बच्चों की आंखो की देखभाल को लेकर कुछ ऐसे मिथक, जिन पर आपको कभी विश्वास नहीं करना चाहिए

चिकित्सक द्वारा समीक्षित | द्वारा

अपडेट डेट जुलाई 23, 2020 . 5 मिनट में पढ़ें
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आंखें भगवान की दी सबसे खूबसूरत चीजों में से हैं, जिनसे हम पूरी दुनिया को देख सकते हैं। बात जब बच्चों की आंखों की आती है, तो माता-पिता उन्हें लेकर बेहद चिंतित रहते हैं। इसका कारण है बच्चों का टीवी, मोबाइल और कंप्यूटर आदि में अधिक व्यस्त रहना। ऐसे में बच्चों की नाजुक आंखों को लेकर माता-पिता का परेशान होना स्वभाविक भी है। आपने भी बच्चों की आंखों की देखभाल को लेकर कुछ बातों को सुना होगा। लेकिन, बच्चों की आंखों और उनकी देखभाल को लेकर ऐसे कुछ मिथक हैं, जिन्हें हम सालों से सच मानते आ रहे हैं। जानिए, बच्चों में आंखों की देखभाल के बारे में मिथक कौन-कौन से हैं और जानें कि सच क्या है। 

 टीवी को नजदीक से देखने से बच्चों की आंखें खराब हो जाती हैं?

आंखों की देखभाल के बारे में मिथक सबसे पहला यह है कि टीवी को नजदीक से देखने से बच्चों की आंखें खराब हो जाती हैं। अक्सर आपने माता-पिता को यह कहते सुना होगा कि उनके बच्चे टीवी को नजदीक से देखते हैं। जिससे उनकी आंखें कमजोर हो गयी हैं। लेकिन, इस बात का कोई सुबूत नहीं है कि टीवी को नजदीक से देखने से आंखे खराब हो सकती हैं। बल्कि विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चे वास्तव में वयस्कों की तुलना में बिना आंखों पर दबाव पड़े करीब की चीजों पर आसानी से ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। इसलिए उनमें टेलीविजन को नजदीक से देखने या पढ़ने की चीज को आंखों के पास रखने की आदत होती है।

हालांकि, टीवी के करीब बैठ कर निकट दृष्टिदोष जैसी समस्या हो सकती है। लेकिन जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते जाते हैं, उनकी ये आदते आमतौर पर बदल जाते हैं। आंखों की संभावित समस्याओं का पता लगाने के लिए बच्चों की नियमित रूप से आंखों की जांच करानी चाहिए।

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कंप्यूटर पर काम करने और मोबाइल पर गेम खेलने से बच्चों की आंखों को नुकसान होता है? 

कंप्यूटर पर काम करने या मोबाइल पर गेम खेलने से भी बच्चों की आंखे खराब नहीं होती। लेकिन, अधिक देर लगातार काम करने से आंखे सामान्य से कम झपकती हैं। जिससे आंखें रूखी हो जाती हैं। इससे आंखों में दबाव पड़ता है या आंखें थक जाती हैं। इसलिए समय-समय पर ब्रेक लेना जरूरी है। बच्चों को भी लगातार कंप्यूटर पर न काम करने दें, न ही मोबाइल पर गेम खेलने दें। हालांकि थोड़ी देर कंप्यूटर पर काम करने से आंखों को नुकसान नहीं होता इसलिए बच्चों को बीच-बीच में ब्रेक लेने दें।

कम रोशनी में पढ़ने या काम करने से आंखे खराब हो सकती हैं ?

कम रोशनी में पढ़ने या काम करने से आंखे ख़राब हो सकती हैं एक मिथक है। कम रोशनी में पढ़ने से आंखों पर दबाव पड़ता  है, लेकिन इससे आंखों को हमेशा के लिए कोई नुकसान नहीं होता। 

गाजर खाने से आंखें तेज होती हैं? 

यह सच है कि गाजर और अन्य सब्जियों में विटामिन A होता है। जो हमारी आंखों और नजर के लिए फायदेमंद है। लेकिन, केवल गाजर खाने से ही आंखें तेज नहीं होती। इसके लिए हमें संतुलित आहार की जरूरत होती है। अगर बच्चों की आंखों की रोशनी को बढ़ाना चाहते हैं तो आपको उनके भोजन में सभी पौष्टिक तत्वों जैसे दूध, अंडे, अनाज, संतरे, बादाम, अवोकेडो आदि को शामिल करना चाहिए।

अधिक चश्मा पहनने से आंखों को उसकी आदत हो जाती है?

बच्चों में आंखों की देखभाल के बारे में मिथक में यह भी एक है। निकट-दृष्टि, दूर-दृष्टि आदि दोष बच्चों की उम्र के बढ़ने से दूर हो जाते हैं। इसके साथ ही अन्य कई कारक भी हैं जिनके कारण नजरें कमजोर होती हैं। जिनमें से आनुवांशिक, अधिक या कम चश्मा पहनना भी शामिल है। श्मा पहनने से आंखें खराब नहीं होती हैं।

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अगर आपको कोई समस्या है तभी आंखों की जांच करानी चाहिए?

बच्चों में आंखों की देखभाल के बारे में मिथक में अगला है कि आपको अपने बच्चे की आंखों की जांच तभी करानी चाहिए जब उनमें कोई समस्या हो। हर व्यक्ति को सही से आपकी आंखों की नियमित जांच करानी चाहिए, फिर चाहे उनमें कोई समस्या हो या नहीं। बच्चों में मामले में यह और भी जरूरी है। जन्म से लेकर स्कूल जाना शुरू करने तक और उसके बाद भी नियमित रूप से उनकी आंखों की जांच कराएं।  वयस्कों के लिए भी यह बेहद जरूरी है। अगर आपको डायबिटीज है या आंख सम्बन्धी समस्या है तो यह और भी जरूरी हो जाता है।

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दृष्टि खोने की स्थिति को रोकने के लिए आप कुछ नहीं कर सकते?

ऐसा माना जाता है कि दृष्टि खोने की स्थिति को रोकने के लिए आप कुछ नहीं कर सकते। यह बच्चों में आंखों की देखभाल के बारे में मिथक है। लेकिन सच यह है कि 90% दृष्टि को खोने के मामलों में आप सफल हो सकते हैं। वो भी सामान्य और सावधानियों का पालन करने से, जैसे बच्चे जब टीवी या कंप्यूटर आदि देख रहे हैं तो सही सेफ्टी ग्लास का प्रयोग करें।  नियमित रूप से उनकी आंखों का चेकअप कराएं। 

क्या केवल लड़कों में ही रंग-बोध की अक्षमता(color-blind) होती है? 

ऐसा नहीं है, लेकिन हां, लड़कियों की तुलना में लड़कों में कलर ब्लाइंडनेस की समस्या अधिक होती है। ऐसा माना जाता है कि लगभग 8 प्रतिशत लड़कों में कुछ कलर ब्लाइंडनेस होती है, हालांकि लड़कियों में यह 1 प्रतिशत से भी कम है।

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20/20 विजन का अर्थ है कि आपके बच्चे की आंखें बिल्कुल ठीक हैं?

यह भी बच्चों में आंखों की देखभाल के बारे में मिथक है। “20/20” का अर्थ है कि उस बच्चे या व्यक्ति की सेंट्रल विजन सही है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि इनकी साइड, नाईट, कलर आदि विजन भी सही है। कुछ संभावित दृष्टिहीन नेत्र रोगों में जैसे कि ग्लूकोमा या डायबिटिक रेटिनोपैथी आदि को विकसित होने में वर्षों लग सकते हैं। इस समय के दौरान, यह रोग आंतरिक आंख के कुछ हिस्सों को नुकसान पहुंचा सकते हैं, लेकिन इनसे सेंट्रल विजन अप्रभावित रह सकती है।

अगर आपके माता-पिता की आंखों की नजर कमजोर है तो बच्चों की भी कम होगी ?

हालांकि यह बात पूरी तरह से सही नहीं है लेकिन अधिकतर मामलों में इसे सच माना जाता है। यह समस्या आनुवांशिक हो सकती है। इसलिए अपनी बच्चों की आंखों की देखभाल के लिए परिवार की हिस्ट्री को अपने डॉक्टर से अवश्य डिसकस करें।

कंजक्टिवाइटिस या संक्रमीनेत्र (Pink eye) केवल छोटे बच्चों को होता है?

यह भी बच्चों में आंखों की देखभाल के बारे में मिथक है। बच्चों को संक्रमीनेत्र (Pink eye)  डे केयर आदि में होने की संभावना अधिक होती है। ऐसे ही वयस्कों को भी यह समस्या हो सकती है। खासतौर पर उन लोगों को जो अच्छे से अपनी आंखों या कांटेक्ट लेन्सेस को अच्छे से नहीं धोते। इससे बचने का सबसे अच्छा तरीका है अच्छे से आंखों को धोना, हाथों को धो कर आंखों को छूना, साफ तौलिये का इस्तेमाल आदि।

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बच्चों की आंखों की देखभाल कैसे करें

बच्चों में आंखों की देखभाल के बारे में मिथक के बारे में जानने के साथ ही उनकी आंखों की देखभाल कैसे करें। इस बारे में आपको पता होना चाहिए-

  • बच्चों की आंखों को तेज धूप या धूल मिटटी से बचा कर रखें।
  • बच्चों को पौष्टिक और संतुलित आहार (विटामिन A, B, C से भरपूर )खाने को दें।
  • नियमित रूप से उनकी आंखों की जांच कराएं।
  • उन्हें ऐसे काम न करने दें जिनसे उनकी आंखों पर दबाव पड़े।
  • उनकी नींद पूरी होना आवश्यक है
  • आंखों की कसरत भी जरूरी है। खासकर, अगर आपको कई घंटे बैठकर पढ़ना पड़ता है।
  • पढ़ाई, कंप्यूटर या अन्य कोई ध्यान लगाने वाला काम अगर बच्चा कर रहा हो, तो बीच-बीच में उसे ब्रेक लेने के लिए कहें।

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