone)
  • ईस्ट्रोजन (Oestrogen)
  • प्रोलेक्टिन (Prolactin)
  • रिलेक्सिन (Relaxin)
  • ऑक्सिटोसिन (Oxytocin)

ह्यूमन कोरियॉनिक गोनाडोट्रॉपिन (hCG)

प्रेग्नेंसी में हॉर्मोनल बदलाव में ह्यूमन कोरियॉनिक गोनाडोट्रॉपिन भी मुख्य है। गर्भ ठहरने के बाद सबसे पहले प्लसेंटा से ह्यूमन कोरियॉनिक गोनाडोट्रॉपिन (hCG) हॉर्मोन का निर्माण होने लगता है। प्रेग्नेंसी टेस्ट से hCG की जानकारी मिल जाती है। गर्भ धारण के शुरुआती दिनों में इसका लेवल कम होता है लेकिन, कुछ ही दिनों में ह्यूमन कोरियॉनिक गोनाडोट्रॉपिन हॉर्मोन का लेवल बढ़ने लगता है। हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार, गर्भधारण के बाद ह्यूमन कोरियॉनिक गोनाडोट्रॉपिन हॉर्मोन हर 48 घंटे में डबल होने लगता है। ह्यूमन कोरियॉनिक गोनाडोट्रॉपिन (hCG) हॉर्मोन के कारण ब्लॉटिंग (पेट फूलना), पेट दर्द, पेल्विक फ्लोर मसल्स में दर्द, मतली और उल्टी आना, स्किन प्रॉब्लम्स, वजन बढ़ना, नींद न आना, सिरदर्द और स्तन में बदलाव होते हैं।

प्रेग्नेंसी में हाॅर्मोनल बदलाव में प्रोजेस्ट्रॉन भी है शामिल

ओवरी से प्रोजेस्ट्रॉन रिलीज होता है। प्रोजेस्ट्रॉन लेवल में बदलाव के कारण पीरियड्स (मासिकधर्म) अनियमित हो जाते हैं। गर्भ ठहरने के लिए प्रोजेस्ट्रॉन की अहम भूमिका होती है। प्रोजेस्ट्रॉन के लेवल में आ रहे बदलाव के कारण मूड स्विंग्स, डिप्रेशन और एकने जैसी परेशानी शुरू हो जाती हैं। इस तरह प्रेग्नेंसी में हाॅर्मोनल बदलाव का महिलाओं के व्यवहार पर गहरा असर पड़ता है।

प्रेग्नेंसी में हाॅर्मोनल बदलाव में ईस्ट्रोजन 

ईस्ट्रोजन हॉर्मोन महिलाओं के लिए बेहद जरूरी है। ईस्ट्रोजन की कमी के कारण अनियमित पीरियड्स, तनाव और इनफर्टिलिटी की समस्या शुरू हो सकती है। प्रेग्नेंसी के दौरान ईस्ट्रोजन गर्भ में पल रहे भ्रूण (Embryo) के विकास में सहायक होता है।

 प्रोलेक्टिन

प्रोलेक्टिन हॉर्मोन गर्भ में पल रहे शिशु के लिए शारीरिक विकास के साथ-साथ लंग्स और ब्रेन के विकास के लिए अनिवार्य होता है। प्रोलेक्टिन हॉर्मोन गर्भ में पल रहे शिशु के साथ-साथ गर्भवती महिला की इम्यून सिस्टम को भी स्ट्रॉन्ग बनाने में मदद करता है। यही नहीं ब्रेस्ट मिल्क का प्रोडक्शन प्रोलेक्टिन हॉर्मोन के कारण ही होता है।

 रिलेक्सिन भी है प्रेग्नेंसी में हाॅर्मोनल बदलाव में शामिल

पहली तिमाही में रिलेक्सिन का लेवल ज्यादा होता है लेकिन, उसके बाद रिलेक्सिन हॉर्मोन के लेवल में कमी आ जाती है। रिलेक्सिन हॉर्मोन समय से पहले डिलिवरी न हो इसमें सहायक होता है। ब्लड वेसेल्स को आराम देने के साथ-साथ किडनी और प्लसेंटा तक ब्लड सप्लाई को बैलेंस्ड रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

 प्रेग्नेंसी में हॉर्मोनल बदलाव में शामिल हैं ऑक्सिटोसिन

ऑक्सिटोसिन हॉर्मोन गर्भावस्था के अंत में ज्यादा सक्रिय होता है।

ये भी पढ़ें: प्रेग्नेंसी की पहली तिमाही में अपनाएं ये डायट प्लान

पहली तिमाही की शुरुआत से ही इन बातों का ध्यान रखें

  • पौष्टिक आहार का सेवन करें।
  • पानी के साथ ही तरल पदार्थ का सेवन ज्यादा करें।
  • नियमित रूप से एक्सरसाइज करें।
  • प्रेग्नेंसी से जुड़ी जानकारी हासिल करें।
  • स्मोकिंग और ड्रिंकिंग न करें  
  • डॉक्टर द्वारा दी गई दवाओं का सेवन समय पर करें।
  • मेटरनिटी ऑउटफिट के साथ-साथ अच्छे जूते पहनें।

प्रेग्नेंसी में हॉर्मोनल बदलाव और एक्सरसाइज के दौरान चोटें

प्रेग्नेंसी में हॉर्मोनल बदलाव होना बेहद ही जरूरी है। लेकिन प्रेग्नेंसी में हॉर्मोनल बदलाव होने में व्यायाम करना और भी मुश्किल हो जाता है। क्योंकि प्रेग्नेंसी में हॉर्मोनल बदलाव के कारण लिगामेंट ढीले हो जाते हैं। इस कारण प्रेग्नेंट महिलाओं का मोच या नस खीचने की समस्याएं होना आम बात है। हालांकि, प्रेग्नेंसी के दौरान सावधानी बरतने से इस तरह की चोटों से बचा जा सकता है। गर्भावस्था के दौरान महिला के शरीर का पूरा पोस्चर बदलता है। इस समय में महिलाओं के ब्रेस्ट का साइज बढ़ जाता है। इसके अलावा महिलाओं का बढ़ा हुआ पेट तो देखा ही जा सकता है। महिला के शरीर में हुए इन बदलावों के कारण उनके शरीर की सेंटर ऑफ ग्रेविटी आगे की ओर हो जाती है। इस कारण उनको शरीर को बैलेंस करने में भी दिक्कत हो सकती है।

ये भी पढ़ें: पुरुषों की स्मोकिंग की वजह से शिशु में होने वाली परेशानियां

प्रेग्नेंसी में हॉर्मोनल बदलाव के कारण स्वाद और गंध का बदलना

ज्यादातर महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान स्वाद के सेंस में बदलाव का अनुभव होता है। प्रेग्नेंट महिलाएं आम तौर पर अन्य महिलाओं की तुलना में नमकीन फूड आयटम्स और मीठे फूड्स को ज्यादा पसंद करती हैं। इसके अलावा प्रेग्नेंट महिलाओं को खट्टा खाने का बहुत मन करता है। प्रेग्नेंट महिलाओं में स्वाद को पहचानने की क्षमता में कमी भी गर्भावस्था की पहली तिमाही के दौरान देखने को मिलती है।

इसके अलावा अलग-अलग ट्राइमेस्टर में प्रेग्नेंट महिलाओं की खाने की आदतों में बदलाव भी देखने को मिलता है। आम तौर पर देखा जाता है कि महिलाओं को प्रसव के बाद कुछ समय तक महिलाओं को खाने में स्वाद की कमी महसूस होती है और साथ ही उनकी भूख में भी काफी कमी देखने को मिलती है। इसके अलावा कुछ महिलाओं को प्रेग्नेंसी के दौरान मुंह में अजीब स्वाद का भी अनुभव होता है। ये सारे लक्षण महिलाओं में प्रेग्नेंसी में हॉर्मोनल बदलाव और अन्य शारीरिक बदलावों के कारण देखने को मिलते हैं। साथ ही प्रेग्नेंट महिलाओं में जी घबराना पोषण की कमी भी देखने को मिलते हैं। प्रेग्नेंसी नें प्रेग्नेंसी में हॉर्मोनल बदलाव के कारण महिलाएं अपने सूंघने की शक्ति में भी बदलावों को महसूस करती हैं। कई मामलों में देखा जाता है इस दौरान महिलाओं को कुछ विशेष गंधों के प्रति सेंसिटिविटी बहुत बढ़ जाती है।

हेल्दी प्रेग्नेंसी में हॉर्मोन बदलाव जरूरी है। हालांकि इससे शुरुआती समय में कुछ तकलीफ हो सकती, लेकिन ये परेशानी सिर्फ कुछ समय के लिए होती हैं। प्रेग्नेंसी की शुरुआत में और इस दौरान दिखने वाले इन लक्षणों से परेशान न हों। किसी भी तरह परेशानी होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

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