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माइट्रल वॉल्व डिजीज: माइट्रल वॉल्व के ठीक तरह से काम ना करने पर बढ़ सकती आपकी तकलीफ!

माइट्रल वॉल्व डिजीज: माइट्रल वॉल्व के ठीक तरह से काम ना करने पर बढ़ सकती आपकी तकलीफ!

माइट्रल वॉल्व हार्ट के दो चैम्बर्स के बीच लेफ्ट साइड में मौजूद होता है। इन चैम्बर्स को लेफ्ट एट्रियम (Left Atria) और लेफ्ट वेंट्रिकल (Left ventricle) कहा जाता है। यह वॉल्व लेफ्ट एट्रियम (Left Atria) से लेफ्ट वेंट्रिकल (Left ventricle) तक एक ही दिशा में ब्लड को ठीक तरह से फ्लो करने का काम करता है। यही नहीं, यह वॉल्व ब्लड को बैकवर्ड दिशा में फ्लो करने से रोकने में भी मददगार है। माइट्रल वॉल्व डिजीज (Mitral Valve Disease) तब होती हैं, जब माइट्रल वॉल्व सही से काम नहीं कर पाता है। माइट्रल वॉल्व डिजीज (Mitral Valve Disease) के कारण लेफ्ट एट्रियम में खून बैकवार्ड फ्लो करता है।

नतीजन, हार्ट आपके शरीर को ऑक्सीजन युक्त ब्लड सप्लाई करने के लिए लेफ्ट वेंट्रिकुलर चैम्बर (Left ventricular chamber) से पर्याप्त रक्त पंप नहीं कर पाता है। इसके साथ सांस लेने में समस्या और थकावट जैसी परेशानियां हो सकती हैं। कई लोग माइट्रल वॉल्व डिजीज (Mitral Valve Disease) में कोई लक्षण महसूस नहीं करते हैं। अगर इस समस्या का सही समय पर इलाज न किया जाए तो यह गंभीर हो सकती है। आइए, जानते हैं माइट्रल वॉल्व डिजीज (Mitral Valve Disease)के बारे में विस्तार से। सबसे पहले जानिए इसके प्रकार कौन से हैं?

माइट्रल वॉल्व डिजीज के प्रकार (Types of Mitral Valve Disease)

माइट्रल वॉल्व डिजीज (Mitral Valve Disease) एक गंभीर स्थिति है। इसके तीन प्रकार हैं। जानिए इनके बारे में:

  • माइट्रल वॉल्व स्टेनोसिस (Mitral valve stenosis): माइट्रल वॉल्व स्टेनोसिस की समस्या तब होती है, जब वॉल्व की ओपनिंग तंग हो जाती है। इसका अर्थ यह है कि लेफ्ट वेंट्रिकल से पर्याप्त खून पास नहीं हो पाता है।
  • माइट्रल वॉल्व प्रोलैप्स (Mitral valve prolapse): माइट्रल वॉल्व प्रोलैप्स की समस्या तब होती है, जब वॉल्व पर फ्लैप कसकर बंद होने के बजाय उभर जाते हैं। यह वॉल्व जो पूरी तरह से बंद नहीं हो पाता है, जिससे ब्लड बैकवर्ड फ्लो हो सकता है।
  • माइट्रल वॉल्व रिगर्जेटेशन (Mitral valve regurgitation): मेडलाइनप्लस (MedlinePlus) के अनुसार माइट्रल वॉल्व रिगर्जेटेशन की समस्या तब होती है, जब वॉल्व से ब्लड लीक होता है। जब लेफ्ट वेंट्रिकल कंप्रेस होता है तो रोगी के लेफ्ट एट्रियम में खून बैकवर्ड फ्लो करता है। माइट्रल वॉल्व रिगर्जेटेशन की समस्या तब भी हो सकती है, जब हार्ट के लेफ्ट साइड में माइट्रल वॉल्व सही से क्लोज नहीं हो पाता है। अब जानिए इसके लक्षणों के बारे में

और पढ़ें : लेफ्ट साइड हार्ट फेलियर के क्या होते हैं लक्षण और किन समस्याओं का करना पड़ता है सामना?

माइट्रल वॉल्व डिजीज के लक्षण (Symptoms of Mitral Valve Disease)

माइट्रल वॉल्व डिजीज (Mitral Valve Disease) के लक्षण, वॉल्व की समस्या के सही कारणों पर निर्भर करते हैं। हो सकता है कि इस हार्ट डिजीज में रोगी को कोई भी लक्षण नजर न आए। लेकिन, इसके सामान्य लक्षणों में यह सब शामिल हैं:

  • खांसी (Cough)
  • सांस लेने में समस्या खासतौर पर जब आप नीचे अपनी पीठ के बल बैठते हैं या व्यायाम करते हैं (Shortness of Breath)
  • थकावट (Fatigue)
  • चक्कर आना (Lightheadedness)

इसके साथ ही आप छाती में दर्द या कसाव का अनुभव भी कर सकते हैं। कुछ मामलों में आप हार्ट बीट के सामान्य होना या इसमें तेजी का अनुभव भी करेंगे। माइट्रल वॉल्व डिजीज (Mitral Valve Disease) के लक्षण आमतौर पर एकदम से बढ़ते हैं। अगर आपको इंफेक्शन है, कोई स्ट्रेस है या आप प्रेग्नेंट हैं तो यह लक्षण बदतर हो सकते हैं। जानिए क्या हैं इसके कारणों के बारे में।

और पढ़ें : हार्ट इन्फेक्शन में एंटीबायोटिक आईवी : इस्तेमाल करने से पहले जान लें ये बातें!

माइट्रल वॉल्व डिजीज के कारण (Causes of Mitral Valve Disease)

हमारे हार्ट में चार वॉल्व होते हैं, जो खून को सही दिशा में फ्लो करने में मदद करते हैं। इन्हीं वॉल्व्स में से एक है माइट्रल वॉल्व। हर वॉल्व के फ्लैप्स होते हैं, जो हर हार्टबीट के साथ बंद होते और खुलते हैं। कई बार यह वॉल्व सही से खुल या बंद नहीं हो पाते हैं। माइट्रल वॉल्व डिजीज (Mitral Valve Disease) में, लेफ्ट हार्ट चैम्बर और लोअर हार्ट चैम्बर के बीच के माइट्रल वॉल्व सही से काम नहीं करता है। यह सही से काम नहीं कर पाता है, जिससे ब्लड बैकवार्ड लीक करता है या वॉल्व तंग हो सकता है। माइट्रल वॉल्व डिजीज (Mitral Valve Disease) के कई कारण हो सकते हैं।

कई बार यह हार्ट डिजीज जन्म के समय भी पैदा हो सकती हैं। रूमेटिक फीवर (Rheumatic fever) माइट्रल वॉल्व डिजीज के प्रकार जैसे माइट्रल वॉल्व स्टेनोसिस (Mitral valve stenosis) का कारण हो सकता है, जो हार्ट को प्रभावित करता है। अब जानिए इसके रिस्क फैक्टर्स के बारे में।

माइट्रल वॉल्व डिजीज (Mitral Valve Disease)

और पढ़ें : कार्डिएक कैथेटेराइजेशन: कई प्रकार की हार्ट डिजीज का पता लगाने के लिए किया जाता है ये टेस्ट

रिस्क फैक्टर

माइट्रल वॉल्व डिजीज (Mitral Valve Disease) के कुछ रिस्क फैक्टर इस समस्या को बहुत अधिक बढ़ा सकते हैं, यह रिस्क फैक्टर इस प्रकार हैं:

  • उम्र का बढ़ना (Older age)
  • कुछ ऐसे इंफेक्शंस की हिस्ट्री होना, जो हार्ट को प्रभावित करें (History of certain infections)
  • हार्ट डिजीज या हार्ट अटैक की खास फॉर्म की हिस्ट्री होना (History of certain forms of heart disease or heart attack)
  • कुछ खास ड्रग्स के प्रयोग की हिस्ट्री (History of use of certain drugs)
  • जन्मजात हृदय दोष (Congenital heart disease)

इन रिस्क फैक्टर्स के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर की सलाह लें। अब जानिए किस तरह से संभव है इसका निदान?

और पढ़ें : कंजेस्टिव हार्ट फेलियर ट्रीटमेंट के लिए अपनाए जाते हैं यह तरीके

माइट्रल वॉल्व डिजीज का निदान कैसे किया जा सकता है? (Diagnosis of Mitral Valve Disease)

माइट्रल वॉल्व डिजीज (Mitral Valve Disease) के निदान के लिए डॉक्टर सबसे पहले रोगी से लक्षणों के बारे में जानते हैं। इसके साथ ही रोगी की शारीरिक जांच भी की जाती है। रोगी की मेडिकल हिस्ट्री के बारे में जानना भी जरुरी है। अगर डॉक्टर को यह संदेह हो कि रोगी को माइट्रल वॉल्व डिजीज (Mitral Valve Disease) है, तो वो स्टेथोस्कोप की मदद से उसकी हार्टबीट को सुनते हैं। हार्ट की असामान्य साउंड और रिदम पैटर्न्स इसके निदान में डॉक्टर की मदद कर सकते हैं। इसके साथ ही डॉक्टर कुछ अन्य टेस्ट्स की सलाह भी दे सकते हैं। यह टेस्ट इस प्रकार हैं:

  • इकोकार्डियोग्राम (Echocardiogram): इस टेस्ट में अल्ट्रासाउंड वेव्स का प्रयोग किया जाता है, ताकि हार्ट के स्ट्रक्चर और फंक्शन की इमेज बनाई जा सके।
  • एक्स रे (X-ray): यह एक सामान्य टेस्ट है, जिसकी मदद से हार्ट की तस्वीर कंप्यूटर या फिल्म पर बनाई जाती है।
  • ट्रांसइसोफेजियल इकोकार्डियोग्राम (Transesophageal Echocardiogram): इस टेस्ट से ट्रेडिशनल इकोकार्डियोग्राम की तुलना में हार्ट की अधिक डिटेल्ड इमेज बनाई जा सकती है।
  • कार्डिएक कैथेटेराइजेशन (Cardiac catheterization): यह प्रक्रिया से डॉक्टर कई तरह के टेस्ट कर सकते हैं, जिसमें हार्ट के ब्लड वेसल की इमेज प्राप्त करना शामिल है
  • इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (Electrocardiogram): इस टेस्ट हार्ट की इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी को रिकॉर्ड किया जा सकता है।
  • हॉल्टर मॉनिटरिंग (Holter monitoring): यह एक पोर्टेबल मॉनिटरिंग डिवाइस है जो हार्ट की इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी को समय के साथ रिकॉर्ड करता है, आमतौर पर 24 से 48 घंटे के भीतर।
  • स्ट्रेस टेस्ट (Stress tests) : जब आप व्यायाम करते हैं, तो आपके डॉक्टर इस टेस्ट के माध्यम से यह जांचते हैं कि आपका दिल फिजिकल स्ट्रेस के प्रति कैसे प्रतिक्रिया करता है। इसके लिए रोगी को ट्रेडमील पर दौड़ना पड़ सकता है या रोगी की हार्ट एक्टिविटी को बढ़ाने के लिए उसे दवाईयां भी दी जा सकती हैं।

और पढ़ें : माइट्रल वॉल्व एंडोकार्डाइटिस : हार्ट वाल्व की सूजन के बारे में जानें इस आर्टिकल के माध्यम से!

माइट्रल वॉल्व डिजीज के उपचार के बारे में जानें (Treatment of Mitral Valve Disease)

माइट्रल वॉल्व डिजीज (Mitral Valve Disease) का उपचार रोगी की स्थिति की गंभीरता और लक्षणों पर निर्भर करते हैं। अगर मामला गंभीर हो तो कई तरीकों से इसका उपचार संभव है या कई बार रोगी की स्थिति को सुधारने के लिए ट्रीटमेंट्स के कॉम्बिनेशन का प्रयोग भी किया जा सकता है। यह उपचार के तरीके इस प्रकार हैं:

दवाईयां (Medication)

अगर माइट्रल वॉल्व डिजीज (Mitral Valve Disease) की स्थिति में उपचार जरूरी हो तो डॉक्टर रोगी को कुछ दवाईयों की सलाह दे सकते हैं। हालांकि, ऐसी कोई दवाई नहीं है जो माइट्रल वॉल्व के स्ट्रक्चरल इशूज को सच में फिक्स कर सके। लेकिन, कुछ दवाईयां इसके लक्षणों में आराम दिलाती हैं और इन्हें बदतर होने से बचाती हैं। यह दवाईयां इस प्रकार हैं:

  • एंटीएरिथिमिक्स (Antiarrhythmics): यह दवाईयां एब्नार्मल हार्ट रिदम्स का उपचार करती हैं।
  • एंटीकोग्युलेंट (Anticoagulants): ब्लड को पतला करने के लिए इसका इस्तेमाल होता है।
  • बीटा ब्लॉकर्स (beta blockers): यह दवाईयां हार्ट रेट को स्लो करती हैं।
  • डाययुरेटिक्स (Diuretics): लंग्स में फ्लूइड की मात्रा को कम करने के लिए इसका इस्तेमाल होता है।

सर्जरी (Surgery)

माइट्रल वॉल्व डिजीज (Mitral Valve Disease) के गंभीर मामलों में सर्जरी भी की जा सकती है। डॉक्टर एक्सिस्टिंग माइट्रल वॉल्व को सर्जरी के माध्यम से रिपेयर कर सकते हैं, ताकि वॉल्व सही से काम कर सके। अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो वॉल्व को नए वॉल्व से भी रिप्लेस किया जा सकता है। यह रिप्लेसमेंट बायोलॉजिकल या मैकेनिकल कोई भी हो सकती है।

और पढ़ें : राइट साइड हार्ट फेलियर के लक्षणों को न करें नजरअंदाज, हो सकते हैं जानलेवा

वॉल्वुलोप्लास्टी (Valvuloplasty)

कुछ मामलों में डॉक्टर को मेडिकल प्रोसीजर की जरूरत भी हो सकती है। जैसे माइट्रल वॉल्व स्टेनोसिस (Mitral valve stenosis) के मामले में। इस प्रोसीजर में एक बैलून का प्रयोग किया जाता है ताकि वॉल्व को ओपन किया जा सके। इस प्रोसीजर को बैलून वॉल्वुलोप्लास्टी (Balloon valvuloplasty) कहा जाता है। यह तो थी जानकारी उपचार के बारे में। माइट्रल वॉल्व डिजीज (Mitral Valve Disease) से जुड़ी जटिलताओं के बारे में जानना भी जरुरी है। यह जटिलाएं इस प्रकार हैं:

माइट्रल वॉल्व डिजीज (Mitral Valve Disease) एक गंभीर स्थिति हो सकती है। हालांकि इससे बचने के कुछ तरीके इस प्रकार हैं।

और पढ़ें : दिल के साथ-साथ हार्ट वॉल्व्स का इस तरह से रखें ख्याल!

माइट्रल वॉल्व डिजीज से बचाव (Prevention of Mitral Valve Disease)

एब्नार्मल या डैमेज्ड हार्ट वॉल्व्स से पीड़ित लोगों में इंफेक्शन का रिस्क अधिक होता है, जिसे एंडोकार्डाइटिस (Endocarditis) कहा जा जाता है। कोई भी चीज जो बैक्टीरिया के आपके ब्लडस्ट्रीम में जाने का कारण बनती है, वह इस संक्रमण का कारण भी बन सकती है। इस समस्या से बचने के उपायों में यह सब शामिल हैं:

  • गंदे इंजेक्शन (Dirty Needles) के प्रयोग से बचें
  • रूमेटिक फीवर (Rheumatic fever) से बचने के लिए स्ट्रेप इंफेक्शंस का इलाज जल्द से जल्द कराएं।

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उपचार से पहले डॉक्टर और डेंटिस्ट को अगर आपको हार्ट वॉल्व डिजीज या कंजेनिटल हार्ट डिजीज (Congenital heart disease) हिस्ट्री हो, तो अवश्य बताएं। ऐसे में, कई लोगों को डेंटल प्रोसीजर या सर्जरी से पहले एंटीबायोटिक्स की जरूरत हो सकती है। यह तो थी माइट्रल वॉल्व डिजीज (Mitral Valve Disease) के बारे में पूरी जानकारी। अपने हार्ट को हेल्दी रखने के लिए अपनी दिनचर्या में बदलाव भी जरूरी है। जैसे हार्ट हेल्दी आहार का सेवन, नियमित व्यायाम, तनाव से बचाव, पर्याप्त नींद लेना आदि। जब माइट्रल वॉल्व उस तरह से काम नहीं करता है, जैसे उसे करना चाहिए। तो हार्ट से बाहर खून सही से फ्लो नहीं कर पाता है। इसके लक्षणों में थकावट या सांस लेने में समस्या शामिल है। हालांकि ऐसा जरूरी नहीं है कि सभी मरीजों को यह लक्षण महसूस हों। लेकिन, इन लक्षणों को पहचानना जरूरी है ताकि समय पर उपचार हो सके।

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AnuSharma द्वारा लिखित आखिरी अपडेट 07/08/2021 को
डॉ. हेमाक्षी जत्तानी के द्वारा मेडिकली रिव्यूड
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