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लोटस बर्थ क्या है और यह कितना सुरक्षित है?

लोटस बर्थ क्या है और यह कितना सुरक्षित है?

नॉर्मल और सिजेरियन डिलीवरी (cesarean delivery) के अलावा बच्चे को जन्म देने के और भी तरीके है जिसमें वॉटर बर्थ (Water birth) भी शामिल है, लेकिन क्या आपने लोटस बर्थ के बारे में सुना है? जी हां, यह भी बच्चे के जन्म का एक तरीका है, मगर यह दूसरे तरीकों से बिल्कुल अलग है, हालांकि आजकल कई देशों में माएं इस तरीके को आजमा रही हैं। लोटस बर्थ (Lotus birth) में जन्म के बाद प्लेसेंटा (placenta ) और गर्भनाल (Umbilical cord) को बच्चे से अलग नहीं किया जाता, बल्कि इसके अपने आप अलग होने का इंतजार किया जाता है। भले ही महिलाएं इस नए ट्रेंड को अपना रही हों, लेकिन विशेषज्ञ लोटस बर्थ (Lotus birth) को सुरक्षित नहीं मानते हैं। लोटस बर्थ के फायदे और इससे जुड़े जोखिमों के बारे में जानिए इस आर्टिकल में।

क्या है लोटस बर्थ? (What is lotus birth)

लोटस बर्थ (Lotus birth) बच्चे को जन्म देने की एक ऐसी तकनीक है जिसमें जन्म के बाद बच्चे की गर्भनाल (umbilical cord) नहीं काटी जाती है और यह उसे प्लेसेंटा (Placenta) से बांधे रखता है। जबकि आमतौर पर जन्म के कुछ देर बाद ही डॉक्टर गर्भनाल को काटकर अलग कर देता है, मगर लोटस बर्थ में ऐसा नहीं किया जाता। जन्म की यह तकनीक पुराने जमाने में प्रचलित थी, लेकिन आज भी कई देशों में इसे अपनाया जाता है। आमतौर पर जन्म के 3 से 10 दिन के अंदर नाल खुद ही सूखकर अलग हो जाती है। हालांकि यह तकनीक कितनी सुरक्षित है इस संबंध में बहुत रिसर्च नहीं किया गया है। हालांकि कुछ लोग जन्म की इस कुदरती प्रक्रिया को अच्छा और फायदेमंद बताते हैं, मगर वैज्ञानिक रिसर्च इसकी पुष्टि नहीं करते हैं। प्लेसेंटा (Placenta) को किसी साफ टब, मटके या थैले में रखा जाता है ताकि उसमें कीटाणु न लगे।

और पढ़ें- क्‍या होता है एप‍िड्यूरल बर्थ, सामान्‍य प्रसव से क‍ितना है ये अलग?

लोटस बर्थ तकनीक कैसे काम करती है?

यदि आप लोटस बर्थ (Lotus birth) तकनीक अपनाने का फैसला करती हैं, तो सबसे पहले इस बारे में डॉक्टर और मिडवाइफ से बात करें, क्योंकि जन्म के समय किसी प्रशिक्षित मेडिकल प्रोफेशनल (Trained medical professional) का साथ होना जरूरी है ताकि किसी तरह की समस्या होने पर तुरतं मेडिकल सहायता उपलब्ध कराई जा सके।

लोटस बर्थ तकनीक में बच्चे के जन्म के बाद लेबर (labor) के तीसरे स्टेज में प्लेसेंटा बाहर आता है। जन्म के बाद अगले कुछ दिनों तक आपको बच्चे के साथ ही रहना होता है। प्लेसेंटा बाहर आने के बाद जब इसे मां से अलग कर दिया जाता है तो यह बैक्टीरिया के पनपने के लिए बेहतरीन जगह बन जाता है, ऐसे में बैक्टीरिया (Bacteria) को पनपने से रोकने के लिए पहले इसे गरम पानी में धोकर सुखाया जाता है। फिर इस पर नमक और हर्ब्स (Herbs) जैसे रोजमेरी (Rosemary) और लैवेंडर (Lavender) लगाया जाता है, ताकि बैक्टीरिया न पनपे और न ही दुर्गंध आए।

फिर प्लेसेंटा को साफ कपड़े में लपेटा जाता है (कपड़े को डेली बदलना चाहिए) और इसे कॉटन बैग में रखा जाता है ताकि हवा आती-जाती रहे। कुछ लोग इसे टब, मटके में भी रखते हैं।

लोटस बर्थ बनाम देर से नाल काटना (Lotus birth vs. delayed cord clamping)

Lotus birth- लोटस बर्थ

देर से नाल काटना (Delayed cord clamping) यानी जन्म के तुरंत बाद नाल काटकर बच्चे को प्लेसेंटा (Placenta) से अलग करने की बजाय कुछ देर के लिए उन्हें ऐसे ही रखा जाता है। डिलेड कॉर्ड क्लैम्पिंग (Delayed cord clamping) का इस्तेमाल आजकल दुनिया के बहुत से देशों में हो रहा है, क्योंकि कुछ विशेषज्ञ इसे बच्चे के लिए फायदेमंद बताते हैं। देर से नाल काटने से होते हैं यह फायदे-

  • गर्भनाल (Umbilical cord) प्लेसेंटा (Placenta) से जुड़ी होती है जिसके जरिए बच्चे को पोषक तत्वों की आपूर्ति होती है, जन्म के कुछ देर बात तक भी प्लेसेंटा से जुड़े रहने पर उन्हें पोषक तत्वों से भरपूर रक्त की आपूर्ति होती रहती है, जिससे हीमोग्लोबिन (Hemoglobin) का स्तर बढ़ता है।
  • इससे बच्चे में आयरन (Iron) की मात्रा भी बढ़ती है
  • रेड बल्ड सेल्स (Red blood cells) वॉल्यूम को बढ़ाता है
  • ब्लड सर्कुलेशन (Blood circulation) बढ़ाता है
  • ब्लड ट्रांसफ्यूशन (Blood transfusion) की संभावना को कम करता है
  • हालांकि गर्भनाल जल्दी न काटने पर पीलिया का जोखिम थोड़ा बढ़ जाता है, लेकिन इसके फायदों को देखते हुए यह जोखिम कुछ नहीं है।
  • डिलेड कॉर्ड क्लैम्पिंग (Delayed cord clamping) से जुड़े जहां कई रिसर्च हो चुके हैं, वहीं लोटस बर्थ (Lotus birth) के फायदों को लेकर रिसर्च की कमी है।

लोटस बर्थ (Lotus birth) के फायदों के लेकर ठोस अध्ययन का अभाव है, फिर भी इसके समर्थकों का मानना है कि यह इंफेक्शन (Infection) के जोखिम को कम करता है, क्योंकि इस तकनीक में नाल को किसी तरह की चोट नहीं पहुंचती है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह इंफेक्शन (Infection) के खतरे को बढ़ा देता हैं, क्योंकि जन्म के बाद प्लेसेंटा (Placenta) एक मृत अंग ही होता है जो खून से बना है और इसमें बैक्टीरिया (Bacteria) पनपने की संभावना अधिक होती है। लेकिन इससे कितना ज्यादा रिस्क होता है इस संबंध में कोई रिसर्च नहीं हुई है।

बहुत से लोग इसे आध्यात्मिक से भी जोड़ते हैं, क्योंकि यह प्लेसेंटा और नवजात शिशु के बीच के रिश्ते का सम्मान करता है, हालांकि यह कितना सुरक्षित है या नहीं इस बारे में सटीक रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता।

और पढ़ें- डिलिवरी के बाद ब्रेस्ट मिल्क ना होने के कारण क्या हैं?

लोटस बर्थ के फायदे (Benefits of lotus birth)

भले ही डॉक्टर्स लोटस बर्थ की सलाह नहीं देते हैं, लेकिन लोटस बर्थ के प्रैक्टिशनर इसके कई फायदे बताते हैं, जिसमें शामिल है-

  • गर्भ से दुनिया में आने का कम आक्रामक तरीका।
  • प्लेसेंटा से ब्लड (blood) और पोषक तत्वों (Nutrition) की अधिक आपूर्ति।
  • नाभि (belly button) को कम चोट पहुंचती है।
  • प्लेसेंटा और बच्चे के बीच के संबंधों को सम्मान देने का आध्यात्मिक (Spiritual) तरीका।

हालांकि कोई विश्वसनीय रिसर्च इन दावों की पुष्टि नहीं करता है। इसलिए इसके फायदों पर पूरी तरह से यकीन नहीं किया जा सकता। हां, लोटस बर्थ (Lotus birth) किसी आपातस्थिति (Emergency) में मददगार हो सकता है। मान लीजिए आपने बच्चे को ऐसी स्थिति में जन्म दिया हो कि तब तुरंत मेडिकल हेल्प मिलना संभव न हो तो ऐसे में नाल और प्लेसेंटा को अलग नहीं किया जा सकता और खुद से इसे काटने से संक्रमण का खतरा रहता है

लोटस बर्थ के जोखिम (Risks of lotus birth)

लोटस बर्थ से संबंधित रिसर्च बहुत सीमित है, इसलिए यह कहना मुश्किल है कि यह कितना सुरक्षित है। साथ ही प्लेसेंटा को किस तरह से सुरक्षित रखा जा सकता है, इस संबंध में भी पर्याप्त जानकारी का अभाव है।

  • गर्भ से बाहर आने के बाद प्लेसेंटा (Placenta) को रक्त की सप्लाई (Blood supply) बंद हो जाती है, ऐसे में यह एक मृत कोशिका (Dead cell) बन जाता है जिसमें संक्रमण का खतरा (Infection risk) बढ़ जाता है। क्योंकि प्लसेंटा नाल के जरिए बच्चे से जुड़ा होता है, इसलिए बच्चे के भी संक्रमित होने की संभावना रहती है।
  • इसके अलावा गर्भनाल (umbilical cord) के दुर्घटनावश बच्चे के शरीर से अलग हो जाने या अलगाव की वजह से चोट (Injury) लगने का खतरा बढ़ जाता है।

लोटस बर्थ का चुनाव करने पर आपको क्या कदम उठाने की जरूरत है?

Lotus birth- लोटस बर्थ

यदि आप भी लोटस बर्थ तकनीक से बच्चे को जन्म देना चाहती हैं, तो आपको कुछ बातों का ध्यान रखने की जरूरत है।

  • यदि जन्म के बाद गर्भनाल (umbilical cord) को बच्चे से जुड़ा रहने दे, यदि वह बच्चे की गर्दन में फंसा है तो धीरे से उसे निकालें।
  • प्लेसेंटा नेचुरल तरीके से बाहर आना चाहिए।
  • प्लेसेंटा (Placenta) को रिसिविंग बाउल में मां के पास रखें।
  • प्लेसेंटा (Placenta) को संभालने से पहले गर्भनाल (Umbilical cord) से पूरा रक्त बच्चे के शरीर में पहुंचने की प्रतिक्षा करें।
  • प्लेसेंटा को आराम से गर्म पानी से धोकर सुखा लें।
  • प्लेंसेंटा का पानी निकालने के लिए उसे 24 घंटे के लिए किसी जालीदार कंटेनर में रखें।
  • प्लेसेंटा को नैपी या किसी कपड़े में लपेटकर इसे प्लेसेंटा बैग में रखें। इसके कपड़े को नियमित रूप से बदलते रहें।
  • प्लेसेंटा को समुद्री नमक पर रखा जाता है या उसे नमक और हर्ब्स से कवर भी किया जा सकता है।
  • बच्चे को ढीले कपड़े पहनाए जाते हैं और मां जब चाहे उसे ब्रेस्टफीड करा सकती है।
  • बच्चे को सामान्य तौर पर ही नहलाया जाता है, बस साथ में प्लेसेंटा रखा जाता है और उसे कम से कम हिलाना-डुलाना चाहिए।

और पढ़ें- क्या है वैक्यूम एसिस्टेड डिलीवरी के खतरे?

क्या मुझे लोटस बर्थ का चुनाव करना चाहिए? (Should I try for lotus birth)

लोटस बर्थ के संबंध में बहुत अधिक प्रामाणिक रिसर्च नहीं है। ऐसे में आप यदि सुनी-सुनाई बातों पर यकीन करके इस तकनीक का चुनाव करना चाहते हैं तो यह पूरी तरह से आपकी इच्छा पर निर्भर करता है। फिर भी बेहतर होगा कि इस संबंध में आप मिडवाइफ या डॉक्टर से बात करें और अपने बर्थ प्लान के बारे में चर्चा करें, जिससे जन्म से जुड़ा जोखिम कम हो सके।

कब मुझे तुरंत मेडिकल सहायता की जरूरत है? (Signs that tell I should seek immediate medical help)

लोटस बर्थ तकनीक से बच्चे के जन्म के बाद यदि निम्न संकेत दिखे तो तुरंत मेडिकल सहायता लें-

  • गर्भनाल (umbilical cord) वाले हिस्से में लालिमा, गर्माहट या सूजन हो
  • नवजात के शरीर का तापमान (Temperature) 100.4 से अधिक हो
  • ठीक से स्तनपान नहीं कर रहा हो
  • सामान्य से अधिक सो रहा हो और आपको स्तनपान के लिए उसे बार-बार जगाना पड़ रहा हो।

ऐसी कोई भी समस्या दिखने पर बिना देरी के डॉक्टर के पास जाएं।

रिसर्च है जरूरी?

यदि आप लोटस बर्थ का फैसला करती हैं, तो जरूरी है कि पहले इससे जुड़ी सभी रिसर्च कर लें और किसी ट्रेन्ड लोटस बर्थ प्रैक्टिशनर के पास जाकर अपने मन के सारे संदेह दूर कर लें। प्रैक्टिशनर से आप अपने हिसाब से कुछ भी पूछ सकती हैं, जिसमें इन सवालों को भी जरूर शामिल करें-

  • गर्भनाल जुड़े रहने पर बच्चे को कैसे कपड़े पहनाने चाहिए और उसे कैसे गोद में लेना होगा?
  • मैं इस प्रैक्टिस को और सुरक्षित कैसे बना सकती हूं?
  • आपने कितनी बार लोटस बर्थ में मदद की है?
  • लोटस बर्थ से किस तरह का जोखिम जुड़ा है?
  • नाल से अटैच रहने पर प्लेसेंटा की देखभाल कैसे करनी चाहिए?
  • यदि नवजात में संक्रमण का कोई संकेत दिखे तो मुझे क्या करना चाहिए?

और पढ़ें- असली लेबर पेन में दिख सकते हैं ये लक्षण, जानकारी है तो खेलें क्विज

लोटस बर्थ एक ऐसी प्रैक्टिस है जिसमें गर्भनाल (Umbilical cord) और प्लेसेंटा (Placenta) को जन्म के बाद बच्चे के शरीर से अलग नहीं किया जाता, बल्कि उसे कुदरती रूप से अलग होने के लिए छोड़ दिया जाता है। इसके समर्थक इसे एक सौम्य तरीका मानते हैं जो बच्चे के लिए अच्छा होता है। हालांकि इस संबंध में रिसर्च की कमी है, इसलिए यदि आप इस तकनीक को अपनाने की सोच रही हैं, तो पहले अपनी मिडवाइफ या डॉक्टर से इस बारे में चर्चा अवश्य कर लें। जहां तक बच्चे के जन्म का सवाल है तो जन्म के तरीके का चुनाव करने के लिए पैरेंट्स स्वतंत्र होते हैं, लेकिन किसी भी तरीके का चुनाव करते समय उन्हें जोखिमों का भी ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि आखिरकार यह उनके बच्चे के जीवन से जुड़ा मामला है। अधिकांश विशेषज्ञ नॉर्मल डिलीवरी को ही सबसे सुरक्षित मानते हैं।

 

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Toshini Rathod द्वारा लिखित आखिरी अपडेट 06/04/2021 को
डॉ. प्रणाली पाटील के द्वारा मेडिकली रिव्यूड
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