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एरिथमोजेनिक राइट वेंट्रिकुलर डिसप्लेसिया: इसे सामान्य हार्ट डिजीज समझने की गलती तो नहीं कर रहे आप?

एरिथमोजेनिक राइट वेंट्रिकुलर डिसप्लेसिया: इसे सामान्य हार्ट डिजीज समझने की गलती तो नहीं कर रहे आप?

मेडलाइन प्लस (MedlinePlus) के अनुसार एरिथमोजेनिक राइट वेंट्रिकुलर डिसप्लेसिया (Arrhythmogenic Right Ventricular Dysplasia) हार्ट डिजीज का वो प्रकार है, जिसके लक्षण युवावस्था में नजर आते हैं। यह मायोकार्डियम से जुड़ा एक डिसऑर्डर है। मायोकार्डियम हार्ट की मस्कुलर वॉल (Muscular wall) को कहा जाता है। यानी, इस बीमारी के कारण असामान्य एब्नार्मल हार्टबीट (एरिथमिया) और अचानक मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है। एरिथमोजेनिक राइट वेंट्रिकुलर डिसप्लेसिया (Arrhythmogenic Right Ventricular Dysplasia) के शुरुआती स्टेजेस में हो सकता है कि रोगी में इसका कोई भी लक्षण नजर न आए लेकिन इससे प्रभावित व्यक्ति को अचानक मृत्यु का भय भी रहता है, खासतौर पर अधिक व्यायाम या शारीरिक परिश्रम के दौरान।

अगर बाद के स्टेजेस में मायोकार्डियम को अधिक नुकसान होता है, तो इसके कारण हार्ट फेलियर (Heart Failure) की संभावना बढ़ सकती है। आइए जानते हैं इस समस्या के बारे में और अधिक। शुरुआत करते हैं इसके लक्षणों से।

एरिथमोजेनिक राइट वेंट्रिकुलर डिसप्लेसिया के लक्षण क्या हैं? (Symptoms of Arrhythmogenic right ventricular cardiomyopathy)

समय रहते इस हार्ट डिजीज के लक्षणों को पहचानना बेहद जरूरी है, क्योंकि ऐसा न होने पर यह स्थिति जानलेवा साबित हो सकती है। इसके कुछ सामान्य लक्षण इस प्रकार हैं:

  • एरिथमिया (Arrhythmias): हार्टबीट के असामान्य होने को एरिथमिया (Arrhythmias) कहा जाता है। इसमें हार्ट बीट का फास्ट होना (Fast Heartbeat), स्किपिंग हार्ट बीट (Skipping heartbeat), हार्ट पाल्पिटेशन (Heart Palpitations) आदि शामिल है।
  • प्रीमेच्योर वेंट्रिकुलर कॉन्ट्रैक्शंस (Premature Ventricular Contractions): प्रीमेच्योर वेंट्रिकुलर कॉन्ट्रैक्शंस उस अतिरिक्त या असामान्य हार्ट बीट को कहा जाता है, जो तब होती है जब हार्ट के राइट एट्रियम में इलेक्ट्रिकल सिग्नल शुरू होते हैं।
  • वेंट्रिकुलर टॉयकीकार्डिया (Ventricular Tachycardia): यह तेज हार्ट बीट्स की एक सीरीज है, जिसकी शुरुआत वेंट्रिकल में होती है। इसके कारण कमजोरी, चक्कर आना, उलटी आना और तेज और स्किप्ड हार्ट बीट जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं।
  • मूर्छा (Syncope): मूर्छा (Syncope) को बेहोशी या अचानक होश न रहना आदि भी कहा जाता है। एरिथमोजेनिक राइट वेंट्रिकुलर डिसप्लेसिया (Arrhythmogenic Right Ventricular Dysplasia) में आप इस समस्या का सामना भी कर सकते हैं।
  • हार्ट फेलियर (Heart failure): दुर्लभ मामलों में इस समस्या से पीड़ित व्यक्ति को राइट हार्ट फेलियर (Right Heart Failure) जैसे लक्षण भी नजर आ सकते हैं। जिनमें कमजोरी, पैरों और एड़ियों में सूजन, पेट में फ्लूइड बिल्ड-अप आदि शामिल हैं।
  • अचानक कार्डिएक अरेस्ट (Sudden Cardiac Arrest): इस समस्या से पीड़ित कुछ लोगों में अचानक कार्डिएक अरेस्ट (Sudden Cardiac Arrest) को इसका सबसे पहला लक्षण माना जाता है। इसमें हार्ट धड़कना और शरीर के अन्य अंगों तक खून को पंप करना बंद कर देता है।

अगर इस समस्या का कुछ ही मिनटों में उपचार न किया जाए तो मृत्यु भी हो सकती है। यह तो थे इसके कुछ लक्षण। अब जानिए क्या हैं इसके कारण?

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एरिथमोजेनिक राइट वेंट्रिकुलर डिसप्लेसिया के कारण (Causes of Arrhythmogenic Right Ventricular Dysplasia)

एरिथमोजेनिक राइट वेंट्रिकुलर डिसप्लेसिया (Arrhythmogenic Right Ventricular Dysplasia) के कारणों के बारे में जानकारी नहीं है। यह एक दुर्लभ हार्ट डिजीज है। हालांकि, यह समस्या बिना फैमिली हिस्ट्री के कारण भी हो सकती है। लेकिन, ऐसा माना जाता है कि एरिथमोजेनिक राइट वेंट्रिकुलर डिसप्लेसिया के लगभग तीस से पचास प्रतिशत मामलों में फैमिली हिस्ट्री को इसका कारण माना गया है। हालांकि, सभी खास जीन्स को इसका कारण नहीं माना गया है। शोधकर्ता स्पेसिफिक जीन म्युटेशन (Specific Gene Mutation) और एरिथमोजेनिक राइट वेंट्रिकुलर डिसप्लेसिया (Arrhythmogenic Right Ventricular Dysplasia) से जुड़े क्रोमोसोम्स (Chromosomes) के स्थानों की पहचान करने का प्रयास कर रहे हैं।

इसके अलावा इस हार्ट डिजीज को कई नॉन-जेनेटिक कारणों से भी जोड़ा गया है जैसे कंजेनिटल अब्नोर्मलिटीज (Congenital abnormalities), वायरल या इंफ्लेमेटरी मायोकार्डिटिस (Viral or inflammatory myocarditis) आदि। अब जानिए इस समस्या के निदान के बारे में।

और पढ़ें: इलेक्ट्रोफिजियोलॉजिकल टेस्टिंग : यह टेस्ट कैसे काम आता है दिल से जुड़ी समस्याओं के निदान में!

एरिथमोजेनिक राइट वेंट्रिकुलर डिसप्लेसिया का निदान (Diagnosis of Arrhythmogenic Right Ventricular Dysplasia)

एरिथमोजेनिक राइट वेंट्रिकुलर डिसप्लेसिया (Arrhythmogenic Right Ventricular Dysplasia) का निदान इसकी मेडिकल हिस्ट्री, शारीरिक जांच और टेस्ट्स पर निर्भर करता है।
इसके निदान के लिए डॉक्टर सबसे पहले रोगी से लक्षणों के बारे में जानते हैं। उसके बाद रोगी की मेडिकल और फैमिली हिस्ट्री जानी जाती है। इसके साथ शारीरिक जांच भी की जाती है। डॉक्टर इस समस्या के निदान के लिए रोगी को यह टेस्ट करने के लिए भी कह सकते हैं, जैसे:

  • एक्स रे (X-ray): यह एक कॉमन टेस्ट है, जिसकी मदद से हार्ट प्रॉब्लम (Heart Problems) के बारे में जानने के लिए दिल की इमेज कंप्यूटर पर बनाई जाती है।
  • कार्डिएक मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग (Cardiac Magnetic Resonance Imaging): इस समस्या के निदान के लिए मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग की सलाह दी जा सकती है। इसमें पावरफुल मेग्नेटिक फील्ड (Magnetic Field) और रेडियो वेव्स (Radio Waves) का प्रयोग कर के हार्ट स्ट्रक्चर की डिटेल्ड पिक्चर बनाई जाती है।
  • इकोकार्डियोग्राम (Echocardiogram): इस टेस्ट में हार्ट के स्ट्रक्चर और फंक्शन की तस्वीर बनाने के लिए अल्ट्रासाउंड वेव्स का प्रयोग किया जाता है। इसे ECG भी कहा जाता है
  • ट्रांसइसोफेजियल इकोकार्डियोग्राम (Transesophageal Echocardiogram): यह टेस्ट भी इकोकार्डियोग्राम की तरह होता है। लेकिन, इस टेस्ट से ट्रेडिशनल इकोकार्डियोग्राम की तुलना में हार्ट की अधिक विस्तृत तस्वीर बनाई जा सकती है।
  • इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (Electrocardiogram): इस टेस्ट के माध्यम से दिल की इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी को रिकॉर्ड किया जा सकता है।
  • हॉल्टर मॉनिटरिंग (Holter monitoring): इस पोर्टेबल मॉनिटरिंग डिवाइस का प्रयोग हार्ट की इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी को समय के साथ रिकॉर्ड करने के लिए प्रयोग किया जाता है।
  • स्ट्रेस टेस्ट (Stress tests) : इस टेस्ट में डॉक्टर व्यायाम करते हुए या कोई भी शारीरिक गतिविधि को करते हुए रोगी का दिल कैसे प्रतिक्रिया देता है, इसे जांचते हैं। इन टेस्ट्स के अलावा भी डॉक्टर अन्य कुछ टेस्ट्स कराने की सलाह रोगी को दे सकते हैं।

एरिथमोजेनिक राइट वेंट्रिकुलर डिसप्लेसिया

और पढ़ें: एब्नॉर्मल हार्ट रिदम: किन कारणों से दिल की धड़कन अपने धड़कने के स्टाइल में ला सकती है बदलाव?

अगर रोगी में निम्नलिखित समस्याएं हैं, तो एरिथमोजेनिक राइट वेंट्रिकुलर डिसप्लेसिया (Arrhythmogenic Right Ventricular Dysplasia) की पुष्टि की जा सकती है:

  • राइट वेंट्रिकल का एब्नार्मल फंक्शन (Abnormal function of Right Ventricle)
  • राइट वेंट्रिकल हार्ट मसल का फाइबर्स-फैटी इन्फ़्लट्रेट्स (Fibrous-fatty infiltrates)
  • असामान्य इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफी (Abnormal Electrocardiography)
  • एरिथमिया (Arrhythmias)

इसके निदान के बाद डॉक्टर उपचार के तरीकों के बारे में निर्धारित करते हैं। जानिए है कि कैसे हो सकता है इस हार्ट डिजीज का उपचार?

और पढ़ें: एओरटिक वाल्व रिप्लेसमेंट के बाद भी फायदेमंद हो सकता है बीटा ब्लॉकर्स का उपयोग!

एरिथमोजेनिक राइट वेंट्रिकुलर डिसप्लेसिया का उपचार (Treatment of Arrhythmogenic Right Ventricular Dysplasia)

एरिथमोजेनिक राइट वेंट्रिकुलर डिसप्लेसिया (Arrhythmogenic Right Ventricular Dysplasia) के उपचार के विकल्प हर रोगी के लिए अलग हो सकते हैं। यह तरीके रोगी के कार्डिएक टेस्ट रिजल्ट्स, मेडिकल हिस्ट्री और जेनेटिक म्युटेशन की अनुपस्थिति पर निर्भर करते हैं। इसके सबसे सामान्य उपचारों में दवाईयां, इम्प्लांटेबल कार्डियोवर्टर-डिफाइब्रिलेटर्स (Implantable Cardioverter Defibrillators), कैथेटर एबलेशन (Catheter Ablation), कार्डिएक ट्रांसप्लांटेशन और लाइफस्टाइल चेंजेज शामिल है:

दवाईयां (Medication)

इन दवाईयों को एरिथमिया के एपिसोड्स और गंभीरता को कम करने के लिए प्रयोग किया जाता है। यह दवाईयां हार्ट की इलेक्ट्रिकल प्रॉपर्टीज को एक या दो तरीकों से प्रभावित कर सकती हैं, जैसे:

  • डायरेक्टली (Directly): इसमें दवाईयां हार्ट के इलेक्ट्रिकल करंट को प्रभावित कर सकती हैं।
  • इंडायरेक्टली (Indirectly): बीटा ब्लॉकर्स (Beta blockers) जैसी दवाईयां एड्रेनलिन (Adrenaline) के प्रभाव को ब्लॉक करती हैं और हार्ट में ब्लड फ्लो (Blood Flow) को सुधरती हैं। बीटा ब्लॉकर्स हार्ट रेट और ब्लड प्रेशर (Blood Pressure) को कम करने में भी मदद कर सकती हैं। यह सबसे सुरक्षित और सामान्य प्रयोग की जाने वाली दवाईयां हैं।

और पढ़ें: ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने के साथ जानुशीर्षासन के और अनजाने फायदें और करने का सही तरीका जानिए

इसके अलावा प्रयोग होने वाली दवाईयां इस प्रकार हैं:

  • यदि बीटा ब्लॉकर्स से उपचार के बाद भी रोगियों को वेंट्रिकुलर टॉयकीकार्डिया (Ventricular tachycardia) का अनुभव होता है, तो एंटीएरिथिमिक दवाएं (Antiarrhythmic Medications), जैसे कि सोटोलोल (Sotalol) या ऐमियोडैरोन (Amiodarone) की सलाह दी जा सकती है।
  • एंजियोटेंसिन कंवर्टिंग एंजाइम (Angiotensin converting enzyme) इन्हिबिटर्स भी हार्ट के वर्कलोड को कम करने में सहायक हैं और हार्ट फेलियर के जोखिम को भी यह कम कर सकती हैं। ऐसे में डॉक्टर इनकी सलाह भी दे सकते हैं। लेकिन ध्यान रखें कि सभी दवाईयों के साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं। इसलिए इनके बारे में भी पहले ही डॉक्टर से जान लें।

और पढ़ें: कार्डियोमायोपैथी में बीटा ब्लॉकर्स : इस तरह से है फायदेमंद, लेकिन डॉक्टर की सलाह के बिना लेने की न सोचें

इम्प्लांटेबल कार्डियोवर्टर-डिफाइब्रिलेटर (Implantable Cardioverter Defibrillators)

इम्प्लांटेबल कार्डियोवर्टर-डिफाइब्रिलेटर का प्रयोग सामान्य रूप से एरिथमोजेनिक राइट वेंट्रिकुलर डिसप्लेसिया(Arrhythmogenic Right Ventricular Dysplasia) के उपचार के लिए किया जाता है। यह डिवाइस लगातार हार्ट बीट को मॉनिटर करते हैं अगर इन डिवाइसेस को एक असामान्य हार्ट बीट या तेज हार्ट रिदम का अनुभव होता है। तो वो ऑटोमेटिकली एक स्मॉल इलेक्ट्रिकल शॉक रोगी के हार्ट को देते हैं। इसके कारण थोड़ी देर के लिए रोगी को परेशानी भी हो सकती है। यह डिवाइस पेसमेकर की तरह भी काम करते हैं। यही नहीं, यह फास्ट और स्लो दोनों तरह की रिदम्स का उपचार कर सकते हैं। लेकिन, इन डिवाइसेस की हर 3 से 6 महीने के अंदर जांच होनी चाहिए और हर 4 या 6 साल में इन्हें रिप्लेस करना भी जरुरी है।

कैथेटर एबलेशन (Catheter Ablation)

एरिथमोजेनिक राइट वेंट्रिकुलर डिसप्लेसिया (Arrhythmogenic Right Ventricular Dysplasia) के उपचार के लिए कैथेटर एबलेशन (Catheter Ablation) का प्रयोग भी किया जाता सकता है। इसके साथ हार्ट का वो हिस्सा जो असामान्य हार्टबीट का कारण बन रहा है, उस टिश्यू को नष्ट करने के लिए पहले इसे पहचाना जाता है और उसके बाद कोट्राइज्ड (Cauterized) यानी दागा जाता है। इस इनवेसिव प्रोसीजर को इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी लेबोरेटरी में किया जाता है और इससे एरिथमिक एपिसोड्स (Arrhythmic episodes) की फ्रीक्वेंसी को कम किया जा सकता है

इस स्थिति में हार्ट को हुआ डैमेज अगर गंभीर हो तो हार्ट ट्रांसप्लांट (Heart Transplant) की जरूरत भी हो सकती है हालांकि यह दुर्लभ है। यह तो इस हार्ट डिजीज के उपचार। अब पाइए एरिथमोजेनिक राइट वेंट्रिकुलर डिसप्लेसिया (Arrhythmogenic Right Ventricular Dysplasia) की स्थिति को मैनेज करने की जानकारी।

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एरिथमोजेनिक राइट वेंट्रिकुलर डिसप्लेसिया को कैसे मैनेज करें?

जैसा की आप जान ही गए होंगे कि एरिथमोजेनिक राइट वेंट्रिकुलर डिसप्लेसिया (Arrhythmogenic Right Ventricular Dysplasia) एक जानलेवा हार्ट डिजीज (Heart Disease) है। ऐसे में अगर आपको यह समस्या है, तो इसे किस तरह से मैनेज किया जाए इसके बारे में जानना भी आपके लिए बेहद जरूरी है। जानिए, कैसे किया जा सकता है इस स्थिति को मैनेज:

  • अधिक फिजिकल एक्टिविटीज़ को करने से बचें।
  • अन्य हार्ट कंडिशन का उपचार कराएं। इसमें कोलेस्ट्रॉल को कम करने के लिए प्रयोग होने वाली दवाईयां भी शामिल हैं।
  • अगर आप एल्कोहॉल का सेवन करते हैं या अधिक मात्रा में कैफीन लेते हैं। तो उनकी मात्रा को सीमित कर दें।
  • अपने लक्षणों को सही से मॉनिटर करें। अगर आपका वजन बहुत तेजी से बढ़ रहा है, तो यह इस बात का संकेत हो सकता है कि आप पुअर हार्ट फंक्शन के कारण फ्लूइड रिटेन (Fluid Retain) कर रहे हैं। इस स्थिति में तुरंत डॉक्टर से बात करें। इसके लक्षणों को सही समय पर पहचानना जरुरी है ताकि सही समय पर उपचार किया जा सके।

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और पढ़ें: बायवेंट्रिकुलर हार्ट फेलियर : इस हार्ट फेलियर के लक्षणों को पहचानना क्यों है जरूरी?

यह तो थी एरिथमोजेनिक राइट वेंट्रिकुलर डिसप्लेसिया (Arrhythmogenic Right Ventricular Dysplasia) के बारे में पूरी जानकारी। इस समस्या या किसी भी हार्ट डिजीज के खतरे से बचने के लिए जरूरी है अपने हेल्दी लाइफस्टाइल को बनाए रखना। इसमें सही आहार का सेवन, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद, तनाव से बचाव आदि शामिल हैं। इसके साथ ही अपनी नियमित रूप से जांच कराना न भूलें और डॉक्टर की सलाह का पालन करना भी आवश्यक है। अगर आपके मन में इस समस्या को लेकर कोई भी सवाल या चिंता है तो अपने डॉक्टर से बात करें।

उम्मीद है कि आपको यह जानकारी पसंद आई होगी। अधिक जानकारी के लिए एक्सपर्ट से सलाह जरूर लें। अगर आपके मन में अन्य कोई सवाल हैं तो आप हमारे फेसबुक पेज पर पूछ सकते हैं। हम आपके सभी सवालों के जवाब आपको कमेंट बॉक्स में देने की पूरी कोशिश करेंगे। अपने करीबियों को इस जानकारी से अवगत कराने के लिए आप ये आर्टिकल जरूर शेयर करें।

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सूत्र

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लेखक की तस्वीर badge
AnuSharma द्वारा लिखित आखिरी अपडेट 13/08/2021 को
और Admin Writer द्वारा फैक्ट चेक्ड
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