सैनिकों के तनाव पर भी करें सर्जिकल स्ट्राइक!

By Medically reviewed by Dr. Radhika apte

देश के बाहर पड़ोसी देशों के हमले से बचाने के लिए सैनिक बॉर्डर पर 24 घंटे तैनात रहते हैं। देश के अंदर के आतंक से देशवासियों को बचाने के लिए भी वह 24 घंटे चौकस रहते हैं। 24 के बजाए 48 घंटे काम करने वाले इन जां बाजों की जान पर बन आती है पर वह एक शब्द किसी से नहीं बोल पाते। कई शोधों के अनुसार सैनिकों में तनाव बढ़ता जा रहा है। सैनिकों में तनाव के कारण जानना चाहते हैं या उनकी मदद करना चाहते हैं तो आर्टिकल जरूर पढ़ें।

सैनिकों में तनाव के कारण

एक नजर सैनिकों के सुसाइड के आंकड़ों पर

सरकारी आंकड़ों की बात करें तो सन् 2011 से 2018 में 891 भारतीय सैनिकों ने सुसाइड किया। थल सेना यानी आर्मी में यह आंकड़ा सबसे ज्यादा है। इन वर्षों में मात्र आर्मी के ही 707 सैनिक शामिल हैं। आर्मी में वर्ष 2011 में 105 और 2016 में 104 सैनिकों की मौत की वजह डिप्रेशन बना। 2018 में यह आंकड़ा 80 लोगों पर जाकर रुका। वहीं सन् 2011 से 2018 में एयर फोर्स के 148 और नेवी के 36 सैनिकों ने आत्महत्या की।

अर्धसैनिक बलों की स्थिति और भी भयावह

अर्धसैनिक बलों की बात करें तो यह आंकड़े और दिल दहलाने वाले हैं। वर्ष 2012 से 2015 तक सीआरपीएफ के 149, सीमा सुरक्षा बल बीएसएफ के 134, सीआईएसएफ के 56, आईटीबीपी और एसएसबी के 25, आसाम राइफल के 30 सैनिकों ने तनाव से ना जूझ पाने की वजह से जान दे दी और अपने साथियों की जान ले भी ली।

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सियाचिन में पिछले 10 सालों में हम 163 जवान खो बैठे हैं

सियाचिन ग्लेशिर 20 हजार फुट की उंचाई पर है। दुनिया की इस सबसे ऊंची रणभूमि में भारतीय सेना के दस हजार सैनिक डेरा जमाए रहते हैं। तैनाती और बेस कैंप में करीब दस दिन का फासला होता है। दिन के समय बर्फ के धसने का खतरा होता है इस कारण जितना हो सके इस सफर को रात में ही तय किया जाता है। तापमान शून्य से – 60 तक पहुंच जाता है। ऐसी स्थिति में रहना कितना मुश्किल है इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। यहां जीने के लिए कुछ तो खाना ही है वाली स्थिति है। पीने का पानी बर्फ को पिघलाकर पिया जाता है। इन विषम परिस्थितियों में रहने के कारण सैनिकों में पाचन संबंधी समस्या, अनिंद्रा, सिर दर्द, याददाश्त में कमी, भूख ना लगना जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो जाती हैं।

बाहर नहीं अंदर के आतंक को रोकने के लिए भी तैनात रहते हैं सैनिक

सरकारी रिपोर्ट के अनुसार सन् 2007 से 2019 में ही 148 सैनिकों ने खुदकुशी कर ली। यह आंकड़ा सिर्फ नक्सल बहुल इलाके बस्तर का है। बॉर्डर की रक्षा हो, जम्मू-कश्मीर का आतंकवाद हो, उत्तर-पूर्व में आतंक हो या नक्सलवाद से लड़ना हो देश के अंदर बाहर हर जगह के आतंक से लड़ने के लिए सेना को खड़ा कर दिया जाता है। इसपर भी प्राकृतिक आपदा में भी इन्हीं की सेवाएं ली जाती हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो बस एक फौजी ही हैं जिनकी जिंदगी में 24 नहीं 48 घंटे होते हैं पर उनके अपने परिवार के लिए सैनिकों के पास समय नहीं होता। छत्तीसगढ़ के नक्सल बहुल क्षेत्र में तैनात सीआरपीएफ के एक जवान ने हैलो स्वास्थ्य से बात करते हुए बताया कि नक्सलों के बीच काम करना बहुत तनावपूर्ण होता है। सैनिकों को रात को पैट्रोलिंग करनी पड़ती है। नक्सलियों और अपने साथियों में रात को फर्क करना इतना मुश्किल हो जाता है कि कई बार ऐसे मामले सामने आए हैं कि नक्सली समझकर अपने ही साथी को मार गिराया है। ऐसे में सैनिकों में तनाव और बढ़ जाता है।

घर-परिवार की याद सताती है

सैनिकों में तनाव का सबसे बड़ा कारण उनका घर-परिवार से दूर रहना माना जाता है। घर पर माता-पिता अकेले हो तो उनकी देखभाल की चिंता सताती है। पत्नी और बच्चे हों तो उनकी सुरक्षा का डर सताता है। बच्चे के भविष्य का डर लगता है। बच्चे को बड़ा होते देखने का सुख एक फौजी के नसीब में नहीं होता। बच्चे को हाथ पकड़कर चलना सीखाना हो या पहली बार उसका स्कूल जाना। यह सब बातें सैनिक बस सपने में ही सोच सकता है। कई बार जमीन के विवाद या अन्य घरेलू विवाद इस तरह सैनिकों में तनाव का कारण बन जाते हैं कि वह सुसाइड तक कर लेते हैं।

मोबाइल वरदान है या अभिशाप

एक वक्त था जब मोबाइल हर किसी के पास नहीं होता था। तब चिट्ठी के जरिए ही एक जवान को पता चलता था कि घर में क्या चल रहा है? इसमें महीनों लग जाते थे। दूर होने के कारण चिट्ठी में घर की समस्याएं उन तक परिवार वाले कम ही पहुंचने देते थे। आज मोबाइल आ गया है। हर मिनट घर की खबर पता चल जाती है। अब दूरियां इतनी पट गई हैं कि माता-पिता बहू की और बहू माता-पिता की हर छोटी-बड़ी बात बॉर्डर पर तैनात सैनिक तक पहुंचाने लगे हैं। घर के कलह का सीधा असर सैनिक की मन:स्थिति पर होता है। घर-परिवार की समस्याओं के कारण भी कई सैनिकों ने आत्महत्या की है।

खुद को परिस्थिति के अनुकूल ढालने में समय लगता है

सैनिक भी इंसान ही होते हैं। यह बात अक्सर हम भूल जाते हैं। मद्रास के किसी व्यक्ति को अगर कश्मीर की बर्फ में जीना पड़े तो उसे समय लगेगा। ऐसा ही सैनिकों के साथ भी होता है। बार-बार जगह के बदलने के कारण भी कुछ सैनिकों में तनाव पैदा हो जाता है पर इस बात पर कम ही ध्यान दिया जाता है। इमरजेंसी लग जाए या कहीं दंगे-फसाद हों या चुनाव में अतिरिक्त लोगों की आवश्यकता। सैनिकों की जगह में फेरबदल कर दिया जाता है। ऐसे में बॉडी को वातावरण के अनुसार ढलने का समय ही नहीं मिल पाता।

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छुट्टियां नहीं मिलती

Defence Institute of Psychological Research (DIPR) की रिपोर्ट के मुताबिक छुट्टियां ना मिलना या समय से छुट्टियां ना मिलना भी सैनिकों में तनाव का बड़ा कारण है। घर पर माता-पिता की तबीयत खराब हो या बहन की शादी हो। कई बार ऐसी परिस्थितियां बनती हैं कि सैनिकों को छुट्टी नहीं दी जा सकती। ऐसे में एक सैनिक में तनाव होना लाजमी हो जाता है। कई सैनिक साल भर में एक बार ही अपने परिवार से मिल पाते हैं। कलकत्ता में बीएसएफ में तैनात राजेश कहते हैं घर में बच्चा हुआ है यह तो फोन पर पता चल जाता है, पर जब तक आप पहुंचते हैं तब तक वह बच्चा बोलने में भी लग जाता है। अपने बच्चे का बचपन एक फौजी पिता कभी नहीं देख पाता। साल भर में एक बार जो छुट्टी मिलती है, उसमें आपका बच्चा आपको कभी नहीं अपना पाता। बच्चों से दूरी बढ़ जाती है, जिसे पाटना बहुत मुश्किल हो जाता है।

महंगाई भी तोड़ देती है कमर

जितनी देर और जितना काम एक सैनिक से लिया जाता है उस हिसाब से उसे वेतन नहीं दिया जाता। हालांकि पहले के मुकाबले वेतन में अंतर आया है पर यह भी सच है कि महंगाई में भी अंतर आया है। महंगाई की तुलना में वेतन बहुत कम है। महंगाई और फौजी की बेबसी का अंदाजा पूर्व सैनिक बिजन दास के प्रधानमंत्री को लिखे सुसाइड नोट से लगाया जा सकता है। उन्होंने इलाहाबाद के एक होटल के कमरे में फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली थी। दास ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे सुसाइड नोट में लिखा था कि उनके पास अपने बेटे के सपने पूरे करने के लिए पैसे नहीं हैं। पैसों की किल्लत के चलते ही उन्होंने जान दे दी। रिटायर होने के बाद ही नहीं कार्यरत रहने पर भी एक सैनिक का और उसके बच्चों का भविष्य अधर में ही होता है।

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सैनिकों में तनाव दूर करने के क्या उपाय किए जा रहे हैं?

  • सैनिकों में तनाव दूर करने के लिए ई-समाधान आएगा: बिना युद्ध के हम लगातार सैनिकों को डिप्रेशन के कारण खो दे रहे हैं। इससे बचने के लिए सरकार ने कुछ जरूरी कदम उठाए हैं। सैनिक कल्याण विभाग ने ऐसी तरकीब ढूंढी है जिससे सैनिक घर-परिवार की चिंता किए बिना ड्यूटी कर सकेंगे। ई-समस्या समाधान पर सैनिक अपनी समस्या बता सकेंगे। समस्या विभाग के पास पहुंचते ही संबंधित उपमंडल या जिला प्रशासन की मदद से समस्या के समाधान किया जाएगा।समस्या का समाधान का मूल्यांकन करने के लिए प्रदेश स्तर पर समन्वयक कमेटी भी बनाई जाएगी। सैनिक खुद जब तक समस्या की एंट्री को नहीं मिटाता, तब तक वह समस्या सॉफ्टवेयर पर दिखाई देगी। केंद्र सरकार से प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद उम्मीद की जा सकती है कि हम परिवार, पानी और सड़क की चिंता से अपने जवानों को नहीं खोएंगे।
  • योगा और मेडिटेशन: सैनिकों में तनाव दूर करने के लिए योगा और मेडिटेशन का आयोजन।
  • सैनिकों में तनाव को कम करने के लिए उत्तरी और पूर्वी कमान में सेना द्वारा MILAP और SAHYOG परियोजना। क्या है मिलाप और सहयोग परियोजना।
  • बेहतर खाना-पान, कपड़े और रहने व बच्चों की पढ़ाई की व्य​वस्था करना।
  • सैनिकों में तनाव को कम करने के लिए मानसिक सहायता हेल्पलाइन का गठन किया गया है। इसमें आर्मी और एयर फोर्स के सैनिक किसी भी प्रकार के मानसिक तनाव से मुक्त होने के लिए कॉल कर सकते हैं।
  • सैनिकों में तनाव को कम करने के लिए मुंबई, कोची, पोर्ट ब्लैयर, गोवा आदि कई स्थानों पर मेंटल हेल्थ सेंटर की स्थापना की गई है।

हैलो स्वास्थ्य की सैनिकों से बातचीत

  • सैनिकों में तनाव का सबसे बड़ा कारण बच्चों की पर​वरिश व शिक्षा होती है। आप अन्य पिताओं की तरह उनके साथ रहकर उनमें सही—गलत की समझ नहीं पैदा कर सकते। समाज में आज हर चीज महंगी है यहां तक की शिक्षा भी। सैनिक चाहे 24 घंटे के बजाए 48 घंटे ही काम क्यों ना कर रहा हो पर वेतन के मामले में वह दुनिया से पीछे ही है। बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लायक भी एक सैनिक के पास पैसे नहीं होते।

                                                                                                                                                 दामोदर धौलाखंडी, रिटायर सैनिक

  • सैनिक आम जन जीवन से कट जाते हैं। अपने मन की बात वह किसी से नहीं कह पाते। इसलिए जरूरी है कि सैनिकों में तनाव दूर करने के लिए कुछ बातचीत व स्ट्रेस मैनेजमेंट के सेशन हो।

                                                                                                                                   किशन चंद्र, जम्मू-कश्मीर में कार्यरत सैनिक

  • देश के भीतर आतंक से लड़ना दुगनी मार होता है क्योंकि कई लोकल लोग इन आतंक फैलाने वाले लोगों को पसंद करते हैं। ऐसे में वह सैनिकों को अपना दुश्मन मानते हैं। ऐसी स्थिति में एक चूक आप पर ही नहीं पूरी सेना पर सवाल खड़ा कर देती है।

                                                                                                              गोपाल सिंह बदला हुआ नाम, छत्तीसगढ़ में कार्यरत सैनिक

घर-परिवार, विषम परिस्थितियों में काम करना, बिना थके-रुके लगातार ड्यूटी करना। हम सब इसके लिए सैनिकों को दाद देते हैं, पर यह भूल जाते हैं कि वह भी इंसान ही हैं कोई मशीन नहीं। सैनिकों को भी आराम और जीवन को सुगम बनान के लिए अच्छे खान-पान, रहन-सहन की जरूरत होती है। सैनिकों में तनाव नहीं जोश होना चाहिए। यह जोश तब होगा जब वह रोजमर्रा की समस्याओं और घर-परिवार की चिंताओं से दूर रहेंगे।

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रिव्यू की तारीख दिसम्बर 7, 2019 | आखिरी बार संशोधित किया गया दिसम्बर 9, 2019

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