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धारा-377 : आखिर समलैंगिकता को स्वीकारने में इतने साल क्यों लगे?

धारा-377 : आखिर समलैंगिकता को स्वीकारने में इतने साल क्यों लगे?

“प्यार तो हमेशा से ही सतरंगी था”, “प्यार किया कोई चोरी नहीं”, “हम होंGAY कामयाब एक दिन”! ऐसे कई पोस्टर या कोट्स आपने सोशल मीडिया पर पढ़े ही होंगे। लेकिन, इनके पीछे की असलियत क्या है, क्या आप जानते हैं इसके बारे में? जहां भारतीय समाज में एक लड़के-लड़की के प्यार को परंपराओं के खिलाफ माना जाता है, वहीं अब समलैंगिक रिश्ते को कानूनी तौर पर अपना लिया गया है। साल 1860 में ब्रिटिश शासन द्वारा बनाए गए धारा 377 को साल 2018 में भारत में वैध करार दिया गया, जिसके तहत आज 6 सितंबर, 2019 को देश में समलैंगिक रिश्ते को मान्यता मिले एक साल हो गया है।

यानी धारा 377 के तहत अब किसी पुरुष या महिला के बीच बनाए गए अप्राकृतिक संबंध अपराध की श्रेणी में नहीं माना जाएगा।

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क्या है समलैंगिक रिश्ता (धारा 377)?

समलैंगिक रिश्ते का अर्थ है कि दो लड़के या दो लड़की एक-दूसरे को ही अपने जीवन साथी के तौर पर चुनें और उन्हीं के साथ शादी करने का फैसला भी लें। जो लोग समलैंगिक रिश्ते से अंजान हैं, हो सकता है कि उन्हें यह सुनकर हैरानी हो लेकिन, यही सच है। अब पुरुष, पुरुष से प्यार कर सकता है। एक महिला सरेआम दूसरी महिला के सामने आपने प्यार का इजहार कर सकती है, जिन्हें एक होने से खुद कानून भी नहीं रोक सकता है।

भले ही इस रिश्ते को पुरानी सोच वाले लोग आज भी विरोध की नजर से देखते हैं लेकिन, इस आप इस इससे भी काफी कुछ अच्छी सीख ले सकते हैं। इस आर्टिकल में हम आपको समलैंगिक रिश्तों से मिलने वाली सीख के बारे में बताएंगे।

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समलैंगिक रिश्ते भी सिखाते हैं जीवन के कई पहलू

समलैंगिक रिश्ते एक पति-पत्नी के रिश्ते की तरह ही खास होते हैं, जो हमें कई पहलू भी सिखाते हैं। अगर आपको लगता है कि लेस्बियन कपल या गे कपल फैमिली प्लानिंग जैसे फैसले नहीं ले सकते हैं, तो आपका यह सोचना गलत साबित हो सकता है। हैलो हेल्थ के इस खास आर्टिकल में जानिए क्यों सबसे खास रिश्ता हो सकता है समलैंगिकता का रिश्ता।

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1.जिम्मेदारी में हिस्सेदारी बराबर की

समलैंगिक होने पर दोनों साथी के कंधों पर बराबर की जिम्मेदारी हो सकती है। आमतौर पर जैसे एक पुरुष और महिला के रिश्ते में देखा जाता है कि पुरुष आर्थिक रूप से घर की देखभाल करेगा और महिला घर के काम, परिवार के सदस्यों का ख्याल और बच्चे का पालन करेगी लेकिन, समलैंगिक होने पर दोनों साथ के बीच इसकी समस्या ही नहीं होती है। दोनों अपनी जिम्मेदारी बराबर से बांट सकते हैं।

2.लें सकते हैं सेक्स का भरपूर आनंद

सेम सेक्स होने पर कपल अपने सेक्शुअली डिजायर्स का ज्यादा आनंद ले सकते हैं। एक अध्ययन में यह कहा भी गया है कि ‘समलैंगिक जोड़े सेक्स पर कम ध्यान देते हैं, जबकि इस दौरान वे सेक्स के आनंद और उत्साह पर अधिक ध्यान देते हैं।

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3.बन सकते हैं बेहतर माता-पिता

एक शोध का दावा है कि समलैंगिक कपल, पुरुष और महिला के मुकाबले एक बेहतर माता-पिता बन सकते हैं। सेम सेक्स के जोड़े फैमिली प्लानिंग के लिए बच्चे गोद ले सकते हैं, जिसकी परवरिश वो मानसिक और सामाजिक तौर पर सबसे अच्छे तरीके से कर सकते हैं। साथ ही, उनका बच्चा खुले विचारों वाला भी हो सकता है।

4.एक-दूसरी की परेशानियों को अच्छे से समझ सकेंगे

सीधी सी बात है अगर एक महिला को पीरियड्स का दर्द होता है या उसका मूड स्विंग होता है, तो उसकी इस हालात को सिर्फ एक दूसरी महिला ही पूरी तरह से समझ सकती हैं। क्योंकि वह भी इन हालातों से गुजरती रहती है। ऐसी स्थिति में एक पुरुष इस तकलीफ के बारे में अपनी सहमति जता सकते हैं, लेकिन उस स्थिति को पूरी तरह से समझ नहीं सकते हैं। इसी तरह अगर गे या लेस्बियन कपल होंगे, तो वे एक-दूसरे की मानसिक और शारीरिक समस्याओं को बहुत आसानी से समझ और स्वीकार कर सकते हैं।

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क्या समलैंगिक कपल होने के कोई नुकसान भी हैं?

धारा 377 के तहत समलैंगिक कपल को कानूनी मान्यता मिल तो गई है, लेकिन ऐसी कई बातें भी हैं जिनकी वजह से समलैंगिक कपल होने के कई नुकसान भी हो सकते हैंः

1.मां-पिता बनने का सुख अधूरा ही मिल सकता है

एक समलैंगिक कपल फिर चाहे वो गे हो या लेस्बियन कपल हो, वो एक आम कपल की तरह मां-पिता बनने का पूरा सुख नहीं उठा सकते हैं। हालांकि, अन्य विधियों और तकनीकों से वे किसी बच्चे के मां या पिता को बन सकते हैं, लेकिन प्राकृतिक रूप से वो इसके सुख के अनुभव से वंचित ही रहेंगे।

2.बच्चे की परवरिश में समस्या हो सकती है

बच्चे की परवरिश के दौरान हर कपल को कई तरह की समस्याएं हो सकती हैं। आमतौर पर देखा जाए, तो एक नवजात बच्चे की शुरूआती परवरिश पूरी तरह की उसकी मां की ही देखरेख में होती है। हालांकि, अगर कपल गे होंगे, तो ऐसी स्थिति में उन्हें बच्चे की परवरिश करने में समस्या हो सकती है, जैसे बच्चे के दूध पिलाना या उसका डायपर बदला आदि।

3.परिवार अलग कर सकता है

भारत सरकार ने भले ही धारा 377 को अब मान्यता दे दी हो, लेकिन एक भारतीय परिवार और समाज अभी भी उसे अपनाने में हिचक महसूस करते हैं। आज की लंबे से समय जिस अधिकार की मांग की जा रही थी, वो अधिकार इन युवाओं को उनके परिवार से अलग रहने के लिए भी मजबूर कर सकता है। ऐसे युवाओं के परिवार पर समाज और रिश्तेदारों का दबाव पड़ सकता है।

4.आगे की पीढ़ी पर भी सवाल

मान लिजिए किसी समलैंगिक कपल ने अपनी पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए किसी बच्चे की परवरिश करने का फैसला किया हो। लेकिन, भविष्य में वह बच्चा खुद और खुद की पसंद को लेकर कंफ्यूज हो सकता है। अकस्र देखा गया है कि लेस्बियन कपल या गे कपल की बच्चे उन्ही की ही तरह सामान जेंडर की ही तरफ आकर्षित होते हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं कि समलैंगिक रिश्तों को बहुत-से लोग अपनाने में झिझकते हैं। लेकिन, यह बात समझनी जरूरी होगी कि हर किसी को अपनी जिंदगी का फैसला लेने का पूरा हक है और इसी हक को पिछले साल आज ही दिन धारा 377 को कानूनी रूप से मान्यता भी मिल चुकी है।

हैलो स्वास्थ्य किसी भी तरह की मेडिकल सलाह नहीं दे रहा है। अगर आपको किसी भी तरह की समस्या हो रही है, तो आप अपने डॉक्टर से जरूर पूछ लें।

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हैलो हेल्थ ग्रुप हेल्थ सलाह, निदान और इलाज इत्यादि सेवाएं नहीं देता।

सूत्र

For a Better Understanding of Sexual Orientation & Homosexuality. https://www.apa.org/topics/lgbt/orientation.pdf. Accessed on 06 February, 2020.

What is Section 377 of IPC?. https://timesofindia.indiatimes.com/india/what-is-section-377/articleshow/66067994.cms. Accessed on 06 February, 2020.

Section 377: Here is everything you need to know. https://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/sc-delivers-historic-verdict-heres-everything-you-need-to-know-about-section-377/articleshow/65698429.cms. Accessed on 06 February, 2020.

The 377 Verdict’s Bittersweet Legacy: More Support, But Not Enough Rights. https://www.huffingtonpost.in/entry/section-377-verdict-legacy-more-support-no-rights_in_5d723372e4b03aabe35acaa7?utm_hp_ref=in-section-377. Accessed on 06 February, 2020.

Section 377. https://www.vice.com/en_in/topic/section-377. Accessed on 06 February, 2020.

लेखक की तस्वीर
Dr. Shruthi Shridhar के द्वारा मेडिकल समीक्षा
Ankita mishra द्वारा लिखित
अपडेटेड 19/08/2019
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