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लिपोडास्ट्रोफी और इससे जुड़ी बीमारियों को जानें और समझें

लिपोडास्ट्रोफी और इससे जुड़ी बीमारियों को जानें और समझें

लिपोडास्ट्रोफी मेडिकल से जुड़ी समस्या है, वहीं यह काफी रेयर बीमारी है। इसके कारण हमारे शरीर में असामान्य रूप से फैट एक ही जगह जमा हो जाता है। कई मामलों में तो फैट लॉस भी होता है। यह बीमारी आनुवांशिक, अक्वायर्ड या फिर जन्मजात हो सकती है। एचआईवी से ग्रसित लोगों में लिपोडास्ट्रोफी होने की संभावना ज्यादा रहती है। लिपोडास्ट्रोफी से ग्रसित लोगों में लेप्टिन का लो ब्लड लेवल होता है, यह हार्मोन शरीर में फैट सेल्स प्रोड्यूस करता है। वहीं शरीर के जिस हिस्से में फैट की आवश्यकता होती है उस जगह में फैट को उपलब्ध कराया जाता है। देखा गया है कि बायोकेमिकल प्रोसेस के कारण भी लिपोडास्ट्रोफी सिंड्रोम हो सकती है, इसमें इंसुलिन रेजिस्टेंस, डायबिटीज, ब्लड लिपिड के कारण भी यह बीमारी हो सकती है। इंफेक्शन होने के बाद ऑटो इम्यून बीमारी, ट्रॉमा के साथ शरीर के एक हिस्से में प्रेशर पड़ने की वजह से भी हो सकती है। उदाहरण के तौर पर आपको डायबिटीज है और आप एक ही जगह पर बार-बार इंसुलिन शॉट्स दे रहे हैं, तो कुछ दिनों में आप देखेंगे कि स्किन की वो जगह लिपोडास्ट्रोफी में तब्दील हो गई है। वहीं लिपोडास्ट्रोफी शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकती है, वहीं यह बीमारी एक से दूसरे अंग को प्रभावित नहीं करती है। इस बीमारी से ग्रसित लोगों का इलाज डॉक्टर मेट्रिलेप्टिन (metreleptin ) नाम की दवा देकर करते हैं। यह दवा एफडीए द्वारा मान्यता प्राप्त है।

लिपोडास्ट्रोफी के प्रकार

लिपोडास्ट्रोफी के कई प्रकार होते हैं, यह अक्वायर्ड के साथ आनुवांशिक भी हो सकता है। आनुवांशिक कारणों के तहत यह बीमारी जन्म के पहले से लेकर जन्म के समय से हो सकती है। इसके तहत शरीर के एक हिस्से में फैट लॉस होता है।

  • पार्शियल व लोकलाइज लिपोडास्ट्रोफी : इसके तहत शरीर का एक हिस्सा ही प्रभावित होता है और यह एब्नॉर्मल हेल्थ से नहीं जुड़ा हुआ है।
  • दोनों जर्नलाइज्ड लिपोडास्ट्रोफी और पार्शियल लिपोडास्ट्रोफी अक्वायर्ड और आनुवांशिक हो सकते हैं।
  • जर्नलाइज्ड लिपोडास्ट्रोफी : इस स्थिति में पूरे शरीर में फैट टिशू प्रभावित होता है। कुछ मामलो में तो वजन बढ़ने के साथ फैट बढ़ता है।

इनहेरिटेड (आनुवांशिक) लिपोडास्ट्रोफी क्या है

जेनेटिक कारणों से इनहेरिटेड लिपोडास्ट्रोफी की बीमारी होती है, जैसे

  • मौजूदा समय में कई प्रकार के फैमिलियल पार्शियल लिपोडायस्ट्रॉफी होती है, जैसे एफपीएलडी टाइप 1कोबरलिंग्स सिंड्रोम (Kobberling’ syndrome), एफपीएलडी टाइप टू (Dunnigan’s syndrome) और अन्य रेयर डिजीज की श्रेणी में आती हैं।
  • कंजीनाइटल जर्नलाइज्ड लीपोडायस्ट्रॉफी : (सीजीएल, बिराडिनिली सिप सिंड्रोम- Berardinelli-Seip syndrome) आनुवांशिक बीमारी है।

जर्नलाइज्ड लिपोडास्ट्रोफी क्या है, जानें

लिपोडास्ट्रोफी शरीर में फैट संबंधी एब्नार्मेलिटी से जुड़ा है। यह काफी रेयर कंडीशन में से एक है, इसके तहत शरीर में फैट की कहीं कमी हो सकती है तो कभी कबार नियमित तौर पर फैट का डिस्ट्रिब्यूशन नहीं होता है। मान लें कि आपका एक हाथ पतला है और दूसरा सामान्य तो आप इस बीमारी से ग्रसित हैं। लेकिन फैट की कमी सिर्फ बाहरी हिस्से में ही नहीं बल्कि शरीर के अंदर भी हो सकता है।

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अक्वायर्ड लीपोडायस्ट्रॉफी क्या है

अक्वायर्ड लीपोडायस्ट्रॉफी एक ऐसी बीमारी है जो अनुवांशिक नहीं होती है, लेकिन अन्य कारणों से यह बीमारी लोगों को हो सकती है, जैसे

  • लोकलाइज और पार्शियल लीपोडायस्ट्रॉफी की बीमारी उस स्थिति में होती है जब किसी व्यक्ति की स्किन पर बार बार एक ही हिस्से में इंजेक्शन लगाया जाए, जो पूरे शरीर को प्रभावित नहीं करता है बल्कि स्किन के एक खास हिस्से को प्रभावित करता है
  • एचआईवी इंफेक्शन के इलाज में इस्तेमाल किए जाने वाले प्रोटीन इनहिबिटर्स के कारण लिपोडायस्ट्रॉफी हो सकती है। इस कारण फैट लॉस होने के साथ शरीर में असामान्य रूप से फैट विकसिक हो सकते हैं।
  • लॉरेंस सिंड्रोम के कारण (Lawrence syndrome)
  • अक्वायर्ड पार्शियल लिपोडायस्ट्रॉफी छाती के ऊपरी हिस्से के साथ चेहरे में हो सकता है वहीं इसके लक्षण बचपन में या फिर किशोरावस्था में दिखना शुरू हो जाते है

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लिपोडायस्ट्रॉफी और उसके प्रकार के लक्षणों को जानें

इस बीमारी का सबसे बड़ा लक्षण यही है कि शरीर में असामान्य रूप से फैट का वितरण हो जाता है। कंजीनाइटल और आनुवांशिक कारणों से होने वाले लीपोडायस्ट्रॉफी की बीमारी में एक से दो साल में लक्षण दिखने को मिलते हैं। वहीं लक्षण अलग-अलग लोगों में अलग-अलग हो सकते हैं, जहां कुछ लोगों के शरीर में एक हिस्से में फैट का जमाव देखने को मिलता है तो कुछ लोगों के पूरे शरीर में फैट का असामान्य जमाव हो सकता है।

अक्वायर्ड जर्नलाइज्ड लिपोडायस्ट्रॉफी के लक्षण

इसमें बीमारी के लक्षण काफी हद तक आनुवांशिक बीमारियों के कारण होने वाले लक्षणों से मिलते जुलते हैं। लेकिन यह लक्षण बच्चों और किशोरों में देखने को मिलते हैं। पुरुषों की तुलना में इस बीमारी का लक्षण ज्यादातर महिलाओं में देखने को मिलता है।

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लिपोडायस्ट्रॉफी होने के कारणों पर एक नजर

जेनेटिक म्यूटेशन के कारण आनुवांशिक और इनहेरेटेड लिपोडायस्ट्रॉफी की बीमारी हो सकती है। यह एक खास प्रकार के जेनेटिक म्यूटेशन के कारण एक से दूसरी पीढ़ी तक जाती है और उन्हें इसका सामना करना पड़ता है। जीन्स में मौजूद म्यूटेशन को एजीपीएटी2 और बीएससीएल 2 के नाम से जाना जाता है। इसके कारण ही 95 फीसदी मामलों में लोगों को कंजीनाइटल जर्नलाइज्ड लिपोडायस्ट्रॉफी की बीमारी होती है।

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कंजीनाइटल जर्नलाइज्ड लिपोडायस्ट्रॉफी में तेजी से विकसित होते हैं बच्चे

इस बीमारी से ग्रसित बच्चों में इस प्रकार के लक्षण दिख सकते हैं जैसे,

  • हड्डियों की उम्र उन्नत होती है
  • प्रोमिनेन्ट मसकुलेचर के तहत अत्यधिक विकसित मांसपेशियां होती हैं
  • जल्दी जवान हो जाते हैं, सेक्सुअल विकास भी जल्दी होता है
  • मानसिक रूप से बीमार हो सकते हैं।
  • सामान्य से ज्यादा खाना खाते हैं
  • तेजी से विकसित होते हैं और लंबे होने
  • इनका मेटॉबॉलिक रेट अधिक होता है
  • स्किन डार्क होने के साथ मखमली त्वचा हो सकती है

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जर्नलाइज्ड लिपोडायस्ट्रॉफी के कारण हार्ट डिजीज से लेकर डायबिटीज तक

इस बीमारी के होने से जहां आप सोच भी नहीं सकते उन जगहों पर फैट जमा होता है, जैसे हार्ट, किडनी, लिवर, पैनक्रियाज आदि। शरीर के इन हिस्सों में फैट जमा होने से विभिन्न समस्या हो सकती है, जैसे

जर्नलाइज्ड लीपोडायस्ट्रॉफी लेप्टिन की होने से एब्नॉर्मेलिटी

लेप्टिन एक नेचुरल केमिकल है जो फैट के मेटॉबॉलिज्म में अहम भाग निभाता है। कुछ लोग जिन्हें जर्नलाइज्ड लिपोडायस्ट्रॉफी की बीमारी होती है उनमें देखा गया है कि लेप्टिन (leptin) नामक तत्व की कमी होती है, इसके कारण शरीर में एब्नॉर्मेलिटी हो सकती है और शरीर में सामान्य से अधिक फैट बनता है। इन अत्यधिक फैट टिशू के कारण मेटाबॉलिक संबंधी बीमारी हो सकती है, जैसे इंसुलिन रेजिस्टेंस, डायबिटीज और हाई कोलेस्ट्रोल के साथ फैटी लिवर डिजीज और हार्ट डिजीज हो सकता है।

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एक ही जगह बार बार इंसुलिन शॉट लगाने से अक्वायर्ड लिपोडायस्ट्रॉफी सिंड्रोम

अक्वायर्ड लिपोडायस्ट्रॉफी सिंड्रोम की बीमारी इंफेक्शन होने के कारण होती है। वैसी बीमारी है जिसके कारण इम्युन सिस्टम हमारी बॉडी पर अटैक करता है। ट्रॉमा के कारण, इंसुलिन शॉट को एक ही जगह बार बार लगाने की वजह से, वहीं कई मामलों में डॉक्टर और एक्सपर्ट को भी यह पता नहीं होता कि इस बीमारी के होने का कारण क्या है।

लेप्टिन लेवल टेस्ट को कर लिपोडायस्ट्रॉफी का पता लगा सकते हैं

इस बीमारी का पता लगाने के लिए डॉक्टर फैट लॉस और गेन के कारण शरीर में असामान्य विकास को देखेंगे। इसके लिए एक्सपर्ट ब्लड टेस्ट करवा सकते हैं, जिसमें लेप्टिन लेवल की जांच की जाती है। वहीं पता लगाया जाता है कि मरीज को कहीं कोई अन्य मेटाबॉलिक संबंधी बीमारी तो नहीं। जैसे इंसुलिन रेजिस्टेंस, डायबिटीज, और एलिवेटेड ब्लड लिपिड लेवल।

कई केस में जेनेटिक टेस्टिंग भी की जाती है, ताकि जेनेटिक म्यूटेशन का पता कर यह जाना जा सके कि यह बीमारी अनुवांशिक कारणों से तो नहीं हो रही है।

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लिपोडायस्ट्रॉफी का कैसे होता है इलाज जानें

  • बीमारी का इलाज : मेटाबॉलिक एब्नॉर्मेलिटी के मामले में भी वही इलाज चलता है जो डायबिटीज और हाई ब्लड कोलेस्ट्रोल जैसी स्थिति से निपटने के लिए चलाया जाता है। इसके तहत मरीज को लाइफस्टाइल में बदलाव करने के साथ-साथ दवा का सेवन करने की सलाह दी जाती है।
  • अक्वायर्ड लिपोडायस्ट्रॉफी : इसके तहत डॉक्टर आपको कुछ सुझाव दे सकते हैं, जैसे यदि आप एक ही जगह पर बार बार इंसुलिन शॉट्स लेते हैं तो इस मामले में एक जगह पर इंसुलिन शॉट्स नहीं लेने की सलाह दी जाती है।
  • सर्जरी : इस बीमारी से ग्रसित लोगों का सर्जरी करके भी इलाज किया जाता है।
  • जर्नलाइज्ड लिपोडायस्ट्रॉफी : लेप्टिन डेफिशिएंसी से ग्रसित लोगों का इलाज करने के लिए 2014 में फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन ने मेट्रिलेप्टिन (metreleptin ) की दवा व इंजेक्शन के इस्तेमाल की स्वीकृति प्रदान की थी। कंजीनाइटल जर्नलाइज्ड और अक्वायर्ड जर्नलाइज्ड टाइप के मरीजों को उनके खानपान में कुछ बदलाव कर इस दवा को देकर इलाज किया जाता है। इस दवा के कुछ साइड इफेक्ट्स भी हो सकते हैं, शरीर में इस प्रकार का बदलाव दिखे तो डॉक्टरी सलाह लें, जैसे वजन का घटना, पेट दर्द, थकान, हायपोग्लाइसीमिया, सिर दर्द हो सकता है।
  • डाइट और लिपोडायस्ट्रॉफी : मौजूदा समय में कोई भी डाइट प्लान नहीं है जिसे अपनाकर इस बीमारी के लक्षणों को कम कर सकें, व बीमारी दूर कर सकें। लेकिन बीमारी से पीड़ित लोगों को लो फैट डाइट का सेवन करने की सलाह दी जाती है।

रेयर है बीमारी, फिर भी लक्षण दिखे तो डॉक्टरी सलाह लें

बता दें कि यह बीमारी काफी रेयर है। बेहद कम ही लोगों में देखने को मिलती है। फिर भी यदि कोई इस बीमारी से ग्रसित होता है तो उन्हें डॉक्टरी सलाह लेकर इलाज कराना चाहिए। वहीं शरीर में कहीं भी असमान्य रूप से फैट बढ़ रहा है या फिर फैट कम हो रहा है तो ध्यान देना चाहिए, ताकि समय रहते डॉक्टरी सलाह लेकर इलाज कराया जा सके।

हैलो हेल्थ ग्रुप हेल्थ सलाह, निदान और इलाज इत्यादि सेवाएं नहीं देता।

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लेखक की तस्वीर
Dr. Pranali Patil के द्वारा मेडिकल समीक्षा
Satish singh द्वारा लिखित
अपडेटेड 23/07/2020
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